कूर्म पुराण: जहाँ विष्णु और शिव एक हैं

समुद्र-मंथन के समय कूर्म-रूप विष्णु ने इंद्रद्युम्न और ऋषियों को सुनाया: सृष्टि, त्रिदेव की एकता, देवी, वंश, काशी-प्रयाग, ईश्वर गीता और व्यास गीता

संक्षेप में

कूर्म पुराण अठारह महापुराणों में पंद्रहवाँ है। समुद्र-मंथन के समय मंदराचल को पीठ पर उठाए कूर्म (कछुआ) रूप विष्णु ने इसे इंद्रद्युम्न और नारद आदि ऋषियों को सुनाया। विष्णु का अवतार वक्ता होने पर भी इसका केंद्र शिव की उपासना और ब्रह्मा, विष्णु, शिव की एकता है। इसके उत्तर भाग में ईश्वर गीता और व्यास गीता हैं।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में पंद्रहवाँ (विष्णु पुराण 3.6.23; कूर्म 1.1.21 भी स्वयं को पंद्रहवाँ कहता है)
वक्ता-परंपरा
कूर्म-रूप विष्णु → इंद्रद्युम्न, नारद आदि ऋषि और इंद्र; फिर व्यास → सूत → नैमिषारण्य के ऋषि
विभाग
पूर्व विभाग (51 अध्याय) और उत्तर विभाग (44 अध्याय)
श्लोक
GRETIL पाठ में 5,823 (पूर्व 3,131 + उत्तर 2,692); पुराण स्वयं कहता है: ब्राह्मी संहिता, 6,000 श्लोक (1.1.23)
परंपरागत संख्या
17,000 (भागवत 12.13.4–8); 18,000 (मत्स्य 53.48)
प्रसिद्ध अंश
ईश्वर गीता (उत्तर 1–11), व्यास गीता (उत्तर 12 से), काशी-माहात्म्य, शिव के 28 योगाचार्य अवतार
स्वरूप
नाम वैष्णव, पर Wilson के अनुसार सदा और ठीक ही शैव पुराणों में गिना जाता है

कूर्म पुराण क्या है?

कूर्म पुराण का नाम उस रूप से है जिसमें यह कहा गया। पुराण की शुरुआत ही समुद्र-मंथन से होती है: अमृत के लिए देवता और दानव मंदराचल को मथानी बनाकर क्षीरसागर मथ रहे थे, और देवताओं के हित के लिए जनार्दन ने कूर्म (कछुए) का रूप लेकर मंदर को अपनी पीठ पर उठा रखा था। उसी समय नारद आदि ऋषियों और इंद्र ने रसातल में स्थित कूर्म-रूप भगवान से प्रश्न किए, और उनके उत्तर में यह पुराण कहा गया।

अठारह महापुराणों की विष्णु पुराण वाली सूची में कूर्म पंद्रहवाँ है, वामन के बाद और मत्स्य से पहले, और कूर्म पुराण अपने पहले अध्याय में ख़ुद भी यही कहता है: "यह उत्तम कौर्म पुराण पंद्रहवाँ है।" उसी अध्याय में वह अठारह पुराणों और अठारह उपपुराणों की अपनी सूची भी देता है, जिसमें सनत्कुमार, नारसिंह, शिवधर्म, दुर्वासा, कपिल, मानव, उशना, वारुण, कालिका, साम्ब, सौर, पराशर, मारीच और भार्गव जैसे नाम हैं।

कूर्म पुराण की सबसे बड़ी पहचान उसका संदेश है। वक्ता विष्णु के अवतार हैं, पर पुराण बार-बार यही सिखाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महादेव एक ही प्रभु के तीन रूप हैं, जो काम के अनुसार अलग दिखते हैं। इसमें विष्णु स्वयं ऋषियों को शिव की शरण में भेजते हैं, और शिव विष्णु से कहते हैं, "तुम्हारा सहारा लिए बिना कोई योगी मुझ तक नहीं पहुँचेगा।" इसलिए यह पुराण वैष्णव और शैव, दोनों परंपराओं के बीच एक सेतु जैसा है।

तस्माद्ब्रह्मा महादेवो विष्णुर्विश्वेश्वरः परः । एकस्यैव स्मृतास्तिस्रस्तनूः कार्यवशात्प्रभोः ॥

इसलिए ब्रह्मा, महादेव और परम विश्वेश्वर विष्णु, ये एक ही प्रभु के तीन शरीर माने गए हैं, जो कार्य के अनुसार (अलग-अलग) हैं।

— कूर्म पुराण (पूर्व और उत्तर विभाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.2.95

लक्ष्मी, माया और इंद्रद्युम्न की कथा

मंथन के बीच समुद्र से श्री (लक्ष्मी) प्रकट हुईं और विष्णु ने उन्हें ग्रहण किया। उनके तेज से नारद आदि ऋषि और इंद्र मोहित हो गए और पूछा: "यह विशाल नेत्रों वाली देवी कौन है?" विष्णु ने उत्तर दिया कि यह मेरी परम शक्ति है, ब्रह्मरूपिणी, मेरी प्रिय अनंत माया, जिससे यह सारा जगत मोहित है। इसी से मैं देवताओं, असुरों और मनुष्यों को मोहित करता हूँ, निगलता हूँ और फिर रचता हूँ। ब्रह्मा, ईशान आदि देवता इसी के अंश से शक्तिमान हुए हैं।

ऋषियों ने पूछा कि इस दुर्जय माया को कौन पार कर सकता है। तब विष्णु ने इंद्रद्युम्न की कथा सुनाई। इंद्रद्युम्न पहले एक राजा थे जिन्होंने कूर्म-रूप भगवान के दर्शन किए और उनके मुख से यह पुराण सुना। भगवान ने उन्हें वर दिया कि अगले जन्म में तुम ब्राह्मण होगे और पिछले जन्म की स्मृति बनी रहेगी। ब्राह्मण-जन्म में इंद्रद्युम्न व्रत, उपवास और नियमों से भगवान की आराधना करते रहे। एक दिन लक्ष्मी उनके सामने प्रकट हुईं और बोलीं: "मुनि और इंद्र आदि देवता भी मुझे नहीं देख पाते। मैं नारायण से अभिन्न उनकी माया हूँ। जो ज्ञान और कर्मयोग से परमेश्वर की आराधना करते हैं, उन पर मेरा बस नहीं चलता।"

फिर लंबे तप के बाद स्वयं नारायण पीताम्बर पहने प्रकट हुए, इंद्रद्युम्न को अपने हाथों से छुआ, और उसी स्पर्श से उन्हें परम तत्त्व का ज्ञान हो गया। भगवान ने उन्हें तीन प्रकार की भावना (ध्यान) बताई: एक भगवान के रूप पर, दूसरी व्यक्त जगत के आश्रय पर, और तीसरी "ब्राह्मी" भावना जो गुणों से परे है; जो ऊँची भावना न कर सके, वह पहली से शुरू करे। अंत में इंद्रद्युम्न ने सब छोड़कर संन्यास लिया, योग-बल से आकाश-मार्ग से मानसोत्तर पर्वत पर पहुँचे, ब्रह्मा ने उठकर उन्हें गले लगाया, फिर एक महान ज्योति निकलकर सूर्य-मंडल में प्रविष्ट हुई, और इंद्रद्युम्न ने शिव-रूप शांत, सर्वव्यापी तेज और विष्णु का परम पद देखकर मोक्ष नाम का अविनाशी धाम पाया।

यह कथा पुराण का सार अपने भीतर रखती है: अपने वर्ण और आश्रम के धर्म में रहकर, अंतिम (ब्राह्मी) भावना का सहारा लेकर बुद्धिमान व्यक्ति लक्ष्मी-रूप माया को पार कर जाता है। देवताओं ने यही ज्ञान विस्तार से सुनना चाहा, और तब कूर्म-रूप भगवान ने पूरा पुराण सुनाया।

संरचना: दो विभाग, 95 अध्याय, चार संहिताएँ

कूर्म पुराण अपने बारे में एक अनोखी बात कहता है: यह पुण्य पुराण संहिताओं के भेद से चार प्रकार का है: ब्राह्मी, भागवती, सौरी और वैष्णवी। "यह ब्राह्मी संहिता है, चारों वेदों के समान, जिसमें छह हज़ार श्लोक हैं।" आज जो कूर्म पुराण मिलता है, वह यही ब्राह्मी संहिता है। GRETIL के पाठ में इसके 95 अध्याय और 5,823 श्लोक गिने जाते हैं, जो इस छह हज़ार वाली संख्या के बहुत पास है।

पर दूसरे पुराण कूर्म की संख्या बहुत बड़ी बताते हैं: भागवत सत्रह हज़ार और मत्स्य अठारह हज़ार। Wilson ने 1840 में इसे "न सुलझने वाला अंतर" कहा, और यह भी लिखा कि कूर्म पुराण होने का दावा करने वाला कोई दूसरा ग्रंथ उन्हें नहीं मिला। संभव है कि बाकी तीन संहिताएँ कभी अलग रही हों या खो गई हों, पर इसका कोई पक्का प्रमाण नहीं है।

पुराण दो लगभग बराबर भागों में बँटा है। पूर्व विभाग में सृष्टि, अवतार, वंश, भुवन-कोश और मन्वन्तर हैं, और साथ में शिव और देवी की कथाएँ और काशी-प्रयाग के माहात्म्य। उत्तर विभाग दर्शन और आचार का है: पहले ईश्वर गीता, फिर व्यास गीता, फिर तीर्थ, और अंत में प्रलय। नीचे की तालिका GRETIL पाठ के अध्यायों के आरंभ पढ़कर बनाई गई है।

कूर्म पुराण: अध्याय और विषय (GRETIL पाठ के अनुसार)
अध्यायविषयस्रोत
पूर्व 1–2समुद्र-मंथन, लक्ष्मी-माया, इंद्रद्युम्न; पुराणों की सूची; वर्ण-आश्रम, तिलककूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.1–1.2
पूर्व 3–8आश्रम-क्रम, काल-गणना, प्रलय के बाद एकार्णव, वराह, सृष्टि के प्रकारकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.3–1.8
पूर्व 9–13नाभि-कमल से ब्रह्मा, विष्णु-ब्रह्मा संवाद, शिव का प्रकट होना; मधु-कैटभ; रुद्र और अर्धनारी; देवी-माहात्म्य और सहस्रनाम; स्वायंभुव मनु का वंशकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.9–1.13
पूर्व 14–18दक्ष-यज्ञ और वीरभद्र; नरसिंह, अंधक और भैरव; बलि और वामन; कश्यप-वंशकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.14–1.18
पूर्व 19–26सूर्य-वंश (राम और सेतु पर शिवलिंग), चंद्र-वंश, यदु-वंश; कृष्ण का उपमन्यु-आश्रम में शिव-तप और साम्ब का जन्मकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.19–1.26
पूर्व 27–28चारों युगों के स्वभाव, कलियुग के लक्षणकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.27–1.28
पूर्व 29–37वाराणसी (अविमुक्त), ओंकार, कपर्दीश्वर, मध्यमेश्वर; प्रयाग-माहात्म्यकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.29–1.37
पूर्व 38–48भुवन-कोश: लोक, सूर्य का रथ, ध्रुव, ब्रह्माण्ड, मेरु, वर्ष, सात द्वीपकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.38–1.48
पूर्व 49–51मन्वन्तर, 28 द्वापरों के व्यास, कलियुग में शिव के 28 योगाचार्य अवतार और उनके शिष्यकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 1.49–1.51
उत्तर 1–11ईश्वर गीता: बदरिकाश्रम में शिव का सनत्कुमार आदि को आत्म-ज्ञान और योग का उपदेशकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 2.1–2.11
उत्तर 12–33व्यास गीता: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ-धर्म, दैनिक कर्म, श्राद्ध, आशौच, दान, वानप्रस्थ, संन्यास, प्रायश्चित्त; कपालमोचनकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 2.12–2.33
उत्तर 34–42तीर्थ: रुद्रकोटि, महालय, दारुवन, नर्मदा, भृगुतीर्थ, नैमिष, पंचनदकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 2.34–2.42
उत्तर 43–44प्रलय और प्राकृत प्रतिसर्ग; कूर्म-रूप का त्याग; पुराण की परंपरा और फलकूर्म पुराण (मूल संस्कृत), 2.43–2.44

ब्रह्मा, विष्णु और शिव: एक ही मूर्ति के रूप

पूर्व विभाग के नौवें अध्याय में ऋषि एक कठिन प्रश्न पूछते हैं: शिव तो सबसे पहले हैं, फिर वे ब्रह्मा के पुत्र कैसे कहलाए? और ब्रह्मा "अंडज" होकर भी कमल से कैसे जन्मे? उत्तर में एक अद्भुत कथा आती है। पिछले कल्प के अंत में सब कुछ एक समुद्र था, और नारायण शेष-शय्या पर सो रहे थे। उनकी नाभि से सौ योजन चौड़ा, उगते सूर्य जैसा कमल निकला। तभी हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) वहाँ आए, विष्णु को जगाया और पूछा, "इस अंधेरे एकार्णव में अकेले सोने वाले आप कौन हैं?"

दोनों ने अपने को जगत का स्वामी बताया। विष्णु ने ब्रह्मा के शरीर में प्रवेश करके उसमें तीनों लोक देखे; फिर ब्रह्मा विष्णु के उदर में गए, पर उन्हें विष्णु का अंत नहीं मिला। विष्णु ने सब द्वार बंद कर दिए थे, केवल नाभि का द्वार खुला था, और उसी से निकलकर ब्रह्मा कमल पर बैठे। तब विष्णु ने प्रेम से कहा, "यह मैंने तुम्हें रोकने के लिए नहीं, लीला के लिए किया; तुम मेरे पुत्र बनो और पद्मयोनि कहलाओ।" पर ब्रह्मा फिर भी कहते रहे कि हम दोनों के अलावा कोई परमेश्वर नहीं।

विष्णु ने कहा, "क्या तुम उस योगेश्वर को नहीं देखते, जो ब्रह्मा के भी स्वामी हैं? परमेश्वर की माया तुम्हें मोहित कर रही है।" तभी तीन नेत्रों वाले, जटाधारी, त्रिशूल लिए, ग्रहों और नक्षत्रों की माला पहने महादेव प्रकट हुए। विष्णु ने ब्रह्मा को दिव्य दृष्टि दी, ब्रह्मा ने ओंकार का स्मरण करके अथर्वशिरस से शिव की स्तुति की, और शिव ने वर माँगने को कहा। ब्रह्मा ने कहा, "मैं आपको ही पुत्र रूप में चाहता हूँ।" यही शिव के ब्रह्मा का पुत्र कहलाने का कारण है।

फिर शिव विष्णु से जो कहते हैं, वह इस पुराण का हृदय है: "यह सब मुझसे भरा है और तुमसे भी, इसमें संदेह नहीं। तुम चंद्र हो, मैं सूर्य; तुम रात हो, मैं दिन; तुम प्रकृति हो, मैं पुरुष; तुम ज्ञान हो, मैं ज्ञाता; तुम माया हो, मैं ईश्वर। जो मैं निष्कल देव हूँ, वही परम नारायण भी है। तुम्हारा आश्रय लिए बिना कोई योगी मुझे नहीं पाएगा।" विष्णु ने वर में केवल शिव की भक्ति माँगी।

मन्मयं त्वन्मयं चैव सर्वमेतन्न संशयः । भवान्सोमस्त्वहं सूर्यो भवान्रात्रिरहं दिनम् ॥ भवान्प्रकृतिरव्यक्तमहं पुरुष एव च । भवान्ज्ञानमहं ज्ञाता भवान्मायाहमीश्वरः ॥

(शिव विष्णु से:) यह सब मुझसे भरा है और तुमसे भी, इसमें संदेह नहीं। तुम चंद्र हो, मैं सूर्य; तुम रात्रि हो, मैं दिन। तुम अव्यक्त प्रकृति हो, मैं पुरुष; तुम ज्ञान हो, मैं ज्ञाता; तुम माया हो, मैं ईश्वर।

— कूर्म पुराण (पूर्व और उत्तर विभाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.9.83–1.9.84

तीन देवताओं के तीन तिलक

पूर्व विभाग का दूसरा अध्याय सृष्टि की एक संक्षिप्त कथा कहता है: नारायण शेष-शय्या पर सोकर जागे और सृष्टि का विचार किया; उनकी प्रसन्नता से चार मुख वाले ब्रह्मा जन्मे, और किसी कारण से उत्पन्न क्रोध से त्रिशूलधारी, तीन नेत्रों वाले रुद्र। फिर कमल-नेत्रों वाली श्री प्रकट हुईं। ब्रह्मा के कहने पर भगवान ने उन्हें जगत को मोहित करने का काम सौंपा, पर यह भी कहा कि ज्ञान-योग में लगे, इंद्रियों को जीतने वाले, क्रोधहीन और सत्यनिष्ठ लोगों से दूर रहना।

इसी अध्याय में वर्ण और आश्रम के धर्म के बाद एक व्यावहारिक बात कही गई है, जो आज भी तिलक की परंपराओं में दिखती है। तीन "आश्रय" बताए गए हैं: वैष्णव, ब्राह्म और हर (शैव)। शंभु के सब भक्त सफ़ेद भस्म से माथे पर त्रिपुंड्र लगाएँ; नारायण की शरण लेने वाले सुगंधित जल (चंदन) से माथे पर शूल (त्रिशूल-आकार) का चिह्न लगाएँ; और ब्रह्मा की शरण लेने वाले तिलक लगाएँ। पुराण कहता है कि त्रिपुंड्र धारण करने से काल-रूप ईश्वर धारण होते हैं, और शूल-चिह्न से ब्रह्मा, विष्णु और शिव-रूप त्रिगुणात्मक प्रधान।

और अंत में सबके लिए एक ही बात: जितेंद्रिय, शांत, क्रोध को जीतने वाला व्यक्ति यज्ञ करे, अग्नि में होम करे, जप करे, दान दे, और जीवन भर इन देवताओं की सेवा करे; वह शीघ्र ही उनका अटल स्थान पाता है। यानी तिलक अलग हो सकते हैं, पर धर्म और साधना एक है।

देवी: अर्धनारीश्वर से पार्वती तक, और सहस्रनाम

पूर्व विभाग का ग्यारहवाँ अध्याय पूरे पुराण का सबसे लंबा अध्याय है, 336 श्लोकों का, और यह देवी को समर्पित है। ब्रह्मा जब मानस पुत्रों सहित तप कर रहे थे, तब उनके मुख से कालाग्नि जैसे, त्रिशूलधारी, तीन नेत्रों वाले रुद्र प्रकट हुए, जिनका आधा शरीर स्त्री का और आधा पुरुष का था। ब्रह्मा ने कहा, "अपने को विभाजित करो", और भय से अंतर्धान हो गए। रुद्र ने अपने को स्त्री और पुरुष में बाँटा; पुरुष-भाग से ग्यारह रुद्र बने, और स्त्री-भाग से सौम्य-असौम्य, शांत-अशांत, गोरी-काली अनेक शक्तियाँ, लक्ष्मी आदि, जिनसे शिव की शक्ति विश्व में व्याप्त है।

फिर वही ईशानी ब्रह्मा के कहने पर दक्ष की पुत्री सती बनीं और रुद्र को दी गईं। पिता के शिव-निंदक होने के कारण उनकी निंदा करके वे हिमालय और मेना की पुत्री पार्वती बनीं। अध्याय में हिमालय देवी की स्तुति करते हैं, और देवी उन्हें आत्म-ज्ञान और योग का लंबा उपदेश देती हैं: "ज्ञान से, कर्मयोग से या भक्तियोग से, संसार से मुक्ति के लिए सदा ईश्वर की शरण लो।" इस उपदेश के बाद हिमालय ने देवताओं के सामने पार्वती का विवाह महेश से कर दिया।

इसी अध्याय में देवी के सहस्रनाम हैं, यानी उनके हज़ार नाम। फलश्रुति कहती है: जो इन नामों को सूर्य-मंडल में स्थित देवी का ध्यान करते हुए गंध-पुष्प से पूजा करके जीवन भर जपता है, वह अंत समय में स्मृति पाकर परब्रह्म को प्राप्त करता है; और जो लक्ष्मी चाहता है, वह पार्वती और उनके पास त्रिनेत्र शंभु की पूजा करके वर्ष भर इनका जप करे। अध्याय का अंतिम वाक्य है: "प्रसंगवश देवी का उत्तम माहात्म्य कहा गया।"

शिव-कथाएँ: दक्ष-यज्ञ, अंधक, कपालमोचन, दारुवन

पूर्व विभाग के चौदहवें अध्याय में दक्ष-यज्ञ और वीरभद्र की कथा है, और पंद्रहवें में दक्ष की संतानें, हिरण्यकशिपु का नरसिंह द्वारा वध, और फिर अंधकासुर, जिसे शिव के भैरव-रूप ने वश में किया। Wilson ने भी लिखा कि पूर्व विभाग में ब्रह्मा आदि के शिव-स्तोत्रों के साथ "भैरव द्वारा अंधकासुर की पराजय" और शिव से चार शक्तियों (माहेश्वरी, शिवा, सती और हैमवती) की उत्पत्ति जैसी शैव कथाएँ हैं। सोलहवें अध्याय में प्रह्लाद के पुत्र विरोचन, फिर बलि और वामन की कथा आती है।

उत्तर विभाग में कपालमोचन की कथा प्रायश्चित्त के प्रसंग में आती है। मेरु के शिखर पर ऋषियों ने ब्रह्मा से पूछा, "एक अविनाशी तत्त्व क्या है?" महेश की माया से मोहित ब्रह्मा ने अपने को ही सर्वोच्च बताया। तभी आकाश में एक प्रचंड ज्योति-मंडल प्रकट हुआ, और ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर क्रोध से जल उठा। उसी क्षण नीललोहित शिव प्रकट हुए, और जब ब्रह्मा ने गर्व से उनसे कहा कि मेरी शरण में आओ, तो शिव ने लोकों को जलाने वाले काल-भैरव को भेजा, जिन्होंने युद्ध करके ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया। ब्रह्मा शिव की कृपा से फिर जीवित हुए और तब उन्होंने ज्योति-मंडल में देवी सहित शिव को देखा।

दारुवन की कथा (उत्तर 37) कूर्म पुराण की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में है। दारुवन में हज़ारों ऋषि पत्नी-पुत्रों सहित केवल प्रवृत्ति-मार्ग के कर्म, यानी यज्ञ और तप, में लगे थे। उन्हें निवृत्ति (वैराग्य) के ज्ञान का महत्व दिखाने के लिए शिव उन्नीस वर्ष के सुंदर, दिगंबर युवक का वेश लेकर भिक्षा माँगने वहाँ गए, और विष्णु मोहिनी स्त्री का वेश धरकर उनके पीछे चले। इस प्रकार शिव ने विष्णु के साथ माया से जगत को मोहित करते हुए देवदारु वन में भिक्षा के लिए विचरण किया।

राजवंश: राम का सेतु-लिंग और कृष्ण का शिव-तप

पूर्व विभाग के 19 से 23 अध्यायों में सूर्य और चंद्र वंश हैं, Wilson के अनुसार प्रायः विष्णु पुराण जैसे ही शब्दों में। सूर्य-वंश में राम की कथा संक्षेप में है: सीता का स्वयंवर, संन्यासी के वेश में रावण का सीता-हरण, हनुमान का लंका में सीता को राम की अंगूठी देना, वानरों द्वारा सेतु, और रावण-वध। फिर एक विवरण आता है जो रामेश्वरम की परंपरा से जुड़ता है: राम ने सेतु के बीच महादेव को लिंग-रूप में स्थापित करके पूजा की।

शिव ने पार्वती सहित प्रत्यक्ष होकर राम को वर दिया: "तुम्हारे स्थापित इस लिंग के दर्शन से महापापियों के पाप भी नष्ट हों। इस समुद्र में स्नान करने वाले के दूसरे पाप भी लिंग के दर्शन मात्र से मिट जाएँगे। जब तक पर्वत, पृथ्वी और यह सेतु रहेंगे, तब तक मैं यहाँ गुप्त रूप से रहूँगा। यहाँ स्नान, दान, जप और श्राद्ध अक्षय होंगे, और इस लिंग के स्मरण से ही दिन भर के पाप नष्ट होंगे।" फिर राम ने भरत से अभिषिक्त होकर धर्म से राज्य किया, और कुश और लव जन्मे।

यदु-वंश के बाद कृष्ण की एक विशेष कथा है। अवतार लेकर भी, कृतकृत्य होकर भी, कृष्ण ने पुत्र के लिए घोर तप किया। गरुड़ पर बैठकर वे उपमन्यु मुनि के आश्रम गए, जहाँ गंगा बहती थी और योगी, वेदपाठी और शिव-आराधक तपस्वी रहते थे। वहाँ कृष्ण ने पूरे शरीर पर भस्म लगाई, सिर मुँडाया, वल्कल पहने और निरंतर रुद्र का जप किया। बहुत समय बाद देवी सहित महादेव आकाश में प्रकट हुए, और उनके वर से जाम्बवती से कृष्ण के पुत्र साम्ब का जन्म हुआ।

अगले अध्याय में कृष्ण कैलास पर महेश्वर के साथ रमते हैं और वहाँ के निवासी उनकी पूजा करते हैं। फिर कंस, नरक, बाण आदि को जीतकर और धर्म की स्थापना करके नारायण अपने धाम लौटने का विचार करते हैं, और भृगु आदि ऋषि उनसे मिलने द्वारका आते हैं।

सेतुमध्ये महादेवमीशानं कृत्तिवाससम् । स्थापयामास लिङ्गस्थं पूजयामास राघवः ॥

राघव (राम) ने सेतु के बीच गज-चर्म धारण करने वाले ईशान महादेव को लिंग-रूप में स्थापित किया और उनकी पूजा की।

— कूर्म पुराण (पूर्व और उत्तर विभाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.20.47

28 व्यास और शिव के 28 योगाचार्य अवतार

पूर्व विभाग के अंतिम अध्यायों में दो सूचियाँ साथ-साथ चलती हैं। पहली, इस वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईस द्वापरों के व्यास: पहले द्वापर में स्वायंभुव मनु, दूसरे में प्रजापति, फिर उशना, बृहस्पति, सविता, मृत्यु, इंद्र, वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, त्रिवृष, शततेजा, धर्म, तरक्षु, त्र्यारुणि, धनंजय, कृतंजय, ऋतंजय, भरद्वाज, गौतम, राजश्रवा, शुष्मायण, तृणबिंदु, वाल्मीकि, शक्ति, पराशर, और अट्ठाईसवें द्वापर में पराशर-पुत्र कृष्णद्वैपायन। पुराण कहता है कि कृष्णद्वैपायन ने शिव की आराधना करके उनकी कृपा से वेदों का विभाजन किया और जैमिनि, सुमंतु, वैशम्पायन, पैल और (वक्ता सूत) को शिष्य बनाया।

दूसरी सूची और भी रोचक है: हर कलियुग में महादेव का एक योगाचार्य-अवतार। पहले कलियुग में हिमालय के छगल शिखर पर "श्वेत" नाम से, जिनके चार शिष्य थे: श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य और श्वेतलोहित। सातवें में जैगीषव्य, नौवें में ऋषभ, दसवें में भृगु, बारहवें में अत्रि, चौदहवें में गौतम, और अट्ठाईसवें यानी अंतिम में नकुलीश, जो "कायावतार" तीर्थ में प्रकट होंगे। हर अवतार के चार-चार शिष्य बताए गए हैं, जिनमें सनंदन, सनातन, कपिल, आसुरि, पंचशिख, पराशर, गर्ग, कुथुमि, श्वेतकेतु, अश्वलायन और अक्षपाद जैसे प्रसिद्ध नाम हैं।

Wilson ने इस अध्याय पर लिखा कि यह शिव के अवतारों का लिंग पुराण से भी अधिक स्पष्ट और जुड़ा हुआ विवरण देता है, और यह योग-परंपरा के आचार्यों को शिव का ही रूप मानने का प्रयास लगता है। पुराण स्वयं कहता है कि ये शिष्य ब्रह्मज्ञान और योग में लगे रहते हैं और योगेश्वरों के आदेश से वेद की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं; जो ब्राह्मण इन्हें याद करते, नमस्कार करते और इनका तर्पण करते हैं, उन्हें ब्रह्मविद्या मिलती है।

तीर्थ: काशी, प्रयाग और नर्मदा

पूर्व विभाग के 29 से 33 अध्याय वाराणसी का माहात्म्य हैं, और इन्हें व्यास की तीर्थ-यात्रा के रूप में कहा गया है। व्यास वाराणसी पहुँचकर गंगा में आचमन करते हैं और विश्वेश्वर शिव की पूजा करते हैं; वहाँ के मुनि उनसे शिव से जुड़ी पवित्र कथाएँ पूछते हैं, और उनके शिष्य जैमिनि एक गूढ़ प्रश्न करते हैं। फिर व्यास शिष्यों सहित मुक्ति देने वाले ओंकार लिंग, कपर्दीश्वर, पिशाचमोचन तीर्थ और मध्यमेश्वर के दर्शन को जाते हैं, और जैमिनि आदि के साथ काशी के सब गुप्त तीर्थों में घूमते हैं।

इसके बाद प्रयाग का माहात्म्य है (पूर्व 34–37)। पुराण कहता है कि माघ मास में साठ हज़ार और छह हज़ार तीर्थ स्वयं गंगा-यमुना के संगम पर आते हैं, और माघ में प्रयाग में तीन दिन स्नान करने का फल एक लाख गायों के विधिपूर्वक दान के बराबर है। यमुना को सूर्य की पुत्री कहकर उसकी महिमा भी गाई गई है।

उत्तर विभाग के 34 से 42 अध्याय फिर तीर्थों पर लौटते हैं: रुद्रकोटि, शिव का "महालय", दारुवन, तीर्थों में उत्तम नदी नर्मदा (तीन अध्याय), जहाँ भृगु ने रुद्र की आराधना की वह भृगुतीर्थ, महादेव को प्रिय नैमिष, और जप्येश्वर के पास पंचनद। यानी पुराण दर्शन की ऊँचाई से उतरकर फिर यात्रा और स्नान के व्यावहारिक धर्म पर आ जाता है।

ईश्वर गीता: शिव का आत्म-ज्ञान

उत्तर विभाग के पहले ग्यारह अध्याय "ईश्वर गीता" कहलाते हैं, और भगवद्गीता की तरह यह भी एक संवाद है। नैमिषारण्य में ऋषि सूत से वह ज्ञान माँगते हैं जिससे संसार के सब दुख मिटें। तभी स्वयं व्यास वहाँ आते हैं, और सूत के कहने पर बताते हैं कि यह ज्ञान महादेव ने प्राचीन काल में सनत्कुमार, सनक, सनंदन, अंगिरा, भृगु, कणाद, कपिल, वामदेव, शुक्र और वसिष्ठ को दिया था। ये सब ऋषि संशय में थे और बदरिकाश्रम में घोर तप कर रहे थे।

बदरिकाश्रम में ऋषियों को नर सहित नारायण के दर्शन हुए। ऋषियों ने पूछा: इस सबका कारण क्या है, कौन बार-बार जन्म लेता है, आत्मा क्या है, मुक्ति क्या है, और परब्रह्म क्या है? तब नारायण ने तपस्वी-रूप छोड़कर अपना शंख-चक्र-गदाधारी तेजस्वी रूप दिखाया, और उसी समय चंद्रशेखर महादेव प्रकट हुए। शिव ने विष्णु को गले लगाकर पूछा कि ये ऋषि यहाँ क्यों आए हैं। विष्णु ने कहा, "आप ही अपने को जानते हैं, आप ही इन्हें अपना स्वरूप दिखाइए।" फिर आकाश से एक दिव्य आसन प्रकट हुआ, जिस पर शिव विष्णु के साथ बैठे और उपदेश दिया।

उपदेश की शुरुआत है: "यह ज्ञान अकथनीय है, आत्मा का गुप्त सनातन रहस्य, जिसे देवता भी प्रयत्न करके नहीं जानते।" फिर आत्मा का स्वरूप: केवल, स्वस्थ, शांत, सूक्ष्म, सनातन, सबके भीतर, चैतन्य-मात्र और अंधकार से परे। पाँचवें अध्याय में इतना कहकर शिव आकाश में नृत्य करने लगे, और ऋषियों ने विष्णु के साथ नृत्य करते महादेव का वह ऐश्वर्य-रूप देखा, जिसके चरण-कमलों का स्मरण करके मनुष्य अज्ञान से जन्मे भय को त्याग देता है। फिर अध्याय 6 से 10 में शिव की महिमा, उनकी विभूतियाँ और लिंग का अर्थ ("जो अलिंग, एक और अव्यक्त है, वही लिंग है, वही ब्रह्म है, यह निश्चित है"), और अध्याय 11 में योग की पूरी विधि है।

ईश्वर गीता के अंत में व्यास एक बहुत व्यक्तिगत बात कहते हैं: "यह ज्ञान मुझे स्वयं रुद्र वामदेव ने दिया था, और देवकी-पुत्र हरि ने अर्जुन को यही उत्तम ज्ञान दिया था। तब से मेरी गिरीश में विशेष भक्ति है।" और ऋषियों से कहते हैं कि पत्नी-पुत्रों सहित शिव की शरण लो और कर्मयोग से उनकी पूजा करो। ऋषि कहते हैं कि अब उनमें वह अटल भक्ति जागी है जो देवताओं को भी दुर्लभ है, और पूछते हैं कि वह कर्मयोग क्या है जिससे मुमुक्षु भगवान की आराधना करें। यहीं से व्यास गीता शुरू होती है।

योगात्संजायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रवर्तते । योगज्ञानाभियुक्तस्य प्रसीदति महेश्वरः ॥

योग से ज्ञान उत्पन्न होता है, और ज्ञान से योग आगे बढ़ता है। जो योग और ज्ञान दोनों में लगा है, उस पर महेश्वर प्रसन्न होते हैं।

— कूर्म पुराण (पूर्व और उत्तर विभाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 2.11.3

व्यास गीता: जीवन के हर चरण का धर्म

ईश्वर गीता ज्ञान और योग की बात करती है, और व्यास गीता (उत्तर 12 से) कर्म की, यानी वेद और स्मृति के अनुसार रोज़ का जीवन। व्यास कहते हैं कि यह कर्मयोग वेद से सिद्ध है और इसे पहले प्रजापति मनु ने ऋषियों को सुनाया था। फिर एक-एक चरण आता है: उपनयन के बाद गर्भ से आठवें या जन्म से आठवें वर्ष में वेदाध्ययन, ब्रह्मचारी का दंड, मेखला, यज्ञोपवीत, मृगचर्म और भिक्षा, और गुरु के मुख की ओर देखते हुए पढ़ना।

आगे के अध्यायों में: शौच और आचमन कब करें (खाने, पीने, सोने, नहाने और गली में जाने के बाद), अनध्याय के दिन, वेद पढ़कर स्नातक बनना, स्नातक के व्रत ("किसी प्राणी की हिंसा न करे, कभी झूठ न बोले, अहित और अप्रिय वचन न कहे, चोरी न करे"), भोजन के नियम, ब्राह्मण के दैनिक कर्म, अमावस्या का पिंडान्वाहार्यक श्राद्ध और उसकी पूरी विधि, सपिंडों में दस दिन का आशौच, अग्निहोत्र और दर्श-पूर्णमास, और गृहस्थ की जीविका।

फिर दान-धर्म, जो ब्रह्मा ने ब्रह्मवादी ऋषियों को कहा था; आयु का दूसरा भाग गृहस्थ में बिताकर पत्नी और अग्नि सहित वानप्रस्थ, तीसरा भाग वन में, और चौथा संन्यास में; संन्यासी की भिक्षा और नियम; और अंत में प्रायश्चित्त, यानी बड़े-छोटे पापों का शोधन, जिसके बीच कपालमोचन की कथा आती है। Wilson ने इन दोनों गीताओं का अंतर ऐसे बताया: ईश्वर गीता में शिव का ज्ञान ध्यान-भक्ति से सिखाया गया है, और व्यास गीता में वही लक्ष्य कर्मों और वेद के नियमों के पालन से।

प्रलय, समापन और पुराण की परंपरा

अंतिम दो अध्यायों में प्रलय और प्राकृत प्रतिसर्ग का वर्णन है, और फिर कथा वहीं लौटती है जहाँ से शुरू हुई थी। इतना कहकर पुरुषोत्तम ने श्री देवी को साथ लिया, कूर्म-रूप छोड़ा और अपने धाम चले गए; देवता और मुनि भगवान को प्रणाम करके और अमृत लेकर अपने-अपने स्थानों को लौट गए। यानी पूरा पुराण समुद्र-मंथन के उसी एक प्रसंग के भीतर कहा गया है।

पुराण अपनी परंपरा भी बताता है: नारायण से सुनकर नारद ने गौतम को दिया, उनसे पराशर को, और पराशर ने गंगाद्वार (हरिद्वार) में मुनियों को सुनाया। ब्रह्मा ने इसे सनक और सनत्कुमार को कहा था; सनक से देवल को, देवल से पंचशिख को; और सनत्कुमार से सत्यवती-पुत्र व्यास को। व्यास से सूत ने सुना। अंतिम श्लोक कूर्म-रूप विष्णु को नमस्कार है, "जिनसे सब उत्पन्न होता है और जिनमें सब लीन होता है।"

फलश्रुति में दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। एक, पुराण अपनी लिखी हुई प्रति वैशाख मास में किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को दान करने का बड़ा फल बताता है। दो, यह इसे मुमुक्षुओं के लिए विशेष रूप से पढ़ने, सुनने और मनन करने योग्य "वेदार्थ का विस्तार" कहता है, और श्राद्ध, देव-कार्य और यज्ञ के अंत में इसे सुनाने को कहता है।

विद्वानों के मत: शैव पुराण और उसका काल

H. H. Wilson ने 1840 में लिखा कि अवतार का नाम देखकर कोई इसे वैष्णव समझेगा, पर यह सदा, और ठीक ही, शैव पुराणों में गिना जाता है, क्योंकि इसका बड़ा भाग शिव और दुर्गा की उपासना सिखाता है। उन्होंने यह भी बताया कि सृष्टि, अवतार और वंश वाले भाग प्रायः संक्षिप्त हैं, और कई जगह विष्णु पुराण के ही शब्दों में।

Wilson के अनुसार उत्तर विभाग में कोई कथा नहीं है, केवल ईश्वर गीता और व्यास गीता। पर GRETIL के पाठ के उत्तर विभाग में ईश्वर गीता और व्यास गीता के बाद कपालमोचन और दारुवन जैसी कथाएँ और नर्मदा आदि तीर्थों के अध्याय भी हैं। यानी Wilson के पास की प्रति और आज के पाठ में अंतर है; पुराणों की पांडुलिपियों में ऐसे अंतर आम हैं।

काल के बारे में Wilson का तर्क एक श्लोक पर टिका था। पुराण कहता है कि वेद के बिना कोई शास्त्र धर्म नहीं बताता, और श्रुति-स्मृति के विरुद्ध दिखने वाले शास्त्र तामसी हैं; फिर वह कापाल, पांचरात्र, यामल, वाम और आर्हत (जैन) शास्त्रों को "मोहन के लिए" बताता है। Wilson का कहना था कि भैरव और यामल तंत्र, वाम-मार्गी शाक्त और जैन मत ईसा की आरंभिक सदियों में ज्ञात नहीं थे, इसलिए यह पुराण बहुत पुराना नहीं हो सकता। ध्यान दें कि Wilson ने अपने पाठ से जो श्लोक उद्धृत किया, उसमें पांचरात्र का नाम नहीं है, जबकि GRETIL के पाठ में है।

महत्व और आज के लिए अर्थ

कूर्म पुराण उस समय की आवाज़ है जब वैष्णव और शैव परंपराएँ अपने-अपने आराध्य को सर्वोच्च बता रही थीं। इस पुराण ने एक अलग रास्ता चुना: विष्णु के अवतार के मुख से शिव की महिमा, और शिव के मुख से विष्णु की। इसमें कोई देवता दूसरे को हराता नहीं, बल्कि दोनों एक-दूसरे की ओर संकेत करते हैं। आज जब लोग "हरि-हर एक हैं" कहते हैं, तो उस विचार की एक गहरी जड़ इसी पुराण में है।

साधक के लिए इसमें दोनों मार्ग हैं: ईश्वर गीता का ज्ञान और योग, और व्यास गीता का कर्म और आचार। और तीर्थ-यात्री के लिए काशी, प्रयाग, नर्मदा और सेतु के लिंग का माहात्म्य। पर सबसे सुंदर बात शायद इंद्रद्युम्न की कथा में है: जो अपने धर्म में स्थिर रहकर ज्ञान और भक्ति से ईश्वर को भजता है, उस पर माया का बस नहीं चलता, चाहे वह माया स्वयं लक्ष्मी का रूप क्यों न हो।

आगे पढ़ें

  • मत्स्य पुराण — मत्स्य-रूप भगवान ने प्रलय के जल में नाव पर बैठे राजा मनु को सुनाया: सृष्टि, पितर, वंश, व्रत, तीर्थ, गोत्र, सावित्री, राजधर्म, मूर्ति-मंदिर और सोलह महादान
  • विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
  • श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
  • पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
  • वेद व्यास — ईश्वर गीता और व्यास गीता के वक्ता
  • वेद-विभाजन — 28 द्वापरों के व्यास
  • अष्टांग योग — ईश्वर गीता के योग-अध्याय से तुलना के लिए
  • महर्षि वसिष्ठ — ईश्वर गीता के श्रोताओं में

स्रोत एवं संदर्भ

कूर्म पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न