सबसे सीधा उत्तर: बौधायन का लक्षण
सप्तानां सप्तऋषीणामगस्त्याष्टमानां यदपत्यं तद्गोत्रमित्युच्यते।सात ऋषियों और आठवें अगस्त्य की जो संतान है, उसे गोत्र कहा जाता है।
गोत्र की उत्पत्ति का सबसे साफ़ कथन बौधायन का है, जिसे प्रवरमञ्जरी उद्धृत करती है। इसमें "उत्पत्ति" का अर्थ है — गोत्र किसी व्यक्ति से नहीं, एक ऋषि-वंश से जुड़ा होता है, और ऐसे मूल वंश आठ हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि केवल आठ गोत्र हैं। उन्हीं आठ ऋषियों के वंशजों के नाम पर आगे हज़ारों गोत्र बने — वत्स, शाण्डिल्य, गर्ग, पराशर जैसे नाम इन्हीं वंशों के भीतर के हैं। इस साइट का आधार-ग्रंथ इन्हें 73 गणों में बाँटता है।
ऋषि कहाँ से आए: ब्रह्मा के मानस-पुत्र
आठ गोत्रकार ऋषियों से पहले की कथा महाभारत और पुराण "ब्रह्मा के मानस-पुत्रों" के रूप में कहते हैं — यानी वे ऋषि जो ब्रह्मा के मन (संकल्प) से उत्पन्न हुए। पर यहाँ ग्रंथ एक सूची पर सहमत नहीं हैं।
महाभारत (आदि पर्व, Section LXV) छह मानस-पुत्र गिनाता है: मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु; और कहता है कि मरीचि के पुत्र कश्यप हैं। मत्स्य पुराण (अध्याय 145) दस गिनाता है: भृगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ और पुलस्त्य।
इन सूचियों और बौधायन के आठ गोत्रकारों में सीधा मेल नहीं है। अत्रि और वसिष्ठ दोनों जगह हैं; पर विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज और गौतम मानस-पुत्र नहीं, बाद की पीढ़ियों के ऋषि हैं। गोत्र-प्रवर ग्रंथ गोत्र को इन्हीं बाद के ऋषियों से गिनते हैं।
| ग्रंथ | सूची | कितने |
|---|---|---|
| महाभारत, आदि LXV | मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु | 6 मानस-पुत्र |
| मत्स्य पुराण, अ. 145 | भृगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ, पुलस्त्य | 10 मानस-पुत्र |
| बौधायन (प्रवरमञ्जरी p. 136) | विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप + अगस्त्य | 7 + 1 गोत्रकार |
मत्स्य पुराण में मनु का प्रश्न
मत्स्य पुराण के गोत्र-अध्याय (195–202) एक संवाद से शुरू होते हैं। वैवस्वत मनु भगवान मत्स्य से पूछते हैं कि ऋषियों के गोत्र, वंश, अवतार और प्रवर बताइए। इसके उत्तर में मत्स्य भृगु-वंश से शुरू करके एक-एक कुल के गोत्र और प्रवर गिनाते हैं।
मत्स्य के अध्यायों का क्रम है — भृगु (195), अंगिरा (196), अत्रि (197), विश्वामित्र (198), कश्यप (199), वसिष्ठ और पराशर (200–201), अगस्त्य (202)। प्रवरमञ्जरी भी इसी क्रम में हर कुल के काण्ड रखती है, और मत्स्य पुराण उसके आधारों में गिना गया है।
"तीन करोड़ गोत्र" — गिनती क्यों नहीं होती
गोत्राणां कोटिसंख्यात्रितयमितिमतां दुर्ग्रहत्वाच्च तस्मात् सर्वेषां सर्वगोत्रप्रवरमतिफलां मञ्जरीमारभेऽहम्।गोत्रों की संख्या तीन करोड़ मानी गई है और उन्हें पकड़ पाना कठिन है; इसलिए मैं सब गोत्रों और प्रवरों की यह "मञ्जरी" (गुच्छा) आरंभ करता हूँ।
प्रवरमञ्जरी अपने आरंभ में ही कहती है कि गोत्र तीन करोड़ माने गए हैं और उन्हें पकड़ पाना कठिन है। बौधायन का वचन भी यही है — गोत्र हज़ारों, लाखों, करोड़ों हैं, पर प्रवर उनचास ही हैं।
इसलिए गोत्र की "उत्पत्ति" का अर्थ एक-एक गोत्र का इतिहास नहीं, बल्कि वह ढाँचा है जिसमें हर गोत्र आठ मूल वंशों में से किसी एक से जुड़ता है, और उसका प्रवर उस जुड़ाव को बताता है।
ग्रंथ क्या नहीं बताते
इन ग्रंथों में गोत्र-व्यवस्था की कोई तिथि नहीं दी गई है, और न ही यह कि यह व्यवस्था किस राजा या काल में बनी। आधुनिक इतिहासकारों के अनुमान इन मूल ग्रंथों का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए हम उन्हें यहाँ "उत्पत्ति" के रूप में नहीं लिखते।
ग्रंथ गोत्र-व्यवस्था का कोई "वैज्ञानिक" या जैविक कारण भी नहीं देते। उनका कारण धार्मिक है: यज्ञ में प्रवर का पाठ और विवाह के नियम।
