प्राचीन भारत में गोत्र व्यवस्था — प्रवरमञ्जरी के अनुसार ढाँचा और नियम

गोत्र-प्रवर ग्रंथों में गोत्र व्यवस्था कैसे चलती थी: आठ कुलों का क्रम, किन गणों में आपस में विवाह होता था, क्षत्रियों का पुरोहित-प्रवर, अनजाने में हुई भूल का प्रायश्चित्त — मूल वचनों सहित।

संक्षेप में

गोत्र-प्रवर ग्रंथों में गोत्र व्यवस्था का ढाँचा एक जैसा है: पहले प्रवर बोलने के नियम, फिर भृगु, आङ्गिरस, अत्रि, विश्वामित्र, कश्यप, वसिष्ठ और अगस्त्य के कुल, और अंत में क्षत्रियों का प्रवर। हर कुल के गणों के लिए बताया गया है कि वे आपस में विवाह कर सकते हैं या नहीं। प्रवरमञ्जरी यह पूरा ढाँचा अपने आरंभ में देती है।

व्यवस्था किन ग्रंथों पर टिकी है

अत्र बोधायनापस्तम्बसत्याषाढकुण्डिनभरद्वाजलौगाक्षिकात्यायनाश्वलायनादिभिः कल्पसूत्रकारैर्मत्स्यादिपुराणकारैर्भारतादीतिहासकारैर्मन्वादिभिस्स्मृतिकारैरुपदिष्टान्प्रवराध्यायाननुपलभ्य…

यहाँ बौधायन, आपस्तम्ब, सत्याषाढ, कुण्डिन, भरद्वाज, लौगाक्षि, कात्यायन, आश्वलायन आदि कल्पसूत्रकारों; मत्स्य आदि पुराणकारों; भारत आदि इतिहासकारों और मनु आदि स्मृतिकारों के बताए प्रवर-अध्यायों को लेकर…

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 2 (प्रवरमञ्जरी, उपोद्घात) (archive.org leaf 40)

प्रवरमञ्जरी अपने आधार खुद गिनाती है: आठ कल्पसूत्रकार (बौधायन, आपस्तम्ब, सत्याषाढ, कुण्डिन, भरद्वाज, लौगाक्षि, कात्यायन, आश्वलायन), मत्स्य आदि पुराण, महाभारत आदि इतिहास, और मनु आदि स्मृतियाँ। विषय भी वह स्वयं बताती है: गोत्र का स्वरूप और संख्या, समान गोत्र, द्विगोत्र, उससे होने वाला विवाह-निषेध, और प्रवर का स्वरूप, संख्या और विकल्प — तीनों वर्णों के लिए।

कुल-दर-कुल विवाह के नियम

प्रवरमञ्जरी (pp. 3–4) हर कुल के बारे में बताती है कि उसके गण आपस में विवाह कर सकते हैं या नहीं। ज़्यादातर कुलों में सब गण आपस में "अविवाह" हैं, यानी एक कुल के किसी गण का दूसरे गण से विवाह नहीं होता। अपवाद भृगु और केवल-आङ्गिरस में हैं।

कुलगण (उदाहरण)आपस में विवाह
भृगुवत्स, बिद, आर्ष्टिषेण; यस्क, शुनक, मित्रयु, वैन्यवत्स-बिद-आर्ष्टिषेण आपस में नहीं; यस्क से वैन्य तक अपना गण छोड़कर सबसे
गौतम (आङ्गिरस)आयास्य, औचथ्य, औशिज, राहूगण, सोमराजकि, वामदेव, बृहदुक्थसब आपस में नहीं
भरद्वाज (आङ्गिरस)केवल भरद्वाज, शुङ्ग-शैशिरि, ऋक्ष, कपि, गर्गसब आपस में नहीं
केवल-आङ्गिरसहरित, कुत्स, कण्व, रथीतर, मुद्गल, संकृति, विष्णुवृद्धहरित-कुत्स आपस में नहीं; कण्व आदि आपस में कर सकते हैं
अत्रिकेवल आत्रेय, वाग्भूतक, गविष्ठिर, अतिथि, पुत्रिकापुत्रसब आपस में नहीं
विश्वामित्रदेवरात, लोहित, कत, धनञ्जय, अघमर्षण, पूरण, इन्द्रकौशिक…सब आपस में नहीं
कश्यपनिध्रुव, रेभ, शण्डिल, लौगाक्षसब आपस में नहीं
वसिष्ठकेवल वसिष्ठ, उपमन्यु, पराशर, कुण्डिन, संकृतिसब आपस में नहीं
अगस्त्यइध्मवाह, साम्भवाह, सोमवाह, यज्ञवाह, माहेन्द्र, पौर्णमाससब आपस में नहीं

भृगु और आङ्गिरस में अपवाद क्यों

एक एव ऋषिर्यावत्प्रवरेष्वनुवर्तते। तावत्समानगोत्रत्वमन्यत्र भृग्वङ्गिरसां गणात्॥

सात ऋषियों और आठवें अगस्त्य में से कोई एक ऋषि जब तक दो प्रवरों में साझा हो, तब तक वे समान गोत्र माने जाते हैं — भृगु और आङ्गिरस के गणों को छोड़कर।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 26 (प्रवरमञ्जरी, बौधायन का वचन) (archive.org leaf 64)

तालिका का अपवाद बौधायन के सगोत्र-नियम से निकलता है। दो गण तभी सगोत्र हैं जब आठ गोत्रकारों में से कोई ऋषि दोनों के प्रवर में साझा हो। वत्स, बिद और आर्ष्टिषेण के प्रवर में जमदग्नि (गोत्रकार) है, इसलिए वे आपस में सगोत्र हैं। यस्क, शुनक आदि के प्रवर में जमदग्नि नहीं है; उनमें कुछ साझा हो तो केवल "भार्गव", जो गोत्रकार नहीं — इसलिए वे आपस में विवाह कर सकते हैं।

क्षत्रियों का प्रवर

क्षत्रियाणामात्मीयप्रवरः पुरोहितप्रवरश्चोपदिष्टः। पुरोहितगोत्रैः पुरोहितप्रवरैश्च सह क्षत्रियाणामविवाहो नोपदिष्टः, प्राप्त्यभावात्॥

क्षत्रियों के लिए उनका अपना प्रवर, और पुरोहित का प्रवर — दोनों बताए गए हैं। पुरोहित के गोत्र और प्रवर वालों से क्षत्रियों का विवाह-निषेध नहीं बताया गया, क्योंकि वह नियम उन पर लागू ही नहीं होता।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 4 (प्रवरमञ्जरी) (archive.org leaf 42)

प्रवरमञ्जरी (p. 4) के अनुसार क्षत्रियों के लिए उनके पुरोहित का प्रवर बताया गया है, और पुरोहित के गोत्र वालों से विवाह का निषेध उन पर लागू नहीं होता। पृष्ठ 128 पर यही बात फिर आती है: राजाओं के विवाह में वही प्रवर लिया जाए जो उनके पुरोहित बोलते हैं।

अनजाने में हुई भूल का क्या?

गर्भश्चेत्स्याददुष्टस्स मुनिभिरुदितः काश्यपो गोत्रविद्भिः॥

अगर (अनजाने में हुए सगोत्र विवाह से) गर्भ हो, तो वह संतान दोषी नहीं; गोत्र जानने वाले मुनियों ने उसे काश्यप (गोत्र का) कहा है।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 1 (प्रवरमञ्जरी, श्लोक 4) (archive.org leaf 39)

प्रवरमञ्जरी के आरंभिक श्लोक (4–5) सगोत्र विवाह को दोष मानते हैं और जानबूझकर किए गए विवाह की निंदा करते हैं। पर अनजाने में हुई भूल के लिए चान्द्रायण व्रत का प्रायश्चित्त बताते हैं, और कहते हैं कि यदि संतान हो तो वह दोषी नहीं — गोत्र जानने वाले मुनि उसे काश्यप गोत्र का कहते हैं।

यह "गोत्र न पता हो तो कश्यप" वाले वचन से अलग प्रसंग है। जिसे अपना गोत्र पता न हो, उसके लिए प्रवरमञ्जरी (p. 128) आचार्य का गोत्र बताती है; और संस्काररत्नमाला (p. 427) के अनुसार "काश्यपं गोत्रमुच्यते" तभी, जब पुरोहित-आचार्य का गोत्र भी अज्ञात हो, और विवाह के लिए नहीं।

आज की कानूनी स्थिति अलग है: हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 सगोत्र विवाह को अवैध नहीं मानता। इस पर विस्तार सगोत्र विवाह वाले लेख में है।

स्रोत

प्राचीन भारत में गोत्र व्यवस्था — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न