यजुर्वेद: शुक्ल और कृष्ण, यज्ञ के मंत्र, रुद्राध्याय और ईशोपनिषद

अध्वर्यु का वेद: यज्ञ की हर क्रिया के मंत्र, याज्ञवल्क्य की कथा, वाजसनेयी के 40 अध्याय और तैत्तिरीय के 7 काण्ड

संक्षेप में

यजुर्वेद यज्ञ की विधि का वेद है। इसमें वे मंत्र और गद्य सूत्र (यजुस्) हैं जो अध्वर्यु पुरोहित यज्ञ की हर क्रिया करते हुए बोलता है। इसकी दो धाराएँ हैं: शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता, 40 अध्याय) और कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक संहिताएँ)। रुद्राध्याय और ईशोपनिषद इसी के हैं।

एक नज़र में

नाम का अर्थ
यजुस् = यज्ञ में बोले जाने वाले मंत्र, विशेषकर गद्य सूत्र
यज्ञ में ऋत्विज
अध्वर्यु: यज्ञ की सारी क्रियाएँ करने वाला
व्यास के शिष्य
वैशम्पायन (विष्णु पुराण 3.4)
दो धाराएँ
शुक्ल (मंत्र अलग, व्याख्या अलग) और कृष्ण (मंत्र और व्याख्या मिले हुए)
शुक्ल संहिता
वाजसनेयी: 40 अध्याय; माध्यन्दिन और काण्व पाठ
कृष्ण संहिताएँ
तैत्तिरीय (7 काण्ड, 44 प्रपाठक), मैत्रायणी (4 काण्ड, 54 प्रपाठक), काठक
प्रसिद्ध अंश
शतरुद्रिय/रुद्राध्याय, त्र्यम्बक मंत्र, शिवसंकल्प, पुरुषमेध, ईशोपनिषद
ब्राह्मण
शतपथ (शुक्ल); तैत्तिरीय (कृष्ण)
उपनिषद
बृहदारण्यक, ईश (शुक्ल); तैत्तिरीय, कठ, मैत्रायणी (कृष्ण)

यजुर्वेद क्या है?

ऋग्वेद अगर देवताओं को पुकारने की कविता है, तो यजुर्वेद उस पुकार को कर्म में बदलने की विधि है। यज्ञ-वेदी नापी जा रही है, अग्नि स्थापित हो रही है, चावल कूटे जा रहे हैं, पुरोडाश बन रहा है, आहुति दी जा रही है: और हर एक काम के साथ एक मंत्र बोला जा रहा है। यह काम करने वाला अध्वर्यु है, और उसके मंत्रों का संग्रह यजुर्वेद है।

"यजुस्" शब्द "यज्" धातु से है, जिसका अर्थ है पूजा करना या यज्ञ करना। यजुस् उन मंत्रों को कहते हैं जो यज्ञ की क्रिया के साथ बोले जाते हैं, और उनमें से बहुत-से गद्य में हैं, छंद में नहीं। Macdonell बताते हैं कि वाजसनेयी संहिता का लगभग आधा भाग ऋचाएँ हैं, जिनमें 700 से अधिक ऋग्वेद में भी मिलती हैं, और बाकी आधा गद्य के यजुस्। यानी यजुर्वेद पद्य और गद्य, दोनों का मेल है।

परंपरा के अनुसार व्यास ने यजुर्वेद अपने शिष्य वैशम्पायन को सौंपा। विष्णु पुराण कहता है कि वैशम्पायन ने यजुर्वेद-रूपी पेड़ की सत्ताईस शाखाएँ बनाईं और अपने शिष्यों को दीं। इन्हीं शिष्यों में याज्ञवल्क्य भी थे, जिनकी कथा से यजुर्वेद की दो धाराएँ, कृष्ण और शुक्ल, निकलीं।

यज्ञ-परंपरा में यजुर्वेद का स्थान: अध्वर्यु

यज्ञ के चार मुख्य ऋत्विजों में अध्वर्यु का काम सबसे अधिक है। होता स्तुति करता है, उद्गाता गाता है, ब्रह्मा निगरानी करता है; पर यज्ञ को सचमुच "करता" अध्वर्यु है। वेदी बनाना, अग्नि जलाना, पात्र सजाना, हवि तैयार करना, आहुति देना, सब उसके हाथ में है। इसीलिए यजुर्वेद को यज्ञ का "व्यावहारिक" वेद कहा जाता है। Macdonell कहते हैं कि सामवेद और यजुर्वेद का संकलन यज्ञ की व्यावहारिक ज़रूरत से हुआ, जबकि ऋग्वेद का पुरानी विरासत बचाने के लिए।

यजुर्वेद की संहिताएँ यज्ञों के क्रम में चलती हैं। वाजसनेयी संहिता का पहला अध्याय अमावस्या और पूर्णिमा के यज्ञ (दर्श-पूर्णमास) से शुरू होता है: बछड़ों को गायों से अलग करना, दूध दुहना, चावल कूटना, अग्नि और अग्नि-सोम के लिए पुरोडाश। Griffith बताते हैं कि यह यज्ञ गृहस्थ ब्राह्मण के लिए अग्न्याधान से तीस वर्ष तक हर पखवाड़े करना अनिवार्य था। यानी यजुर्वेद केवल बड़े राजसी यज्ञों का नहीं, रोज़ और हर पखवाड़े के धर्म का भी वेद है।

शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद: याज्ञवल्क्य की कथा

विष्णु पुराण यजुर्वेद की दो धाराओं के जन्म की कथा सुनाता है। ऋषियों ने नियम बनाया था कि जो ऋषि महामेरु पर होने वाली सभा में नहीं आएगा, उसे सात रातों में ब्रह्महत्या का पाप लगेगा। अकेले वैशम्पायन ने वह नियम तोड़ा, और प्रायश्चित्त के लिए अपने शिष्यों से कहा कि सब मिलकर मेरे लिए व्रत करो।

तब शिष्य याज्ञवल्क्य बोले: "भगवन्, इन कमज़ोर तेज वाले ब्राह्मणों को कष्ट देने से क्या लाभ? यह व्रत मैं अकेला कर लूँगा।" इसे घमंड समझकर गुरु क्रोधित हो गए: "ब्राह्मणों का अपमान करने वाले, मुझसे जो पढ़ा है, वह छोड़ दो।" याज्ञवल्क्य ने कहा: "मैंने तो भक्ति से कहा था; पर आपसे जो पढ़ा, वह मुझे भी नहीं चाहिए।" और उन्होंने पढ़े हुए यजुस् उगल दिए। गुरु के कहने पर दूसरे शिष्यों ने तीतर (तित्तिरि) बनकर उन यजुस् को चुग लिया। इसी से वे "तैत्तिरीय" कहलाए, और जिन्होंने गुरु के लिए व्रत किया, वे "चरक-अध्वर्यु"।

अब याज्ञवल्क्य के पास कोई वेद नहीं बचा। उन्होंने प्राणायाम करते हुए, सिर झुकाकर, सूर्य की स्तुति की और ऐसे यजुस् माँगे जो उनके गुरु के पास भी न हों। सूर्य ने अश्व (वाजी) का रूप लेकर उन्हें वे "अयातयाम", यानी ताज़े, अनछुए यजुस् दिए। जिन्होंने ये यजुस् पढ़े, वे "वाजी" कहलाए, क्योंकि सूर्य घोड़ा बने थे; और इसी से शुक्ल यजुर्वेद की संहिता "वाजसनेयी" कहलाती है। याज्ञवल्क्य की चलाई इन वाजी शाखाओं की संख्या पंद्रह है, जिनमें काण्व सबसे प्रमुख है।

कथा का अर्थ बहुत गहरा है। "कृष्ण" (काला) यजुर्वेद वह है जिसमें मंत्र और उनकी व्याख्या मिली-जुली है, मानो उगला हुआ और फिर चुगा हुआ ज्ञान; और "शुक्ल" (उजला) वह, जो सूर्य से सीधे, साफ़ और अलग-अलग मिला। विद्वान दोनों नामों का यही कारण बताते हैं: कृष्ण यजुर्वेद में मंत्र और ब्राह्मण का गद्य साथ-साथ है, और शुक्ल में मंत्र संहिता में हैं और व्याख्या अलग शतपथ ब्राह्मण में।

यजूंष्यथ विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज । जगृहुस्तित्तिरीभूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते ततः ॥

हे द्विज, याज्ञवल्क्य के छोड़े हुए यजुस् को दूसरे शिष्यों ने तीतर बनकर चुग लिया; इसी कारण वे तैत्तिरीय कहलाए।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 3.5.13
यजूंषि यैरधीतानि तानि विप्रैर्द्विजोत्तम । वाजिनस्ते समाख्याताः सूर्योऽश्वः सोऽभवद्यतः ॥

हे श्रेष्ठ द्विज, जिन ब्राह्मणों ने वे यजुस् पढ़े, वे "वाजी" कहलाए, क्योंकि सूर्य ने अश्व का रूप लिया था।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 3.5.29

शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद में अंतर

दोनों धाराओं को मिलाना आम भूल है, इसलिए अंतर साफ़ समझ लें। शुक्ल यजुर्वेद की एक संहिता है, वाजसनेयी, जो दो पाठों में बची है: माध्यन्दिन और काण्व। कृष्ण यजुर्वेद की कई संहिताएँ हैं: तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, और कपिष्ठल-कठ, जिसके Macdonell के समय केवल टूटे-फूटे अंश मिले थे। Macdonell तैत्तिरीय संहिता को बाकी कृष्ण संहिताओं से कुछ बाद की मानते हैं, और बताते हैं कि कृष्ण संहिताएँ अपनी सामग्री एक जैसे ढंग से सजाती हैं, जो वाजसनेयी से अलग है।

Macdonell शाखाओं का पुराना भूगोल भी देते हैं। कठ, अपनी उपशाखा कपिष्ठल के साथ, यूनानियों के समय पंजाब में थे, और बाद में केवल कश्मीर में रह गए। मैत्रायणीय, जिनका पुराना नाम कालाप था, नर्मदा के निचले भाग, नासिक और बड़ौदा के आसपास तक फैले थे। तैत्तिरीय केवल नर्मदा के दक्षिण में मिलते हैं। और वाजसनेयी शाखा गंगा की घाटी में पूर्व की ओर फैली।

शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद: तुलना
पहलूशुक्ल यजुर्वेदकृष्ण यजुर्वेदस्रोत
संहितावाजसनेयीतैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, कपिष्ठल-कठ (अंश)Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII
पाठ / शाखाएँमाध्यन्दिन, काण्व (पंद्रह वाजी शाखाओं में)तैत्तिरीय आदि (वैशम्पायन की सत्ताईस शाखाओं से)विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.5.1, 3.5.30
मंत्र और व्याख्याअलग-अलग: मंत्र संहिता में, व्याख्या शतपथ मेंसाथ-साथ: संहिता में ही ब्राह्मण का गद्यMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII, VIII
संरचना40 अध्यायतैत्तिरीय: 7 काण्ड, 44 प्रपाठक; मैत्रायणी: 4 काण्ड, 54 प्रपाठकMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII
ब्राह्मणशतपथ (100 अध्याय)तैत्तिरीय ब्राह्मण (3 भाग); कठ और मैत्रायणी में संहिता का गद्य हीMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII
उपनिषदबृहदारण्यक, ईशतैत्तिरीय, महानारायण, कठ, मैत्रायणीMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII
नाम की कथासूर्य (वाजी) से मिले यजुस्तित्तिरि पक्षी बनकर चुने यजुस्विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.5.13, 3.5.29

वाजसनेयी संहिता: 40 अध्यायों में क्या है

शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता चालीस अध्यायों में है, और ये अध्याय एक यज्ञ से दूसरे यज्ञ की ओर क्रम से चलते हैं। नीचे की तालिका Griffith के अनुवाद की विषय-सूची से बनाई गई है। Macdonell बताते हैं कि पहले अठारह अध्याय सबसे पुराने हैं: केवल इन्हीं के मंत्र शतपथ ब्राह्मण के पहले नौ काण्डों में शब्द-शब्द समझाए गए हैं, और बाद के अध्यायों के कुछ ही मंत्र वहाँ आते हैं।

बाद के बाईस अध्यायों में Macdonell अश्वमेध के कुछ अंशों (अध्याय 22–25) को छोड़कर ऐसी सामग्री बताते हैं जो दूसरी जगह केवल तैत्तिरीय के ब्राह्मण और आरण्यक में मिलती है। अध्याय 26 से 29 तक पहले के यज्ञों के पूरक मंत्र हैं। यानी वाजसनेयी संहिता एक बार में नहीं बनी; उसकी परतें हैं, जिनमें सबसे पुरानी परत पहले अठारह अध्याय हैं।

वाजसनेयी संहिता: अध्याय और विषय (Griffith, 1899)
अध्यायविषयस्रोत
1–2दर्श-पूर्णमास: अमावस्या और पूर्णिमा के यज्ञशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books I–II
3अग्न्याधान (यज्ञ-अग्नि की स्थापना), अग्निहोत्र, चातुर्मास्य; त्र्यम्बक मंत्र (3.60)शुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Book III
4–8सोम-यज्ञ: सोम का स्वागत, यूप (खंभा) खड़ा करना, सोम-पात्र, सांय-सवनशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books IV–VIII
9–10वाजपेय ("बल का पेय") और राजसूय (राज्याभिषेक)शुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books IX–X
11–18अग्निचयन: ईंटों से अग्नि-वेदी का निर्माण; 16 में शतरुद्रियशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books XI–XVIII
19–21सौत्रामणीशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books XIX–XXI
22–25अश्वमेधशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books XXII–XXV
26–29पहले के यज्ञों के पूरक मंत्रशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books XXVI–XXIX
30–31पुरुषमेध (31 में पुरुष सूक्त)शुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books XXX–XXXI
32–33सर्वमेध, अग्नि की स्तुतियाँशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books XXXII–XXXIII
34शिवसंकल्प उपनिषद (पहले छह मंत्र) और फुटकर मंत्रशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Book XXXIV
35पितृयज्ञ: पितरों के लिए मंत्रशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Book XXXV
36–39प्रवर्ग्य और उसकी भूलों का प्रायश्चित्तशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Books XXXVI–XXXIX
40ईशावास्य उपनिषदशुक्ल यजुर्वेद (Griffith अनु.), Book XL

तैत्तिरीय संहिता: कृष्ण यजुर्वेद का प्रमुख ग्रंथ

कृष्ण यजुर्वेद की सबसे प्रसिद्ध संहिता तैत्तिरीय है। Macdonell के अनुसार इसमें सात काण्ड और चवालीस प्रपाठक हैं। Keith ने 1914 में इसका पूरा अंग्रेज़ी अनुवाद Harvard Oriental Series में प्रकाशित किया। इसकी बनावट वाजसनेयी से अलग है। पहले काण्ड के पहले चार प्रपाठकों में पखवाड़े के और सोम-यज्ञों के मंत्र हैं, और चौथे काण्ड में अग्नि-वेदी के निर्माण के; ये दोनों वाजसनेयी के उन्हीं भागों का समानांतर पाठ हैं।

पर तैत्तिरीय संहिता अपने भीतर ही उन मंत्रों की व्याख्या भी रखती है। पाँचवाँ काण्ड अग्नि-वेदी वाले यज्ञ का ब्राह्मण है, और छठा सोम-यज्ञ का। दर्श-पूर्णमास की व्याख्या वहाँ नहीं, तैत्तिरीय ब्राह्मण के तीसरे भाग में है। यही वह "मिलावट" है जिसके कारण इसे कृष्ण यजुर्वेद कहा जाता है।

मैत्रायणी संहिता चार काण्डों और चौवन प्रपाठकों की है, और उसका चौथा काण्ड, पहले तीन की व्याख्या और पूरक होने के कारण, एक तरह का विशेष ब्राह्मण है। काठक संहिता कठ शाखा की है। Macdonell कृष्ण संहिताओं की प्रार्थनाओं की भाषा पर एक रोचक बात कहते हैं: उनमें कई जगह ऐसे अक्षर, ख़ासकर "ॐ", बार-बार आते हैं जिनका शब्द-अर्थ नहीं होता, और मैत्रायणी संहिता से ऐसा ही एक उदाहरण देते हैं।

यज्ञीय मंत्रों का स्वरूप

यजुर्वेद के मंत्र ऋग्वेद के मंत्रों जैसे लंबे स्तुति-गीत नहीं हैं। वे छोटे, सीधे और काम से जुड़े होते हैं। अध्वर्यु कोई वस्तु उठाता है, और कहता है कि मैं इसे इस देवता के लिए उठाता हूँ; वेदी पर कुशा बिछाता है, और उसका मंत्र बोलता है; आहुति देता है, और "स्वाहा" कहता है। इस तरह यज्ञ की हर छोटी क्रिया एक पवित्र कर्म बन जाती है, क्योंकि उसके साथ उसका अर्थ बोला जाता है।

Macdonell कहते हैं कि यजुर्वेद की संहिताओं में ऋग्वेद के बहुत-से मंत्र आते हैं, पर अक्सर अपने मूल संदर्भ से अलग करके, किसी नई यज्ञ-क्रिया के लिए। उनकी शिकायत है कि ये गद्य सूत्र अक्सर बहुत दोहराव वाले हैं। पर एक भक्त की दृष्टि से इसी दोहराव का अर्थ है ध्यान: हर बार वही भाव, हर क्रिया के साथ, ताकि कर्म कभी यांत्रिक न हो।

प्रमुख यज्ञ: अग्निहोत्र से अश्वमेध तक

अग्निहोत्र सबसे सरल और सबसे नियमित यज्ञ है: रोज़ सुबह और शाम घर की यज्ञ-अग्नि में आहुति। दर्श-पूर्णमास हर पखवाड़े होता है, अमावस्या और पूर्णिमा को। चातुर्मास्य हर चार महीने पर, ऋतुओं के बदलने के साथ। ये गृहस्थ के नियमित यज्ञ हैं, और वाजसनेयी संहिता के पहले तीन अध्याय इन्हीं के मंत्र देते हैं। Macdonell बताते हैं कि ऋग्वेद का कौषीतकि ब्राह्मण भी अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास और चातुर्मास्य की इसी क्रम से व्याख्या करता है।

सोमयाग यज्ञों में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण माना गया। इसमें सोम-लता का रस निकाला, छाना और देवताओं को अर्पित किया जाता था, और उसके साथ होता, उद्गाता और अध्वर्यु, तीनों का काम चलता। एक दिन के अग्निष्टोम से लेकर 360 दिन के गवामयन तक, सोम-यज्ञ के कई रूप थे। वाजसनेयी के अध्याय 4 से 8 सोम-यज्ञ के हैं: सोम का अतिथि की तरह स्वागत, यूप खड़ा करना, सोम-पात्रों में रस भरना, और शाम का सवन।

राजसूय और वाजपेय राजाओं के यज्ञ थे। राजसूय राज्याभिषेक का यज्ञ है, और वाजपेय, जिसे Griffith "बल का पेय" या "विजय का प्याला" कहते हैं, सोम-यज्ञ का ही एक विशेष रूप है। अश्वमेध सबसे प्रसिद्ध राजसी यज्ञ है, जिसका केंद्र एक यज्ञ-अश्व है। वाजसनेयी के अध्याय 22 से 25 इसके मंत्र देते हैं, अध्याय 23 घोड़े के लौटने के बाद के कर्म बताता है, और अध्याय 24 में यज्ञ के पशुओं की लंबी सूची है।

सबसे बड़ा निर्माण-यज्ञ अग्निचयन है, जिसमें ईंटों से अग्नि-वेदी बनाई जाती थी, और अग्नि को एक पात्र (उखा) में उठाकर उस पर स्थापित किया जाता था। वाजसनेयी के अध्याय 11 से 18 इसी के हैं, और शतपथ ब्राह्मण के काण्ड 6 से 10 इसकी व्याख्या करते हैं, जहाँ शाण्डिल्य को सबसे बड़ा आचार्य माना गया है। यज्ञ-परंपरा का पूरा विस्तार "यज्ञ-परंपरा" लेख में है।

पुरुषमेध: पाठ क्या कहता है, और विद्वान क्या मानते हैं

वाजसनेयी संहिता के अध्याय 30 और 31 "पुरुषमेध" के हैं, और इस विषय को सावधानी और ईमानदारी, दोनों से समझना ज़रूरी है। अध्याय 30 में अलग-अलग जातियों, रूपों, स्वभावों और पेशों के लोगों की एक लंबी सूची है, जिन्हें अलग-अलग देवताओं के लिए "समर्पित" बताया गया है। अध्याय 31 में ऋग्वेद का पुरुष सूक्त है।

Griffith, जिन्होंने 1899 में इस संहिता का पूरा अनुवाद किया, अपनी टिप्पणी में लिखते हैं कि इस अनुष्ठान में मनुष्य "वास्तव में या प्रतीक रूप में" अश्व की जगह रखा जाता था, और सूची के लोगों को यज्ञ के खंभों से बाँधा जाता था। पर वे आगे साफ़ लिखते हैं: "ये मानव-बलि बाद में बिना कोई हानि पहुँचाए छोड़ दिए जाते थे, और जहाँ तक शुक्ल यजुर्वेद के पाठ की बात है, पूरा अनुष्ठान केवल प्रतीकात्मक था: पुरुष, यानी विराट पुरुष, के अपने आप को अर्पित करने का रूपक।" यह संबंध इस बात से भी दिखता है कि अगला ही अध्याय पुरुष सूक्त है, जिसमें देवता विराट पुरुष को हवि बनाकर सृष्टि का यज्ञ करते हैं।

इसलिए इस विषय पर दो गलतियों से बचना चाहिए। एक, इसे सनसनी बनाकर "वेदों में नरबलि" कहना, जबकि पाठ के अनुवादक स्वयं उसे प्रतीकात्मक बताते हैं। दो, इसे छिपा देना, जैसे यह पाठ में है ही नहीं। अलग-अलग विद्वानों ने इस पर अलग-अलग मत रखे हैं, और Griffith अपनी टिप्पणी में ऐसे कई विद्वानों की सूची देते हैं। ईमानदार पढ़ाई यही है कि पाठ जैसा है वैसा जाना जाए, और उसकी परंपरागत और विद्वत व्याख्या भी।

रुद्राध्याय और श्री रुद्रम

शिव की उपासना में सबसे पवित्र वैदिक पाठ "रुद्राध्याय" है, और वह यजुर्वेद में है। शुक्ल यजुर्वेद में यह वाजसनेयी संहिता का सोलहवाँ अध्याय है, जिसे Griffith "शतरुद्रिय" कहते हैं, यानी सौ रूपों वाले रुद्र की स्तुति। यह अग्नि-वेदी वाले अग्निचयन यज्ञ के बीच आता है, और इसमें रुद्र को बार-बार "नमः" कहकर उनके असंख्य रूपों को नमस्कार किया गया है।

कृष्ण यजुर्वेद में यही स्तुति तैत्तिरीय संहिता के चौथे काण्ड के पाँचवें प्रपाठक में है, जिसका शीर्षक Keith "रुद्र को अर्पण" देते हैं। इसके अनुवाक "रुद्र को प्रसन्न करना", "रुद्र को दोहरा नमस्कार", "रुद्र को एकल नमस्कार" जैसे क्रम में चलते हैं। दक्षिण भारत में "श्री रुद्रम्" के नाम से जो पाठ होता है, वह इसी का है। उसके साथ पढ़ा जाने वाला "चमकम्", जिसमें "च मे" (और मुझे यह भी) की टेक के साथ जीवन की हर अच्छी वस्तु माँगी जाती है, इसी काण्ड के सातवें प्रपाठक में है।

ध्यान देने की बात है कि ऋग्वेद में रुद्र केवल तीन-चार सूक्तों के देवता हैं, पर यजुर्वेद में उनकी स्तुति एक पूरा अध्याय भरती है। वैदिक साहित्य के भीतर ही रुद्र का यह बढ़ता महत्व आगे शिव-उपासना की नींव बना। रुद्र के प्रसिद्ध "त्र्यम्बक" मंत्र और शिव-परंपरा पर ऋग्वेद और शिव पुराण के पृष्ठ देखें।

महामृत्युंजय मंत्र का यजुर्वेद में संदर्भ

महामृत्युंजय मंत्र मूल रूप से ऋग्वेद (7.59.12) का है, पर यजुर्वेद में भी आता है, और वहाँ का प्रसंग बहुत रोचक है। वाजसनेयी संहिता के तीसरे अध्याय में, चातुर्मास्य यज्ञ के एक भाग में, "रुद्र त्र्यम्बक" के लिए आहुति दी जाती है। मंत्र 3.60 वही "त्र्यम्बकं यजामहे" है, और Griffith के अनुवाद में उसका भाव है: "हम त्र्यम्बक की पूजा करते हैं, जो समृद्धि को बढ़ाने वाले हैं; जैसे ककड़ी बेल से छूटती है, वैसे मैं मृत्यु के बंधन से छूटूँ, अमरता से नहीं।"

यजुर्वेद में इस मंत्र के तुरंत बाद एक दूसरा रूप भी आता है, जो विवाह से जुड़ा है। उसमें त्र्यम्बक को "पतिवेदन", यानी पति दिलाने वाला, कहा गया है, और प्रार्थना है कि "मैं यहाँ से (पिता के घर से) छूटूँ, वहाँ से (पति के घर से) नहीं"। Griffith की टिप्पणी के अनुसार यह रूप यजमान के परिवार की कन्याएँ वेदी की परिक्रमा करते हुए बोलती थीं। यानी एक ही मंत्र-रूप दो अलग जीवन-प्रसंगों में दो अलग अर्थों के साथ प्रयोग हुआ: एक में मृत्यु से मुक्ति, और दूसरे में मायके से विदा होकर नए घर में स्थिर होना।

शिवसंकल्प उपनिषद: "तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु"

वाजसनेयी संहिता के चौंतीसवें अध्याय के पहले छह मंत्र एक छोटे-से उपनिषद के रूप में प्रसिद्ध हैं, जिसे Griffith "शिवसंकल्प उपनिषद" कहते हैं। इसका नाम हर मंत्र के अंतिम शब्दों से पड़ा है: "मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।" ये छह मंत्र मन के स्वरूप पर हैं: वह मन जो जागते में दूर-दूर तक जाता है और सोते में भी लौट आता है, जिससे सारे कर्म होते हैं, जिसमें सारा ज्ञान पिरोया है, जो जीवों को ऐसे चलाता है जैसे सारथी घोड़ों को।

इसकी सीख सीधी और आज के लिए बहुत उपयोगी है। मनुष्य जो कुछ करता है, वह पहले मन में "संकल्प" बनता है। इसलिए साधना का पहला क़दम बाहर का कर्म नहीं, भीतर का संकल्प शुद्ध करना है। यज्ञ के वेद का यह छोटा-सा अंश बताता है कि वैदिक ऋषि बाहरी अनुष्ठान के साथ भीतरी अनुशासन को भी उतना ही महत्व देते थे।

शतपथ ब्राह्मण: सौ मार्गों का ग्रंथ

शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण "शतपथ" है, यानी "सौ मार्गों वाला", क्योंकि इसमें सौ अध्याय हैं। Macdonell इसे ऋग्वेद के बाद पूरे वैदिक साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ मानते हैं। इसके दो पाठ बचे हैं: माध्यन्दिन, चौदह काण्डों का, और काण्व, सत्रह काण्डों का। माध्यन्दिन के पहले नौ काण्ड वाजसनेयी संहिता के पहले अठारह अध्यायों से मेल खाते हैं, और सबसे पुराने हैं।

शतपथ के भीतर दो अलग परंपराएँ दिखती हैं। काण्ड 6 से 10 अग्नि-वेदी के निर्माण पर हैं, और उनमें शाण्डिल्य सबसे बड़े आचार्य हैं; याज्ञवल्क्य का नाम तक नहीं आता, और जिन लोगों का उल्लेख है, वे उत्तर-पश्चिम के हैं: गांधार, शाल्व, केकय। बाकी काण्डों में याज्ञवल्क्य सबसे बड़े आचार्य हैं, और लोग मध्य और पूर्व भारत के: कुरु-पांचाल, कोसल, विदेह, सृंजय। Macdonell का अनुमान है कि याज्ञवल्क्य विदेह के निवासी थे।

शतपथ ब्राह्मण केवल यज्ञ-विधि का ग्रंथ नहीं, कथाओं का भी ख़ज़ाना है, और उसकी कई कथाएँ आगे पुराणों और महाकाव्यों की नींव बनीं। Macdonell बताते हैं कि जल-प्रलय की कथा भारतीय साहित्य में पहली बार यहीं आती है। मनु को एक छोटी-सी मछली मिली, जिसने कहा: "मुझे पालो, मैं तुम्हें आने वाली बाढ़ से बचाऊँगी।" उसकी सलाह से मनु ने नाव बनाई, और जब प्रलय आया, तो मछली के सींग से नाव बाँधी, जो उन्हें उत्तर के पर्वत तक ले गई। बाद में मनु से ही मानव-जाति चली। मत्स्य पुराण और मत्स्य अवतार की कथा का सबसे पुराना रूप यही है। पुरूरवा और उर्वशी के प्रेम और बिछोह की कथा, जिससे आगे कालिदास ने नाटक रचा, यहाँ विस्तार से है, और शकुंतला के पुत्र भरत भी यहाँ आते हैं।

शतपथ का अंतिम काण्ड आरण्यक है, और उसके अंतिम छह अध्याय बृहदारण्यक उपनिषद हैं, जो सबसे बड़े उपनिषदों में है। इसी में राजा जनक की सभा में याज्ञवल्क्य का प्रसिद्ध शास्त्रार्थ है, और याज्ञवल्क्य और उनकी पत्नी मैत्रेयी का संवाद, जिसकी कथाएँ इस साइट के ऋषि खंड में हैं।

तैत्तिरीय ब्राह्मण और आरण्यक

कृष्ण यजुर्वेद में ब्राह्मण का गद्य संहिताओं के भीतर ही है। कठ और मैत्रायणी शाखाओं में वही उनके एकमात्र ब्राह्मण हैं। तैत्तिरीय शाखा में इसके अलावा एक अलग "तैत्तिरीय ब्राह्मण" भी है, तीन भागों का, जो Macdonell के अनुसार संहिता का ही विस्तार है: उसमें वे यज्ञ हैं जो संहिता में छूट गए, या जिनका वहाँ विस्तार नहीं है।

तैत्तिरीय ब्राह्मण के एक भाग (3.11) में नचिकेता नाम के बालक की कथा है, जो यमलोक गया और यम से तीन वर माँगे। Macdonell बताते हैं कि यह भाग मूल रूप से कठ शाखा का था, और इसी कथा पर कठ उपनिषद आधारित है। नचिकेता और यम की पूरी कथा इस साइट के ऋषि खंड की गाथाओं में है।

तैत्तिरीय आरण्यक के दस भाग हैं। उनके अंतिम चार भाग इस शाखा के दो उपनिषद हैं: भाग 7 से 9 तैत्तिरीय उपनिषद, और भाग 10 महानारायण उपनिषद, जिसे याज्ञिकी उपनिषद भी कहते हैं। मैत्रायणी शाखा का मैत्रायणी (या मैत्री) उपनिषद है।

ईशोपनिषद: शुक्ल यजुर्वेद का अंतिम अध्याय

वाजसनेयी संहिता का चालीसवाँ, यानी अंतिम अध्याय, ईशावास्य उपनिषद है। Macdonell बताते हैं कि शुक्ल यजुर्वेद से सबसे बड़ा उपनिषद, बृहदारण्यक, भी जुड़ा है, और सबसे छोटे में से एक, ईश, भी, जिसमें केवल अठारह मंत्र हैं। इसका नाम इसके पहले शब्द "ईशा" से पड़ा। यह उन गिने-चुने उपनिषदों में है जो संहिता के भीतर ही हैं।

पहला मंत्र पूरे वेदांत का सार माना जाता है: यह सारा जगत ईश्वर से ढका है; इसलिए त्याग के भाव से भोग करो, किसी के धन का लालच मत करो। दूसरा मंत्र कर्म छोड़ने को नहीं कहता: कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करो, इस तरह कर्म तुमसे नहीं चिपकेगा। छठा और सातवाँ मंत्र कहते हैं कि जो सब प्राणियों को अपने में और अपने को सब प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता; और जिसके लिए सब प्राणी आत्मा ही हो गए, उस एकता देखने वाले को क्या मोह, क्या शोक?

ग्यारहवाँ मंत्र विद्या और अविद्या, यानी ज्ञान और कर्म, को साथ जोड़ता है: जो दोनों को साथ जानता है, वह कर्म से मृत्यु को पार करता है और ज्ञान से अमृत पाता है। यज्ञ के वेद का अंत कर्म और ज्ञान के इसी मेल से होता है, जो आगे भगवद्गीता का भी केंद्रीय विचार बना। (इस पृष्ठ के मंत्र काण्व पाठ के हैं; माध्यन्दिन पाठ में कुछ मंत्रों का क्रम अलग है।)

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥

इस गतिशील संसार में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से ढका (व्याप्त) है। इसलिए त्याग के भाव से भोग करो; किसी के धन का लालच मत करो।

— ईशोपनिषद् (काण्व पाठ), भाष्य सहित — GRETIL e-text, मंत्र 1
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥

यहाँ कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करो। तुम्हारे लिए इसके सिवा कोई दूसरा मार्ग नहीं; इस तरह कर्म मनुष्य से नहीं चिपकता।

— ईशोपनिषद् (काण्व पाठ), भाष्य सहित — GRETIL e-text, मंत्र 2
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥

जो सब प्राणियों को अपनी आत्मा में ही देखता है, और सब प्राणियों में अपनी आत्मा को, वह फिर किसी से घृणा नहीं करता।

— ईशोपनिषद् (काण्व पाठ), भाष्य सहित — GRETIL e-text, मंत्र 6

यजुर्वेद में प्रकृति, समाज और धर्म

यजुर्वेद के मंत्र यज्ञ के लिए हैं, पर उनमें उस समाज की झलक भी है जिसमें यज्ञ होते थे। Macdonell लिखते हैं कि यजुर्वेद में चार वर्ण भारतीय समाज के मुख्य विभाग के रूप में पक्के हो चुके हैं, और वाजसनेयी के एक बाद के अध्याय (पुरुषमेध की सूची) से पता चलता है कि बाद के समय की बहुत-सी मिश्रित जातियाँ और पेशे भी तब तक बन चुके थे। और रुद्राध्याय में तो रुद्र को हर काम करने वालों के रूप में नमस्कार किया गया है: "बढ़इयों को नमस्कार, रथ बनाने वालों को नमस्कार, कुम्हारों को और लोहारों को नमस्कार" (16.27)। यानी उस समाज ने हर पेशे में देवत्व देखा।

प्रकृति के प्रति यजुर्वेद का भाव कृतज्ञता का है। अश्वमेध के अध्याय 24 में दर्जनों पशुओं और पक्षियों के नाम आते हैं, और अग्निचयन में ऋतुओं, नक्षत्रों और दिशाओं की ईंटें रखी जाती हैं। तैत्तिरीय संहिता के चौथे काण्ड में "नक्षत्र ईंटें" और "ऋतु ईंटें" जैसे भाग हैं, यानी यज्ञ-वेदी स्वयं पूरे ब्रह्मांड का एक छोटा प्रतिरूप बन जाती है।

और धर्म के लिए यजुर्वेद का सबसे बड़ा विचार यह है कि कर्म ही पूजा है। हर क्रिया का मंत्र बताता है कि कोई भी काम छोटा नहीं, अगर उसे सही भाव से किया जाए। ईशोपनिषद इसी को अंतिम रूप देता है: कर्म करते हुए जियो, पर लालच के बिना, और सब में एक ही ईश्वर को देखते हुए।

यजुर्वेद की शिक्षाएँ और भारतीय परंपरा पर प्रभाव

आज के हिंदू कर्मकांड पर यजुर्वेद का प्रभाव सबसे सीधा है। हवन में "स्वाहा" के साथ दी जाने वाली आहुति, पूजा की विधियों का क्रम, संस्कारों के मंत्र, और यज्ञ-वेदी की बनावट, सब इसी परंपरा से आते हैं। शिव-मंदिरों में होने वाला रुद्राभिषेक रुद्राध्याय के पाठ से होता है, जो यजुर्वेद का है।

दर्शन में यजुर्वेद ने भारत को उसके दो सबसे बड़े उपनिषद दिए: बृहदारण्यक और ईश, और उनके साथ तैत्तिरीय और कठ भी। "अहं ब्रह्मास्मि" जैसे महावाक्य, नचिकेता और यम का संवाद, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी की बातचीत, और "ईशा वास्यमिदं सर्वम्" का दर्शन: इन सबकी जड़ें यजुर्वेद की परंपरा में हैं।

और यजुर्वेद की सबसे मानवीय कथा, याज्ञवल्क्य की, आज भी एक सीख देती है। अपने गुरु से अलग होकर भी याज्ञवल्क्य ने ज्ञान की खोज नहीं छोड़ी, और सीधे सूर्य से नया ज्ञान पाया। भारतीय परंपरा ने गुरु-भक्ति के साथ-साथ स्वतंत्र खोज को भी सम्मान दिया, और शुक्ल यजुर्वेद इसका जीवित प्रमाण है।

आगे पढ़ें

  • ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
  • सामवेद — ऋग्वेद की ऋचाएँ जब स्वर-लहरी में गाई जाती हैं, तो साम बनती हैं: पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक, उद्गाता और छान्दोग्य का ॐ
  • अथर्ववेद — घर-गृहस्थी और जीवन का वेद: शांति, स्वास्थ्य, विवाह, राज्य, "माता भूमिः" का पृथ्वी सूक्त, काल और प्राण सूक्त, और मुण्डक-माण्डूक्य उपनिषद
  • यज्ञ की परंपरा — तीन अग्नियों वाले बड़े श्रौत यज्ञ और घर की एक अग्नि वाले गृह्य संस्कार: सोलह ऋत्विज, चौदह श्रौत यज्ञ, चालीस संस्कार और पाँच महायज्ञ
  • वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
  • शिव पुराण — सातों संहिताओं में: शिवरात्रि और ज्योति-स्तंभ, सती और दक्ष-यज्ञ, पार्वती का तप और शिव-विवाह, कार्तिकेय और गणेश, त्रिपुर और जलंधर, शिव के अवतार, बारह ज्योतिर्लिंग, रुद्राक्ष और पंचाक्षर
  • महर्षि याज्ञवल्क्य — शुक्ल यजुर्वेद के प्रवर्तक
  • जनक की सभा — बृहदारण्यक में याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ
  • नचिकेता और यम — तैत्तिरीय ब्राह्मण और कठ उपनिषद की कथा
  • वेद-विभाजन — वैशम्पायन और शाखाओं की कथा
  • महामृत्युंजय मंत्र — पाठ, अर्थ और जप
  • रुद्र मंत्र — रुद्र की उपासना के मंत्र

स्रोत एवं संदर्भ

यजुर्वेद — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न