दो कोश
यह ज्ञानकोश क्यों?
बहुत-से घरों में आज भी कोई बुज़ुर्ग सुबह गायत्री जपते हैं, किसी के घर सत्यनारायण की कथा होती है, और किसी की अंतिम यात्रा के बाद गरुड़ पुराण पढ़ा जाता है। ये सब हमारी रोज़ की परंपरा का हिस्सा हैं। पर जब कोई बच्चा पूछे कि "गायत्री मंत्र किस वेद में है?" या "पुराण कितने हैं, और उनमें लिखा क्या है?", तो अक्सर सही उत्तर नहीं मिलता। यह ज्ञानकोश उसी कमी को भरने का प्रयास है।
यहाँ हर ग्रंथ का अपना पृष्ठ है, और हर पृष्ठ चार बातों का ध्यान रखता है। पहली, जो कुछ लिखा है वह ग्रंथ के मूल पाठ से मिलाया गया है, केवल याद या सुनी-सुनाई बात से नहीं। दूसरी, गिनतियाँ (कितने मंडल, सूक्त, अध्याय, श्लोक) किस संस्करण की हैं, यह साथ में लिखा है, क्योंकि अलग-अलग छपे संस्करणों में संख्या बदल जाती है। तीसरी, जहाँ परंपराएँ अलग बात कहती हैं, वहाँ सब रूप दिए गए हैं। और चौथी, ग्रंथ की आस्था और आधुनिक विद्वानों का मत अलग-अलग दिखाए गए हैं।
वेद और पुराण: दो धाराएँ, एक परंपरा
वेद "श्रुति" कहलाते हैं, यानी जो सुना गया। परंपरा उन्हें अपौरुषेय मानती है: ऋषियों ने मंत्र देखे, रचे नहीं। वेदों की भाषा वैदिक संस्कृत है, जो बाद की संस्कृत से पुरानी है, और उनका पाठ स्वर (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) के साथ हज़ारों साल से गुरु से शिष्य तक मुँह-ज़बानी चलता आया है। वेदों का केंद्र यज्ञ और उससे जुड़ा चिंतन है।
पुराणों का स्वर अलग है। वे कथा के ग्रंथ हैं: सृष्टि कैसे हुई, देवताओं और ऋषियों के वंश, मनुओं के काल, राजाओं के चरित, अवतारों की लीलाएँ, तीर्थ, व्रत और भक्ति। उनकी भाषा सरल श्लोकों वाली संस्कृत है, और उन्हें सूत जैसे कथावाचक सभाओं में सुनाते थे। विष्णु पुराण कहता है कि व्यास ने वेद चार शिष्यों को सौंपे, और "इतिहास-पुराण" का भार सूत रोमहर्षण को दिया।
मत्स्य पुराण तो यहाँ तक कहता है कि ब्रह्मा ने सब शास्त्रों में सबसे पहले पुराण का स्मरण किया, और उसके बाद उनके मुखों से वेद निकले। यह पुराणों का अपने बारे में दावा है, और इसका अर्थ इतना ही लेना चाहिए कि परंपरा पुराणों को वेदों जितना ही पुराना और पूज्य मानती है। व्यवहार में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं: वेद बीज हैं, और पुराण उस बीज से उगा पेड़, जो आम लोगों तक धर्म की बात कथा के सहारे पहुँचाता है।
| पहलू | वेद | पुराण | स्रोत |
|---|---|---|---|
| परंपरा में स्थान | श्रुति, अपौरुषेय | इतिहास-पुराण; व्यास द्वारा संकलित | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (p. 42); विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.16 |
| संख्या | चार: ऋग्, साम, यजुः, अथर्व | अठारह महापुराण, और उपपुराण | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.59–60 |
| मुख्य रूप | मंत्र, सूक्त, यज्ञ की विधि और उसका चिंतन | कथा, वंशावली, अवतार, तीर्थ, व्रत, भक्ति | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.24; Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. III, VIII |
| भाषा | वैदिक संस्कृत, स्वर सहित | बाद की संस्कृत, सरल श्लोक | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. III |
| कौन सुनाता था | ऋत्विज और वेद-पाठी | सूत और कथावाचक | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.16–19 |
वेद ज्ञानकोश में क्या है
वेद ज्ञानकोश में चारों वेदों के अलग-अलग विस्तृत पृष्ठ हैं, और साथ में वैदिक साहित्य को समझने वाले लेख: संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद की चार परतें, वेदों के पाठ की परंपरा, यज्ञ-परंपरा, और वैदिक देवता। ऋग्वेद के पृष्ठ पर, उदाहरण के लिए, दसों मंडलों के सूक्त और मंत्र हमने संहिता के पूरे पाठ में स्वयं गिने हैं, और अग्नि, इंद्र, वरुण, उषा, गायत्री, नासदीय, पुरुष और हिरण्यगर्भ सूक्तों के मूल मंत्र अर्थ सहित दिए हैं।
पुराण ज्ञानकोश में क्या है
पुराण ज्ञानकोश में अठारह महापुराणों के अलग-अलग पृष्ठ हैं, उसी क्रम में जिसमें विष्णु पुराण और भागवत उन्हें गिनाते हैं। हर पृष्ठ बताता है कि उस पुराण के वक्ता और श्रोता कौन हैं, उसकी संरचना क्या है, उसमें कौन-सी कथाएँ हैं और वे क्या सिखाती हैं, और उसकी श्लोक-संख्या परंपरा में कितनी कही गई है और आज के पाठ में कितनी मिलती है। साथ में पंचलक्षण, महापुराण और उपपुराण का अंतर, और महापुराणों की अलग-अलग सूचियों पर लेख हैं।
पहली बार पढ़ रहे हैं? कहाँ से शुरू करें
अगर आप वेदों से शुरू करना चाहते हैं, तो पहले "वेद ज्ञानकोश" का मुख्य पृष्ठ पढ़िए। उसमें चारों वेदों की तुलना-तालिका है, और यह समझ आ जाता है कि संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं। उसके बाद ऋग्वेद पढ़िए, क्योंकि बाकी तीनों वेद उसी पर टिके हैं, और गायत्री, महामृत्युंजय और पुरुष सूक्त जैसे रोज़ सुने जाने वाले मंत्र भी उसी के हैं।
अगर आप पुराणों से शुरू करना चाहते हैं, तो "पुराण ज्ञानकोश" के मुख्य पृष्ठ पर अठारहों की सूची, उनकी श्लोक-संख्या और सूचियों के आपसी अंतर देखिए। फिर विष्णु पुराण पढ़िए। उसका ढाँचा पुराण की पुरानी परिभाषा, पंचलक्षण, के सबसे क़रीब है, इसलिए वह बाकी पुराणों को समझने की चाबी जैसा है। उसमें ध्रुव, प्रह्लाद और समुद्र-मंथन जैसी जानी-पहचानी कथाएँ भी हैं, जिनसे पढ़ना सहज लगता है।
इस ज्ञानकोश को कैसे पढ़ें
हर पृष्ठ की शुरुआत "संक्षेप में" से होती है, जो पचास-साठ शब्दों में मुख्य बात कह देता है। उसके बाद "एक नज़र में" की तालिका है, और फिर विस्तृत खंड। जहाँ मूल श्लोक या मंत्र दिया गया है, उसके नीचे उसका सरल हिंदी अर्थ और ग्रंथ का सटीक संदर्भ (मंडल-सूक्त-मंत्र या अंश-अध्याय-श्लोक) है। पृष्ठ के अंत में "स्रोत एवं संदर्भ" में वे सब ग्रंथ और संस्करण हैं जिनसे जानकारी ली गई।
एक बात हमेशा ध्यान रखें। पुराणों और वेदों में सृष्टि, ब्रह्मांड, युगों और लोकों का जो वर्णन है, वह उस परंपरा की आस्था और चिंतन है, आधुनिक विज्ञान की खोज नहीं। इसी तरह ग्रंथ जो फल बताते हैं, जैसे "इसे सुनने से पाप नष्ट होते हैं", वे ग्रंथ की अपनी घोषणा हैं। उन्हें हम पूरा और ईमानदारी से बताते हैं, पर किसी चिकित्सा या प्रमाणित परिणाम की तरह नहीं।
वेद ज्ञानकोश
वेद से जुड़े लेख
पुराण ज्ञानकोश
पुराण से जुड़े लेख
आगे पढ़ें
- वेद ज्ञानकोश — ऋग्, साम, यजुः और अथर्व: हर वेद का स्वरूप, उसके ऋत्विज, ब्राह्मण और उपनिषद, और चारों की तुलना
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- वेद-विभाजन — व्यास ने वेद और पुराण कैसे बाँटे
- वेद व्यास — वेदों और पुराणों के संकलनकर्ता
- योग के प्राचीन ग्रंथ — योगसूत्र, हठयोग प्रदीपिका और दूसरे योग-ग्रंथ
स्रोत एवं संदर्भ
- ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text — Theodor Aufrecht (सं.); data entry: B. A. van Nooten, G. B. Holland (1877) · 3.62.10, सभी मंडल (स्वयं गिनती), 3.62.10, 7.59.12, 10.90, 1.1.1, 10.129.6–7
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.21–23, अंश 1–6 (स्वयं गिनती), 3.6.16, 3.6.24, 3.6.16–19, 3.6.21–24, 3.6.21–24, 6.8.2, 1.1.1, 6.8.40–53
- A History of Sanskrit Literature — A. A. Macdonell (1900) · ch. III, The Rigveda, ch. III, VIII, ch. III
- The Vishnu Purana, vol. 3 (Book III) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1866) · अंश 3, अध्याय 4 (vol. 3, p. 42), 3.4 (p. 42)
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.3, 53.59–60
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.7.23–24, 12.13.4–9
