ऋग्वेद: मंडल, सूक्त, देवता और प्रमुख मंत्र

दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक

संक्षेप में

ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे पुराना मंत्र-संग्रह माना जाता है। इसमें दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 मंत्र (ऋचाएँ) हैं, जो अग्नि, इंद्र, वरुण, उषा, सोम जैसे देवताओं की स्तुति हैं। गायत्री मंत्र, नासदीय सूक्त और पुरुष सूक्त इसी के हैं। आज केवल शाकल शाखा का पाठ बचा है।

एक नज़र में

नाम का अर्थ
ऋक् (स्तुति का छंदबद्ध मंत्र) + वेद (ज्ञान): स्तुति-मंत्रों का ज्ञान
विभाजन
10 मंडल → 1,028 सूक्त → 10,552 ऋचाएँ (Aufrecht की संहिता से गिनी हुई)
उपलब्ध शाखा
केवल शाकल; बाष्कल आदि का पूरा पाठ नहीं बचा
यज्ञ में ऋत्विज
होता: ऋग्वेद के मंत्रों से देवताओं का आह्वान करने वाला
सबसे अधिक सूक्त
इंद्र (कम से कम 250), अग्नि (लगभग 200), सोम (100 से अधिक)
प्रमुख छंद
गायत्री, त्रिष्टुभ्, जगती: तीनों मिलकर लगभग चार-पाँचवाँ भाग
ब्राह्मण
ऐतरेय, कौषीतकि (शांखायन)
आरण्यक और उपनिषद
ऐतरेय आरण्यक में ऐतरेय उपनिषद; कौषीतकि आरण्यक में कौषीतकि उपनिषद
पहला मंत्र
अग्निमीळे पुरोहितं… (1.1.1)
अंतिम सूक्त
10.191: संज्ञान, यानी मन और संकल्प की एकता

ऋग्वेद क्या है?

कल्पना कीजिए, हज़ारों साल पहले भोर से पहले का अँधेरा है। यज्ञ-वेदी पर अग्नि जलाई जा रही है, और एक ऋषि धीमे, सधे स्वर में कहते हैं: "अग्निमीळे पुरोहितं…" यानी "मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ, जो यज्ञ के आगे रखे गए पुरोहित हैं।" ऋग्वेद का पहला मंत्र यही है, और यहीं से भारत की लिखित-मौखिक ज्ञान-परंपरा का सबसे पुराना ग्रंथ शुरू होता है।

"ऋग्वेद" दो शब्दों से बना है: "ऋक्" और "वेद"। ऋक् या ऋचा उस छंदबद्ध मंत्र को कहते हैं जिससे किसी देवता की स्तुति की जाती है, और वेद का अर्थ है ज्ञान। इस तरह ऋग्वेद का अर्थ हुआ: स्तुति-मंत्रों का ज्ञान। सामवेद और यजुर्वेद की तरह यह किसी एक यज्ञ-विधि के लिए छाँटकर नहीं बना। Macdonell लिखते हैं कि इसे इकट्ठा करने वालों का उद्देश्य पुरानी विरासत को बदलने और नष्ट होने से बचाना था। इसलिए ऋग्वेद अपने आप में एक पूरा काव्य-संग्रह है।

परंपरा वेद को "अपौरुषेय" मानती है, यानी किसी मनुष्य की रचना नहीं। ऋषियों को मंत्र-द्रष्टा कहा जाता है: उन्होंने मंत्र रचे नहीं, "देखे"। इसीलिए हर सूक्त के साथ उसके ऋषि, देवता और छंद का नाम याद रखा जाता है। विष्णु पुराण कहता है कि वेद मूल में एक ही था, और हर द्वापर युग में व्यास उसे चार भागों में बाँटते हैं। इस द्वापर में यह काम कृष्ण द्वैपायन ने किया और ऋग्वेद अपने शिष्य पैल को सौंपा।

चारों वेदों और वैदिक साहित्य में ऋग्वेद का स्थान

चारों वेदों में ऋग्वेद को पहला स्थान दिया जाता है, और इसके दो कारण हैं। पहला कारण पुराना होना है: विद्वान ऋग्वेद को सबसे पुरानी संहिता मानते हैं। दूसरा कारण यह है कि बाकी वेद उस पर टिके हैं। Macdonell बताते हैं कि सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद ने ऋग्वेद के बहुत-से सूक्त, मंत्र और पंक्तियाँ अपने में ली हैं। इसलिए ऋग्वेद के पाठ की जाँच में बाकी वेद वही काम करते हैं जो किसी दूसरे ग्रंथ की जाँच में पुरानी पांडुलिपियाँ करती हैं।

यज्ञ में चार मुख्य ऋत्विज (पुरोहित) होते हैं, और हर एक का अपना वेद है। ऋग्वेद "होता" का वेद है। होता ऋचाएँ पढ़कर देवताओं को यज्ञ में बुलाता और उनकी स्तुति करता है। ऋग्वेद का पहला मंत्र ही अग्नि को "होतारं" कहता है, यानी अग्नि स्वयं देवताओं के होता हैं। यजुर्वेद अध्वर्यु का, सामवेद उद्गाता का और अथर्ववेद ब्रह्मा नाम के ऋत्विज का वेद है।

हर वेद के चार स्तर माने जाते हैं: संहिता (मंत्रों का संग्रह), ब्राह्मण (यज्ञ की व्याख्या), आरण्यक (वन में किए जाने वाले चिंतन) और उपनिषद (आत्मा और ब्रह्म का ज्ञान)। जब कोई "ऋग्वेद" कहता है, तो आमतौर पर उसका अर्थ ऋग्वेद-संहिता होता है, और इस पृष्ठ का मुख्य विषय भी वही है। ऋग्वेद से जुड़े ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद नीचे अलग खंड में हैं।

ऋग्वेद की संरचना: मंडल, सूक्त और मंत्र

ऋग्वेद का सबसे प्रचलित विभाजन मंडल के हिसाब से है। "मंडल" का अर्थ है घेरा या चक्र। पूरा ग्रंथ दस मंडलों में बँटा है। हर मंडल में कई सूक्त हैं, और हर सूक्त में कई मंत्र। "सूक्त" का अर्थ है "अच्छी तरह कहा गया", यानी एक पूरी स्तुति या एक पूरा गीत। एक सूक्त में कम से कम तीन मंत्र होते हैं, और Macdonell के अनुसार सबसे लंबे में 58 तक।

नीचे की गिनती किसी किताब से उठाई हुई नहीं है। हमने Aufrecht की ऋग्वेद-संहिता के पूरे पाठ में हर सूक्त और हर मंत्र को स्वयं गिना है। कुल 1,028 सूक्त और 10,552 मंत्र निकले। इन 1,028 में आठवें मंडल के 11 "वालखिल्य" सूक्त (8.49 से 8.59) भी शामिल हैं। वालखिल्य का अर्थ है पूरक सूक्त, जो बाद में बीच में जोड़े गए माने जाते हैं। इन्हें हटा दें तो 1,017 सूक्त बचते हैं। Macdonell भी शाकल पाठ के यही दो आँकड़े, 1,017 और 1,028, देते हैं।

पहले और दसवें, दोनों मंडलों में ठीक 191-191 सूक्त हैं। Macdonell का अनुमान है कि दसवें मंडल में बाद के सूक्त इसी तरह जोड़े गए कि उसकी गिनती पहले मंडल के बराबर हो जाए। सबसे छोटा मंडल दूसरा है, 43 सूक्तों का। मंत्रों में सबसे बड़ा पहला मंडल है, 2,006 मंत्रों का।

मंडल-वार सूक्त और मंत्र (Aufrecht की संहिता से गिनती)
मंडलसूक्तमंत्र (ऋचाएँ)मुख्य ऋषि-परंपरास्रोत
पहला1912,006अनेक ऋषि ("शतर्चिन्"), मधुच्छन्दा से अगस्त्य तकऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 1; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 1, 5
दूसरा43429गृत्समद (भार्गव शौनक)ऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 2; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 13
तीसरा62617विश्वामित्रऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 3; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 14–15
चौथा58589वामदेव गौतमऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 4; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 17
पाँचवाँ87727अत्रि-वंशऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 5; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 19
छठा75765भरद्वाजऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 6; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 22
सातवाँ104841वसिष्ठऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 7; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 24
आठवाँ103 (11 वालखिल्य सहित)1,716मुख्यतः कण्व-वंशऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 8; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 27
नौवाँ1141,108अनेक ऋषि; सब सूक्त सोम पवमान केऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 9; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 36
दसवाँ1911,754अनेक ऋषि, छोटे-बड़े सूक्तऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 10; सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 46
कुल1,02810,552ऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), सभी मंडल

दस मंडलों का परिचय: कुल-मंडल, सोम-मंडल और दसवाँ मंडल

दस मंडल एक जैसे नहीं हैं, और उनका अंतर समझ लें तो ऋग्वेद को पढ़ना आसान हो जाता है। दूसरे से सातवें तक के छह मंडल "कुल-मंडल" (family books) कहलाते हैं। हर एक किसी एक ऋषि और उसके वंशजों का है: दूसरा गृत्समद का, तीसरा विश्वामित्र का, चौथा वामदेव का, पाँचवाँ अत्रि-वंश का, छठा भरद्वाज का और सातवाँ वसिष्ठ का। Macdonell कहते हैं कि ये संग्रह बहुत समय तक अलग-अलग परिवारों में ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते रहे होंगे। उनके भीतर सूक्त एक ही ढंग से, एक-एक देवता के समूहों में सजे हैं।

पहला, आठवाँ और दसवाँ मंडल किसी एक कुल के नहीं हैं। उनमें कई ऋषियों के सूक्त-समूह हैं। आठवें मंडल में कण्व-वंश के ऋषि सबसे अधिक हैं, और पहले मंडल के पहले पचास सूक्तों में भी कण्वों के सूक्त आधे से अधिक हैं। ऋग्वेद का पहला सूक्त विश्वामित्र-वंशी मधुच्छन्दा का है।

नौवाँ मंडल पूरा एक ही देवता, "सोम पवमान" (छनते हुए सोम) को समर्पित है। इसके सूक्त उन्हीं कुलों के ऋषियों के हैं जिनके कुल-मंडल हैं। Macdonell का अनुमान है कि जब कुल-मंडल एक ग्रंथ में जोड़े गए, तब उनके सोम-सूक्त निकालकर यहाँ एक जगह रखे गए। इसका अर्थ यह नहीं कि सोम-सूक्त नए हैं; सोम की परंपरा तो बहुत पुरानी है।

दसवाँ मंडल सबसे अलग है। इसमें ऐसे विषय आते हैं जो पहले के मंडलों में लगभग नहीं हैं: सृष्टि के प्रश्न (नासदीय, हिरण्यगर्भ, पुरुष सूक्त), विवाह और अंत्येष्टि, और "श्रद्धा", "मन्यु" जैसे भावों की स्तुति। Macdonell भाषा के उदाहरण देकर दसवें मंडल को बाद का मानते हैं। फिर भी वे यह भी लिखते हैं कि किसी सूक्त का संग्रह में बाद में आना यह सिद्ध नहीं करता कि वह रचा भी बाद में गया।

किस मंडल के कौन ऋषि हैं, किस ऋषि ने कौन-सा प्रसिद्ध मंत्र देखा, और सर्वानुक्रमणी क्या कहती है: यह सब इस साइट के "मन्त्र-द्रष्टा ऋषि" लेख में विस्तार से है। यहाँ उसका सार ही दिया गया है।

सूक्त, मंत्र, ऋचा और छंद: एक मंत्र बनता कैसे है?

ऋग्वेद का हर मंत्र छंद में है, यानी उसकी एक तय लय है। पर यह लय यूनानी कविता की तरह "पैरों" (feet) पर नहीं, अक्षरों की गिनती पर चलती है। मंत्र की एक पंक्ति को "पाद" कहते हैं। पाद का अर्थ है चौथाई, क्योंकि सबसे आम मंत्र में चार पंक्तियाँ होती हैं, जैसे पशु के चार पैर। एक पाद में आमतौर पर 8, 11 या 12 अक्षर होते हैं।

ऋग्वेद में लगभग पंद्रह छंद मिलते हैं, पर तीन सबसे आम हैं। गायत्री में 8-8 अक्षरों के तीन पाद होते हैं; Macdonell के अनुसार ऋग्वेद के लगभग एक-चौथाई मंत्र (2,450) इसी में हैं, और पहला मंत्र "अग्निमीळे" भी गायत्री में है। त्रिष्टुभ् में 11-11 अक्षरों के चार पाद होते हैं, और जगती में 12-12 के। ये तीनों मिलकर ऋग्वेद के लगभग चार-पाँचवें भाग में हैं। ध्यान रहे, "गायत्री" एक छंद का नाम है। जिसे आज "गायत्री मंत्र" कहते हैं, वह इसी छंद में रचा सविता का एक मंत्र (3.62.10) है।

ऋग्वेद के पाठ में स्वर भी होते हैं: उदात्त (ऊँचा), अनुदात्त (नीचा) और स्वरित (ऊँचे से नीचे उतरता)। छपी संहिता में अनुदात्त के नीचे आड़ी रेखा और स्वरित के ऊपर खड़ी रेखा लगाई जाती है, और उदात्त पर कोई चिह्न नहीं होता। वैदिक पाठी आज भी इन्हीं स्वरों के साथ पाठ करते हैं। स्वर बदलने से अर्थ बदल सकता है, इसलिए परंपरा में स्वर की शुद्धता को बहुत बड़ी बात माना गया है।

ऋग्वेद की शाखाएँ: पाँच के नाम, एक बचा पाठ

वेद की "शाखा" का अर्थ है उसकी एक पाठ-परंपरा, यानी गुरु-शिष्य की वह धारा जो संहिता को एक विशेष रूप में सँभालती आई। "चरणव्यूह" नाम का सूत्रकाल का ग्रंथ ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ गिनाता है: शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन और माण्डूकेय।

पर Macdonell साफ़ करते हैं कि आश्वलायन और शांखायन अलग पाठ नहीं थे। उनका शाकलों से अंतर बस इतना था कि वे वालखिल्य सूक्तों को मान्यता देते थे। बाष्कल पाठ में आठ सूक्त अधिक थे, और पहले मंडल के एक समूह का क्रम अलग था। माण्डूकेय पाठ के बारे में कोई जानकारी नहीं बची। आज पूरी तरह उपलब्ध पाठ केवल शाकल शाखा का है, और ऋग्वेद के सारे छपे संस्करण इसी पर आधारित हैं।

पुराण यही बात कथा के रूप में कहते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार पैल ने ऋग्वेद की दो संहिताएँ बनाईं, एक इन्द्रप्रमति को दी और एक बाष्कल को। आगे चलकर शाकल्य ने अपनी संहिता को पाँच भागों में बाँटा। व्यास से शुरू होकर यह शाखा-वृक्ष कैसे फैला, यह "वेद-विभाजन" लेख में पूरी कथा के साथ है।

ऋग्वेद के प्रमुख ऋषि और ऋषिकाएँ

सर्वानुक्रमणी, यानी ऋग्वेद के सूक्तों की पुरानी सूची, एक सरल नियम देती है: "यस्य वाक्यं स ऋषिः"। जिसके वचन मंत्र में हैं, वही उस मंत्र का ऋषि है, चाहे पुरुष हो या स्त्री, मनुष्य हो या कोई और। इसी नियम से ऋग्वेद में कई स्त्री-ऋषि, यानी ऋषिकाएँ, दर्ज हैं।

कुल-मंडलों के छह महान ऋषि हैं: गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भरद्वाज और वसिष्ठ। इनके अलावा मधुच्छन्दा, मेधातिथि, कण्व, कुत्स और अगस्त्य पहले मंडल में आते हैं। भारतीय परंपरा में ये नाम केवल कवियों के नहीं, पूरे कुलों और गोत्रों के आदि-पुरुषों के हैं। इसीलिए आज भी संकल्प में गोत्र और प्रवर बोलते समय इन्हीं ऋषियों का स्मरण होता है।

ऋषिकाओं में लोपामुद्रा का नाम सबसे प्रसिद्ध है। सूक्त 1.179 लोपामुद्रा और उनके पति अगस्त्य का संवाद है। अत्रि-वंश की कन्या अपाला के सात मंत्र 8.91 में हैं, और सर्वानुक्रमणी इस सूक्त को "इतिहास", यानी घटी हुई कथा, कहती है। सूक्त 8.1 का अंतिम मंत्र आङ्गिरसी शश्वती का है, जिसमें वे अपने पति की स्तुति करती हैं। 10.10 के यम-यमी संवाद में यमी के वचन हैं। सूक्त 10.125 में तो वाणी (वाक्) स्वयं "अहम्", यानी "मैं" कहकर बोलती है।

ऋग्वेद के प्रमुख देवता

ऋग्वेद के देवता प्रकृति की शक्तियों से गहरे जुड़े हैं: आग, आकाश, वर्षा, भोर, सूर्य, हवा, नदियाँ। पर वे केवल प्रकृति नहीं हैं। उनके साथ नैतिक व्यवस्था, सत्य और दया के भाव भी जुड़े हैं। Macdonell गिनती देते हैं: बीस से भी कम देवता ऐसे हैं जिनके कम से कम तीन पूरे सूक्त हों। इंद्र के कम से कम 250 सूक्त हैं, अग्नि के लगभग 200 और सोम के 100 से अधिक। इंद्र अकेले ऋग्वेद के एक-चौथाई से अधिक भाग में हैं।

उषा, यानी भोर की देवी, लगभग अकेली देवी हैं जिनके पूरे सूक्त हैं, और उनके लगभग बीस सूक्त हैं। वायु के केवल तीन पूरे सूक्त हैं। रुद्र, जो आगे चलकर शिव के रूप में पूजे गए, ऋग्वेद में केवल तीन-चार सूक्तों में हैं। विष्णु भी ऋग्वेद में कम सूक्तों वाले देवता हैं। उनकी सबसे बड़ी पहचान तीन पगों से पूरे लोक नाप लेना है: सूक्त 1.154 कहता है कि विष्णु ने पृथ्वी के लोकों को नापा और "त्रेधा", यानी तीन पगों में, ऊपर के लोक को थाम लिया। पुराणों की वामन-कथा का बीज यही है।

ऋग्वेद का एक मंत्र इन सब देवताओं को एक सूत्र में बाँध देता है, और वह सूत्र आगे चलकर पूरे भारतीय चिंतन की नींव बना। 1.164.46 कहता है: सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं: इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, यम, मातरिश्वा।

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥

उसे इंद्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं; वही दिव्य, सुंदर पंखों वाला गरुत्मान् है। सत्य एक है, ज्ञानी उसे बहुत तरह से कहते हैं: अग्नि, यम, मातरिश्वा।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.164.46
ऋग्वेद के कुछ प्रमुख देवता एक नज़र में
देवताक्या हैंऋग्वेद में स्थानस्रोत
इंद्रवर्षा और युद्ध के देवता, वृत्र का वध करने वालेकम से कम 250 सूक्त; ग्रंथ का एक-चौथाई से अधिकMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV
अग्नियज्ञ की आग; देवताओं के होता और दूतलगभग 200 सूक्त; पहला सूक्त इन्हीं काMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV; ऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 1.1
सोमयज्ञ का पवित्र पेय और उसके देवता100 से अधिक; पूरा नौवाँ मंडलMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV; ऋग्वेद, खण्ड 2 (Griffith अनु.), Book IX
वरुणऋत (विश्व-व्यवस्था) और नैतिक नियम के रक्षकवसिष्ठ के सातवें मंडल में सबसे भावुक स्तुतियाँऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 7.86–89
उषाभोर की देवीलगभग 20 सूक्त; लगभग अकेली देवी जिनके पूरे सूक्त हैंMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV
सविताप्रेरणा देने वाले सूर्य-देवगायत्री मंत्र (3.62.10) इन्हीं काऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 3.62.10
विष्णुतीन पगों में लोक नापने वालेकम सूक्त; 1.154 प्रमुखऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 1.154.1; Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV
रुद्रधनुष-बाण वाले उग्र देव, औषधि के स्वामी भीतीन-चार सूक्त; महामृत्युंजय मंत्र (7.59.12) इन्हीं काMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV; ऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 7.59.12

अग्नि सूक्त: ऋग्वेद का पहला सूक्त (1.1)

ऋग्वेद अग्नि से शुरू होता है, और यह संयोग नहीं है। वैदिक जीवन का केंद्र यज्ञ था, और यज्ञ का केंद्र अग्नि। पहले सूक्त के नौ मंत्र विश्वामित्र-वंशी मधुच्छन्दा के हैं और गायत्री छंद में हैं। पहले ही मंत्र में अग्नि को चार नाम दिए गए हैं। वे "पुरोहित" हैं, यानी आगे रखे गए; "यज्ञस्य देवम्", यज्ञ के देवता; "ऋत्विजम्", ठीक ऋतु पर यज्ञ करने वाले; और "होतारम्", देवताओं को बुलाने वाले। "रत्नधातमम्" का अर्थ है सबसे अधिक रत्न देने वाले।

इस सूक्त का सबसे कोमल मंत्र अंतिम (1.1.9) है। ऋषि अग्नि से कहते हैं: जैसे पिता अपने बेटे के लिए सहज ही पास आ जाता है, वैसे ही तुम हमारे पास आओ और हमारे कल्याण के लिए हमारे साथ रहो। इसमें देवता को डर से नहीं, पिता जैसे अपनेपन से पुकारा गया है। ऋग्वेद के बहुत-से सूक्तों का स्वर यही है: भक्त और देवता के बीच मित्रता और भरोसा।

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥

मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ, जो यज्ञ के आगे रखे गए पुरोहित हैं, यज्ञ के देवता हैं, समय पर यज्ञ करने वाले ऋत्विज हैं, देवताओं को बुलाने वाले होता हैं और सबसे अधिक धन-रत्न देने वाले हैं।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.1.1
स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये ॥

हे अग्नि, जैसे पिता अपने पुत्र के लिए सहज ही पास आ जाता है, वैसे तुम हमारे लिए सुलभ बनो। हमारे कल्याण के लिए हमारे साथ रहो।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.1.9

इंद्र सूक्त: "स जनास इन्द्रः" (2.12)

इंद्र ऋग्वेद के सबसे प्रिय देवता हैं: वर्षा लाने वाले, वृत्र नाम के उस दैत्य को मारने वाले जिसने जल को रोक रखा था, और युद्ध में आर्य जनों के रक्षक। Macdonell उन्हें वैदिक लोगों का "राष्ट्रीय देवता" कहते हैं। वृत्र-वध की कथा ऋग्वेद में बार-बार आती है: इंद्र ने वृत्र को मारकर बँधे हुए जल को छुड़ाया, और नदियाँ समुद्र की ओर बह चलीं।

गृत्समद का सूक्त 2.12 इंद्र-स्तुति का सबसे प्रसिद्ध नमूना है। इसके लगभग हर मंत्र का अंत एक ही टेक पर होता है: "स जनास इन्द्रः", यानी "हे लोगो, वही इंद्र है"। ऋषि एक-एक करके बताते हैं कि किसने जन्म लेते ही देवताओं को अपनी शक्ति से घेर लिया, किसके बल से धरती और आकाश काँपते हैं। फिर हर बार उत्तर देते हैं: वही इंद्र है।

इस सूक्त का पाँचवाँ मंत्र बहुत रोचक है, क्योंकि उसमें उस समय के संदेह की भी झलक है। लोग पूछते हैं, "वह कहाँ है?", और कुछ कहते हैं, "वह है ही नहीं।" ऋषि उत्तर देते हैं: "उस पर श्रद्धा रखो (श्रदस्मै धत्त), वही इंद्र है।" हज़ारों साल पुराने ग्रंथ में संदेह और श्रद्धा का यह आमना-सामना बताता है कि वैदिक ऋषि प्रश्नों से डरते नहीं थे।

यं स्मा पृच्छन्ति कुह सेति घोरमुतेमाहुर्नैषो अस्तीत्येनम् । सो अर्यः पुष्टीर्विज इवा मिनाति श्रदस्मै धत्त स जनास इन्द्रः ॥

जिस भयंकर के बारे में लोग पूछते हैं कि "वह कहाँ है?", और जिसके बारे में कहते हैं कि "वह है ही नहीं", वह शत्रु की समृद्धि को ऐसे छीन लेता है जैसे बहेलिया पक्षियों को (कुछ इसे जुए के दाँव की उपमा मानते हैं, "विजः" का अर्थ पक्का नहीं)। उस पर श्रद्धा रखो; हे लोगो, वही इंद्र है।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 2.12.5

वरुण के सूक्त: ऋत, पाप और क्षमा

अगर इंद्र ऋग्वेद के सबसे शक्तिशाली देवता हैं, तो वरुण सबसे नैतिक। वरुण "ऋत" के रक्षक हैं। ऋत का अर्थ है वह अटल व्यवस्था जिससे सूर्य उगता है, ऋतुएँ आती हैं और मनुष्य को सत्य पर चलना चाहिए। आगे चलकर "धर्म" शब्द ने जो जगह ली, ऋग्वेद में उसका बीज ऋत में है। वरुण के सामने ऋषि अपना अपराध मानते हैं और क्षमा माँगते हैं, जो दूसरे देवताओं के सूक्तों में कम दिखता है।

वसिष्ठ के सातवें मंडल का सूक्त 7.86 इसका सबसे सुंदर उदाहरण है। ऋषि को लगता है कि वरुण उनसे रूठे हैं, और वे बेचैन होकर पूछते हैं: "मेरा कौन-सा बड़ा अपराध था कि तुम अपने ही स्तुति करने वाले मित्र को मारना चाहते हो?" फिर वे विनती करते हैं कि यदि पिता-दादाओं का या अपना कोई पाप हो, तो उसे ढीला कर दो। एक मनुष्य का अपने देवता के आगे टूटकर अपनी गलती पूछना: यही भाव आगे चलकर भक्ति-परंपरा में बार-बार दिखता है।

किमाग आस वरुण ज्येष्ठं यत्स्तोतारं जिघांससि सखायम् । प्र तन्मे वोचो दूळभ स्वधावोऽव त्वानेना नमसा तुर इयाम् ॥

हे वरुण, मेरा वह कौन-सा बड़ा अपराध था कि तुम अपने स्तुति करने वाले मित्र को मारना चाहते हो? हे अजेय, अपनी शक्ति वाले देव, मुझे वह बताओ, ताकि मैं निष्पाप होकर, नमस्कार के साथ, जल्दी तुम्हारे पास आ सकूँ।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 7.86.4

उषा सूक्त: भोर की देवी

उषा के सूक्त ऋग्वेद की सबसे सुंदर कविता माने जाते हैं। उषा भोर की लाली हैं, "चमकने वाली"। वे रोज़ लौटती हैं, सोए हुए जीवों को जगाती हैं और हर एक को अपने काम पर भेजती हैं। Macdonell लिखते हैं कि जब ऋषि उषा को पुकारते हैं, तो भोर का असली दृश्य उनके मन से कभी अलग नहीं होता। यह स्तुति आसमान को देखते हुए की गई कविता है।

सूक्त 1.113 उषा के सबसे प्रसिद्ध सूक्तों में है। बीस मंत्रों के इस सूक्त में उषा हर जीव को अलग-अलग काम के लिए जगाती है: किसी को चलने के लिए, किसी को भोग के लिए, किसी को धन, यश या अपने लक्ष्य के लिए (मंत्र 5–6)। ग्यारहवाँ मंत्र समय पर एक गहरी बात कहता है: जिन मनुष्यों ने पहले की उषा देखी, वे चले गए; अब हम उसे देख रहे हैं; और जो आगे की उषाएँ देखेंगे, वे भी आ रहे हैं। इसका सोलहवाँ मंत्र मानो सबको जगाने की पुकार है: उठो, जीवन लौट आया है, अँधेरा चला गया, प्रकाश आ रहा है।

उदीर्ध्वं जीवो असुर्न आगादप प्रागात्तम आ ज्योतिरेति । आरैक्पन्थां यातवे सूर्यायागन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः ॥

उठो! हमारा प्राण, हमारा जीवन लौट आया है। अँधेरा चला गया, प्रकाश आ रहा है। उषा ने सूर्य के चलने के लिए रास्ता खोल दिया है। हम वहाँ पहुँच गए हैं जहाँ लोग अपनी आयु आगे बढ़ाते हैं।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.113.16

सविता और गायत्री मंत्र (3.62.10)

सविता का अर्थ है "प्रेरित करने वाला"। वे सूर्य का वह रूप हैं जो सबको चलने, जागने और काम करने की प्रेरणा देता है। आज जिसे "गायत्री मंत्र" कहते हैं, वह विश्वामित्र के तीसरे मंडल के सूक्त 3.62 का दसवाँ मंत्र है, और सविता को समर्पित है। इसका नाम उसके छंद से पड़ा: यह गायत्री छंद में है, आठ-आठ अक्षरों के तीन पाद। उपनिषदों में इसे "सावित्री" भी कहा गया है, यानी सविता का मंत्र।

इस मंत्र में कोई धन, संतान या विजय नहीं माँगी गई। माँगी गई है बस सही बुद्धि: "वह हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे।" शायद इसी कारण यह मंत्र हज़ारों साल से उपनयन और संध्या का केंद्र बना रहा। इसके पाठ की विधि, अर्थ और जप के नियम इस साइट के गायत्री मंत्र पृष्ठ पर हैं।

तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

हम सविता देव के उस श्रेष्ठ, वरण करने योग्य तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 3.62.10

नासदीय सूक्त: सृष्टि से पहले क्या था? (10.129)

नासदीय सूक्त दुनिया के सबसे पुराने दार्शनिक प्रश्नों में से एक है। इसका नाम इसके पहले शब्द "नासद्" से पड़ा: "न असत्", यानी "तब असत् भी नहीं था"। सात मंत्रों का यह छोटा-सा सूक्त कोई कथा नहीं सुनाता, कोई देवता नहीं गढ़ता। यह बस पूछता है, और बड़ी ईमानदारी से मान लेता है कि उत्तर शायद किसी को पता नहीं।

सूक्त का क्रम ऐसे चलता है। तब न असत् था, न सत्; न अंतरिक्ष था, न उसके पार आकाश। न मृत्यु थी, न अमरता; न रात और दिन का कोई चिह्न। बस "वह एक" (तदेकम्) था, जो बिना हवा के अपनी ही शक्ति से साँस ले रहा था, और उसके सिवा कुछ नहीं था। अँधेरे से ढका अँधेरा था। फिर "तप" की महिमा से वह एक प्रकट हुआ, और सबसे पहले "काम" (इच्छा) उठा, जिसे मन का पहला बीज कहा गया। ज्ञानियों ने अपने हृदय में खोजकर असत् में सत् का संबंध पाया।

अंतिम दो मंत्र इस सूक्त को अमर बनाते हैं। कौन सच में जानता है, कौन यहाँ बता सकता है कि यह सृष्टि कहाँ से आई? देवता तो इसके बनने के बाद आए। जो इसका अध्यक्ष है, परम आकाश में, वह जानता है, "या शायद वह भी नहीं जानता"। धर्मग्रंथ में ऐसा विनम्र संदेह कम ही मिलता है। यह सूक्त बताता है कि प्रश्न पूछना भी साधना है।

न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः । आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास ॥

तब न मृत्यु थी, न अमरता। रात और दिन का कोई चिह्न नहीं था। वह एक, बिना हवा के, अपनी ही शक्ति से साँस ले रहा था। उसके सिवा और कुछ भी नहीं था।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.129.2
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न । यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥

यह सृष्टि जहाँ से आई, उसने इसे धारण किया या नहीं किया: जो परम आकाश में इसका अध्यक्ष है, वह जानता है; या शायद वह भी नहीं जानता।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.129.7

पुरुष सूक्त: विराट पुरुष और सृष्टि का यज्ञ (10.90)

पुरुष सूक्त (10.90) सृष्टि को एक महान यज्ञ के रूप में देखता है। इसमें एक विराट "पुरुष" है, जिसके हज़ार सिर, हज़ार आँखें और हज़ार पैर हैं। वह पूरी धरती को चारों ओर से घेरकर भी उससे दस अंगुल ऊपर रहता है। दूसरा मंत्र कहता है कि जो कुछ हुआ है और जो होगा, सब पुरुष ही है। यानी ईश्वर संसार में है भी, और संसार से बड़ा भी है।

देवताओं ने इस पुरुष को ही हवि बनाकर यज्ञ किया, और उसी यज्ञ से सब कुछ बना: पशु, ऋचाएँ, साम, छंद, यजुष्। मंत्र 13 कहता है कि उसके मन से चंद्रमा, आँख से सूर्य, मुख से इंद्र और अग्नि, और प्राण से वायु पैदा हुए। यानी मनुष्य का शरीर और ब्रह्मांड एक-दूसरे का प्रतिबिंब हैं।

इसी सूक्त का मंत्र 12 चार वर्णों का उल्लेख करता है: ब्राह्मण उसका मुख थे, राजन्य (क्षत्रिय) भुजाएँ, वैश्य जंघाएँ, और शूद्र पैरों से हुए। इस मंत्र को अलग-अलग युगों में बहुत अलग ढंग से पढ़ा गया है। कई परंपराएँ इसे एक ही शरीर के अंगों की तरह समाज के अंगों की परस्पर निर्भरता का रूपक मानती हैं। आधुनिक विद्वान इसे बाद में बनी वर्ण-व्यवस्था से जोड़कर देखते हैं। Macdonell दसवें मंडल को बाद का स्तर मानते हैं, और यह मंत्र उसी में है। मंत्र का पाठ जैसा है, नीचे वैसा ही दिया गया है।

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥

जो कुछ हो चुका है और जो होगा, यह सब पुरुष ही है। वह अमरता का भी स्वामी है, और उसका भी जो अन्न से बढ़ता है।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.90.2
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥

ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्य उसकी भुजाएँ बने, जो वैश्य है वह उसकी जंघाएँ थीं, और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुआ।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.90.12

हिरण्यगर्भ सूक्त: "कस्मै देवाय हविषा विधेम" (10.121)

हिरण्यगर्भ का अर्थ है "सोने का गर्भ" या "सुनहरा बीज"। सूक्त 10.121 कहता है कि सृष्टि के आरंभ में हिरण्यगर्भ प्रकट हुआ, और जन्म लेते ही सब प्राणियों का एक स्वामी बना। उसने धरती और आकाश को धारण किया। आगे पुराणों में ब्रह्मा को हिरण्यगर्भ और सृष्टि को "ब्रह्मांड", यानी ब्रह्म का अंडा, कहने की जो परंपरा है, उसका मूल यहीं है।

इस सूक्त के पहले नौ मंत्र एक ही प्रश्न पर रुकते हैं: "कस्मै देवाय हविषा विधेम", यानी "हम किस देवता को हवि अर्पित करें?" हर मंत्र उस एक की कोई महिमा बताता है: जो प्राण और बल देता है, जिसकी आज्ञा सब देवता मानते हैं, जिसकी छाया अमरता भी है और मृत्यु भी। अंत में दसवाँ मंत्र उत्तर देता है: हे प्रजापति, तुम्हारे सिवा कोई इन सब उत्पन्न वस्तुओं को घेरकर नहीं रहता। बाद की परंपरा ने प्रश्नवाचक "क" को ही प्रजापति का एक नाम मान लिया; Griffith के अनुवाद में भी सूक्त का शीर्षक "Ka" है।

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

आरंभ में हिरण्यगर्भ प्रकट हुआ। जन्म लेते ही वह सब उत्पन्न प्राणियों का एक स्वामी था। उसने इस पृथ्वी और आकाश को धारण किया। हम किस देवता को हवि अर्पित करें?

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.121.1

विवाह सूक्त: सूर्या का विवाह (10.85)

ऋग्वेद का सूक्त 10.85 सूर्य की पुत्री सूर्या के विवाह की कथा है। Griffith इसका शीर्षक "Surya's Bridal" देते हैं। कथा के रूप में यह सोम और सूर्या का दिव्य विवाह है, पर इसके बहुत-से मंत्र सीधे मानवीय विवाह के हैं: वधू की विदाई, पति के घर में उसका स्वागत, और नए घर के लिए आशीर्वाद। भारतीय विवाह-संस्कार की सबसे पुरानी झलक यहीं मिलती है।

मंत्र 36 में वर वधू का हाथ थामते हुए कहता है: "सौभाग्य के लिए मैं तुम्हारा हाथ पकड़ता हूँ, ताकि तुम मुझ पति के साथ बुढ़ापे तक रहो।" पाणिग्रहण, यानी हाथ पकड़ने का यह भाव आज भी विवाह का केंद्र है। मंत्र 46 वधू को आशीर्वाद देता है कि वह ससुर, सास, ननद और देवरों के बीच "सम्राज्ञी", यानी रानी बनकर रहे। हज़ारों साल पुराना यह मंत्र नई बहू को दासी नहीं, घर की स्वामिनी के रूप में देखता है।

गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः । भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥

सौभाग्य के लिए मैं तुम्हारा हाथ थामता हूँ, ताकि तुम मुझ पति के साथ बुढ़ापे तक रहो। भग, अर्यमा, सविता और पुरंधि देवताओं ने तुम्हें गृहस्थी चलाने के लिए मुझे सौंपा है।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.85.36
सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव । ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु ॥

ससुर के बीच रानी बनकर रहो, सास के बीच रानी बनकर रहो, ननद के बीच रानी बनकर रहो, देवरों के बीच भी रानी बनकर रहो।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.85.46

सृष्टि, ब्रह्मांड और ऋत: ऋग्वेद की दृष्टि

ऋग्वेद में सृष्टि की कोई एक तय कथा नहीं है, बल्कि कई अलग दृष्टियाँ हैं, और वे एक-दूसरे को काटती नहीं। नासदीय सूक्त सृष्टि को एक रहस्य मानता है जो "उस एक" से तप और इच्छा के द्वारा प्रकट हुआ। पुरुष सूक्त उसे एक विराट यज्ञ मानता है। हिरण्यगर्भ सूक्त उसे एक सुनहरे बीज से निकला मानता है। विद्वान ध्यान दिलाते हैं कि ये तीनों दसवें मंडल में हैं, जहाँ दार्शनिक चिंतन सबसे अधिक है।

इन सबके नीचे एक साझा विचार है: "ऋत"। सूर्य का रोज़ उगना, ऋतुओं का लौटना, नदियों का बहना, और मनुष्य का सत्य बोलना, ये सब एक ही व्यवस्था के अंग हैं। देवता ऋत के रक्षक हैं, उसके मालिक नहीं। इसलिए ऋग्वेद में प्रकृति और नैतिकता अलग-अलग नहीं हैं। जो झूठ बोलता है, वह केवल समाज को नहीं, पूरे विश्व की व्यवस्था को तोड़ता है।

एक बात साफ़ समझ लेनी चाहिए। ऋग्वेद के ये सूक्त सृष्टि पर ऋषियों का चिंतन और श्रद्धा हैं, आधुनिक विज्ञान की खोज नहीं। उन्हें "बिग बैंग" जैसे सिद्धांतों का प्रमाण बताना न ऋग्वेद के साथ न्याय है, न विज्ञान के साथ। इनकी असली सुंदरता इनका प्रश्न पूछने का साहस है।

यज्ञ और वैदिक जीवन

ऋग्वेद के ज़्यादातर सूक्त यज्ञ के समय गाए जाने के लिए बने। यज्ञ में अग्नि जलाई जाती, उसमें घी, अन्न और सोम की आहुति दी जाती, और होता ऋचाओं से देवताओं को बुलाता। विचार यह था कि अग्नि दूत बनकर आहुति देवताओं तक पहुँचाते हैं, और देवता बदले में वर्षा, अन्न, पशु, संतान और विजय देते हैं। "हम तुम्हें देते हैं, तुम हमें दो": यह लेन-देन ऋग्वेद के बहुत-से सूक्तों में खुलकर दिखता है।

ऋग्वेद से उस समाज का भी कुछ चित्र मिलता है। Macdonell ऋग्वेद काल पर एक पूरा अध्याय लिखते हैं। उनके अनुसार ऋग्वेद में आई लगभग सारी नदियाँ सिंधु की नदी-प्रणाली की हैं; सूक्त 10.75 सिंधु की स्तुति है, और सरस्वती सबसे प्रमुख नदी-देवी हैं, जिनके तीन पूरे सूक्त हैं; और वैदिक मुखियाओं के पास गायों के बड़े-बड़े झुंड थे। पर ध्यान रहे, ऋग्वेद इतिहास की किताब नहीं, स्तुति का संग्रह है। उससे समाज का चित्र बनाना विद्वानों का अनुमान है, और उन अनुमानों पर बहुत मतभेद हैं।

आगे चलकर यज्ञ की विधियाँ बहुत बड़ी और जटिल हो गईं, और उन्हें समझाने के लिए ब्राह्मण ग्रंथ बने। ऋग्वेद का ऐतरेय ब्राह्मण मुख्य रूप से सोम-यज्ञ की व्याख्या करता है: एक दिन का अग्निष्टोम, 360 दिन का गवामयन, और बारह दिन का द्वादशाह।

ऋग्वेद की प्रमुख शिक्षाएँ

पहली शिक्षा है: सत्य एक है, नाम अनेक (1.164.46)। अलग-अलग देवताओं की स्तुति करते हुए भी ऋषि जानते थे कि सबके पीछे एक ही सत्य है। भारत में सहिष्णुता और "सबको अपनी राह से पहुँचने दो" वाली सोच की जड़ यहीं है।

दूसरी शिक्षा है: अच्छे विचारों के लिए हर ओर से दरवाज़ा खुला रखो। सूक्त 1.89 का पहला मंत्र कहता है, "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः", यानी हमारे पास हर दिशा से कल्याणकारी विचार आएँ। तीसरी शिक्षा है: ऋत, यानी सत्य और व्यवस्था पर चलना, और भूल हो जाए तो वरुण के आगे वसिष्ठ की तरह विनम्र होकर उसे मानना।

और ऋग्वेद की अंतिम शिक्षा उसका अंतिम सूक्त ही है। 10.191 सबको साथ मिलने, साथ बोलने और एक मन होने को कहता है। इसका अंतिम मंत्र कहता है: तुम्हारा संकल्प एक हो, तुम्हारे हृदय एक हों, तुम्हारा मन एक हो, ताकि तुम सब अच्छी तरह साथ रह सको। हज़ारों मंत्रों के बाद ऋग्वेद का आख़िरी शब्द "एकता" है। यह किसी भी परिवार, गाँव या देश के लिए आज भी उतना ही सच्चा है।

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे-दिवे ॥

हमारे पास हर दिशा से कल्याणकारी, अटूट, अबाध और नई राह खोलने वाले विचार आएँ, ताकि देवता सदा हमारी उन्नति के लिए हों, कभी हमें न छोड़ें और दिन-प्रतिदिन हमारी रक्षा करें।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.89.1
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥

तुम्हारा संकल्प एक हो, तुम्हारे हृदय एक हों, तुम्हारा मन एक हो, ताकि तुम सब अच्छी तरह साथ रह सको।

— ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.191.4

ऋग्वेद के ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद

संहिता के बाद हर वेद के साथ गद्य के ग्रंथ जुड़े, जो यज्ञ की विधि और उसका अर्थ समझाते हैं। इन्हें ब्राह्मण कहते हैं। ऋग्वेद के दो ब्राह्मण हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में 40 अध्याय हैं, जो आठ "पंचिकाओं" में बँटे हैं; पंचिका का अर्थ है पाँच अध्यायों का समूह। Macdonell के अनुसार इसके अंतिम दस अध्याय बाद में जोड़े गए लगते हैं। दूसरा कौषीतकि या शांखायन ब्राह्मण है, 30 अध्यायों का। इसमें अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास और चातुर्मास्य की विधि भी है, पर मुख्य विषय सोम-यज्ञ ही है।

ऐतरेय ब्राह्मण की सबसे प्रसिद्ध कथा शुनःशेप की है (सातवीं पंचिका)। राजा हरिश्चंद्र ने पुत्र के लिए वरुण से मन्नत माँगी थी कि पुत्र को उन्हें बलि दे देंगे। पुत्र रोहित वन भाग गया, और बदले में ब्राह्मण-बालक शुनःशेप को ख़रीदकर यूप से बाँधा गया। शुनःशेप ने एक-एक कर देवताओं की स्तुति की, और हर मंत्र के साथ वरुण के बंधन ढीले होते गए, यहाँ तक कि वह पूरी तरह छूट गया। इसी कथा में नारद का पुत्र-महिमा पर वह प्रसिद्ध गीत भी है: पुत्र पिता के लिए आकाश में दीपक जैसा है।

ब्राह्मणों के अंत में आरण्यक आते हैं, यानी वन में पढ़े जाने वाले चिंतन-ग्रंथ, और उनके भीतर उपनिषद। ऐतरेय आरण्यक के पाँच भाग हैं। उसके दूसरे भाग के अंतिम चार खंड ही "ऐतरेय उपनिषद" हैं, और तीसरा भाग संहिता, पद और क्रम पाठ के गूढ़ अर्थ की चर्चा करता है। कौषीतकि आरण्यक के 15 अध्यायों में तीसरे से छठे तक "कौषीतकि उपनिषद" है।

ऋग्वेद से जुड़ा साहित्य
स्तरग्रंथक्या हैस्रोत
संहिताशाकल संहिता10 मंडल, 1,028 सूक्त, 10,552 ऋचाएँऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), सभी मंडल
ब्राह्मणऐतरेय ब्राह्मण40 अध्याय, 8 पंचिकाएँ; मुख्यतः सोम-यज्ञ और राज्याभिषेकMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII
ब्राह्मणकौषीतकि (शांखायन) ब्राह्मण30 अध्याय; अग्न्याधान से सोम-यज्ञ तकMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII
आरण्यकऐतरेय आरण्यक5 भाग; दूसरे भाग के अंतिम चार खंड = ऐतरेय उपनिषदMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII
आरण्यककौषीतकि आरण्यक15 अध्याय; अध्याय 3–6 = कौषीतकि उपनिषदMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII
उपनिषदऐतरेय, कौषीतकिआत्मा, प्राण और ब्रह्म का चिंतनMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII

ऋग्वेद कैसे बचा रहा: संहिता, पद, क्रम, जटा और घन पाठ

हज़ारों साल तक ऋग्वेद लिखा नहीं, बोला और सुना गया। फिर भी वह आश्चर्यजनक शुद्धता से बचा रहा। Macdonell लिखते हैं कि उसकी रक्षा ऐसी निष्ठा से हुई जो साहित्य के इतिहास में अनोखी है। इसके लिए पाठ के कई तरीके बने, जो एक-दूसरे की जाँच करते थे।

पहला है "संहिता पाठ", जिसमें शब्द संधि के साथ जुड़े रहते हैं (अग्निमीळे)। दूसरा "पद पाठ", जिसमें हर शब्द अलग किया जाता है (अग्निम् । ईळे)। Macdonell के अनुसार पद पाठ शाकल्य ने बनाया। तीसरा "क्रम पाठ", जिसमें शब्द जोड़े-जोड़े में बोले जाते हैं: क-ख, ख-ग, ग-घ। चौथा "जटा पाठ", जिसमें हर जोड़ा आगे-पीछे-आगे बोला जाता है: क-ख, ख-क, क-ख। पाँचवाँ और सबसे कठिन "घन पाठ" है: क-ख, ख-क, क-ख-ग, ग-ख-क, क-ख-ग। एक शब्द भी बदले तो पूरी बुनावट टूट जाती है, और गलती तुरंत पकड़ी जाती है।

इसके साथ प्रातिशाख्य ग्रंथ बने, जो बताते हैं कि पद पाठ से संहिता पाठ कैसे बनता है। अनुक्रमणियाँ बनीं, जिनमें हर सूक्त के ऋषि, देवता और छंद, और सूक्तों, मंत्रों, शब्दों और अक्षरों तक की गिनती दर्ज है। पाठ की यही परंपरा आज भी जीवित है। UNESCO ने "वैदिक पाठ की परंपरा" (Tradition of Vedic chanting) को 2003 में मानवता की मौखिक धरोहर घोषित किया, और 2008 में उसे अपनी प्रतिनिधि सूची में दर्ज किया।

ऋग्वेद कितना पुराना है?

इस प्रश्न के दो उत्तर हैं, और दोनों अपनी-अपनी जगह से ईमानदार हैं। परंपरा का उत्तर है कि वेद अपौरुषेय और अनादि है: वह ऋषियों को "दिखा", रचा नहीं गया, और हर कल्प में फिर प्रकट होता है। विष्णु पुराण इसी दृष्टि से कहता है कि इस मन्वन्तर में अब तक 28 बार वेद का विभाजन हुआ है।

आधुनिक विद्वान भाषा, छंद और संदर्भों के आधार पर समय का अनुमान लगाते हैं, और उनमें भी बड़े मतभेद हैं। Macdonell का मत था कि ऋग्वेद का मूल पाठ लगभग 1000 ई.पू. से कम पुराना नहीं हो सकता, और उसके सूक्तों के बनने में कई सौ वर्ष लगे होंगे। उनके बाद के विद्वानों ने अलग-अलग तिथियाँ सुझाई हैं। इसलिए कोई एक तारीख़ "पक्का तथ्य" कहकर बताना ठीक नहीं। इतना निश्चित है कि ऋग्वेद भारत का, और संसार के भी, सबसे पुराने जीवित धार्मिक ग्रंथों में से है।

भारतीय संस्कृति पर ऋग्वेद का प्रभाव

ऋग्वेद आज भी किताबों में बंद नहीं है। रोज़ की संध्या का गायत्री मंत्र (3.62.10) इसी का है। रोग और भय में जपा जाने वाला महामृत्युंजय मंत्र (7.59.12) वसिष्ठ के मंडल का है; सर्वानुक्रमणी उसे "मृत्युविमोचनी", यानी मृत्यु से छुड़ाने वाली ऋचा कहती है। पूजा में पढ़ा जाने वाला पुरुष सूक्त 10.90 है। विवाह में हाथ थामने का भाव 10.85 से आता है। यज्ञ और हवन में "अग्निमीळे" की गूँज आज भी है।

विचार के स्तर पर भारतीय दर्शन के कई बड़े प्रश्न ऋग्वेद से उठे। "एकं सद्" से अद्वैत और सहिष्णुता की धारा निकली, नासदीय सूक्त से सृष्टि का दार्शनिक चिंतन, और पुरुष सूक्त से विराट-पुरुष की वह धारणा जो उपनिषदों, गीता के विश्वरूप और पुराणों तक जाती है। वरुण के आगे क्षमा माँगते वसिष्ठ में भक्ति का बीज है। हिरण्यगर्भ और विष्णु के तीन पगों में पुराणों की सृष्टि-कथा और वामन-अवतार की जड़ें हैं।

ऋग्वेद ने भाषा और विद्या को भी आकार दिया। उसके पाठ को शुद्ध रखने के लिए ही शिक्षा (उच्चारण), छंद, व्याकरण और निरुक्त जैसी विद्याएँ विकसित हुईं, जिन्हें वेदांग कहते हैं। पाणिनि का व्याकरण और यास्क का निरुक्त इसी धारा के फल हैं।

आगे पढ़ें

  • सामवेद — ऋग्वेद की ऋचाएँ जब स्वर-लहरी में गाई जाती हैं, तो साम बनती हैं: पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक, उद्गाता और छान्दोग्य का ॐ
  • यजुर्वेद — अध्वर्यु का वेद: यज्ञ की हर क्रिया के मंत्र, याज्ञवल्क्य की कथा, वाजसनेयी के 40 अध्याय और तैत्तिरीय के 7 काण्ड
  • अथर्ववेद — घर-गृहस्थी और जीवन का वेद: शांति, स्वास्थ्य, विवाह, राज्य, "माता भूमिः" का पृथ्वी सूक्त, काल और प्राण सूक्त, और मुण्डक-माण्डूक्य उपनिषद
  • वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
  • वेद-पाठ की परंपरा — संहिता, पद, क्रम, जटा और घन पाठ; उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वर; शिक्षा, प्रातिशाख्य और अनुक्रमणियाँ: स्मृति की रक्षा का एक पूरा विज्ञान
  • वैदिक देवता — तैंतीस देवता, तीन लोक: द्युलोक के वरुण, सविता, विष्णु और उषा; अंतरिक्ष के इंद्र, रुद्र और मरुत; पृथ्वी के अग्नि और सोम; और "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति"
  • मन्त्र-द्रष्टा ऋषि — किस मंडल को किस ऋषि ने देखा, सर्वानुक्रमणी के साथ
  • वेद-विभाजन — व्यास ने वेद कैसे बाँटे, और शाखाओं का पेड़
  • गायत्री मंत्र — पाठ, अर्थ और जप की विधि
  • महामृत्युंजय मंत्र — ऋग्वेद 7.59.12 का पूरा पृष्ठ
  • महर्षि विश्वामित्र — तीसरे मंडल के द्रष्टा
  • महर्षि वसिष्ठ — सातवें मंडल के द्रष्टा
  • मुद्गल का द्रोण — ऋग्वेद 10.102 की कथा

स्रोत एवं संदर्भ

  • ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text — Theodor Aufrecht (सं.); data entry: B. A. van Nooten, G. B. Holland (1877) · 1.1.1, सभी 10 मंडल (स्वयं गिनती), मंडल 1, 2, 10 (स्वयं गिनती), 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, सभी मंडल, 1.1.1, 3.62.10, 10.125.1–8, 1.154.1, 1.164.46, 1.1, 7.86–89, 3.62.10, 7.59.12, 1.1.1–9, 1.1.9, 2.12.1–15, 2.12.5, 7.86.4–5, 1.113.1–20, 10.129.1–7, 10.129.1–5, 10.129.6–7, 10.90.1–2, 10.90.6–14, 10.90.12, 10.121.1, 10.121.1–10, 10.85.1–47, 10.85.36, 10.85.46, 10.90, 10.121, 10.129, 10.75, 1.89.1, 7.86.4, 10.191.2–4, 3.62.10, 7.59.12, 10.85.36, 10.90, 1.154.1, 1.164.46, 7.86, 10.90, 10.121, 10.129, 7.86.4, 1.113.16, 10.129.2, 10.129.7, 10.90.2, 10.85.36, 10.85.46, 1.89.1, 10.191.4
  • A History of Sanskrit Literature — A. A. Macdonell (1900) · ch. III, The Rigveda, ch. VIII, The Brahmanas, ch. IV, Poetry of the Rigveda, ch. IV, ch. V, Philosophy of the Rigveda, ch. IV (नदियाँ), ch. VI, The Rigvedic Age, ch. VIII, ch. IX, The Sutras
  • The Vishnu Purana, vol. 3 (Book III) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1866) · अंश 3, अध्याय 3–4 (vol. 3, pp. 33–43), अंश 3, अध्याय 4 (vol. 3, pp. 41–43), अंश 3, अध्याय 4 (vol. 3, pp. 44–46), अंश 3, अध्याय 3 (vol. 3, pp. 34–36)
  • Kâtyâyana's Sarvânukramanî of the Rigveda (सर्वानुक्रमणी) — ए. ए. मैकडॉनल (सं.) (1886) · सूत्र 2.4, 1, 5, 13, 14–15, 17, 19, 22, 24, 27, 36, 46, 13–24, 5, 27, 1–46, 5–27, 12, 27, 32, 36, 5, 16, 26
  • The Hymns of the Rigveda, vol. II (2nd ed., Books VII–X) — Ralph T. H. Griffith (अनु.) (1897) · Book IX, सूक्त-शीर्षक "Soma Pavamana", Book IX, मंडल 7, सूक्त 86, मंडल 10, सूक्त 129, मंडल 10, सूक्त 90, मंडल 10, सूक्त 121, शीर्षक "Ka", मंडल 10, सूक्त 85, शीर्षक, मंडल 10, सूक्त 191 और टिप्पणी
  • The Hymns of the Rigveda, vol. I — Ralph T. H. Griffith (अनु.) (1896) · मंडल 1, सूक्त 164.46, मंडल 1, सूक्त 1.9, मंडल 2, सूक्त 12.5, मंडल 1, सूक्त 113, मंडल 3, सूक्त 62.10
  • Tradition of Vedic chanting (Representative List, element 00062) — UNESCO Intangible Cultural Heritage (2008) · element 00062

ऋग्वेद — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न