विष्णु पुराण: छह अंश, कथाएँ, सृष्टि और दर्शन

पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय

संक्षेप में

विष्णु पुराण अठारह महापुराणों में तीसरा है। इसमें महर्षि पराशर अपने शिष्य मैत्रेय को सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद की कथाएँ, पृथ्वी के द्वीप, मन्वन्तर, राजवंश, श्रीकृष्ण का चरित और प्रलय सुनाते हैं। समीक्षित संस्करण में इसके छह अंश, 126 अध्याय और लगभग 5,700 श्लोक हैं।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में तीसरा (विष्णु पुराण 3.6.21; भागवत 12.7.23 में भी तीसरा)
वक्ता और श्रोता
महर्षि पराशर (वसिष्ठ के पौत्र) → उनके शिष्य मैत्रेय
विभाजन
6 अंश, 126 अध्याय (समीक्षित संस्करण, Vadodara 1997–99)
श्लोक
समीक्षित पाठ में 5,707; परंपरा (मत्स्य 53, भागवत 12.13) 23,000 कहती है
मुख्य आराध्य
विष्णु, जो पूरे जगत के कारण और स्वरूप हैं
कल्प
मत्स्य पुराण के अनुसार वाराह कल्प के प्रसंग से कहा गया
प्रसिद्ध कथाएँ
समुद्र-मंथन, ध्रुव, पृथु, प्रह्लाद, जड़ भरत, श्रीकृष्ण-चरित
दर्शन
विष्णु ही प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल; भक्ति, वर्णाश्रम-धर्म, योग और मुक्ति
अंग्रेज़ी अनुवाद
H. H. Wilson (1840; Hall सं. 1864–70)

विष्णु पुराण क्या है?

एक सुबह महर्षि पराशर अपनी नित्य-क्रिया पूरी करके बैठे हैं। उनके शिष्य मैत्रेय पास आते हैं, प्रणाम करते हैं और पूछते हैं: "गुरुदेव, यह जगत कैसे बना, आगे कैसा होगा, और किसमें जाकर लीन होगा?" विष्णु पुराण का पहला श्लोक यही दृश्य है, और पूरा पुराण इसी एक प्रश्न का उत्तर है। गुरु और शिष्य की इस बातचीत में सृष्टि से प्रलय तक का पूरा इतिहास, भूगोल, धर्म और भक्ति समा जाते हैं।

नाम का अर्थ सीधा है: वह पुराण जिसमें विष्णु की महिमा कही गई है। पर पुराण स्वयं इसका एक गहरा कारण देता है। तीसरे अंश में पराशर कहते हैं कि सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश और मन्वन्तर, सब में भगवान विष्णु का ही वर्णन होता है, इसलिए इसका नाम "वैष्णव" है। विष्णु इस पुराण में केवल एक देवता नहीं, जगत के कारण और स्वयं जगत हैं।

अठारह महापुराणों की परंपरागत सूची में विष्णु पुराण तीसरे स्थान पर है। यह क्रम स्वयं विष्णु पुराण (3.6.21) और श्रीमद्भागवत (12.7.23), दोनों में है। पराशर स्वयं कहते हैं कि "यह वैष्णव पुराण, जो मैं तुम्हें सुना रहा हूँ, पद्म के ठीक बाद आता है"।

पराशरं मुनिवरं कृतपूर्वाह्णिकक्रियम् । मैत्रेयः परिपप्रच्छ प्रणिपत्याभिवाद्य च ॥

जब मुनिश्रेष्ठ पराशर सुबह की नित्य-क्रियाएँ पूरी कर चुके थे, तब मैत्रेय ने उन्हें प्रणाम और अभिवादन करके प्रश्न किया।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.1.1

पराशर को यह पुराण कैसे मिला: एक वरदान की कथा

पहले ही अध्याय में पराशर बताते हैं कि यह ज्ञान उन्हें क्यों और कैसे याद आया। उनके पिता शक्ति को विश्वामित्र की प्रेरणा से एक राक्षस खा गया था। क्रोध में आकर पराशर ने ऐसा यज्ञ शुरू किया जिसमें सैकड़ों राक्षस जलने लगे। तब उनके दादा वसिष्ठ ने उन्हें समझाया कि क्रोध मूर्खों का गुण है, और ज्ञानी क्षमा करते हैं। पराशर ने यज्ञ रोक दिया।

पराशर के इस संयम से वसिष्ठ प्रसन्न हुए। उसी समय ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य वहाँ आए। उन्होंने वरदान दिया कि पराशर पुराणों की संहिता के रचयिता होंगे और देवताओं के सच्चे स्वरूप को जानेंगे। वसिष्ठ ने भी कहा कि पुलस्त्य का कहा सब पूरा होगा। पराशर मैत्रेय से कहते हैं: "तुम्हारे प्रश्न से वह सब मुझे याद आ गया जो वसिष्ठ और पुलस्त्य ने कहा था।" यानी इस पुराण का जन्म क्रोध छोड़ने और क्षमा करने से हुआ। अपने आप में यह इसकी पहली शिक्षा है।

पुराण के अंत (6.8) में इसकी पूरी गुरु-परंपरा भी दी गई है। ब्रह्मा ने यह ऋभु को सुनाया, ऋभु ने प्रियव्रत को, और यह भागुरि, स्तम्भमित्र, दधीच, सारस्वत, भृगु, पुरुकुत्स और नर्मदा से होता हुआ नागों तक पहुँचा: धृतराष्ट्र और पूरण नाग, वासुकि, वत्स, अश्वतर, कम्बल और एलापत्र। पाताल से इसे वेदशिरा मुनि लाए, फिर यह प्रमति और जातूकर्ण्य को मिला, और पुलस्त्य के वरदान से पराशर को। पराशर ने मैत्रेय को सुनाया, और कहते हैं कि मैत्रेय इसे कलियुग के अंत में शिनीक को सुनाएँगे।

संरचना: छह अंश और 126 अध्याय

विष्णु पुराण छह भागों में बँटा है, जिन्हें "अंश" कहते हैं। हमने Oriental Institute, Vadodara के समीक्षित संस्करण (1997–99) के पूरे पाठ में हर अंश के अध्याय और श्लोक स्वयं गिने। कुल 126 अध्याय और 5,707 श्लोक निकले। इस गिनती में वे श्लोक नहीं हैं जिन्हें संपादक ने बाद में जोड़े गए (प्रक्षिप्त) माना है। दूसरे छपे संस्करणों में श्लोक-संख्या कुछ अलग हो सकती है।

परंपरा इस पुराण को 23,000 श्लोकों का बताती है: मत्स्य पुराण (53.17) भी, और भागवत (12.13.4) भी। पर आज उपलब्ध किसी भी पाठ में इतने श्लोक नहीं मिलते। H. H. Wilson ने 1840 में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया। वे लिखते हैं कि भारत के पूर्व और पश्चिम से मिली उनकी सातों पांडुलिपियों में सात हज़ार से कम श्लोक थे, और सबमें आरंभ, मध्य और अंत पूरा था, कुछ भी छूटा हुआ नहीं लगता था। "23,000" और "7,000" का यह अंतर कैसे समझा जाए, यह आज भी एक खुला प्रश्न है।

विष्णु पुराण के छह अंश (समीक्षित संस्करण से गिनती)
अंशअध्यायश्लोकमुख्य विषयस्रोत
पहला221,402सृष्टि, काल-गणना, वराह, समुद्र-मंथन, ध्रुव, पृथु, प्रह्लादविष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), अंश 1
दूसरा16786प्रियव्रत के वंश, सात द्वीप, भारतवर्ष, नरक, लोक, सूर्य का रथ, जड़ भरत, ऋभु-निदाघविष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), अंश 2
तीसरा18845मन्वन्तर, 28 व्यास, वेद-शाखाएँ, अठारह पुराण, यम-गीता, वर्णाश्रम, श्राद्ध, मायामोहविष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), अंश 3
चौथा24631सूर्य और चंद्र वंश, राम, यदु-वंश, पांडव, कलियुग के राजाविष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), अंश 4
पाँचवाँ381,531श्रीकृष्ण का पूरा चरित: जन्म से द्वारका और प्रस्थान तकविष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), अंश 5
छठा8512कलियुग, तीन प्रकार का प्रलय, भगवान शब्द का अर्थ, केशिध्वज-खाण्डिक्य का योग, फलश्रुतिविष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), अंश 6
कुल1265,707विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), अंश 1–6

पंचलक्षण: विष्णु पुराण में पुराण के पाँच लक्षण

पुराण की पुरानी परिभाषा पाँच लक्षणों की है: सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय और फिर से सृष्टि), वंश (देवताओं और ऋषियों की वंशावली), मन्वन्तर (मनुओं के काल) और वंशानुचरित (राजवंशों का चरित)। विष्णु पुराण यह परिभाषा स्वयं देता है (3.6.24), और अंत में पराशर कहते हैं कि "मैंने तुम्हें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित, सब सुना दिए" (6.8.2)।

विद्वान विष्णु पुराण को इन पाँच लक्षणों का सबसे व्यवस्थित उदाहरण मानते हैं, क्योंकि इसके छह अंश लगभग इसी क्रम में चलते हैं। पहले अंश में सर्ग है, दूसरे में संसार का भूगोल, तीसरे में मन्वन्तर, चौथे में वंश और वंशानुचरित, और छठे में प्रतिसर्ग, यानी प्रलय। पाँचवाँ अंश, श्रीकृष्ण का चरित, वंशानुचरित का ही सबसे बड़ा विस्तार है। इसलिए "पंचलक्षण" समझना हो, तो विष्णु पुराण सबसे अच्छा आरंभ है।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव भवतो गदितं मया ॥

सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित: ये सब मैंने तुम्हें सुना दिए।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 6.8.2

सृष्टि और काल: पहला अंश

पहला अंश सृष्टि से शुरू होता है, और उसका आरंभ एक स्तुति से होता है: उस विष्णु को नमस्कार, जो अविकारी, शुद्ध, नित्य, परमात्मा और सदा एक रूप वाले हैं। पराशर बताते हैं कि यही विष्णु प्रधान (मूल प्रकृति), पुरुष, व्यक्त जगत और काल, चारों रूपों में हैं। प्रकृति के गुणों में हलचल होती है, तो महत्, अहंकार, सूक्ष्म भूत और इन्द्रियाँ बनती हैं, और ये सब मिलकर एक अंड (ब्रह्मांड) बनाते हैं, जिसमें ब्रह्मा प्रकट होते हैं।

यहीं विष्णु पुराण की काल-गणना आती है, जो आगे के लगभग सभी पुराणों में दोहराई गई। चार युग (कृत, त्रेता, द्वापर, कलि) मिलकर एक चतुर्युग बनाते हैं, एक हज़ार चतुर्युगों का ब्रह्मा का एक दिन होता है, जिसे कल्प कहते हैं, और उतनी ही बड़ी रात। ब्रह्मा के दिन में चौदह मनु बदलते हैं, और हर मनु का काल एक मन्वन्तर है। पहले अंश में पराशर यह भी बताते हैं कि पिछला महाकल्प "पाद्म" कहलाता था, और इस पुराण की कथा वाराह कल्प की है।

चौथे अध्याय में सृष्टि की शुरुआत की एक सुंदर कथा है। प्रलय के जल में डूबी पृथ्वी को निकालने के लिए भगवान ने महावराह का रूप लिया, अपनी दाढ़ पर धरती को उठाया और रसातल से ऊपर आए। वराह के वेदमय शरीर के रोमों में बसे मुनि उनकी स्तुति करते हैं। यही वराह अवतार है, और इसी कारण इस कल्प को वाराह कल्प कहते हैं।

अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥

जो कभी बदलते नहीं, शुद्ध हैं, नित्य हैं, परमात्मा हैं, सदा एक रूप में रहते हैं और सब पर विजय पाने वाले हैं, उन विष्णु को नमस्कार।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.2.1

समुद्र-मंथन और लक्ष्मी का प्रकट होना (1.9)

समुद्र-मंथन की कथा विष्णु पुराण में एक श्राप से शुरू होती है। शिव के अंश से जन्मे महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर घूम रहे थे। एक विद्याधरी के हाथ में उन्होंने दिव्य फूलों की माला देखी, उसे माँग लिया और रास्ते में ऐरावत पर बैठे इंद्र को भेंट कर दी। इंद्र ने वह माला हाथी के सिर पर रख दी, और हाथी ने उसे सूँघकर ज़मीन पर फेंक दिया। अपमान देखकर दुर्वासा क्रोधित हुए और श्राप दिया कि इंद्र की तीनों लोकों की श्री नष्ट हो जाए। इंद्र हाथी से उतरकर उन्हें मनाते रहे, पर श्राप लौटा नहीं।

श्री के जाते ही देवता दुर्बल हो गए और असुरों से हारने लगे। वे ब्रह्मा के साथ विष्णु की शरण में गए। विष्णु ने कहा कि असुरों से संधि करके उनके साथ क्षीर-सागर का मंथन करो, और अमृत मैं तुम्हें दिलवाऊँगा। देवताओं ने असुरों से संधि की और अमृत के लिए जुट गए। मंथन से एक-एक कर अद्भुत वस्तुएँ निकलीं, उनमें देवांगनाओं को आनंद देने वाला सुगंधित पारिजात वृक्ष भी। फिर श्वेत वस्त्र पहने धन्वन्तरि अमृत से भरा कमंडलु लेकर प्रकट हुए। अंत में कमल पर बैठी देवी श्री, यानी लक्ष्मी, प्रकट हुईं और उन्होंने विष्णु के वक्ष पर स्थान लिया।

विष्णु पुराण लक्ष्मी को विष्णु से कभी अलग न होने वाली शक्ति बताता है। जैसे विष्णु सर्वव्यापी हैं, वैसे ही लक्ष्मी। जब विष्णु राघव (राम) बनते हैं, तो लक्ष्मी सीता बनती हैं; जब कृष्ण, तो रुक्मिणी। इस कथा की सीख साफ़ है: अहंकार और अपमान से "श्री" चली जाती है, और विनम्रता व सहयोग से लौटती है।

ध्रुव की कथा: एक बालक जो तारा बन गया (1.11–12)

राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं: सुनीति, जिनसे राजा को कम प्रेम था, और सुरुचि, जो उन्हें अत्यंत प्रिय थीं। सुनीति के पुत्र ध्रुव थे और सुरुचि के उत्तम। एक दिन उत्तम पिता की गोद में बैठा था, और नन्हे ध्रुव ने भी गोद में चढ़ना चाहा। सुरुचि ने राजा के सामने ही घमंड से कहा: "तुम मेरे पुत्र नहीं हो, इसलिए इस गोद के अधिकारी नहीं हो।" अपमानित ध्रुव रोते हुए माँ के पास गए। सुनीति ने उन्हें गोद में लेकर कहा: "बेटा, सुरुचि सच कहती है, तुम्हारा भाग्य कम है। पर पुण्य करो, तो वह तुम्हें मिलेगा जो तुम चाहते हो।"

ध्रुव ने ठान लिया कि वे ऐसा स्थान पाएँगे जो सब स्थानों से ऊँचा हो। वन में उन्हें सात मुनि मिले, जो काले मृगचर्म बिछाकर बैठे थे। ध्रुव ने उनसे पूछा कि सबसे ऊँचा स्थान कैसे मिलता है। मुनियों ने उन्हें भगवान वासुदेव की आराधना बताई और "ॐ नमो वासुदेवाय" वाला जप सिखाया। ध्रुव यमुना के तट पर मधुवन पहुँचे। पुराण बताता है कि यह वही जगह है जहाँ बाद में शत्रुघ्न ने मधु के पुत्र लवण राक्षस को मारकर मधुरा (मथुरा) नगरी बसाई।

ध्रुव की तपस्या इतनी कठोर थी कि देवता घबरा गए और विष्णु से विनती की कि वे उसे रोकें। विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने ध्रुव को वह स्थान दिया जो सूर्य, चंद्र, सब ग्रहों, नक्षत्रों और सप्तर्षियों से भी ऊपर है, और जो पूरे कल्प तक रहेगा। उनकी माँ सुनीति भी उनके पास एक तारा बनकर रहेंगी। विष्णु ने यह भी कहा कि जो लोग सुबह-शाम एकाग्र होकर ध्रुव का कीर्तन करेंगे, उन्हें बड़ा पुण्य मिलेगा। असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने तब यह श्लोक कहा: "अहो, इस तप का बल, इस तप का फल! सप्तर्षि भी ध्रुव को आगे रखकर स्थित हैं।"

ध्रुव की कथा का सार है: अपमान को कड़वाहट नहीं, साधना की ताक़त बना लेना। एक छोटे बालक की लगन ने उसे आकाश का अटल तारा बना दिया। ध्रुव के जीवन की पूरी कथा, भागवत में आने वाले रूप के साथ, इस साइट के भक्त ध्रुव पृष्ठ पर है।

वेन और पृथु: धरती का दोहन (1.13)

ध्रुव के वंश में राजा वेन हुआ, जो अत्यंत अधर्मी था। उसने आज्ञा दी कि कोई यज्ञ न करे, दान न दे; सब केवल उसी की पूजा करें। ऋषियों ने उसे बहुत समझाया, पर वह नहीं माना, और अंत में ऋषियों ने उसे मार डाला। राजा के बिना देश में अराजकता फैल गई। तब ऋषियों ने वेन के शरीर का मंथन किया। पहले उसकी जंघा से एक छोटा, काला, जले ठूँठ जैसा पुरुष निकला, और फिर दाहिने हाथ के मंथन से तेजस्वी पृथु प्रकट हुए।

पृथु के राज्य में अकाल था, क्योंकि धरती ने सारी औषधियाँ और अन्न अपने भीतर छिपा लिए थे। पृथु धनुष उठाकर उसके पीछे दौड़े। धरती गाय का रूप लेकर काँपती हुई भागी, और अंत में बोली: "मुझे मारोगे तो प्रजा किस पर टिकेगी?" पृथु ने उत्तर दिया कि वे अपने योग-बल से प्रजा को धारण कर लेंगे। तब धरती ने समझौता किया: "प्रजा के हित के लिए मुझे एक बछड़ा दो, जिसके प्रेम से मेरा दूध बहे, और धरती को हर जगह समतल कर दो, ताकि दूध, यानी अन्न और औषधियों के बीज, सब जगह फैल सके।" पृथु ने वैसा ही किया, और धरती से अन्न फिर उगने लगा। राजा का धर्म प्रजा का पेट भरना है, और प्रकृति से छीनकर नहीं, उसके साथ समझौता करके: यही इस कथा का सार है।

प्रह्लाद की कथा: जिसे कोई नहीं मार सका (1.16–20)

विष्णु पुराण में प्रह्लाद की कथा सबसे लंबी कथाओं में से है, और पाँच अध्यायों में फैली है। दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने तपस्या से तीनों लोक जीत लिए थे और स्वयं इंद्र, सूर्य, वायु, अग्नि, वरुण और सोम बन बैठा था। उसका पुत्र प्रह्लाद बचपन से विष्णु का भक्त था। गुरु के घर से लौटकर जब उसने पिता के सामने कहा कि सबके स्वामी विष्णु हैं, तो हिरण्यकशिपु आग-बबूला हो गया।

फिर शुरू हुईं प्रह्लाद को मारने की कोशिशें, एक के बाद एक। दैत्यों ने हथियारों से वार किए, पर वे निष्फल रहे। तक्षक जैसे विषैले साँप छोड़े गए, जिन्होंने उसके पूरे शरीर पर डसा, पर कुछ नहीं हुआ। पहाड़ जैसे दिग्गजों ने उसे ज़मीन पर पटककर दाँतों से कुचलना चाहा, पर उनके वज्र जैसे दाँत ही टूट गए। प्रह्लाद ने कहा कि यह मेरा बल नहीं, जनार्दन के स्मरण का प्रभाव है। फिर उसे आग में डाला गया, पर आग उसे कमल के पत्तों जैसी ठंडी लगी।

इसके बाद उसके भोजन में हालाहल विष मिलाया गया, और रसोइये डरते हुए राजा को बताने आए कि भयंकर विष अन्न के साथ पच गया। तब पुरोहितों ने "कृत्या" पैदा की, आग की लपटों जैसे मुख वाली एक भयानक शक्ति। उसने प्रह्लाद की छाती पर त्रिशूल मारा, पर त्रिशूल सौ टुकड़े हो गया: पुराण कहता है कि जिस हृदय में हरि बसते हों, वहाँ वज्र भी टूट जाता है, त्रिशूल की क्या बात। कृत्या उलटकर पुरोहितों पर ही टूट पड़ी। उन्हें जलता देखकर प्रह्लाद "कृष्ण, अनंत, बचाओ!" कहते दौड़े और प्रार्थना की: "जैसे मैं शत्रु-पक्ष में भी सर्वव्यापी विष्णु को ही देखता हूँ, जिन्होंने मुझे विष दिया, आग में डाला और साँपों से डसवाया, उनके प्रति भी मेरे मन में कोई पाप नहीं, तो इसी सत्य से ये पुरोहित जी उठें।" और वे सब फिर जीवित हो उठे। अंत में दैत्यों ने उसे नागपाश से बाँधकर समुद्र में डाला और ऊपर से हज़ारों योजन तक पहाड़ लाद दिए। पहाड़ों के नीचे दबे प्रह्लाद ने एकाग्र होकर विष्णु की स्तुति की, और उसके बंधन टूट गए।

उस स्तुति के बाद विष्णु प्रकट हुए। प्रह्लाद ने वर माँगा तो केवल इतना: "हे नाथ, मैं हज़ारों योनियों में जहाँ भी जन्म लूँ, वहाँ आपमें मेरी अटल भक्ति रहे।" और दूसरा: "मेरी भक्ति के कारण मेरे पिता के मन में जो द्वेष हुआ, उसका पाप नष्ट हो जाए।" अंत में विष्णु ने नरसिंह रूप में हिरण्यकशिपु का वध किया, और प्रह्लाद दैत्यों के राजा बने। ध्यान देने की बात यह है कि विष्णु पुराण नरसिंह-वध को एक ही श्लोक (1.20.32) में कहता है। खंभे से प्रकट होने वाला विस्तृत वर्णन भागवत पुराण में है। विष्णु पुराण का ज़ोर वध पर नहीं, प्रह्लाद की अटल भक्ति पर है।

प्रह्लाद पिता को भक्ति का सार भी समझाते हैं: सब प्राणियों में हरि को जानकर ज्ञानी सब पर समान प्रेम रखें। यानी भक्ति का अर्थ केवल मंदिर में पूजा नहीं, हर जीव में भगवान को देखना है।

एवं सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी । कर्तव्या पण्डितैर्ज्ञात्वा सर्वभूतमयं हरिम् ॥

इसलिए ज्ञानी लोग यह जानकर कि हरि सब प्राणियों में व्याप्त हैं, सब प्राणियों के प्रति अटल, बिना भेदभाव वाली भक्ति रखें।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.19.9

पृथ्वी, लोक और सूर्य: दूसरा अंश

दूसरा अंश पुराणों के ब्रह्मांड-भूगोल का सबसे साफ़ वर्णन देता है। स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत ने पृथ्वी को अपने पुत्रों में सात द्वीपों में बाँटा: जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। हर द्वीप एक समुद्र से घिरा है, और हर समुद्र अगले द्वीप से। बीच में जम्बू द्वीप है, जिसके केंद्र में सोने का मेरु पर्वत है।

जम्बू द्वीप का एक भाग भारतवर्ष है। पुराण उसे समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण का देश बताता है, और कहता है कि यही कर्मभूमि है। दूसरे लोकों में भोग होता है, पर कर्म का फल यहीं बनता है, और इसीलिए देवता भी भारत में जन्म लेने को तरसते हैं। इसी अंश में भारत की नदियों, पर्वतों और जनपदों की लंबी सूचियाँ हैं, जैसे कारूष, मालव, सौवीर, सैन्धव, शाल्व।

आगे पाताल के सात लोक, अलग-अलग पापों के नरक (2.6), भू, भुवः, स्वः से सत्य लोक तक के ऊपरी लोक, और सूर्य का रथ आता है (2.8)। सूर्य के रथ पर आदित्य, ऋषि, गंधर्व, अप्सराएँ, ग्रामणी, सर्प और राक्षस रहते हैं (2.10), और पुराण उसी के साथ दिन-रात, पक्ष, मास, ऋतु, अयन और वर्ष की गणना समझाता है। ध्रुव तारा इस पूरे चक्र की धुरी है, जिससे ग्रह-नक्षत्र बँधे घूमते हैं। यह पुराणों की ब्रह्मांड-कल्पना है, आधुनिक खगोल-विज्ञान नहीं। इसका महत्व यह है कि मनुष्य को पूरे विश्व-चक्र के बीच अपनी जगह और अपना कर्तव्य दिखाया जाता है।

जड़ भरत और ऋभु-निदाघ: ज्ञान की दो कथाएँ (2.13–16)

राजा भरत राज्य छोड़कर शालग्राम क्षेत्र में रहने लगे और मन को सदा वासुदेव में लगाकर योग करते थे। एक दिन नदी किनारे एक गर्भवती हिरणी शेर की दहाड़ से डरकर कूदी, उसका बच्चा पानी में गिर पड़ा, और हिरणी मर गई। भरत ने बहते हुए मृग-छौने को उठा लिया और आश्रम ले आए। धीरे-धीरे उनका सारा ध्यान उसी पर लग गया: वह कहाँ है, कुछ खाया या नहीं, कहीं भेड़िया तो नहीं ले गया। मरते समय भी उनका मन उसी हिरण में अटका रहा, और अगले जन्म में वे हिरण बने।

हिरण के जन्म में भी उन्हें पिछला जन्म याद रहा, और अगले जन्म में वे एक ब्राह्मण के घर पैदा हुए। इस बार उन्होंने जानबूझकर पागल और मूर्ख जैसा व्यवहार किया, ताकि कोई मोह फिर न बँधे। लोग उन्हें "जड़" समझते थे। एक दिन सौवीर का राजा पालकी में बैठकर इक्षुमती नदी के किनारे कपिल मुनि के आश्रम जा रहा था, और राजा के सेवक ने उन्हें बेगार में पालकी उठाने में लगा दिया। राजा ने डाँटा कि ठीक से क्यों नहीं चलते, तो जड़ भरत ने उत्तर दिया: "कौन ढो रहा है, किसे ढो रहा है? शरीर तो पाँच भूतों का है, और मैं वह नहीं हूँ।" राजा पालकी से उतरकर उनके चरणों में गिर गया और ज्ञान माँगा।

उसी ज्ञान के प्रसंग में जड़ भरत ऋभु और निदाघ की कथा सुनाते हैं। ब्रह्मा के पुत्र ऋभु ने अपने शिष्य निदाघ को, जो पुलस्त्य के पुत्र थे, अद्वैत का ज्ञान दिया। पर निदाघ के मन में भेद बना रहा। हज़ार वर्ष बीतने पर ऋभु फिर उसी नगर में पहुँचे, और निदाघ को भीड़ से अलग खड़ा देखकर उनसे बात करने लगे। राजा की सवारी जा रही थी, और ऋभु ने पूछा: "राजा और हाथी में राजा कौन है, हाथी कौन? और जब मैं तुम पर चढ़ूँ, तो तुम कौन, मैं कौन?" निदाघ ने ऋभु के चरण पकड़ लिए: "आप निश्चय ही मेरे गुरु ऋभु हैं।" और समझ गए कि "मैं" और "तू" का भेद केवल ऊपर का है। ये दोनों कथाएँ विष्णु पुराण की भक्ति के साथ उसके ज्ञान-पक्ष को भी दिखाती हैं।

मन्वन्तर, वेद-व्यास और धर्म: तीसरा अंश

तीसरा अंश समय के बड़े चक्र, मन्वन्तरों से शुरू होता है: स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, और अभी चल रहा सातवाँ, वैवस्वत मन्वन्तर। हर मन्वन्तर के अपने मनु, इंद्र, देवता और सप्तर्षि होते हैं। फिर अगले सात मनुओं के नाम भी आते हैं। इसी अंश में 28 व्यासों की वह सूची है, जिसके अनुसार हर द्वापर में वेद का विभाजन होता है; इस बार के व्यास पराशर के पुत्र कृष्ण द्वैपायन हैं। इसी में अठारह पुराणों की वह परंपरागत सूची भी है, जिस पर इस ज्ञानकोश का पूरा पुराण-खंड टिका है।

सातवें अध्याय में "यम-गीता" नाम का एक छोटा, बहुत प्रसिद्ध प्रसंग है। यम अपने हाथ में पाश लिए दूत के कान में कहते हैं: "जो मधुसूदन की शरण में हैं, उन्हें छोड़ देना। मैं बाकी मनुष्यों का स्वामी हूँ, वैष्णवों का नहीं।" आगे यम बताते हैं कि भक्त की पहचान क्या है: जो अपने धर्म से नहीं डिगता, मित्र और शत्रु में समान रहता है, किसी की चीज़ नहीं छीनता और किसी जीव को नहीं मारता।

आठवें अध्याय से वर्णाश्रम-धर्म, गृहस्थ के आचार, संस्कार, विवाह के नियम और श्राद्ध की विधि (3.13–16) का लंबा वर्णन है। इसका मूल विचार 3.8.9 के श्लोक में है: अपने वर्ण और आश्रम के धर्म का ठीक पालन करना ही विष्णु की आराधना है, उन्हें प्रसन्न करने का दूसरा कोई रास्ता नहीं। यानी विष्णु पुराण के लिए धर्म और भक्ति अलग नहीं, रोज़ का कर्तव्य ही पूजा है। अंत में मायामोह की कथा (3.17–18) है, जिसमें विष्णु के माया-रूप द्वारा दैत्यों को वैदिक धर्म से दूर करने का वर्णन है।

स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं वदति यमः किल तस्य कर्णमूले । परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम् ॥

हाथ में पाश लिए अपने दूत को देखकर यम उसके कान में कहते हैं: जो मधुसूदन की शरण में आ गए हैं, उन्हें छोड़ देना। मैं दूसरे मनुष्यों का स्वामी हूँ, वैष्णवों का नहीं।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 3.7.14
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान् । विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारणम् ॥

जो मनुष्य अपने वर्ण और आश्रम के आचार का पालन करता है, वही परम पुरुष विष्णु की सच्ची आराधना करता है। उन्हें प्रसन्न करने का कोई दूसरा मार्ग नहीं।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 3.8.9

राजवंश और इतिहास: चौथा अंश

चौथा अंश पुराण के "वंशानुचरित" लक्षण का केंद्र है। वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु से सूर्य-वंश चलता है, जिसमें आगे राम आते हैं। चंद्र-वंश पुरूरवा से शुरू होता है, और उसमें नहुष और ययाति आते हैं। ययाति के पुत्रों से यदु और पुरु के वंश चलते हैं: यदु-वंश में आगे वसुदेव और कृष्ण, और पुरु-वंश में कुरु और पांडव। इस अंश का अधिकांश भाग गद्य में है, यानी नामों की लंबी वंश-सूचियाँ, और बीच-बीच में प्रसिद्ध राजाओं की छोटी कथाएँ।

इस अंश का अंतिम अध्याय (4.24) सबसे अलग है, क्योंकि उसमें "भविष्य के राजा" बताए गए हैं: कलियुग में मगध पर राज करने वाले वंश। पुराण कहता है कि महापद्म नंद के बाद से शूद्र राजा होंगे, और नौ नंदों को कौटिल्य नाम का ब्राह्मण उखाड़ फेंकेगा। Wilson का अनुवाद आगे बताता है कि कौटिल्य चंद्रगुप्त को राजा बनाएँगे, और मौर्य वंश राज करेगा। इतिहासकारों के लिए ये सूचियाँ बहुत मूल्यवान रही हैं, क्योंकि इनमें कई ऐसे राजवंश हैं जिनका इतिहास दूसरे स्रोतों से भी पता चलता है।

श्रीकृष्ण-चरित: पाँचवाँ अंश, 38 अध्याय

पाँचवाँ अंश पूरे पुराण का सबसे बड़ा अंश है: 38 अध्याय और 1,531 श्लोक, यानी पूरे ग्रंथ का एक-चौथाई से अधिक। इसमें श्रीकृष्ण का जीवन जन्म से अंतिम प्रस्थान तक एक क्रम में चलता है। भागवत पुराण का दसवाँ स्कंध इसी कथा को और विस्तार से कहता है, पर कृष्ण-चरित के सबसे पुराने पूरे वर्णनों में विष्णु पुराण का यह अंश गिना जाता है।

कथा का क्रम ऐसे चलता है। कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म, गोकुल पहुँचना, पूतना-वध (5.5), यमुना के कुंड में कालिय नाग का दमन (5.7), इंद्र की पूजा रोककर गोवर्धन की पूजा और पर्वत उठाना (5.10–12), और शरद की रात का रास (5.13)। फिर कंस अक्रूर को भेजता है (5.15–17), कृष्ण-बलराम मथुरा आते हैं और कंस का वध होता है (5.20)। इसके बाद जरासंध के बार-बार के हमले और कालयवन आते हैं: कृष्ण कालयवन को उस गुफा में ले जाते हैं जहाँ राजा मुचुकुंद सोए थे, और मुचुकुंद की दृष्टि से वह भस्म हो जाता है (5.23)। फिर द्वारका बसती है।

द्वारका-काल में रुक्मिणी-हरण (5.26), नरकासुर-वध (5.29), स्वर्ग से पारिजात लाना (5.30–31), बाणासुर की पुत्री उषा और कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की कथा (5.32–33), नकली वासुदेव बने पौण्ड्रक का वध (5.34), और बलराम द्वारा वानर द्विविद का वध (5.36) आते हैं। अंत में यदु-वंश का विनाश होता है, कृष्ण पृथ्वी छोड़ते हैं, और उनके जाते ही कलियुग शुरू होता है (5.37–38)।

विष्णु पुराण का कृष्ण भागवत के कृष्ण से कुछ अलग स्वर में है। यहाँ बाल-लीलाएँ भी हैं और रास भी, पर ज़ोर इस बात पर है कि कृष्ण स्वयं विष्णु हैं, जो पृथ्वी का भार उतारने आए। कृष्ण-कथा के रस और भक्ति के विस्तार के लिए परंपरा भागवत की ओर देखती है; कथा के पुराने, सधे हुए ढाँचे के लिए विष्णु पुराण की ओर।

कलियुग: "कलिः साधुः" और नाम-कीर्तन (6.1–2)

छठा अंश कलियुग के वर्णन से शुरू होता है, और यह पुराणों का सबसे प्रसिद्ध युग-वर्णन है। कलि में वर्ण और आश्रम का आचार ढीला होगा; जो बलवान होगा, वही सबका स्वामी बन बैठेगा; जिसके पास घोड़े, रथ और हाथी होंगे, वही राजा कहलाएगा, और जो दुर्बल है, वह नौकर बनेगा। जब लोगों का मन वेद की बातों में नहीं, पाखंड में रमने लगे, तो समझ लेना कि कलि बढ़ रहा है। पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी ने आज के समाज की तस्वीर खींच दी हो।

पर दूसरे अध्याय में एक अनोखा मोड़ आता है। कुछ मुनि व्यास से मिलने जाते हैं, और देखते हैं कि व्यास गंगा में डुबकी लगाकर निकलते हैं और कहते हैं: "कलि साधु है!" फिर डुबकी लगाते हैं: "शूद्र, तुम धन्य हो!" फिर: "स्त्रियाँ साधु हैं, उनसे अधिक धन्य कौन?" मुनि हैरान होकर पूछते हैं कि यह क्यों कहा। व्यास समझाते हैं कि जो फल सत्ययुग में बरसों के ध्यान से, त्रेता में बड़े यज्ञों से और द्वापर में पूजा से मिलता है, वही कलियुग में केवल केशव का नाम-कीर्तन करने से मिल जाता है। शूद्र और स्त्रियाँ कठिन नियमों के बिना, सेवा और कर्तव्य से ही वह पुण्य पा लेते हैं जो दूसरों को बड़े श्रम से मिलता है।

यानी विष्णु पुराण कलियुग को केवल अंधकार का युग नहीं कहता। जिस युग में धर्म सबसे कमज़ोर है, उसी में भगवान तक पहुँचना सबसे आसान है। नाम-कीर्तन की पूरी भक्ति-परंपरा, जो आगे चलकर संतों में फूली, इसी विचार पर खड़ी है।

ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥

सत्ययुग में ध्यान करके, त्रेता में यज्ञ करके और द्वापर में पूजा करके मनुष्य जो पाता है, वही कलियुग में केवल केशव का नाम-कीर्तन करके पा लेता है।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 6.2.17

प्रलय के तीन प्रकार और "भगवान" का अर्थ (6.3–5)

पराशर बताते हैं कि प्रलय (प्रतिसंचर) तीन तरह का होता है। "नैमित्तिक" प्रलय ब्रह्मा के हर दिन, यानी हर कल्प, के अंत में होता है, जब तीनों लोक डूब जाते हैं। "प्राकृत" प्रलय ब्रह्मा की पूरी आयु, दो परार्ध, के बाद होता है, जब सारा व्यक्त जगत अपने कारण, अव्यक्त प्रकृति, में लीन हो जाता है। और "आत्यन्तिक" प्रलय मोक्ष है: एक जीव का सदा के लिए संसार-चक्र से छूट जाना।

पाँचवें अध्याय में तीन तरह के दुख (ताप-त्रय) बताए गए हैं: अपने शरीर और मन से (आध्यात्मिक), दूसरे जीवों से (आधिभौतिक), और प्रकृति से (आधिदैविक)। इनसे छूटने का उपाय भगवान को जानना है। फिर पुराण "भगवान" शब्द की वह परिभाषा देता है जो आज भी हर जगह उद्धृत होती है। "भग" छह चीज़ों का नाम है: पूरा ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य। जिसमें ये छहों पूरे हों, और कोई हेय गुण न हो, वही "भगवान" है।

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥

पूरा ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य: इन छह का नाम "भग" है।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 6.5.74

केशिध्वज और खाण्डिक्य: योग का उपदेश (6.6–7)

पुराण का दार्शनिक शिखर दो चचेरे भाइयों की कथा है, जो एक-दूसरे के शत्रु थे। केशिध्वज ने खाण्डिक्य को राज्य से निकाल दिया था, और खाण्डिक्य वन में रहते थे। केशिध्वज के यज्ञ की गाय को एक बाघ मार गया, और प्रायश्चित्त की विधि केवल खाण्डिक्य जानते थे। शत्रु से पूछने जाना पड़ा। खाण्डिक्य के मंत्रियों ने कहा कि इसे मार डालो, पर खाण्डिक्य ने धर्म चुना और विधि बता दी।

यज्ञ पूरा होने पर केशिध्वज गुरु-दक्षिणा देने लौटे। खाण्डिक्य ने राज्य नहीं माँगा। उन्होंने माँगा वह ज्ञान, जिससे दुख मिटता है। केशिध्वज ने तब योग का उपदेश दिया: "मैं" और "मेरा" का भाव ही संसार का बीज है; मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है; यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा से मन को स्थिर करके भगवान के रूप का ध्यान करना चाहिए। शत्रुता से शुरू हुई कथा गुरु-शिष्य के संबंध पर ख़त्म होती है।

विष्णु पुराण का दर्शन: भक्ति, धर्म और ज्ञान एक साथ

विष्णु पुराण का दर्शन एक वाक्य में कहें, तो विष्णु ही सब कुछ हैं: जगत का कारण भी, जगत भी, और जगत के पार भी। पहले अंश की स्तुतियों में विष्णु को प्रधान, व्यक्त जगत और काल-रूप कहकर नमस्कार किया गया है। इसीलिए यह पुराण सांख्य के तत्वों (प्रकृति, पुरुष, महत्, अहंकार) को लेता है, पर उन्हें विष्णु के ही रूप मानता है।

इस पुराण में तीन मार्ग बिना झगड़े साथ चलते हैं। भक्ति का मार्ग ध्रुव, प्रह्लाद और नाम-कीर्तन में है। धर्म का मार्ग वर्णाश्रम और गृहस्थ के कर्तव्यों में है: अपना काम ठीक से करना ही पूजा है (3.8.9)। ज्ञान का मार्ग जड़ भरत, ऋभु-निदाघ और केशिध्वज के उपदेश में है, जहाँ "मैं-तू" का भेद मिटता है। यही संतुलन इस पुराण को सबके लिए पढ़ने योग्य बनाता है: भक्त को कथा मिलती है, गृहस्थ को कर्तव्य, और जिज्ञासु को तत्त्व।

रचना-काल, संस्करण और अनुवाद

परंपरा के अनुसार विष्णु पुराण के वक्ता पराशर हैं, और व्यास ने पुराण-संहिता अपने शिष्य सूत रोमहर्षण को दी। यह पुराण स्वयं कहता है कि रोमहर्षण के छह शिष्य हुए, और उनमें से तीन ने अपनी-अपनी संहिताएँ बनाईं। यानी पुराण भी मौखिक परंपरा में बहता और बदलता रहा, और उसके कई पाठ बने।

आधुनिक विद्वान विष्णु पुराण को पुराने महापुराणों में गिनते हैं, क्योंकि इसका ढाँचा पंचलक्षण के सबसे क़रीब है। पर इसकी कोई एक तिथि सर्वमान्य नहीं है, और अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग अनुमान दिए हैं। इसलिए यहाँ कोई एक तारीख़ "तथ्य" के रूप में नहीं दी जा रही।

संस्करणों की बात करें, तो H. H. Wilson ने 1840 में इसका पूरा अंग्रेज़ी अनुवाद, विष्णु पुराण की अपनी टीका के साथ, प्रकाशित किया, और Fitzedward Hall ने 1864–70 में उसे पाँच खंडों में फिर से संपादित किया। Oriental Institute, Vadodara ने 1997–99 में इसका समीक्षित संस्करण निकाला, जिसमें अनेक पांडुलिपियों को मिलाकर पाठ तय किया गया। इस पृष्ठ के सारे श्लोक और गिनतियाँ उसी समीक्षित पाठ से हैं।

प्रभाव और आज के लिए अर्थ

विष्णु पुराण की कथाएँ भारत के घर-घर में पहुँचीं: ध्रुव तारे की कहानी हर बच्चे को सुनाई जाती है, प्रह्लाद की भक्ति होली की कथा का आधार है, और समुद्र-मंथन से लक्ष्मी और धन्वन्तरि का प्रकट होना दीपावली और धनतेरस की परंपरा से जुड़ा है। "भगवान" शब्द की छह गुणों वाली परिभाषा (6.5.74) आज भी धर्म-चर्चा में सबसे अधिक उद्धृत होने वाले श्लोकों में है।

आज के पाठक के लिए विष्णु पुराण की सबसे बड़ी सीख शायद उसकी शुरुआत में ही है। पराशर ने क्रोध छोड़ा, तब उन्हें यह ज्ञान मिला। ध्रुव ने अपमान को साधना बनाया। प्रह्लाद ने अत्याचार के बीच भी द्वेष नहीं रखा और पिता के लिए क्षमा माँगी। केशिध्वज और खाण्डिक्य ने शत्रुता को ज्ञान में बदल दिया। और व्यास ने बताया कि सबसे कठिन युग में भी भगवान का नाम सबसे सरल रास्ता है।

पुराण अपनी फलश्रुति में कहता है कि जो इसे श्रद्धा से सुनता है, वह संसार के भय से छूटता है और उसके बुरे सपने और दोष नष्ट होते हैं। यह ग्रंथ की अपनी घोषणा है, और श्रद्धा का विषय है।

आगे पढ़ें

  • श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
  • पद्म पुराण — सात खंडों में: सृष्टि (पुष्कर और ब्रह्मा का यज्ञ), भूमि (सुकला, माता-पिता और गुरु-तीर्थ), स्वर्ग, ब्रह्म, पाताल (राम का अश्वमेध), उत्तर (कार्तिक, एकादशी, गीता और भागवत माहात्म्य) और क्रियायोगसार
  • ब्रह्म पुराण — अठारह में पहला, "आदि पुराण": सृष्टि और वंश, कोणार्क का सूर्य, पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) और जगन्नाथ की मूर्तियों की कथा, गौतमी (गोदावरी) के सौ से अधिक तीर्थ, कृष्ण-चरित और योग
  • पुराण के पंच लक्षण — पुराण की सबसे पुरानी परिभाषा, भागवत के दस लक्षण, और यह सवाल कि आज के पुराण इस परिभाषा पर कितने खरे उतरते हैं
  • कल्प, मन्वंतर और युग — निमेष से ब्रह्मा की आयु तक: चार युग और उनके वर्ष, चौदह मनु, ब्रह्मा का दिन और रात, परार्ध, और यह कि आज हम कौन-से कल्प और मन्वंतर में हैं
  • भक्त ध्रुव — ध्रुव की पूरी कथा
  • भक्त प्रह्लाद — प्रह्लाद की भक्ति और नरसिंह अवतार
  • जड़ भरत — मृग-मोह से आत्म-ज्ञान तक
  • महर्षि पराशर — विष्णु पुराण के वक्ता
  • वेद व्यास — वेद और पुराणों के विभाजक
  • वेद-विभाजन — विष्णु पुराण 3.3–6 के आधार पर
  • विष्णु सहस्रनाम — विष्णु के हज़ार नाम

स्रोत एवं संदर्भ

विष्णु पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न