परत-दर-परत
इस तालिका की हर पंक्ति उस ग्रंथ के प्रकाशित पाठ से है। हमने किसी ग्रंथ की रचना-तिथि नहीं लिखी, क्योंकि ये मूल पाठ अपनी तिथि नहीं बताते और अनुमान इस साइट का आधार नहीं हैं।
| परत | ग्रंथ | गोत्र के बारे में क्या |
|---|---|---|
| वेद | ऋग्वेद (सर्वानुक्रमणी से), तैत्तिरीय आदि श्रुतियाँ, बृहदारण्यक | ऋषि-परिवारों के मण्डल; प्रवर में ऋषियों की संख्या; सात ऋषि |
| कल्पसूत्र | बौधायन, आपस्तम्ब, सत्याषाढ, कात्यायन-लौगाक्षि, आश्वलायन | गणों और प्रवरों की सूचियाँ; सगोत्र का नियम |
| पुराण-इतिहास | मत्स्य पुराण अ. 195–202; महाभारत | कुलों की सूचियाँ; ऋषियों की वंशावलियाँ और कथाएँ |
| स्मृति | मनुस्मृति III.5, V.60 | सगोत्र और सपिण्ड से विवाह-निषेध |
| निबन्ध | पुरुषोत्तम की प्रवरमञ्जरी; प्रवरदर्पण | सब सूत्रों और मत्स्य को एक जगह मिलाना; व्याख्या |
| छपा संग्रह | पी. चेन्सल राव, गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (1900) | सब ग्रंथ, 73 गणों की तालिका और नाम-सूची |
| कानून | Act XXVIII of 1946; हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 | सगोत्र-सप्रवर विवाह अवैध नहीं |
कल्पसूत्र: सूचियाँ बनती हैं
गोत्र-प्रवर की पहली व्यवस्थित सूचियाँ कल्पसूत्रों के प्रवर-अध्यायों में हैं। प्रवरमञ्जरी हर कुल के लिए इन्हें अलग-अलग काण्डों में रखती है — "बौधायनीय भृगुगोत्रकाण्ड", "आपस्तम्बाद्युक्त", "लौगाक्षिकात्यायनप्रणीत", "आश्वलायनोक्त" — और उसके बाद मत्स्य पुराण का अध्याय।
सूत्र हर जगह एक नहीं हैं। एक ही गण के प्रवर के कई रूप मिलते हैं: जैसे शुनक गण का प्रवर एक सूत्र में "गार्त्समद", दूसरे में "भार्गव, शौनहोत्र, गार्त्समद", तीसरे में "शौनक" है। इस साइट की तालिका में ये सब विकल्प सूत्र के नाम के साथ दिए गए हैं।
निबन्ध: बिखरे वचन एक जगह
गोत्राणां कोटिसंख्यात्रितयमितिमतां दुर्ग्रहत्वाच्च तस्मात् सर्वेषां सर्वगोत्रप्रवरमतिफलां मञ्जरीमारभेऽहम्।गोत्रों की संख्या तीन करोड़ मानी गई है और उन्हें पकड़ पाना कठिन है; इसलिए मैं सब गोत्रों और प्रवरों की यह "मञ्जरी" (गुच्छा) आरंभ करता हूँ।
जब सूत्रों, पुराणों और स्मृतियों के वचन अलग-अलग हों, तो उन्हें मिलाने का काम निबन्धों ने किया। पुरुषोत्तम पण्डित की प्रवरमञ्जरी अपने उद्देश्य में यही कहती है: गोत्र बहुत हैं और समझने में कठिन, इसलिए सबके गोत्र-प्रवर की "मञ्जरी" — सबके काम का एक संग्रह।
प्रवरमञ्जरी की विषय-सूची में हर कुल के सूत्र-पाठों के बाद "एतेषां व्याख्यानम्" — यानी उन सबकी व्याख्या — का अलग खंड है।
1900 का संग्रह
पी. चेन्सल राव का "गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम्" (1900) प्रवरमञ्जरी, प्रवरदर्पण और सूत्रों के प्रवर-अध्याय एक साथ छापता है, और अंत में सब गणों की तुलनात्मक तालिका और गोत्र-ऋषियों की अकारादि सूची देता है। यह ग्रंथ अब public domain में है, और इस साइट के 73 गण और 3,140 नाम उसी की तालिका (pp. 207–285) से, पृष्ठ-छवि पढ़कर लिए गए हैं।
आधुनिक कानून
Hindu Marriage Disabilities Removal Act, 1946 (Act XXVIII of 1946) ने कहा कि हिन्दुओं में समान गोत्र या प्रवर होने से विवाह अवैध नहीं होगा। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में भी सगोत्र विवाह की कोई रोक नहीं है; वहाँ रोक सपिण्ड और निषिद्ध संबंधों पर है।
इसलिए आज गोत्र का महत्व मुख्यतः धार्मिक और पारिवारिक है — पूजा में संकल्प, प्रवर-पाठ, और परिवार की अपनी विवाह-परंपरा।
