मार्कण्डेय पुराण: धर्मपक्षी, मदालसा, मन्वन्तर और देवी-माहात्म्य

जैमिनि के प्रश्न और चार ज्ञानी पक्षी: हरिश्चंद्र, मदालसा की लोरी, दत्तात्रेय का योग, चौदह मन्वन्तर, और दुर्गा सप्तशती का मूल देवी-माहात्म्य

संक्षेप में

मार्कण्डेय पुराण अठारह महापुराणों में सातवाँ है। इसमें व्यास के शिष्य जैमिनि के प्रश्नों का उत्तर चार ज्ञानी पक्षी देते हैं। हरिश्चंद्र, मदालसा, दत्तात्रेय और मन्वन्तरों की कथाएँ इसमें हैं, और दुर्गा सप्तशती, यानी देवी-माहात्म्य, इसी पुराण के अध्याय 81 से 93 हैं।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में सातवाँ (विष्णु पुराण 3.6.21)
परंपरागत श्लोक-संख्या
9,000 (भागवत 12.13.5; मत्स्य 53.26)
सर्ग (Pargiter, 1904)
137
वक्ता और श्रोता
जैमिनि → मार्कण्डेय → चार धर्मपक्षी; भीतर मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवाद
मत्स्य पुराण की पहचान
पक्षियों के माध्यम से धर्म-अधर्म का विचार, मार्कण्डेय द्वारा कहा गया
सबसे प्रसिद्ध अंश
देवी-माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), अध्याय 81–93
प्रमुख कथाएँ
हरिश्चंद्र, मदालसा और अलर्क, दत्तात्रेय, अनसूया, मन्वन्तरों के जन्म की कथाएँ
अंग्रेज़ी अनुवाद
F. E. Pargiter (Bibliotheca Indica, 1904)

मार्कण्डेय पुराण क्या है?

व्यास के महान शिष्य जैमिनि महाभारत पढ़ चुके हैं, पर उनके मन में चार प्रश्न अटके हैं, जिनका उत्तर उन्हें कहीं नहीं मिला। वे ऋषि मार्कण्डेय के पास जाते हैं। मार्कण्डेय कहते हैं: "मेरे पास समय नहीं है; विंध्य पर्वत पर चार पक्षी रहते हैं, जो वेदों के ज्ञाता हैं; वे तुम्हें उत्तर देंगे।" जैमिनि पक्षियों के पास जाते हैं, और पक्षी न केवल उन चार प्रश्नों का, बल्कि जीवन, मृत्यु, कर्म, योग और सृष्टि के बड़े प्रश्नों का भी उत्तर देते हैं। यही मार्कण्डेय पुराण है: एक ऐसा पुराण जिसमें धर्म पक्षियों के मुख से कहा गया।

मत्स्य पुराण इसकी पहचान ठीक इसी रूप में देता है: जिसमें पक्षियों को आधार बनाकर धर्म-अधर्म का विचार किया गया है, जिसे धर्म-चारी मुनियों के प्रश्न पर मार्कण्डेय ने विस्तार से कहा, वह 9,000 श्लोकों वाला मार्कण्डेय पुराण है। भागवत भी इसकी संख्या 9,000 ही बताता है। अठारह महापुराणों की परंपरागत सूची में यह सातवाँ है।

आज मार्कण्डेय पुराण को घर-घर में पहचान उसके एक अंश से मिली है: देवी-माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती या चंडी-पाठ कहते हैं। नवरात्रि में जो सप्तशती पढ़ी जाती है, वह इसी पुराण के अध्याय 81 से 93 हैं। पर देवी-माहात्म्य के अलावा भी इस पुराण में बहुत कुछ है, और यह पृष्ठ उस पूरे पुराण का परिचय है।

चार धर्मपक्षी: वे पक्षी कैसे बने?

पक्षियों के जन्म की कथा स्वयं एक छोटा पुराण है। अप्सरा वपु को दुर्वासा ऋषि ने शाप दिया था कि वह पक्षी बनेगी। वह पक्षी बनकर द्रोण नाम के पक्षी की पत्नी बनी, और महाभारत के युद्ध-क्षेत्र में उसके चार अंडे गिरे। ऋषि शमीक ने उन्हें बचाया और पाला, और वे वेदों के ज्ञाता बन गए।

पर वे केवल पक्षी नहीं थे। पिछले जन्म में वे सुकृश नाम के ऋषि के चार ब्राह्मण पुत्र थे। एक बार एक भूखा पक्षी भोजन माँगने आया, और सुकृश ने पुत्रों से कहा कि अपना शरीर उसे भोजन के रूप में अर्पित करो। पुत्रों ने मना कर दिया, और पिता ने उन्हें शाप दिया कि वे पक्षी बनेंगे। अपने ही शाप-मुक्ति के समय वे ज्ञान के साथ जन्मे, इसलिए "धर्मपक्षी" कहलाए।

संरचना: पाँच भाग, 137 सर्ग

Pargiter के 1904 के अनुवाद में मार्कण्डेय पुराण 137 सर्गों (अध्यायों) में है। अपनी भूमिका में, विद्वान Banerjea का अनुसरण करते हुए, वे इसे पाँच साफ़ अलग भागों में बाँटते हैं, हर भाग का "असली वक्ता" अलग है। पहले भाग (सर्ग 1–9) में पक्षी सीधे जैमिनि को उत्तर देते हैं। दूसरे (10–44) में नाम पक्षियों का है, पर असली वक्ता सुमति, जिन्हें "जड़" कहा गया, और उनके पिता हैं। तीसरे (45–81) में असली वक्ता मार्कण्डेय और उनके शिष्य क्रौष्टुकि हैं। चौथा (82–92) देवी-माहात्म्य है, जिसके वक्ता मेधा ऋषि हैं। और पाँचवें (93–136) में मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवाद फिर चलता है; 137वाँ सर्ग समापन है।

Pargiter का मत है कि मूल "मार्कण्डेय का पुराण" तीसरा और पाँचवाँ भाग ही था, क्योंकि उन्हीं में मार्कण्डेय स्वयं शिक्षक हैं, और सर्ग 45 में मार्कण्डेय कहते हैं कि अब मैं यह पुराण सुनाता हूँ, जैसे मैंने इसे पहले सुना था। उनके अनुसार पहले और दूसरे भाग बाद में आगे जोड़े गए, और देवी-माहात्म्य बीच में। यह विद्वान का विश्लेषण है; परंपरा पूरे ग्रंथ को एक मानकर पढ़ती है।

संस्करणों में अध्याय-संख्या थोड़ी बदलती है। GRETIL पर जो संस्कृत पाठ उपलब्ध है, उसमें अध्याय 1 से 93 तक हैं, और उसकी कुछ संख्याएँ Pargiter से एक कम हैं: मदालसा की लोरी GRETIL में 25.11 पर है, और Pargiter में सर्ग 26 में। पर देवी-माहात्म्य दोनों में 81 से 93 तक है, और यही संख्या सप्तशती की परंपरा भी मानती है।

मार्कण्डेय पुराण के पाँच भाग (Pargiter, 1904)
भागसर्गअसली वक्तामुख्य विषयस्रोत
पहला1–9धर्मपक्षीजैमिनि के चार प्रश्न, पक्षियों का जन्म, हरिश्चंद्र, वसिष्ठ-विश्वामित्र युद्धमार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Introduction; Contents
दूसरा10–44सुमति (जड़) और उनके पिताजन्म, मृत्यु, कर्म, नरक; अनसूया-दत्तात्रेय; मदालसा और अलर्क; योगमार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Introduction; Contents
तीसरा45–81मार्कण्डेय और क्रौष्टुकिसृष्टि, रुद्र, भूगोल, मन्वन्तरों की कथाएँमार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Introduction; Contents
चौथा81/82–92/93मेधा ऋषि (मार्कण्डेय द्वारा दोहराया)देवी-माहात्म्य: मधु-कैटभ, महिषासुर, शुंभ-निशुंभमार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Introduction; Contents; मार्कण्डेय पुराण (मूल संस्कृत), 81–93
पाँचवाँ93–136 (+137 समापन)मार्कण्डेय और क्रौष्टुकिआगे के मनु, सूर्य-माहात्म्य, वैवस्वत मनु के वंशमार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Introduction; Contents

जैमिनि के चार प्रश्न: महाभारत की उलझनें

जैमिनि के चार प्रश्न महाभारत से जुड़े थे, और पक्षियों के उत्तर बड़े रोचक हैं। पहला: निर्गुण भगवान ने मनुष्य का शरीर क्यों लिया? उत्तर: विष्णु ने संसार के कल्याण के लिए देह-रूप धारण किए। दूसरा: द्रौपदी पाँच पांडवों की एक पत्नी कैसे हुई? उत्तर: पाँचों पांडव एक ही इंद्र के अंश थे। तीसरा: बलराम ने ब्रह्महत्या का पाप कैसे किया? उत्तर: मद की अवस्था में, और उन्होंने तीर्थ-यात्रा से उसका प्रायश्चित्त किया।

चौथा प्रश्न सबसे मार्मिक था: द्रौपदी के पाँचों पुत्र, जिनके रक्षक इतने महान थे, बचपन में ही, अविवाहित क्यों मारे गए? पक्षियों ने बताया कि वे पाँच विश्वेदेव थे। जब विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र पर क्रूरता की, तो इन देवताओं ने विश्वामित्र की निंदा की, और विश्वामित्र ने शाप दिया कि वे मनुष्य बनेंगे, पर जवानी में, बिना विवाह के, मरेंगे। और यहीं से हरिश्चंद्र की पूरी कथा शुरू होती है।

हरिश्चंद्र की कथा और दो ऋषियों का युद्ध (सर्ग 7–9)

राजा हरिश्चंद्र की कथा, जो सत्य के लिए सब कुछ खो देने की सबसे प्रसिद्ध भारतीय कथा है, अपने पूरे विस्तार में मार्कण्डेय पुराण में है। विश्वामित्र को दिए वचन को निभाने के लिए हरिश्चंद्र राज्य, धन, पत्नी, पुत्र और अंत में स्वयं को भी बेच देते हैं, और श्मशान में चांडाल के सेवक बनकर काम करते हैं। अंत में उनका सत्य उन्हें परम गति दिलाता है। पक्षी जैमिनि के कहने पर यह पूरी कथा सुनाते हैं।

कथा का अंत एक अनोखे दृश्य में होता है। हरिश्चंद्र के कुलगुरु वसिष्ठ ने जब सुना कि विश्वामित्र ने उनके शिष्य के साथ क्या किया, तो दोनों ऋषियों में ऐसा वैर ठना कि वे एक-दूसरे के शाप से विशाल पक्षी बनकर भयंकर युद्ध करने लगे। सत्य के मार्ग पर चले राजा की कथा दो महान ऋषियों के क्रोध के विनाशकारी युद्ध पर ख़त्म होती है, जो अपने आप में एक सीख है। हरिश्चंद्र की कथा इस साइट की ऋषि-गाथाओं में भी है।

जड़ का उपदेश: जन्म, मृत्यु, कर्म और नरक (सर्ग 10–15)

दूसरे भाग में जैमिनि आगे पूछते हैं: जीव गर्भ में कैसे आता है, कैसे जन्मता, बढ़ता और मरता है, और उसके कर्मों का फल कैसे मिलता है? पक्षी उत्तर में एक पुरानी बातचीत दोहराते हैं: एक ब्राह्मण पिता और उसका पुत्र सुमति, जिसे लोग "जड़" यानी मूर्ख समझते थे, क्योंकि वह पिछले जन्मों की याद के कारण संसार से उदासीन था। पिता के पूछने पर सुमति जीवन-मृत्यु का पूरा चक्र समझाता है।

इस उपदेश का बड़ा भाग कर्म-फल और नरकों के वर्णन का है: किस कर्म से कौन-सा कष्ट मिलता है, और कैसे जीव अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग योनियों में जन्म लेता है। इसी प्रसंग में राजा विपश्चित् की कथा आती है, जो नरक में उतरते हैं, वहाँ के जीवों के कष्ट देखते हैं, और अंत में अपने साथ वहाँ बंद दूसरे जीवों को भी नरक से छुड़ाकर निकलते हैं। कर्म-फल का यह वर्णन पुराण की आस्था है, और उसका मूल संदेश करुणा और सदाचार है।

अनसूया और दत्तात्रेय का जन्म (सर्ग 16–19)

मार्कण्डेय पुराण में दत्तात्रेय के जन्म की कथा एक पतिव्रता स्त्री की शक्ति से शुरू होती है। एक ब्राह्मण पर ऐसा शाप था कि सूर्योदय होते ही उसकी मृत्यु हो जाएगी, तो उसकी पतिव्रता पत्नी ने अपने तप से सूर्य को उगने से ही रोक दिया। संसार में अँधेरा छा गया। तब अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया, जो स्वयं महान पतिव्रता थीं, उस स्त्री को समझाने आईं, और सूर्य फिर उगा। Pargiter की विषय-सूची इस ब्राह्मण का नाम माण्डव्य से जोड़ती है।

प्रसन्न होकर देवताओं ने अनसूया को वर दिया, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव उनके तीन पुत्रों के रूप में जन्मे: सोम (चंद्रमा), दत्तात्रेय और दुर्वासा। दत्तात्रेय विष्णु के अवतार माने गए, और योग के परम आचार्य। आगे राजा कार्तवीर्य ने, अपने मंत्री गर्ग की सलाह पर, दत्तात्रेय की आराधना की और उनके आशीर्वाद से गौरव के साथ राज्य किया।

मदालसा की लोरी और अलर्क की शिक्षा (सर्ग 20–36)

मार्कण्डेय पुराण की सबसे प्यारी कथा मदालसा की है। राजकुमार ऋतध्वज, जिन्हें कुवलयाश्व भी कहा गया, ऋषि गालव की रक्षा के लिए कुवलय नाम के अद्भुत घोड़े पर निकलते हैं, एक दैत्य को हराकर गंधर्व-राजकुमारी मदालसा से विवाह करते हैं। फिर एक छल से मदालसा को पति की मृत्यु का झूठा समाचार मिलता है, और वह प्राण त्याग देती है। नाग-राज अश्वतर, जिनके पुत्र ऋतध्वज के मित्र थे, सरस्वती और शिव की आराधना से मदालसा को फिर जीवित करते हैं, और पाताल बुलाकर उसे ऋतध्वज को लौटा देते हैं।

मदालसा के चार पुत्र हुए। पहले तीन को वह पालने में ही लोरी के बहाने आत्म-ज्ञान सुनाती थी: "तुम शुद्ध हो, बेटा; तुम्हारा कोई नाम नहीं, यह नाम तो अभी कल्पना से रखा गया है; यह पाँच भूतों का शरीर तुम्हारा नहीं, फिर तुम किस कारण रो रहे हो?" यह सुन-सुनकर तीनों पुत्र बड़े होकर संसार से विरक्त हो गए। चौथे पुत्र अलर्क को, पति के कहने पर, उसने राज-धर्म सिखाया: राजा के कर्तव्य, चारों वर्णों के धर्म, गृहस्थ के आचार, श्राद्ध और दान। मार्कण्डेय पुराण का यह भाग (सर्ग 27 से) राजनीति, धर्म और समाज की शिक्षा का एक पूरा ग्रंथ है, जो एक माँ के मुख से कहा गया।

मदालसा की कथा भारतीय परंपरा में माँ को पहली गुरु के रूप में देखने का सबसे सुंदर उदाहरण है। एक ही माँ अपने बेटों को मोक्ष का ज्ञान भी देती है, और राज्य चलाने की व्यावहारिक बुद्धि भी, जिसकी जिसे ज़रूरत हो।

शुद्धोऽसि रे तात न तेऽस्ति नाम कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव । पञ्चात्मकं देहमिदं तवैतन्नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतोः ॥

बेटा, तुम शुद्ध हो; तुम्हारा कोई नाम नहीं है, यह नाम तो अभी कल्पना से रखा गया है। पाँच भूतों से बना यह शरीर तुम्हारा नहीं, और तुम इसके नहीं; फिर तुम किस कारण रो रहे हो?

— मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 1–93 — GRETIL e-text, पृष्ठ 25.11

दत्तात्रेय का योग-उपदेश (सर्ग 37–43)

राजा बनने के बाद अलर्क भोग में डूब गए। उनके भाई ने काशी के राजा के साथ मिलकर उन पर आक्रमण किया, और संकट में पड़े अलर्क दत्तात्रेय की शरण में गए। दत्तात्रेय ने अलर्क को आत्मा के बारे में बताया, और अलर्क के पूछने पर योग की पूरी विधि, उसकी शर्तें, उसके लक्षण और उसमें आने वाली बाधाएँ समझाईं।

मार्कण्डेय पुराण का यह योग-उपदेश पुराणों में योग के सबसे पुराने और व्यवस्थित वर्णनों में गिना जाता है। अंत में अलर्क राज्य छोड़कर मुक्ति के मार्ग पर चल पड़ते हैं, और उनके भाई और काशी-राज भी इस घटना से ज्ञान पाते हैं। इसी के साथ पुराण का दूसरा भाग समाप्त होता है। इस साइट के योग ज्ञानकोश में योग की परंपरा और ग्रंथों पर विस्तार है।

सृष्टि, रुद्र और पृथ्वी का भूगोल (सर्ग 45–60)

तीसरे भाग से मार्कण्डेय स्वयं शिक्षक बनते हैं, और उनके श्रोता उनके शिष्य क्रौष्टुकि हैं। सर्ग 45 में मार्कण्डेय कहते हैं कि यह पुराण भी वेदों की तरह ब्रह्मा के मुख से निकला। फिर वे सृष्टि का क्रम बताते हैं: प्रकृति से महत्, अहंकार और तत्त्वों की उत्पत्ति, ब्रह्मा की सृष्टि, युग और कल्प का काल-मान, रुद्र का जन्म, स्वायम्भुव मनु और उनके वंशज, दक्ष और उनकी संतानें।

इसके बाद मार्कण्डेय पृथ्वी का वर्णन करते हैं: सात द्वीप, जम्बू द्वीप, मेरु पर्वत, उसके आसपास के वन, झील और पर्वत, गंगा का मार्ग, और भारतवर्ष। फिर भारत में रहने वाले लोगों और जनपदों की लंबी सूचियाँ आती हैं: मध्य देश, उत्तर-पश्चिम, उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम के। और एक अनोखा वर्णन, जिसमें भारत को कूर्म (कछुए) के रूप में विष्णु पर टिका दिखाया गया है, और उसके अंगों पर अलग-अलग जनपद और नक्षत्र रखे गए हैं।

मन्वन्तरों की कथाएँ: हर मनु का जन्म एक कहानी (सर्ग 61–80)

मार्कण्डेय पुराण की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह हर मनु के जन्म की एक कथा सुनाता है। दूसरे मनु, स्वारोचिष, के जन्म की कथा में एक ब्राह्मण हिमालय पर अप्सरा वरूथिनी से मिलता है, और एक गंधर्व उसका रूप धरकर वरूथिनी का प्रेम पा लेता है; उनका पुत्र स्वरोचिस् होता है, जिसका पुत्र मनु बनता है। तीसरे मनु, औत्तम, की कथा में राजा उत्तम अपनी क्रोधी रानी को निकाल देते हैं, एक ऋषि उन्हें उनके अपने व्यवहार के लिए डाँटते हैं, और अंत में रानी लौटती है और उसका पुत्र मनु बनता है।

चौथे मनु, तामस, राज्य से निकाले गए राजा स्वराष्ट्र के पुत्र हैं। पाँचवें, रैवत, की कथा में ऋषि ऋतवाक् रेवती नक्षत्र को गिरा देते हैं, उससे एक कन्या जन्मती है, जो राजा दुर्गम से विवाह करती है, और उसका पुत्र रैवत मनु होता है। छठे मनु चाक्षुष हैं। सातवें, आज के मनु, वैवस्वत की कथा में सूर्य का विवाह विश्वकर्मा (त्वष्टा) की पुत्री संज्ञा से होता है; संज्ञा सूर्य का तेज न सह पाने के कारण अपनी छाया को छोड़कर चली जाती है, और सूर्य और संज्ञा के पुत्र वैवस्वत मनु और यम होते हैं।

इन कथाओं के बाद मार्कण्डेय आने वाले आठवें मनु, सावर्णि, की बात करते हैं, और वहीं से देवी-माहात्म्य शुरू होता है: क्योंकि अगले जन्म में सावर्णि मनु बनने वाले वही राजा सुरथ हैं, जिनकी कथा देवी-माहात्म्य में है। यानी सप्तशती पुराण के ढाँचे में "मन्वन्तर" लक्षण के भीतर बैठी है। आगे (सर्ग 94–100) नौवें से तेरहवें मनु तक, और प्रजापति रुचि की कथा से रौच्य मनु तक का वर्णन है।

देवी-माहात्म्य: दुर्गा सप्तशती का मूल (अध्याय 81–93)

देवी-माहात्म्य की कथा एक हारे हुए राजा से शुरू होती है। राजा सुरथ शत्रुओं से हारकर राज्य से निकाले जाते हैं, और वन में समाधि नाम के एक वैश्य से मिलते हैं, जिसे उसके अपने परिवार ने धन के लोभ में निकाल दिया था। दोनों को आश्चर्य है कि जिन्होंने उन्हें छोड़ दिया, उनके लिए मन अब भी क्यों तड़पता है। दोनों मेधा ऋषि के पास जाते हैं, और ऋषि बताते हैं कि यह महामाया, देवी, की शक्ति है, और फिर देवी के तीन चरित्र सुनाते हैं।

पहले चरित्र (अध्याय 81) में विष्णु की नींद में उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ दैत्य जन्मते हैं; ब्रह्मा देवी की स्तुति करते हैं, देवी विष्णु को जगाती हैं, और विष्णु दोनों का वध करते हैं। दूसरे चरित्र (82–84) में महिषासुर देवताओं को हरा देता है, और सब देवताओं के तेज के मेल से देवी चंडिका प्रकट होती हैं और महिषासुर का वध करती हैं। तीसरे चरित्र (85–92) में शुंभ और निशुंभ; देवी के ललाट से निकली काली चंड और मुंड को मारती हैं, और इसी से उनका नाम "चामुंडा" पड़ता है; फिर रक्तबीज, जिसके रक्त की हर बूँद से नया दैत्य जन्मता था, और अंत में निशुंभ और शुंभ।

अंतिम अध्याय (93) में कथा सुनकर सुरथ और समाधि देवी की आराधना करते हैं। देवी सुरथ को वर देती हैं कि वे राज्य वापस पाएँगे और अगले जन्म में आठवें मनु, सावर्णि, बनेंगे। संसार से विरक्त हो चुके समाधि ने केवल ज्ञान माँगा, और देवी ने कहा: "तुम्हें वह ज्ञान मिलेगा, जो परम सिद्धि देता है।" एक ने संसार माँगा, एक ने मुक्ति; और देवी ने दोनों को वही दिया जो उन्होंने माँगा। सप्तशती का पूरा पाठ, अंग, अर्थ और पाठ-विधि इस साइट के दुर्गा सप्तशती पृष्ठों पर है।

विद्वानों के मत भी जानना ज़रूरी है। Pargiter देवी-माहात्म्य को पुराण के मूल पाठ में बाद में जोड़ा गया अंश मानते थे, क्योंकि उसकी शैली और वक्ता अलग हैं। पर वे यह भी बताते हैं कि नेपाल के राजकीय पुस्तकालय में देवी-माहात्म्य की एक प्रति मिली है जिस पर 998 ई. की तिथि है, इसलिए यह नौवीं सदी से बाद का नहीं हो सकता, और कहीं अधिक पुराना भी हो सकता है। Pargiter ने यह भी लिखा कि यह ग्रंथ पूरे उत्तर भारत और बंगाल में, ख़ासकर दुर्गा-पूजा के समय, देवी के उपासकों का मुख्य पाठ बन चुका है। उसकी उत्पत्ति के स्थान पर उनका अपना अनुमान नर्मदा-घाटी का था; यह एक विद्वान का अनुमान ही है।

सूर्य-माहात्म्य और वंश (सर्ग 101–137)

पाँचवें भाग में क्रौष्टुकि के कहने पर मार्कण्डेय वंशावलियाँ शुरू करते हैं, और उससे पहले सूर्य की महिमा का एक लंबा प्रसंग आता है। ब्रह्मा से दक्ष, और दक्ष की वंश-परंपरा से मार्तण्ड, यानी सूर्य, का जन्म होता है। पुराण कहता है कि देवता और वेद सूर्य के ही रूप हैं। सूर्य का तेज इतना था कि सृष्टि नहीं हो पा रही थी, और ब्रह्मा ने स्तुति करके उनसे तेज को समेटने की विनती की। आगे विश्वकर्मा द्वारा सूर्य के तेज को छाँटने की कथा, सूर्य की स्तुतियाँ, और राजा राज्यवर्धन की कथा है, जिन्हें प्रजा की सूर्य-आराधना से लंबी आयु मिली।

अंतिम भाग वैवस्वत मनु के वंश का है: मनु के सात पुत्र, इला-सुद्युम्न, पुरूरवा; मनु के पुत्र पृषध्र, जो ब्राह्मण की गाय मारने के कारण शूद्र बने; दिष्ट के पुत्र नाभाग, जिन्होंने एक वैश्य कन्या से विवाह किया; और फिर भनंदन, वत्सप्रि, खनित्र, करंधम, अवीक्षित और वैशालिनी की कथाएँ। अंतिम सर्ग पुराण की महिमा का है, जो पहले भाग की कथा को पूरा करता है।

वंश की कथाएँ: नाभाग, खनित्र और अवीक्षित-वैशालिनी

मार्कण्डेय पुराण के वंश-वर्णन सूखी सूचियाँ नहीं, छोटी-छोटी कथाएँ हैं। मनु के वंशज नाभाग ने अपनी इच्छा से एक वैश्य कन्या से विवाह किया और स्वयं वैश्य बन गए; उनके पुत्र भनंदन ने पूरी पृथ्वी जीती, पर नाभाग ने राज्य लेने से मना कर दिया। तब नाभाग की पत्नी ने रहस्य खोला: वह असल में वैश्य नहीं, एक राजा की बेटी थी, जो अगस्त्य के शाप से वैश्य बनी थी, और उसके पिता भी एक ऋषि के शाप से वैश्य बने थे। वंश में राजा खनित्र भी आते हैं, जो इतने दयालु थे कि जब उनके भाइयों के मंत्रियों ने जादू-टोने से उन्हें हटाना चाहा और उसी में स्वयं नष्ट हो गए, तो खनित्र दुख से राज्य छोड़कर वन चले गए।

सबसे लंबी कथा राजकुमार अवीक्षित और राजकुमारी वैशालिनी की है। अवीक्षित ने वैशालिनी के स्वयंवर से उसे उठा लिया, पर दूसरे राजाओं ने मिलकर उन्हें हराकर बंदी बना लिया। वैशालिनी ने फिर भी किसी और को नहीं चुना। अवीक्षित के पिता करंधम ने उन्हें छुड़ाया, पर हार के अपमान से दुखी अवीक्षित ने वैशालिनी से विवाह करने से मना कर दिया, और वैशालिनी तप करने चली गई। आगे शिकार के समय अवीक्षित ने एक राक्षस से एक कन्या को बचाया, जो वैशालिनी ही निकली, और असल में एक गंधर्व-कन्या थी। गंधर्व-लोक में दोनों का विवाह हुआ, और उनके पुत्र मरुत्त हुए, जो आगे महान चक्रवर्ती राजा बने।

इन कथाओं में एक साझा सीख है: राज्य और वंश से बड़ा व्यक्ति का चरित्र है। नाभाग राज्य ठुकराते हैं, खनित्र भाइयों के विरुद्ध हिंसा के बजाय त्याग चुनते हैं, और वैशालिनी अपमान के बाद भी अपने चुनाव पर अडिग रहती है। पुराण का "वंशानुचरित" लक्षण यहाँ नैतिक कहानियों का रूप ले लेता है।

दर्शन और शिक्षाएँ

मार्कण्डेय पुराण की शिक्षा तीन धाराओं में चलती है। पहली कर्म की है: सुमति (जड़) का उपदेश बताता है कि जीव अपने कर्मों से ही जन्म, सुख और दुख पाता है, और नरकों का वर्णन उसी चेतावनी का रूप है। दूसरी धर्म और कर्तव्य की है: मदालसा अलर्क को राजा, गृहस्थ और समाज के हर अंग का धर्म सिखाती है, और हरिश्चंद्र की कथा सत्य को सब धर्मों से ऊपर रखती है।

तीसरी धारा मुक्ति की है, और यह दो रूपों में आती है। एक, ज्ञान और योग का मार्ग: मदालसा की लोरी और दत्तात्रेय का योग-उपदेश। दो, देवी की शरण का मार्ग: देवी-माहात्म्य, जहाँ महामाया ही बंधन भी है और मुक्ति भी, और उसकी उपासना से सुरथ को राज्य और समाधि को मोक्ष, दोनों मिलते हैं। एक ही पुराण में आत्म-ज्ञान और शक्ति-उपासना का यह मेल इसे अनोखा बनाता है।

रचना-काल और स्थान: विद्वानों के मत

परंपरा के अनुसार यह पुराण मार्कण्डेय ऋषि ने कहा, और पुराण स्वयं (सर्ग 45) बताता है कि इसे पहले च्यवन ने ऋषियों से कहा था, जिन्हें यह भृगु से मिला। Pargiter इसी आधार पर मानते हैं कि पुराण स्वयं को पश्चिमी भारत से आया बताता है।

तिथि के बारे में Pargiter Wilson के अनुमान से असहमत थे। Wilson ने मार्कण्डेय पुराण को महाभारत से बाद का पर ब्रह्म, पद्म, नारदीय और भागवत से पहले का माना था, और नौवीं-दसवीं सदी ई. का अनुमान लगाया था। Pargiter इसे बहुत नया बताते हैं, और कहते हैं कि बाद की खोजों से पता चला है कि Wilson ने पुराणों की आयु को कम आँका था। उदाहरण के लिए, हरप्रसाद शास्त्री ने नेपाल में स्कंद पुराण की एक प्रति पाई थी जो छठी-सातवीं सदी की लिपि में थी। इसलिए कोई एक निश्चित तिथि यहाँ "तथ्य" के रूप में नहीं दी जा रही।

प्रभाव और आज के लिए अर्थ

मार्कण्डेय पुराण का सबसे बड़ा प्रभाव देवी-माहात्म्य के रूप में है। नवरात्रि और दुर्गा-पूजा में सप्तशती का पाठ, चंडी-होम, और देवी के महिषासुरमर्दिनी, चामुंडा और काली रूपों की पूजा: इन सबका सबसे पुराना और प्रामाणिक स्रोत यही 13 अध्याय हैं। Pargiter के शब्दों में यह पूरे उत्तर भारत और बंगाल में देवी के उपासकों का पाठ-ग्रंथ बन गया।

पर पूरा पुराण आज भी बहुत कुछ कहता है। हरिश्चंद्र की सत्य-निष्ठा भारत की सबसे प्रसिद्ध नैतिक कथाओं में है। मदालसा की लोरी बताती है कि बच्चे को सबसे बड़ा उपहार उसकी अपनी पहचान का ज्ञान है। सुरथ और समाधि की कहानी हर उस व्यक्ति की कहानी है जो छोड़ दिए जाने के बाद भी मोह से छूट नहीं पाता। और जैमिनि की तरह, ज्ञान कहीं से भी मिल सकता है: पक्षियों से भी।

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स्रोत एवं संदर्भ

मार्कण्डेय पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न