अग्नि पुराण क्या है?
नैमिषारण्य में ऋषि सूत से एक ही प्रश्न पूछते हैं: "हमें वह सारों का सार बताइए, जिसे जान लेने मात्र से सब कुछ जाना हुआ हो जाता है।" सूत उत्तर देते हैं कि वह सार भगवान विष्णु हैं, और "मैं ब्रह्म हूँ", यह जान लेने से सर्वज्ञता आती है। फिर वे बताते हैं कि यह ज्ञान उन्हें कैसे मिला: वे शुक और पैल के साथ बदरिकाश्रम गए, व्यास को प्रणाम किया, और व्यास ने वह सुनाया जो उन्हें वसिष्ठ ने बताया था, और जो वसिष्ठ को स्वयं अग्नि देव ने कहा था। यही अग्नि पुराण है।
अग्नि स्वयं वसिष्ठ से कहते हैं: "मैं विष्णु हूँ, कालाग्नि रुद्र हूँ; मैं तुम्हें विद्या का सार कहता हूँ", वह पुराण जो सबका कारण है, और जिसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित हैं। यह आरंभ ही बता देता है कि अग्नि पुराण का लक्ष्य क्या है: एक ही ग्रंथ में सब विद्याओं का सार देना। और यह सचमुच वैसा ही है, अठारहों पुराणों में सबसे अधिक विविध विषयों वाला।
मत्स्य पुराण इसका परिचय ऐसे देता है: जिसमें ईशान कल्प के वृत्तांत को आधार बनाकर अग्नि ने वसिष्ठ को उपदेश दिया, वह आग्नेय पुराण है, सोलह हज़ार श्लोकों का। भागवत इसे "वाह्न" कहता है और संख्या 15,400 बताता है। अठारह महापुराणों की परंपरागत सूची में यह आठवाँ है।
दो ब्रह्म, दो विद्याएँ: अग्नि पुराण की दृष्टि
अग्नि पुराण के पहले ही अध्याय में एक गहरा विचार है: दो ब्रह्म जानने योग्य हैं, "शब्द-ब्रह्म" और "पर-ब्रह्म"। और पुराण स्वयं इसके लिए अथर्ववेद की श्रुति का हवाला देता है, कि "दो विद्याएँ जाननी चाहिए"। यह वही बात है जो मुण्डक उपनिषद में अङ्गिरस शौनक से कहते हैं: परा और अपरा विद्या।
अग्नि पुराण अपरा विद्या की सूची भी देता है, और यह सूची ही उसकी सामग्री का नक़्शा है: चारों वेद, छह वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छंद), और उनके साथ न्याय, वैद्यक (चिकित्सा), गांधर्व (संगीत), धनुर्वेद और अर्थशास्त्र। और परा विद्या वह है जो दिखती नहीं, पकड़ी नहीं जाती, जिसका कोई गोत्र या वर्ण नहीं, जो अटल है। यानी अग्नि पुराण संसार की सब उपयोगी विद्याएँ सिखाता है, और अंत में याद दिलाता है कि सबसे बड़ी विद्या ब्रह्म-ज्ञान है।
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । द्वे विद्ये वेदितव्ये हि इति चाथर्वणी श्रुतिः ॥दो ब्रह्म जानने योग्य हैं: शब्द-ब्रह्म और जो परम ब्रह्म है। अथर्ववेद की श्रुति भी कहती है कि दो विद्याएँ जाननी चाहिए।
संरचना: 381 अध्याय, एक विश्वकोश
GRETIL पर उपलब्ध अग्नि पुराण का पाठ Rajendralal Mitra के संस्करण (Bibliotheca Indica, कलकत्ता 1870–79) पर आधारित है, और उसमें पुराण की अपनी "अनुक्रमणिका" है, जिसमें हर अध्याय का विषय लिखा है। उस अनुक्रमणिका में 381 अध्याय हैं, अंतिम है "यम-गीता"। दूसरे संस्करणों में अध्याय-संख्या कुछ अलग मिल सकती है, और Wilson के समय भी अलग-अलग पांडुलिपियों में श्लोक-संख्या 14,000 से 16,000 के बीच बताई जाती थी।
नीचे की तालिका उसी अनुक्रमणिका से बनी है, और विषयों को मोटे समूहों में दिखाती है। इसे देखकर साफ़ हो जाता है कि अग्नि पुराण को "अग्नि-पूजा का पुराण" या किसी एक धार्मिक विषय का ग्रंथ समझना गलत होगा: यह उस समय की लगभग हर विद्या का एक संक्षिप्त संग्रह है।
| अध्याय | विषय | स्रोत |
|---|---|---|
| 1–16 | अवतार: मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम (रामायण-सार), कृष्ण (हरिवंश), महाभारत-सार, बुद्ध और कल्कि | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 1–16 |
| 17–20 | सृष्टि (नौ प्रकार के सर्ग) | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 17–20 |
| 21–106 | पूजा, मंत्र, मुद्रा, दीक्षा, मंडल; मंदिर-निर्माण, मूर्ति और लिंग के लक्षण, प्रतिष्ठा; घर और नगर का वास्तु | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 21–106 |
| 107–120 | सृष्टि, भुवन-कोश, तीर्थ-माहात्म्य (गंगा, प्रयाग, वाराणसी, नर्मदा, गया), श्राद्ध, भारतवर्ष | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 107–120 |
| 121–149 | ज्योतिष, काल-गणना, युद्ध-विजय की ज्योतिष ("युद्धजयार्णव"), तांत्रिक पूजाएँ | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 121–149 |
| 150–174 | मन्वन्तर, वर्णाश्रम-धर्म, विवाह, आचार, शुद्धि, आशौच, श्राद्ध, प्रायश्चित्त | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 150–174 |
| 175–217 | तिथि, वार, नक्षत्र और मास के व्रत; दान; मंत्र-माहात्म्य, गायत्री | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 175–217 |
| 218–252 | राज्याभिषेक, राजधर्म, युद्ध-यात्रा, शकुन, षाड्गुण्य, राम द्वारा कही नीति, पुरुष-स्त्री लक्षण, आयुध, रत्न-परीक्षा, वास्तु, धनुर्वेद (248 से) | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 218–252 |
| 253–257 | व्यवहार (न्याय-शास्त्र): दिव्य प्रमाण, दाय-भाग, सीमा-विवाद, वाक्-पारुष्य | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 253–257 |
| 258–277 | चारों वेदों के विधान, शांति, वेद-शाखाएँ; सूर्य, चंद्र, यदु और पुरु वंश | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 258–277 |
| 278–298 | आयुर्वेद: सिद्ध औषधियाँ, रस, वृक्षायुर्वेद, हाथी-घोड़ों की चिकित्सा, विष-चिकित्सा, बाल-तंत्र | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 278–298 |
| 299–328 | अनेक मंत्र और पूजाएँ: गणपति, वागीश्वरी, शिव-शांति | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 299–328 |
| 329–346 | छंद-शास्त्र, शिक्षा, काव्य-लक्षण, नाटक, रस, रीति, नृत्य, अभिनय, अलंकार, काव्य के गुण-दोष | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 329–346 |
| 347–366 | एकाक्षर-कोश, व्याकरण (संधि, शब्द-रूप, कारक, समास, तद्धित, धातु-रूप), नाम-कोश के वर्ग | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 347–366 |
| 367–381 | प्रलय, शरीर, नरक; अष्टांग योग, ब्रह्म-ज्ञान, अद्वैत ब्रह्म-ज्ञान; गीता-सार, यम-गीता | अग्नि पुराण (मूल संस्कृत), 367–381 |
अवतार और महाकाव्यों का सार (अध्याय 1–16)
दूसरे अध्याय में वसिष्ठ अग्नि से पूछते हैं कि मत्स्य आदि रूप धारण करने वाले विष्णु के बारे में बताइए, और अग्नि अवतारों का उद्देश्य बताते हैं: दुष्टों का नाश और सज्जनों की रक्षा। मत्स्य-कथा पिछले कल्प के अंत के प्रलय से शुरू होती है, जब वैवस्वत मनु कृतमाला नदी में जल-तर्पण कर रहे थे। अग्नि पुराण की शुरुआत विष्णु के अवतारों से होती है, और यह भाग किसी कथा-संग्रह की तरह चलता है।
अवतारों के क्रम में मत्स्य और कूर्म के अलग अध्याय हैं; वराह, नरसिंह, वामन और परशुराम एक अध्याय में; और राम-अवतार पर सात अध्याय, जो पूरी रामायण का संक्षिप्त सार देते हैं। फिर हरिवंश के आधार पर कृष्ण-कथा, और तीन अध्यायों में पूरे महाभारत का सार। अवतारों का यह क्रम बुद्ध और कल्कि के अध्याय पर पूरा होता है।
Wilson ने इस पर ध्यान दिलाया था कि राम और कृष्ण की कथाओं में अग्नि पुराण खुलकर रामायण और महाभारत का अनुसरण करता है। यानी यहाँ अग्नि पुराण स्वयं को नई कथाओं का स्रोत नहीं, बल्कि महाकाव्यों के सार का ग्रंथ बनाता है, ताकि पाठक को एक ही जगह सब मिल जाए।
मंदिर-निर्माण, वास्तु और मूर्ति-लक्षण
भारतीय कला और स्थापत्य के इतिहास के लिए अग्नि पुराण का सबसे मूल्यवान भाग मंदिर और मूर्ति से जुड़ा है। अनुक्रमणिका के अनुसार इसमें देवालय बनाने का फल, भूमि का चयन, शिलान्यास, प्रासाद (मंदिर) के लक्षण और उसमें देवता की स्थापना पर अलग-अलग अध्याय हैं; और आगे पाताल-शिलान्यास, वास्तु-पूजा, प्रासाद के सामान्य लक्षण, घर का वास्तु और नगर का वास्तु भी।
मूर्ति-लक्षण, यानी मूर्ति कैसी बनाई जाए, पर इसमें अध्यायों की एक पूरी शृंखला है: वासुदेव आदि की प्रतिमा के लक्षण, पिंडिका (आधार) के लक्षण, शालग्राम के लक्षण और पूजा, विष्णु की चौबीस मूर्तियों का स्तोत्र, मत्स्य आदि अवतारों की प्रतिमा, देवी की प्रतिमा, सूर्य आदि की प्रतिमा, योगिनियों की प्रतिमा, और शिव-लिंग के लक्षण, व्यक्त और अव्यक्त लिंग, और लिंग की पिंडिका। इसके बाद मूर्ति की प्रतिष्ठा, यानी प्राण-प्रतिष्ठा, के विधान आते हैं: कलश-अधिवास, देव-स्नान, वासुदेव, लक्ष्मी और सुदर्शन चक्र की प्रतिष्ठा, कुएँ और बाग़ की प्रतिष्ठा, और पुरानी मूर्ति के उद्धार का विधान।
मूर्ति-लक्षण का पहला अध्याय दिखाता है कि यह शास्त्र कितना ठोस था। भगवान बताते हैं कि मूर्ति के लिए चुनी शिला की पहले पूजा और बलि की जाए, फिर शिल्पी उसे नौ भागों में बाँटे, और उनमें से एक भाग को आगे "स्वांगुल", यानी मूर्ति की अपनी अंगुल-इकाई, बनाया जाए। फिर हर अंग का माप "ताल" (एक निश्चित लंबाई) में तय होता है: मुकुट एक ताल, मुख एक ताल, कंठ एक ताल, हृदय एक ताल, और इसी तरह एड़ी, घुटने और गर्दन के भाग। यानी मूर्ति का हर अनुपात गणित से तय था, कलाकार की मर्ज़ी से नहीं।
यह भाग बताता है कि मंदिर और मूर्ति भारतीय परंपरा में केवल आस्था की नहीं, एक व्यवस्थित शास्त्र की चीज़ थे, जिसमें माप, अनुपात और विधि सब तय थे। आज भी मंदिर-निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा की परंपराएँ ऐसे ही ग्रंथों से जुड़ती हैं।
पूजा, दीक्षा और तंत्र
अग्नि पुराण का एक बड़ा भाग आगम और तंत्र की पूजा-पद्धतियों का है। अनुक्रमणिका में आगम के अनुसार विष्णु आदि देवताओं की सामान्य पूजा, स्नान-विधि, कुंड-निर्माण और अग्नि-कार्य, मंत्र, मुद्राओं के लक्षण, दीक्षा, आचार्य का अभिषेक, और सर्वतोभद्र जैसे मंडलों के लक्षण आते हैं। आगे गणेश, सूर्य और शिव की पूजा, और शैव दीक्षा के कई प्रकार: समय-दीक्षा, संस्कार-दीक्षा और निर्वाण-दीक्षा।
Wilson ने इस भाग की ओर ध्यान दिलाया था। उनके अनुसार इसके बहुत-से कर्मकांड तांत्रिक पद्धति के हैं, और कुछ शिव-पूजा के गूढ़ रूपों के, जैसे दीक्षा, जिसमें अनेक विधियों और तंत्र के बीज-मंत्रों के साथ शिष्य शिव का जीवित रूप बन जाता है और गुरु उसका सम्मान करता है। उन्होंने यह भी लिखा कि अपनी पहले की एक टिप्पणी में उन्होंने अग्नि पुराण को वैष्णव पुराण कहा था, जो गलत था, और यह शैव वर्ग का पुराण है। यानी अग्नि पुराण किसी एक संप्रदाय में बँधा नहीं: इसमें विष्णु, शिव, देवी, सूर्य और गणेश, सबकी पूजा-पद्धतियाँ हैं।
तीर्थ, धर्मशास्त्र, व्रत और दान
तीर्थों पर अग्नि पुराण में गंगा, प्रयाग, वाराणसी और नर्मदा के माहात्म्य के अध्याय हैं, और गया पर विशेष रूप से, क्योंकि श्राद्ध और पिंडदान के लिए गया की यात्रा का वर्णन भी इसी में है। धर्मशास्त्र के भाग में वर्ण और आश्रम के धर्म, गृहस्थ की जीविका, ब्रह्मचर्य, विवाह, आचार, वस्तुओं की शुद्धि, मृत्यु और जन्म के आशौच, वानप्रस्थ और संन्यास के धर्म, श्राद्ध और प्रायश्चित्त, सब आते हैं।
अध्याय 162 धर्मशास्त्र के प्रवर्तकों की एक लंबी सूची से शुरू होता है: मनु, विष्णु, याज्ञवल्क्य, हारीत, अत्रि, यम, अंगिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तंब, उशना, व्यास, कात्यायन, बृहस्पति, गौतम और दूसरे। Wilson ने लिखा कि न्याय (व्यवहार) पर इसका अध्याय याज्ञवल्क्य-स्मृति की मिताक्षरा टीका के मूल पाठ जैसा ही है। दान पर अग्नि पुराण धर्म के दो प्रकार बताता है: "इष्ट" और "पूर्त"। इष्ट में अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदों की रक्षा, अतिथि-सत्कार और वैश्वदेव आते हैं; और पूर्त में बावड़ी, कुएँ, तालाब, मंदिर, अन्न-दान और बगीचे बनवाना, यानी समाज के लिए किए गए काम। पुराण कहता है कि जो दोनों करता है, वह सब कुछ पाता है। व्रतों पर अग्नि पुराण में हर तिथि, हर वार, नक्षत्र और मास के व्रतों के अध्याय हैं: एकादशी, द्वादशी, शिवरात्रि, भीष्म-पंचक, दीप-दान और अगस्त्य-अर्घ्य जैसे व्रत; और दान पर महादान, भूमि-दान और अनेक दानों के अध्याय।
राजनीति, युद्ध और धनुर्वेद
राज्य-शास्त्र पर अग्नि पुराण किसी अर्थशास्त्र की तरह विस्तार में जाता है। अनुक्रमणिका के अनुसार इसमें राज्याभिषेक और उसके मंत्र, शत्रु पर विजय और सहायक-संपदा, राजा के धर्म, युद्ध-यात्रा, शकुनों का फल, षाड्गुण्य (संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध और आश्रय की छह नीतियाँ), राजा का प्रतिदिन का कर्म, राज्य के अंग, बारह राजाओं का मंडल, और साम, दान, दंड, भेद जैसे उपायों पर अध्याय हैं। इनमें एक अध्याय "राम द्वारा कही गई नीति" का भी है, जो राम ने लक्ष्मण को कही। उसमें राम बताते हैं कि राजा का आचरण चार तरह का है: न्याय से धन कमाना, उसे बढ़ाना, उसकी रक्षा करना और सुपात्र को देना। और नीति की जड़ विनय है, विनय शास्त्र के निश्चय से आता है, और विनय का अर्थ है इंद्रियों पर विजय; जो इनसे युक्त है, वही पृथ्वी का पालन करे।
इसी भाग में पुरुष और स्त्री के शारीरिक लक्षण, आयुधों (हथियारों) के लक्षण, और रत्नों की परीक्षा पर अध्याय आते हैं। और इसके बाद धनुर्वेद, यानी युद्ध-विद्या, का भाग है, जो अध्याय 248 में "चार पादों वाले धनुर्वेद" के परिचय से शुरू होता है। अग्नि बताते हैं कि धनुर्वेद के चार पाद रथ, हाथी, घोड़े और पैदल योद्धाओं पर टिके हैं, और युद्ध के पाँच प्रकार हैं: यंत्र से छोड़े जाने वाले अस्त्र (जैसे धनुष), हाथ से फेंके जाने वाले (जैसे पत्थर और तोमर), छोड़कर फिर खींच लिए जाने वाले (जैसे प्रास), हाथ में ही रहने वाले (जैसे तलवार), और बिना शस्त्र का बाहु-युद्ध। Wilson ने लिखा कि राजाओं के कर्तव्य और युद्ध-कला के अध्याय किसी पुराने ग्रंथ से लिए गए लगते हैं। चाहे जो हो, पुराण में इनका होना बताता है कि राज्य और युद्ध को भी धर्म के व्यापक दायरे का हिस्सा माना गया।
न्याय-शास्त्र पर अग्नि पुराण के अध्याय 253 से 257 व्यवहार, यानी मुक़दमों और विवादों, के हैं: दिव्य प्रमाण (परीक्षा द्वारा सत्य की जाँच), संपत्ति का बँटवारा (दाय-भाग), सीमा के विवाद, और कटु वचन या मारपीट जैसे अपराध। एक पुराण में अदालत और क़ानून के नियम पढ़ना आज के पाठक को अनोखा लग सकता है, पर यह दिखाता है कि उस परंपरा में धर्म जीवन के हर क्षेत्र को छूता था।
ज्योतिष, आयुर्वेद और पशु-चिकित्सा
ज्योतिष पर अग्नि पुराण में ज्योतिष-शास्त्र, काल-गणना, और "युद्धजयार्णव" नाम से युद्ध में विजय से जुड़ी ज्योतिष के कई अध्याय हैं, जिनमें नक्षत्र-चक्र, साठ संवत्सर और अलग-अलग चक्रों का वर्णन है। यह उस परंपरा का ज्ञान है; इन्हें आज के अर्थ में भविष्यवाणी की गारंटी नहीं समझना चाहिए।
वृक्षायुर्वेद का अध्याय स्वयं धन्वंतरि के मुख से कहा गया है, और उसकी शुरुआत घर के आसपास पेड़ लगाने के नियम से होती है: उत्तर में पाकड़, पूर्व में बरगद, दक्षिण में आम और पश्चिम में पीपल शुभ हैं; काँटेदार पेड़ घर के पास दक्षिण दिशा में उगें तो ठीक नहीं; और घर के पास बगीचा होना चाहिए। आगे पेड़ लगाने और तालाब बनाने के शुभ नक्षत्र बताए गए हैं, और वरुण, विष्णु और पर्जन्य की पूजा करके जल-स्रोत बनाने का विधान। प्रकृति के प्रति यह सम्मान आज के पर्यावरण-विचार से भी मेल खाता है।
आयुर्वेद का भाग अग्नि पुराण के सबसे बड़े विद्या-भागों में है। इसमें सिद्ध औषधियाँ, सब रोगों को दूर करने वाली औषधियाँ, रसों के लक्षण, अनेक रोगों की औषधियाँ, और मंत्र-रूप औषधियाँ हैं। सबसे अनोखा है "वृक्षायुर्वेद", यानी पेड़-पौधों का आयुर्वेद, और पशुओं की चिकित्सा: हाथियों की चिकित्सा, घोड़ों की देखभाल और चिकित्सा, और हाथी-घोड़ों की शांति। साँप के काटने और विष की चिकित्सा, और बच्चों के रोगों का "बाल-तंत्र" भी इसी में है। यह परंपरा का ज्ञान है; रोग में आज के योग्य चिकित्सक से ही इलाज कराना चाहिए।
छंद, काव्यशास्त्र, व्याकरण और कोश
अग्नि पुराण उन गिने-चुने पुराणों में है जिनमें साहित्य-शास्त्र पर पूरे अध्याय हैं, और इस कारण यह भारतीय काव्यशास्त्र के इतिहास में भी पढ़ा जाता है। छंद-शास्त्र पर इसमें छंदों का सार, जाति-छंद, विषम, अर्धसम और समवृत्त छंद, और प्रस्तार के अध्याय हैं, और शिक्षा (उच्चारण-शास्त्र) पर एक अध्याय।
काव्य-शास्त्र का भाग अग्नि के एक बहुत प्रसिद्ध वचन से शुरू होता है। वे पहले बताते हैं कि वाणी के चार रूप हैं, ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य, और शास्त्र, इतिहास और काव्य में अंतर यह है कि शास्त्र में शब्द प्रधान है, इतिहास में घटना, और काव्य इन दोनों से अलग है। फिर वे कहते हैं: संसार में मनुष्य होना दुर्लभ है, उसमें विद्या दुर्लभ, विद्या में कवित्व दुर्लभ, और कवित्व में सच्ची प्रतिभा और भी दुर्लभ। रस के अध्याय में अग्नि रस को सीधे ब्रह्म से जोड़ते हैं: वेदांत जिस अक्षर, परम, चैतन्य ब्रह्म की बात करता है, उसका सहज आनंद जब प्रकट होता है, तो उसी "चेतना के चमत्कार" को रस कहते हैं, और उसका पहला रूप शृंगार है।
काव्य-शास्त्र पर इसमें काव्य के लक्षण, नाटक का निरूपण, शृंगार आदि रसों का निरूपण, रीति, नृत्य और अभिनय में अंगों के कर्म, शब्दालंकार, अर्थालंकार, शब्दार्थालंकार, और काव्य के गुण और दोष पर अध्याय हैं। यानी एक ही पुराण में रस-सिद्धांत, अलंकार और नाट्य, सबका संक्षिप्त शास्त्र है।
और भाषा पर इसमें व्याकरण का एक पूरा संक्षिप्त ग्रंथ है: संधि, पुंलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग शब्दों के रूप, कारक, समास, तद्धित, उणादि, धातु-रूप और कृदंत। इसके बाद "एकाक्षर-कोश" और अमरकोश की तरह वर्गों में बँटा एक नाम-कोश: स्वर्ग-पाताल वर्ग, अव्यय वर्ग, नानार्थ वर्ग, भूमि-वन-औषधि वर्ग, मनुष्य वर्ग, ब्रह्म वर्ग, क्षत्र-विट्-शूद्र वर्ग। एक धार्मिक ग्रंथ में शब्दकोश और व्याकरण, यही अग्नि पुराण को अनोखा बनाता है।
अंत में: प्रलय, योग, ब्रह्म-ज्ञान और गीता-सार
इतनी सब व्यावहारिक विद्याओं के बाद अग्नि पुराण का अंतिम भाग फिर उसी "परा विद्या" की ओर लौटता है जिसकी बात पहले अध्याय में हुई थी। पहले नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यंतिक प्रलय, गर्भ में जीव की उत्पत्ति, शरीर के अंग और नरकों का वर्णन; फिर पूरा अष्टांग योग: यम-नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि।
योग का भाग अग्नि के इन शब्दों से शुरू होता है: "संसार के ताप से छूटने के लिए मैं अष्टांग योग कहता हूँ।" योग की परिभाषा वे तीन तरह से देते हैं: चित्त का एकाग्र होना, चित्त की वृत्तियों का निरोध, और जीव और ब्रह्म का मिलन। पाँच यम हैं: अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह; और नियम हैं: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-पूजा। अहिंसा के बारे में अग्नि एक सुंदर उपमा देते हैं: जैसे हाथी के पैर के निशान में राह चलने वाले सबके पैरों के निशान समा जाते हैं, वैसे ही सारे धर्म अहिंसा में समा जाते हैं।
फिर अग्नि हिंसा के दस रूप गिनाते हैं, जो बताते हैं कि हिंसा केवल मारना नहीं: किसी को उद्विग्न करना, संताप देना, रोग या घाव देना, खून बहाना, चुगली करना, किसी के हित में बहुत बाधा डालना, किसी का भेद खोलना, किसी का सुख छीनना, किसी को बंदी बनाना, और वध। और सत्य की परिभाषा भी उतनी ही गहरी है: सत्य वह वचन है जो प्राणियों के लिए सबसे अधिक हितकारी हो। यानी अग्नि पुराण का योग केवल आसन और श्वास का नहीं, आचरण का योग है।
उसके बाद ब्रह्म-ज्ञान और "अद्वैत ब्रह्म-ज्ञान" के अध्याय आते हैं, और पुराण दो छोटे "गीताओं" पर समाप्त होता है: "गीता-सार", यानी भगवद्गीता का सार, और "यम-गीता"। यानी अग्नि पुराण का पूरा ढाँचा वही है जो उसके पहले अध्याय ने बताया था: पहले अपरा विद्या, यानी संसार की सब उपयोगी विद्याएँ, और अंत में परा विद्या, यानी ब्रह्म का ज्ञान।
गीता-सार का पहला उपदेश भगवद्गीता की ही बात है: जो मर गया या जो जीवित है, उस देहधारी के लिए शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि आत्मा अजर, अमर और अभेद्य है। फिर गीता की वह प्रसिद्ध सीढ़ी: विषयों का ध्यान करने से उनमें आसक्ति होती है, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से स्मृति का नाश, और बुद्धि के नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है। अंतिम "यम-गीता" वह है जो यम ने नचिकेता को कही। यम कहते हैं कि मनुष्य, जो स्वयं अस्थिर है, बड़े मोह से अपने आसन, बिस्तर, सवारी, कपड़े और घर को स्थिर चाहता है; और फिर कपिल और पंचशिख जैसे आचार्यों के वचन याद दिलाते हैं कि सबमें समान दृष्टि, ममता का त्याग और अनासक्ति ही मनुष्य का परम कल्याण है।
गायत्री का अर्थ और वसिष्ठ की लिंग-स्तुति (अध्याय 216–217)
अग्नि पुराण में गायत्री पर दो अध्याय हैं, और पहला अध्याय गायत्री नाम का अर्थ समझाता है। संध्या की विधि के बाद गायत्री का जप और स्मरण करना चाहिए, क्योंकि जो इसका गायन करता है, उसकी, यानी शिष्यों, पत्नी और प्राणों की, यह रक्षा करती है: "गायन्तं त्रायते", इसीलिए यह गायत्री कहलाती है। सविता को प्रकाशित करने के कारण यह सावित्री कहलाती है, और वाणी-रूप होने से सरस्वती। मंत्र के "भर्गः" शब्द का अर्थ वह परम ज्योति, परब्रह्म, बताया गया है।
दूसरे अध्याय में अग्नि बताते हैं कि वसिष्ठ ने लिंग-रूप शिव की स्तुति करके गायत्री के द्वारा योग और परम ब्रह्म में निर्वाण पाया। वह स्तुति शिव-लिंग के अनेक रूपों को नमस्कार है: स्वर्ण-लिंग, वेद-लिंग, परम-लिंग, आकाश-लिंग, सहस्र-लिंग, अग्नि-लिंग, पुराण-लिंग और श्रुति-लिंग। एक ही पुराण में गायत्री, वैष्णव पूजा और शिव-लिंग की स्तुति का साथ-साथ होना अग्नि पुराण के समन्वय वाले स्वभाव को दिखाता है।
विद्वानों के मत: संकलन, मौलिकता और काल
H. H. Wilson का अग्नि पुराण पर मत कड़ा था। उन्होंने लिखा कि बंगाल और बनारस से मिले रूप में अग्नि पुराण मार्कण्डेय पुराण से बिल्कुल उलटा है, और "संदेह है कि इसकी एक भी पंक्ति मौलिक हो"; इसका बड़ा भाग दूसरे स्रोतों में खोजा जा सकता है। उदाहरण के लिए, उन्होंने भूगोल के अध्यायों को विष्णु पुराण जैसा, न्याय के अध्याय को मिताक्षरा के पाठ जैसा, और वेद-पुराण के विभाजन के वर्णन को विष्णु पुराण का संक्षेप बताया।
Wilson ने यह भी बताया कि उनकी दो प्रतियों में लगभग पंद्रह हज़ार श्लोक थे, जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी के पुस्तकालय की दो प्रतियाँ बारह हज़ार से आगे नहीं जाती थीं और कई बातों में अलग थीं; उनमें से एक अकबर के शासन में, 1589 ई. में, आगरा में लिखी गई थी। आज की दृष्टि से इसे दूसरे ढंग से भी देखा जा सकता है: अग्नि पुराण का महत्व इसकी मौलिकता में नहीं, इसके संकलन में है। जो ज्ञान अलग-अलग शास्त्रों में बिखरा था, उसे इसने एक जगह, आम पाठक की पहुँच में रख दिया। तिथि के बारे में कोई एक मत सर्वमान्य नहीं है।
महत्व और आज के लिए अर्थ
अग्नि पुराण की सबसे बड़ी सीख उसकी बनावट में ही है: धर्म जीवन के किसी एक कोने की चीज़ नहीं। घर बनाना, मूर्ति गढ़ना, राज चलाना, मुक़दमा सुलझाना, रोग का इलाज करना, कविता रचना, सही व्याकरण बोलना, और अंत में आत्मा को जानना: सब एक ही ज्ञान-परंपरा के अंग हैं। यह भारतीय परंपरा की उस दृष्टि का सबसे अच्छा उदाहरण है जिसमें विज्ञान, कला और अध्यात्म अलग-अलग खाने नहीं थे।
आज के पाठक के लिए अग्नि पुराण एक खिड़की है, जिससे हज़ार साल से भी पहले के भारत की विद्याओं को एक साथ देखा जा सकता है: मंदिर-स्थापत्य के इतिहासकार उसके मूर्ति-लक्षण पढ़ते हैं, काव्यशास्त्र के विद्यार्थी उसके अलंकार, और आयुर्वेद के अध्येता उसके वृक्षायुर्वेद और पशु-चिकित्सा। और भक्त के लिए वह याद दिलाता है कि हर विद्या के बाद भी अंतिम विद्या वही है जिससे ब्रह्म जाना जाता है।
आगे पढ़ें
- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- गरुड़ पुराण — विष्णु और गरुड़ का संवाद: पूजा और व्रत से रत्न-परीक्षा और आयुर्वेद तक, फिर प्रेतकल्प में मृत्यु, कर्म-फल, श्राद्ध और मोक्ष का उपदेश
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
- महर्षि वसिष्ठ — अग्नि पुराण के श्रोता
- आयुर्वेद — आयुर्वेद की उत्पत्ति की कथा
- व्याकरण — पाणिनि और व्याकरण की परंपरा
- अष्टांग योग — यम से समाधि तक
- गायत्री मंत्र — अग्नि पुराण में गायत्री पर अध्याय भी है
स्रोत एवं संदर्भ
- अग्नि पुराण (Rajendralal Mitra सं., Bibliotheca Indica 1870–79) — GRETIL e-text — Rajendralal Mitra (सं.); input: Jun Takashima (1879) · 1.3–1.7, 1.13–1.14, 1.5, 1.15–1.18, अनुक्रमणिका, अध्याय 1–381, अनुक्रमणिका, 1–16, 17–20, 21–106, 107–120, 121–149, 150–174, 175–217, 218–252, 253–257, 258–277, 278–298, 299–328, 329–346, 347–366, 367–381, 2.1–4, 2–16, 38–43, 92–94, 104–106, 44–70, 44.1–5, 38–70, 21–32, 71–91, 21–106, 299–328, 109–117, 151–174, 162.1–2, 175–213, 209.1–4, 218–241, 237.1–3, 242–248, 248.1–5, 121–142, 281.1–6, 329–335, 336.1–4, 338.1–4, 336–346, 367–375, 371.1–5, 371.5–7, 376–381, 1.15–1.18, 380.1–4, 381.1–4, 216.1–3, 217.1–3, 1.15–1.18, अनुक्रमणिका, 44–70, 278–298, 336–346, 376–379
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.28–30
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.13.5
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.22
- The Upanishads, Part II (Sacred Books of the East, vol. 15) — मुण्डक उपनिषद — F. Max Müller (अनु.) (1884) · Mundaka Upanishad I.1.4
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, p. lix, Preface, pp. lix–lx, Preface, p. lx
