ब्रह्माण्ड पुराण क्या है?
ब्रह्माण्ड पुराण पहले ही अध्याय में अपनी परंपरा बताता है: प्रजापति ब्रह्मा ने यह पुराण वसिष्ठ को सराहकर दिया; वसिष्ठ ने अपने पौत्र, शक्ति के पुत्र पराशर को पढ़ाया; पराशर ने यह वेद-सम्मित दिव्य पुराण द्वैपायन व्यास को दिया; और व्यास ने इसे पाँच शिष्यों को दिया: जैमिनि, सुमंतु, वैशंपायन और अन्य, जिनमें धार्मिक और विनम्र सूत भी थे। फिर ऋषियों के सत्र में सूत कहते हैं: "मैं वह पुराण कहूँगा जो मातरिश्वा (वायु) ने कहा था।"
यही इस पुराण की सबसे बड़ी विशेषता है: इसके लगभग हर अध्याय की पुष्पिका में लिखा है "ब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते", यानी ब्रह्माण्ड महापुराण में, जो वायु ने कहा। इससे इसका वायु पुराण से गहरा संबंध दिखता है, जिस पर Wilson ने भी विस्तार से लिखा। पुराण यह भी कहता है कि सब शास्त्रों में सबसे पहले ब्रह्मा ने पुराण को सुना।
अठारह पुराणों की विष्णु पुराण वाली सूची में ब्रह्माण्ड अंतिम है। मत्स्य पुराण इसका परिचय देता है: जिसमें ब्रह्मा ने ब्रह्माण्ड का माहात्म्य बारह हज़ार दो सौ श्लोकों में कहा, और जिसमें भविष्य के कल्पों का विस्तार है। भागवत इसकी संख्या बारह हज़ार देता है, और उपसंहार पाद की एक पुष्पिका भी इसे "बारह हज़ार की संहिता" कहती है।
सूत उवाच यो मे द्वैपायनप्रीतः कथां वै द्विजसत्तमाः । पुराणं संप्रवक्ष्यामि यदुक्तं मातरिश्वना ॥सूत बोले: हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, द्वैपायन (व्यास) ने प्रसन्न होकर मुझे जो कथा दी, वह पुराण मैं कहूँगा, जिसे मातरिश्वा (वायु) ने कहा था।
संरचना: चार पाद और तीन भाग
सूत पुराण के चार पाद गिनाते हैं: पहला "प्रक्रिया" पाद, फिर अनुषंग, उपोद्घात और उपसंहार। GRETIL के पाठ में ये तीन भागों में बँटे हैं: पूर्व भाग में प्रक्रिया पाद (5 अध्याय) और अनुषंग पाद (33 अध्याय); मध्यम भाग में उपोद्घात पाद (74 अध्याय); और उत्तर भाग में उपसंहार पाद (4 अध्याय) और उसके बाद ललितोपाख्यान (40 अध्याय)। हर अध्याय का नाम उसकी अपनी पुष्पिका में दिया है, और नीचे की तालिका उन्हीं से बनी है।
पाँच पारंपरिक लक्षणों (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित) का क्रम इस पुराण में काफ़ी साफ़ दिखता है: पहले सृष्टि और लोक, फिर कल्प, मन्वन्तर और युग, फिर ऋषियों और राजाओं के वंश, और अंत में प्रलय (उपसंहार)। इसलिए इसे "पंचलक्षण" पुराण का एक अच्छा उदाहरण माना जा सकता है।
| भाग / पाद | मुख्य विषय | स्रोत |
|---|---|---|
| पूर्व भाग, प्रक्रिया पाद (1–5) | कृत्य-समुद्देश, नैमिष-आख्यान, हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति, लोक-कल्पना | ब्रह्माण्ड पुराण (मूल संस्कृत), 1.1–1.5 |
| पूर्व भाग, अनुषंग पाद (6–38) | कल्प और मन्वन्तर, मानस सृष्टि, रुद्र का जन्म, ऋषि-सर्ग, प्रियव्रत-वंश, पृथ्वी, भारतवर्ष, द्वीप, सूर्य-व्यूह, ध्रुव, ज्योतिष; नीलकंठ नाम, लिंगोत्पत्ति, दारुवन; अमावस्या-श्राद्ध; यज्ञ-प्रवर्तन, चार युग, ऋषि-लक्षण, व्यास-शिष्य, पृथ्वी-दोहन, मन्वन्तर | ब्रह्माण्ड पुराण (मूल संस्कृत), 1.6–1.38 |
| मध्यम भाग, उपोद्घात पाद (1–20) | ऋषि-सर्ग, प्रजापति-वंश, दनु और कश्यप के वंश, ऋषि-वंश; श्राद्ध-कल्प: पितृ-लोक, पुण्य देश, आशौच, दान, तिथि-श्राद्ध, ब्राह्मण-परीक्षा | ब्रह्माण्ड पुराण (मूल संस्कृत), 2.1–2.20 |
| मध्यम भाग, उपोद्घात पाद (21–58) | वसिष्ठ-सगर संवाद में कार्तवीर्य अर्जुन और परशुराम (भार्गव-चरित), कार्तवीर्य-वध; सगर का उपाख्यान, और्व-आश्रम, सगर-पुत्रों का विनाश, अंशुमान, गंगा का आनयन | ब्रह्माण्ड पुराण (मूल संस्कृत), 2.21–2.58 |
| मध्यम भाग, उपोद्घात पाद (59–74) | वैवस्वत मनु, गांधर्व की मूर्च्छनाएँ, सोम, धन्वंतरि, ययाति, वृष्णि-वंश और अन्य वंश | ब्रह्माण्ड पुराण (मूल संस्कृत), 2.59–2.74 |
| उत्तर भाग, उपसंहार पाद (1–4) | प्रलय (आभूत-संप्लव), शिवपुर, प्रतिसर्ग, ब्रह्माण्ड का आवर्त | ब्रह्माण्ड पुराण (मूल संस्कृत), 3.1–3.4 |
| उत्तर भाग, ललितोपाख्यान | अगस्त्य की यात्रा और हयग्रीव का प्रकट होना; अमृत-मंथन, मोहिनी; भंडासुर; ललिता का प्रादुर्भाव, विवाह, सेना-यात्रा, भंडासुर-वध; मदन का पुनर्जन्म; श्रीनगर की सात कक्षाएँ, चिंतामणि गृह, मंत्रराज | ब्रह्माण्ड पुराण (मूल संस्कृत), 3.5–3.44 |
सृष्टि, युग और यज्ञ का आरंभ
प्रक्रिया और अनुषंग पादों में ब्रह्माण्ड पुराण अपने नाम के अनुसार ब्रह्माण्ड का वर्णन करता है: हिरण्यगर्भ (सोने के अंड) से ब्रह्मा की उत्पत्ति, लोकों की रचना, कल्प और मन्वन्तर, ब्रह्मा की मानस सृष्टि, और रुद्र का जन्म। रुद्र के जन्म की कथा में ब्रह्मा एक नीले-लाल वर्ण वाले रोते हुए बालक को देखते हैं और बार-बार पूछते हैं, "क्यों रोते हो?", और उसे "मत रो" कहते हैं।
आगे प्रियव्रत का वंश, पृथ्वी का विस्तार, भारतवर्ष, किंपुरुष आदि वर्ष, जंबूद्वीप और प्लक्ष आदि द्वीप, सूर्य का व्यूह, ग्रह, ध्रुव की गति और ज्योतिषों (नक्षत्रों) की स्थिति आती है। फिर शिव से जुड़े अध्याय: "नीलकंठ" नाम की उत्पत्ति, लिंग की उत्पत्ति, और दारुवन में प्रवेश और भस्म-स्नान की विधि।
अनुषंग पाद का उत्तरार्ध काल और धर्म का है: यज्ञ का प्रवर्तन, चार युगों का आख्यान, युग के अनुसार प्रजा के लक्षण और ऋषियों के प्रवर, ऋषि के लक्षण, व्यास के शिष्यों की उत्पत्ति और वेदों का विभाजन, स्वायंभुव और बाकी मन्वन्तर, पृथ्वी-दोहन, चाक्षुष सर्ग, और मन्वन्तरों का वर्णन। अमावस्या के श्राद्ध में पितरों का विचार भी इसी पाद में है।
श्राद्ध-कल्प: पितरों का विस्तृत शास्त्र
उपोद्घात पाद के आरंभिक अध्यायों में ऋषि-सर्ग, प्रजापति के वंश, दानवों का वंश और कश्यप के वंश के बाद एक पूरा "श्राद्ध-कल्प" आता है, लगभग दस अध्यायों में। इसमें पितृ-राज्य का कल्प, श्राद्ध की समिधाएँ, श्राद्ध के लिए पुण्य देशों की सूची, आशौच की विधि, ब्राह्मणों के विषय, दान की प्रशंसा, तिथि-अनुसार श्राद्ध, श्राद्ध में बुलाए जाने वाले ब्राह्मणों की परीक्षा, और श्राद्ध की संपूर्ण विधि है।
इस भाग के अंत में श्रद्धालु को आश्वासन दिया गया है: "परम भक्ति से युक्त होकर (करोगे), तो मनचाहा फल पाओगे।" ब्रह्माण्ड पुराण का यह श्राद्ध-कल्प वायु पुराण के श्राद्ध-भाग से बहुत मिलता है, जो Wilson के इस मत से मेल खाता है कि दोनों का बड़ा भाग एक ही है।
भार्गव-चरित: परशुराम की सबसे लंबी कथा
ब्रह्माण्ड पुराण का सबसे बड़ा कथा-भाग परशुराम का चरित है, जो उपोद्घात पाद में बीस से अधिक अध्यायों तक चलता है, और यह कथा वसिष्ठ राजा सगर को सुनाते हैं। पहले कार्तवीर्य अर्जुन का उपाख्यान, फिर जमदग्नि के पुत्र राम (परशुराम) का तप, और "भार्गव-चरित" नाम से अध्याय पर अध्याय। इसी में परशुराम का शस्त्र धारण करना और असुरों का वध भी आता है।
कथा का सबसे मार्मिक प्रसंग जमदग्नि के मारे जाने के बाद का है। परशुराम आँसू भरी आँखों से नीचे मुँह किए खड़े थे; किसी ने उन्हें समझाया कि धैर्यवान लोग विपत्ति में शोक नहीं करते। तब विधवापन के शोक से व्याकुल माता रेणुका रोते हुए अपने दोनों हाथों से इक्कीस बार अपनी छाती पीटने लगीं। परशुराम ने उन्हें सांत्वना दी और प्रतिज्ञा की: "आपने जितनी बार, इक्कीस बार, अपनी छाती पीटी है, उतनी बार मैं पृथ्वी पर सब जगह (क्षत्रियों का) वध करूँगा; यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।" इसके बाद रेणुका ने पति के साथ जाने की इच्छा प्रकट की।
इसी भार्गव-चरित में कार्तवीर्य का वध है, और एक प्रसिद्ध प्रसंग गणेश के एक दाँत का। अपनी पराजय के अपमान को सोचकर हर्ष और शोक से भरे, क्रोधित परशुराम ने अपना फरसा फेंका; उस फरसे को व्यर्थ न जाने देने के लिए गणेश ने उसे अपने बाएँ दाँत पर ले लिया, और रक्त से सने गणेश वज्र से मारे पर्वत जैसे धरती पर गिरे। पृथ्वी काँप उठी, कार्तिकेय आदि ज़ोर से रोने लगे, और पार्वती और शंकर वहाँ आए। स्कंद से कारण सुनकर पार्वती शंकर पर क्रोधित हुईं।
त्रिःसप्तकृत्वो यदिदं त्वया वक्षः समाहतम् । हनिष्ये भुवि सर्वत्र सत्यमेतद्ब्रविमि ते ॥(परशुराम माता रेणुका से:) तुमने जो इक्कीस बार अपनी छाती पर प्रहार किया है, (उतनी बार) मैं पृथ्वी पर सब जगह वध करूँगा; यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।
सगर, कपिल और गंगा
भार्गव-चरित के बाद, उसी वसिष्ठ-सगर संवाद के भीतर, सगर का अपना उपाख्यान आता है: वसिष्ठ का आगमन, सगर का अपनी प्रतिज्ञा का पालन, और्व ऋषि के आश्रम में सगर का जाना, लोक-निंदा के भय से विषयों का त्याग, यज्ञ का घोड़ा, पृथ्वी को खोदते हुए घोड़े को घेरकर भीतर जाते सगर-पुत्र, उनका विनाश, कपिल के आश्रम से घोड़े को लाना, अंशुमान को राज्य, और अंत में गंगा का आनयन।
परशुराम-कथा का अंत कुरुक्षेत्र में होता है, और यहाँ एक प्रसिद्ध तीर्थ की उत्पत्ति बताई गई है। (अनेक युद्धों के बाद) परशुराम तपोमय कुरुक्षेत्र गए, वहाँ चारों ओर सुगम स्नान वाले तीर्थ बनाए और पाँच सरोवर भरे। उन्होंने शास्त्र के अनुसार, बिना आलस्य, ब्राह्मणों के साथ पितरों का तर्पण और माता के लिए भी विधि से कर्म किए, और वहीं पितृ-पूजा में लगे रहे। जहाँ भृगुश्रेष्ठ ने पितरों की अक्षय तृप्ति की और सब पितर बहुत संतुष्ट हुए, वह "समंतपंचक" नाम से लोक में प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ जाने वाले मनुष्यों के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
सगर की कथा में भी कई विवरण विशेष हैं। राजा सगर का विवाह केशिनी और सुमति से हुआ। वसिष्ठ उनसे मिलने आए, कुशल पूछा और आशीर्वाद दिया (यहाँ एक पंक्ति में वक्ता जैमिनि के रूप में आते हैं, जो कथा के कहने वाले हैं)। संतान के लिए सगर और्व ऋषि के आश्रम गए। और्व ने वर दिया कि एक रानी से एक पुत्र होगा, और दूसरी से साठ हज़ार; उन्होंने बताया कि गर्भ से निकले बीज-रूप को सँभालकर रखने से गिनती के अनुसार साठ हज़ार पुत्र होंगे। राजा ने वैसा ही किया, और साठ हज़ार पुत्र समूहों में बढ़े। केशिनी का एकमात्र पुत्र, जो राजा को बहुत प्रिय था, एक पिशाच से ग्रस्त होकर बुरे आचरण वाला हो गया, और आगे की कथा उसी से जुड़ती है।
इस तरह ब्रह्माण्ड पुराण इक्ष्वाकु-वंश की उस कथा को, जो रामायण में भी आती है, एक बड़े ढाँचे में रखता है: वसिष्ठ सगर को परशुराम की कथा सुनाते हैं, और फिर सगर की अपनी कहानी गंगा के पृथ्वी पर आने तक पहुँचती है।
गांधर्व, सोम, धन्वंतरि और ययाति
उपोद्घात पाद के अंतिम भाग में एक अनोखा विषय है: "गांधर्व" यानी संगीत-शास्त्र। दो अध्यायों में स्वरों की मूर्च्छनाओं के लक्षण बताए गए हैं, और पुराण उन्हें देवताओं, पितरों और पक्षियों से भी जोड़ता है: "पक्षियों की मूर्च्छनाएँ सुनकर (जो बनीं), वे पक्षियों की मूर्च्छनाएँ कहलाईं।"
फिर वंशानुचरित: वैवस्वत मनु की उत्पत्ति और सृष्टि, सोम और बुध का जन्म, आयु का वंश, धन्वंतरि के जन्म आदि का वर्णन, ययाति का चरित, वृष्णि-वंश, और तुर्वसु, पुरु, द्रुह्यु और अनु के वंश। ययाति के अध्याय के अंत में कहा गया है कि जो ब्राह्मण ययाति का पूरा चरित पढ़ता या सुनता है (वह पुण्य पाता है)।
ललितोपाख्यान: हयग्रीव, अगस्त्य और ललिता देवी
ललितोपाख्यान से पहले के उपसंहार पाद में प्रलय और लोकों का वर्णन है। ऋषि सूत से फिर सृष्टि-प्रवर्तन पूछते हैं: जब सब बंधन लीन हो जाते हैं और गुण तमोमय साम्य में होते हैं, तब क्या होता है। सात लोक गिनाए गए हैं: भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सबसे ऊपर चमकता सत्यलोक (ब्रह्मलोक); और कहा गया है कि "भूः" व्याहृति से पहले भूर्लोक बना। अध्याय "शिवपुर" का वर्णन भी करता है, और अंतिम अध्याय "ब्रह्माण्डावर्त", यानी ब्रह्मांड के चक्र, पर है, जहाँ पुराण अपने नाम के अर्थ पर लौट आता है।
उपसंहार पाद के चार अध्यायों (प्रलय, शिवपुर, प्रतिसर्ग, ब्रह्माण्ड का आवर्त) के बाद ब्रह्माण्ड पुराण में "ललितोपाख्यान" है, हयग्रीव और अगस्त्य का संवाद। अध्याय का पहला श्लोक ही देवी की प्रार्थना है: "हाथों में पौंड्र ईख का धनुष, पाश, अंकुश और फूलों के बाण धारण करने वाली, जगत की एकमात्र माता, तुम्हें नमस्कार।" कथा यह है कि अगस्त्य ने पर्वत, वन, नदियाँ और जनपद घूमते हुए लोगों को केवल पेट और काम में डूबा देखा और उनके लिए चिंतित हुए; वे कांची नगर पहुँचे, कामाक्षी की पूजा की, और लंबे तप के बाद जनार्दन उनके सामने प्रकट हुए; Wilson के अनुसार यहाँ विष्णु हयग्रीव रूप में आते हैं, और पूरा संवाद हयग्रीव और अगस्त्य का ही कहलाता है।
अगस्त्य ने इन साधारण जीवों के उद्धार का उपाय पूछा। भगवान ने कहा कि यही प्रश्न पहले ब्रह्मा ने और फिर दुर्वासा ने किया था; और उत्तर में उन्होंने अपनी प्रधान शक्ति, परा शक्ति, की उपासना का मार्ग बताया। फिर कथा आती है: दाक्षायणी (सती) के देह-त्याग के बाद, शिव द्वारा भस्म किए गए कामदेव की भस्म से एक पुरुष बना, जो आगे भंडासुर कहलाया। उसे शिव से साठ हज़ार वर्ष का राज्य मिला, और उसके कारण देवताओं के यज्ञ रुक गए।
ललितोपाख्यान समुद्र-मंथन और मोहिनी की कथा को भी देवी से जोड़ता है। अमृत के लिए जब देवताओं और असुरों में कलह हुआ, तब विष्णु ने ललिता की, जिनका रूप उनसे एक है, आराधना की, और उसी एक ध्यान के योग से वे स्वयं उसी रूप के हो गए: सब शृंगारों और आभूषणों से युक्त, मंद मुस्कान से दैत्यों को मोहित करती मोहिनी। मोहिनी ने कहा, "कठोर, गला सुखाने वाली व्यर्थ बातों से क्या? अमृत का पात्र मेरे हाथ में दो।" मोहित असुरों ने कलश दे दिया; मोहिनी ने देवताओं और असुरों की अलग पंक्तियाँ बनाईं, पहले देवताओं को अमृत परोसा, और असुरों के सामने पात्र लाकर अंतर्धान हो गईं। फिर युद्ध में पराजित दैत्य दिशाओं के छोर और पाताल को भाग गए, और इंद्र ने श्री (लक्ष्मी) की कृपा-दृष्टि से अपनी खोई श्री फिर पाई और पहले की तरह त्रिलोक का पालन करने लगे; देवता प्रसन्न होकर इच्छानुसार विचरने लगे। बाद में नारद कैलास जाते हैं, और पार्वती-पति शिव के पूछने पर विस्मय से बताते हैं कि आदिनारायण ने मोहिनी रूप धारण किया था।
देवता भंडासुर से युद्ध में हार गए। तब उन्होंने एक योजन चौड़ा कुंड बनाया और "महामांस", यानी अपने ही शरीर के मांस, हाथ और पैर की आहुतियाँ देकर परा शक्ति का यज्ञ किया। आहुतियाँ पूरी होते ही एक अनुपम तेज-पुंज प्रकट हुआ, और उसके बीच उगते सूर्य जैसी, सौंदर्य की सीमा, आनंद-रस की सागर, सब आभूषणों से युक्त महादेवी प्रकट हुईं, जिनके हाथों में पाश, अंकुश, ईख का धनुष और पाँच बाण थे। देवताओं ने बार-बार प्रणाम करके उन अंबिका की स्तुति की।
ललिता के प्रकट होने से पहले की कथा भी रोचक है। भंडासुर के राज्य में देवताओं के यज्ञ असुरों के घर होने लगे थे, और देवता उसकी माया से मोहित थे। तब नारद देवताओं के साथ इंद्र के पास आए और कहा कि उस अत्यंत बलवान का तेज कोई और तप से करोड़ों कल्पों में भी नहीं हर सकता; केवल भगवती की आराधना से कल्याण होगा। इंद्र तप के लिए हिमालय गए, और पुराण कहता है कि वह स्थान तभी से "इंद्रप्रस्थ" कहलाया, जो सब सिद्धियाँ देता है। दस हज़ार वर्ष और दस दिन तक देवताओं ने वहाँ देवी की पूजा, जप और ध्यान किया। भंडासुर के पुरोहित (शुक्र) ने उसे चेताया कि इंद्र तुम्हारे विरुद्ध तप कर रहा है; भंडासुर सेना लेकर गया, देवताओं की बनाई प्राचीर को अपने अस्त्र से तोड़ा, और देवता भयभीत होकर सब कर्म छोड़ बैठे।
देवी के प्रकट होने के बाद ब्रह्मा के आदेश से विश्वकर्मा ने उनके लिए एक नगर बनाया: हाथी, घोड़ों और रथों की शालाओं से भरा, राजमार्गों से सजा, बीच में चिंतामणि से बना दिव्य सिंहासन। देखने के लिए शिव वृषभ पर, ऋषि, अप्सराएँ, दुर्गा, ब्राह्मी आदि मातृकाएँ, भैरव और क्षेत्रपाल आए। ब्रह्मा ने सोचा कि श्रुति कहती है राजा का अभिषेक अनुकूल पत्नी के साथ हो, पर इनके योग्य वर तीनों लोकों में शंकर के सिवा कोई नहीं; और शंकर तो भस्म लगाए, श्मशान की हड्डियों से सजे रहते हैं। ब्रह्मा यह सोच ही रहे थे कि महेश्वर दिव्य वस्त्र, माला और सुगंध धारण किए, जगत को मोहित करने वाले रूप में उनके सामने प्रकट हुए, और ब्रह्मा ने उनका नाम "कामेश्वर" रखा।
देवताओं ने देवी से लोक-रक्षा के लिए किसी परम पुरुष को वरण करने की प्रार्थना की, ताकि वे प्रिय के साथ अभिषिक्त होकर आसन पर बैठें। देवी ने कहा कि उनका प्रिय उनके अनुरूप चरित्र वाला होगा, और फिर हाथ में माला लेकर आकाश में उछाली; वह माला कामेश्वर के कंठ में गिरी, और फूलों की वर्षा हुई। विष्णु से कहा गया कि इन दोनों शिवों का विधि से विवाह कराएँ, और यह भी कि महादेवी आपका ही रूप हैं। विवाह में सबने उपहार दिए: हरि ने कभी न मुरझाने वाला पुष्प-धनुष, विश्वकर्मा ने अंकुश, समुद्र ने नवरत्नों के आभूषण, कुबेर ने चिंतामणि की माला, और गंगा-यमुना ने चँवर। जब देवी सभा में आईं, तो अपनी कृपा-दृष्टि मात्र से सबकी कामनाएँ पूरी कीं, और इसी से उन्हें "कामाक्षी" और "कामेश्वरी" नाम मिले।
आगे के अध्यायों के नाम ही कथा बता देते हैं: ललिता का स्तवराज; सेना सहित विजय-यात्रा; दंडनाथा और श्यामला की सेनाएँ; चक्रराज रथ और किरिचक्र रथ के देवता; भंडासुर के सेनापतियों का वध; भंड के पुत्रों का वध; गणनाथ (गणेश) का पराक्रम; भंडासुर-वध; और फिर ललिता की आज्ञा से मदन (कामदेव) का पुनर्जन्म।
युद्ध के दो प्रसंग विशेष हैं। एक में विशुक्र नाम के मायावी दानव ने रात में शिला-पट्ट पर आठ देवताओं से युक्त "जयविघ्न महायंत्र" लिखकर देवी की सेना के शिविर में डाल दिया; उसके प्रभाव से देवी की शक्तियाँ उदासीन, नींद और आलस्य से भरी हो गईं, और "युद्ध कैसा?" कहकर आज्ञा मानने से भी इनकार करने लगीं। मंत्रिणी और दंडनाथा ने यह महारानी ललिता को बताया। तब ललिता मुस्कुराईं, और उनकी हँसी से एक देवता प्रकट हुए: हाथी जैसे मुख वाले, दस हाथों में बिजौरा, गदा, ईख का धनुष, शूल, सुदर्शन और रत्न-कुंभ धारण किए, सिद्धि-लक्ष्मी से आलिंगित। उन्होंने देवी को प्रणाम किया, छिपे हुए यंत्र को खोजा, उस महाशिला को क्षण भर में चूर-चूर करके आकाश में उड़ा दिया, और फिर अपने अनेक गजमुख रूप रचे। यही "गणनाथ का पराक्रम" है।
दूसरा प्रसंग भंडासुर-वध से ठीक पहले का है, और यह दशावतार की एक अनोखी कल्पना है। भंडासुर ने अपनी भौंहों और अस्त्रों से पुराने असुरों को रचा: करोड़ों हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, बलि, सहस्रार्जुन, मेघनाद, द्विविद के वानर, और कंस, चाणूर, पूतना, शकट, तृणावर्त, पौंड्रक वासुदेव, रुक्मी जैसे दानव-राजा। उत्तर में ललिता ने अपने नखों से अवतार रचे: श्वेत महावराह ने हिरण्याक्षों को कुचला; शक्ति से प्रकट नृसिंह ने प्रह्लाद की रक्षा करके हिरण्यकशिपुओं का नाश किया; दाहिने हाथ की कनिष्ठा से निकले (वामन के) गणों ने बलियों को पाशों में बाँधा; भार्गव राम ने सहस्रार्जुनों को मारा; लक्ष्मण सहित कोदंड-राम आए और लक्ष्मण ने मेघनाद को मारा; तालध्वज बलराम ने द्विविद के वानरों का नाश किया; और बाएँ हाथ की अनामिका के नख से वासुदेव और संकर्षण प्रकट हुए, जिन्होंने कंस आदि सबका अंत किया। अंत में भंडासुर का वध हुआ।
अंतिम अध्यायों में "श्रीनगर" का वर्णन है, जो ललिता का दिव्य नगर है: उसकी सात कक्षाएँ (परकोटे) और उनके रक्षक देवता, पुष्पराग आदि रत्नों के प्राकार, दिक्पालों से शिवलोक तक के लोक, महापद्माटवी, चिंतामणि गृह, और अंत में "मंत्रराज" की साधना का विधान। पाठ स्वयं एक जगह कहता है कि (देवी के) नाम "सहस्रनाम अध्याय" में कहे जाएँगे; पर GRETIL के इस पाठ के चालीस अध्यायों में वह सहस्रनाम-अध्याय शामिल नहीं है।
तन्मध्ये तु महादेवीमुदयार्कसमप्रभाम् । ... पाशाङ्कुशेक्षुकोदण्डपञ्चबाणलसत्कराम् ॥उस (तेज-पुंज) के बीच उगते सूर्य जैसी प्रभा वाली महादेवी (प्रकट हुईं), ... जिनके हाथों में पाश, अंकुश, ईख का धनुष और पाँच (फूलों के) बाण शोभित थे।
विद्वानों के मत: वायु पुराण से संबंध
Wilson ने 1840 में लिखा कि ब्रह्माण्ड पुराण को स्कंद की तरह आम तौर पर एक संपूर्ण ग्रंथ के रूप में न मिलने वाला माना जाता था, और उसके नाम से अनेक खंड और माहात्म्य चलते थे। उन्होंने Colonel Wilford का यह कठोर उद्धरण भी दिया कि ब्रह्माण्ड, स्कंद और पद्म को "चोरों के पुराण" कहा गया, क्योंकि इनके नाम से कुछ भी जोड़ दिया जाता था; पर Wilson ने स्वयं कहा कि यह बात पद्म पर लागू नहीं होती।
Wilson को दो भागों में एक प्रति मिली, पहले में 124 और दूसरे में 78 अध्याय, लगभग उतने श्लोकों के जितने इस पुराण के बताए जाते हैं। उन्होंने पाया कि पहला और बड़ा भाग लगभग पूरी तरह वायु पुराण ही था, केवल पुष्पिका में "वायु पुराणे" की जगह "ब्रह्माण्ड पुराणे" लिखा था; वे इसे धोखा नहीं, बल्कि किसी प्रतिलिपिकार की भूल मानते थे, क्योंकि वायु पुराण के पहले भाग का अंतिम खंड "ब्रह्माण्ड" कहलाता है, और प्रति में वायु को वक्ता बताना ईमानदारी से बना रहा। GRETIL के पाठ की "वायुप्रोक्त" पुष्पिकाएँ इसी संबंध को दिखाती हैं।
दूसरे भाग के बारे में Wilson ने लिखा कि वह वायु का भाग नहीं, शायद दक्षिण भारत में प्रचलित एक संहिता या खंड है: अगस्त्य कांची जाते हैं, जहाँ हयग्रीव-रूप विष्णु उन्हें परा शक्ति की उपासना बताते हैं, और मुख्य विषय ललिता देवी द्वारा भंडासुर-वध है। उपासना के नियम उन्हें शाक्त या तांत्रिक लगे, इसलिए उन्होंने इसे "वास्तविक पुराण" का भाग नहीं माना। उनके संपादक F. Hall ने टिप्पणी में यह भी जोड़ा कि बहुत लोकप्रिय "अध्यात्म रामायण" ब्रह्माण्ड पुराण का भाग मानी जाती है। ये दोनों मत यहाँ इसलिए हैं कि पाठक जानें कि ब्रह्माण्ड पुराण के रूप पर विद्वानों में बहस रही है।
महत्व और आज के लिए अर्थ
ब्रह्माण्ड पुराण दो बिल्कुल अलग दुनियाओं को एक साथ रखता है। एक ओर यह पुराण का सबसे "शास्त्रीय" रूप है: सृष्टि, युग, मन्वन्तर, श्राद्ध और वंश, साफ़ पादों में। दूसरी ओर इसका ललितोपाख्यान श्रीविद्या की भक्ति का स्रोत है, जहाँ देवी ललिता सौंदर्य, आनंद और करुणा की मूर्ति हैं, और भंडासुर, जो काम की भस्म से जन्मा, अहंकार और अज्ञान का प्रतीक।
परशुराम की कथा में भी एक गहरी मानवीय बात है: एक पुत्र जो माता के इक्कीस आघात देखकर प्रतिज्ञा कर लेता है। और गणेश, जो शिव के दिए फरसे का मान रखने के लिए उसे व्यर्थ नहीं जाने देते और अपना दाँत दे देते हैं। ये कथाएँ बताती हैं कि पुराण केवल देवताओं की नहीं, भावनाओं और मर्यादाओं की भी कथाएँ हैं।
आगे पढ़ें
- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- मार्कण्डेय पुराण — जैमिनि के प्रश्न और चार ज्ञानी पक्षी: हरिश्चंद्र, मदालसा की लोरी, दत्तात्रेय का योग, चौदह मन्वन्तर, और दुर्गा सप्तशती का मूल देवी-माहात्म्य
- शिव पुराण — सातों संहिताओं में: शिवरात्रि और ज्योति-स्तंभ, सती और दक्ष-यज्ञ, पार्वती का तप और शिव-विवाह, कार्तिकेय और गणेश, त्रिपुर और जलंधर, शिव के अवतार, बारह ज्योतिर्लिंग, रुद्राक्ष और पंचाक्षर
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- महर्षि अगस्त्य — ललितोपाख्यान के श्रोता
- महर्षि वसिष्ठ — सगर को परशुराम-कथा सुनाने वाले
- श्री गणेश — एकदंत की कथा
- माँ दुर्गा — देवी के रूप
स्रोत एवं संदर्भ
- ब्रह्माण्ड पुराण (पूर्व, मध्यम, उत्तर भाग) — GRETIL e-text — GRETIL e-text (2020) · 1.1.8–1.1.14, 1.1.35–1.1.36, पुष्पिकाएँ, अध्याय 1.1 से, 1.1.40, 3.4, पुष्पिका, 1.1.37–1.1.39, पुष्पिकाएँ, 1.1.37, 1.6–1.38, 3.1–3.4, 1.1–1.5, 2.1–2.20, 2.21–2.58, 2.59–2.74, 3.5–3.44, 1.3, 1.6–1.10, 1.10.5–1.10.16, 1.14–1.24, 1.25–1.27, 1.28–1.38, 2.1–2.20, पुष्पिकाएँ, 2.21.81, 2.21–2.46, पुष्पिकाएँ, 2.24.77–2.24.81, 2.30.20–2.30.40, 2.40, पुष्पिका, 2.42.1–2.42.10, 2.47–2.58, पुष्पिकाएँ, 2.51.69, 2.52.43, 2.47.1–2.47.12, 2.49.2–2.49.60, 2.51.19–2.51.53, 2.47–2.58, 2.61–2.62, पुष्पिकाएँ, 2.61.50–2.61.52, 2.59–2.74, पुष्पिकाएँ, 2.66.90, 2.68.107, 2.73.126, 3.1–3.4, पुष्पिकाएँ, 3.2.14–3.2.25, 3.4.5–3.4.6, 3.5.1–3.5.12, 3.5.13–3.5.25, 3.11.2–3.11.30, 3.12.53–3.12.57, 3.10.1–3.10.39, 3.10.23–3.10.26, 3.12.63–3.12.75, 3.12.16–3.12.64, 3.14.1–3.14.21, 3.14.26–3.14.29, 3.15.1–3.15.35, 3.13–3.30, पुष्पिकाएँ, 3.14.20–3.14.21, 3.15.12–3.15.35, 3.27.24–3.27.80, 3.29.95–3.29.128, 3.29, पुष्पिका, 3.31–3.38, पुष्पिकाएँ, 3.20.68, 3.11–3.12, 2.30.28–2.30.31, 2.42.2–2.42.4, 2.30.30–2.30.31, 3.12.70, 3.12.73
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, pp. lxxxv–lxxxvi, Preface, p. lxxxvi, Preface, p. lxxxv
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.23
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.55–56
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.13.4–8
