ब्रह्म पुराण: पहला पुराण, पुरी और गोदावरी का

अठारह में पहला, "आदि पुराण": सृष्टि और वंश, कोणार्क का सूर्य, पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) और जगन्नाथ की मूर्तियों की कथा, गौतमी (गोदावरी) के सौ से अधिक तीर्थ, कृष्ण-चरित और योग

संक्षेप में

ब्रह्म पुराण अठारह महापुराणों में पहला है, इसलिए इसे "आदि पुराण" भी कहते हैं। नैमिषारण्य में लोमहर्षण सूत इसे सुनाते हैं। इसमें सृष्टि और वंशों के साथ ओडिशा के तीर्थों, कोणार्क के सूर्य और पुरी के जगन्नाथ की कथा, गोदावरी (गौतमी गंगा) के सौ से अधिक तीर्थ, कृष्ण-चरित और सांख्य-योग का उपदेश है।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में पहला (विष्णु पुराण 3.6.21); पुराण स्वयं को "आद्य" कहता है (246.4)
वक्ता
नैमिषारण्य के बारह वर्ष के सत्र में व्यास-शिष्य लोमहर्षण सूत
अध्याय और श्लोक
GRETIL पाठ में 246 अध्याय, 13,257 श्लोक
परंपरागत संख्या
10,000 (भागवत 12.13); 13,000 (मत्स्य 53, GRETIL पाठ)
सबसे बड़ा भाग
गौतमी-माहात्म्य (अध्याय 70–175): गोदावरी के तट के तीर्थ
प्रसिद्ध कथाएँ
इंद्रद्युम्न और जगन्नाथ की काष्ठ-मूर्तियाँ, मार्कण्डेय और वट-पत्र पर बालक, गौतम और गंगा, चांडाल का एकादशी-जागरण
अपने को क्या कहता है
"वेद-सम्मित", और अंत में "वैष्णव पुराण" (246.20)

ब्रह्म पुराण क्या है?

ब्रह्म पुराण की कथा नैमिषारण्य से शुरू होती है, और पहला ही अध्याय उस वन का सुंदर चित्र खींचता है: सरल, कर्णिकार, कटहल, आम, जामुन, बरगद, देवदार, पीपल, पारिजात, चंदन, नारियल और चंपा के पेड़; पक्षी और हिरण; जौ, गेहूँ, चना, उड़द, मूँग, तिल और ईख के खेत; और गायों के झुंड। वहाँ नैमिषारण्य के ऋषि बारह वर्ष का सत्र कर रहे थे, और तभी व्यास के शिष्य, बुद्धिमान लोमहर्षण सूत वहाँ आए।

ऋषियों ने सूत से कहा: "आप पुराण, आगम, शास्त्र और इतिहास सब जानते हैं; वेद, शास्त्र, महाभारत और मोक्ष-शास्त्र में आपसे कुछ छिपा नहीं। हम सुनना चाहते हैं कि यह सारा चर-अचर जगत पहले कैसे उत्पन्न हुआ, कैसे फिर होगा, किससे निकला, और प्रलय में कहाँ लीन होता है।" इसी प्रश्न के उत्तर में पूरा पुराण कहा गया।

अठारह पुराणों की हर सूची में ब्रह्म पुराण सबसे पहले आता है, और पुराण का अंतिम अध्याय भी इसे "आद्य", यानी पहला, ब्राह्म नाम का पुराण कहता है। Wilson ने लिखा कि इसी कारण इसे "आदि पुराण" भी कहते हैं, और सूर्य-उपासना के बड़े भाग के कारण "सौर" भी। रोचक बात यह है कि पुराण अपने अंत में अपने को "वैष्णव पुराण" कहता है, क्योंकि इसका सबसे बड़ा भाग पुरुषोत्तम (जगन्नाथ) और विष्णु-भक्ति का है।

तेऽपि श्रुत्वा मुनिश्रेष्ठाः पुराणं वेदसंमितम् । आद्यं ब्राह्माभिधानं च सर्ववाञ्छाफलप्रदम् ॥

उन श्रेष्ठ मुनियों ने भी वेद के समान, सब इच्छाओं का फल देने वाले, "ब्राह्म" नाम के पहले (आद्य) पुराण को सुनकर...

— ब्रह्म पुराण, अध्याय 1–246 — GRETIL e-text, पृष्ठ 246.4

संरचना: 246 अध्याय

GRETIL पर उपलब्ध ब्रह्म पुराण के संस्कृत पाठ में 246 अध्याय और 13,257 श्लोक हैं। परंपरागत संख्याएँ अलग हैं: भागवत इसे दस हज़ार श्लोकों का बताता है, और मत्स्य पुराण का GRETIL पाठ तेरह हज़ार; आज का पाठ मत्स्य की संख्या के बहुत पास है। Wilson की प्रतियों में केवल सात से आठ हज़ार श्लोक थे, इसलिए उनके पास जो ब्रह्म पुराण था, उसमें आज का पूरा गौतमी-माहात्म्य शायद नहीं था।

नीचे की तालिका हर अध्याय का आरंभिक श्लोक पढ़कर बनाई गई है। इससे साफ़ दिखता है कि पुराण का बड़ा भाग तीर्थों का है: ओडिशा (उत्कल) के कोणार्क, विरजा और पुरुषोत्तम क्षेत्र, और फिर लगभग सौ अध्यायों में गोदावरी के तीर्थ।

ब्रह्म पुराण: अध्याय-समूह और विषय (GRETIL पाठ के अनुसार)
अध्यायविषयस्रोत
1–18नैमिषारण्य; सृष्टि, शतरूपा, पृथु, मन्वन्तर; सूर्य और चंद्र वंश, यदु-वंश, स्यमंतक मणिब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 1–18
19–24भारतवर्ष, द्वीप, पृथ्वी का विस्तार, नरक, ऊपर के लोक, शिशुमार चक्रब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 19–24
25–33पृथ्वी के तीर्थ; ओड्र (उत्कल) देश और कोणार्क का सूर्य (कोणादित्य); सूर्य-माहात्म्य, सूर्य के बारह रूपब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 25–33
34–42शिव और उमा, पार्वती का विवाह, काम; दक्ष-यज्ञ का विनाश; विरजा क्षेत्रब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 34–42
43–51राजा इंद्रद्युम्न; पुरुषोत्तम क्षेत्र; प्रासाद; बलराम, कृष्ण और सुभद्रा की मूर्तियाँब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 43–51
52–56प्रलय में मार्कण्डेय, वट-वृक्ष और दिव्य बालकब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 52–56
57–70पंचतीर्थ, श्वेतमाधव, मत्स्यमाधव, इंद्रद्युम्न सरोवर, ज्येष्ठ स्नान, गुंडिचा यात्रा; विष्णुलोक; पुरुषोत्तम-माहात्म्य का समापनब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 57–70
70–175गौतमी-माहात्म्य (ब्रह्मा-नारद संवाद): शिव की जटा की गंगा के दो भाग, गौतम और ब्रह्मगिरि, त्र्यंबक, और गोदावरी तट के सौ से अधिक तीर्थब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 70–175
176–178पुरुषोत्तम क्षेत्र की और महिमाब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 176–178
179–213विष्णु के अवतार; कृष्ण-चरित, जन्म से द्वारका और यदुवंश के अंत तक; वराहब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 179–213
214–221यम-मार्ग, नरक, धर्म की गति, श्राद्ध-कल्पब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 214–221
222–229वर्णाश्रम-धर्म, शिव-पार्वती संवाद, कृष्ण-माहात्म्य, एकादशी-जागरण और चांडाल, भक्ति का क्रमब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 222–229
230–246कलियुग, तीन प्रकार के प्रलय, योग, सांख्य, वसिष्ठ-करालजनक संवाद, क्षर-अक्षर; समापनब्रह्म पुराण (मूल संस्कृत), 230–246

उत्कल देश और कोणार्क का सूर्य

तीर्थों के वर्णन में ब्रह्म पुराण सबसे पहले ओडिशा पर आता है: "भारतवर्ष में दक्षिणी समुद्र के तट पर ओड्र देश नाम का प्रसिद्ध प्रदेश है, जो स्वर्ग और मोक्ष देने वाला है," समुद्र से उत्तर में विरजा-मंडल तक। पुराण वहाँ के ब्राह्मणों की प्रशंसा करता है: इंद्रियों को वश में रखने वाले, तप और स्वाध्याय में लगे, वेदों के पारंगत, इतिहास और पुराणों के जानकार, अग्निहोत्री और सत्यवादी; और बाकी तीनों वर्ण भी अपने कर्म में लगे, शांत और धार्मिक।

उसी देश में खारे समुद्र के तट पर, रेत से भरे सुंदर प्रदेश में, चंपा, अशोक, बकुल, कनेर और पाटल के पेड़ों के बीच, "कोणादित्य" नाम से सूर्य प्रतिष्ठित हैं, जिनके दर्शन से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। यही आज का कोणार्क है। अगले अध्यायों में सूर्य-माहात्म्य है: सारा त्रिलोक सूर्य पर आधारित है, उन्हीं से जगत उत्पन्न होता है; निर्गुण सूर्य बारह रूपों में प्रकट हुए; और सूर्य से जुड़ी अनेक कथाएँ।

Wilson ने सूर्य-उपासना वाले इसी भाग के कारण लिखा कि ब्रह्म पुराण को "सौर पुराण" भी कहा जाता है, पर यह भी चेताया कि सौर नाम का एक अलग उपपुराण भी है, जिससे इसे भ्रमित नहीं करना चाहिए। उन्होंने यह भी लिखा कि ओडिशा के सूर्य, शिव और जगन्नाथ के मंदिरों और उपवनों के वर्णन इस पुराण की विशेष पहचान हैं।

इंद्रद्युम्न और जगन्नाथ की काष्ठ-मूर्तियाँ

पुरी के जगन्नाथ मंदिर की उत्पत्ति की प्रसिद्ध कथा ब्रह्म पुराण में विस्तार से है। कृतयुग में इंद्रद्युम्न नाम के एक राजा थे: सत्यवादी, सब शास्त्रों के जानकार, वेद और धनुर्वेद में निपुण, वैष्णव, क्रोध और इंद्रियों को जीतने वाले, योग और सांख्य के अध्येता। उनके मन में विचार उठा कि जनार्दन की आराधना कहाँ और कैसे करूँ, और मन में सब तीर्थों, क्षेत्रों और नगरों पर विचार करके, उन्हें छोड़कर, वे मुक्ति देने वाले प्रसिद्ध पुरुषोत्तम क्षेत्र गए। वहाँ उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया।

उन्होंने वहाँ महायज्ञ किया और प्रासाद (मंदिर) बनवाया, पर फिर रात-दिन चिंता में डूब गए: "किस वस्तु से मैं सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कर्ता पुरुषोत्तम की प्रतिमा बनाऊँ? पत्थर, मिट्टी या लकड़ी, विष्णु की प्रतिमा के योग्य क्या है?" राजा ने न सोना-चाँदी, न रत्न, न संगीत, न हाथी-घोड़ों में मन लगाया; उन्होंने पांचरात्र विधि से पुरुषोत्तम की पूजा की और स्तुति करने लगे।

स्वप्न में मिले संकेत के अनुसार राजा अकेले, बिना घोड़े, पैदल सेना या सारथी के, समुद्र-तट पर गए, और वहाँ जल के पास एक विशाल, तेजस्वी वृक्ष (दारु) देखा, गहरे मंजीठ जैसे रंग का, जिसका नाम और जाति कोई नहीं जानता था। राजा ने तेज़ कुल्हाड़ी से उसे काटा। तभी विष्णु और विश्वकर्मा, दोनों ब्राह्मण का रूप लेकर, अपने तेज से चमकते हुए वहाँ आए और पूछा, "महाराज, इस निर्जन वन में समुद्र-तट पर यह वृक्ष क्यों काटा?" राजा ने कहा, "देवदेव की आराधना के लिए प्रतिमा बनाने का मेरा निश्चय है; मुझे स्वप्न में यही आदेश मिला।"

ब्राह्मण-रूप विष्णु ने राजा की प्रशंसा की और कहा, "यह मेरे साथ आया शिल्पी स्वयं विश्वकर्मा के समान है; यह वैसी ही प्रतिमा बनाएगा जैसी मैं बताऊँ।" फिर उन्होंने आदेश दिया: एक कृष्ण का रूप, शांत, कमल-नयन, श्रीवत्स और कौस्तुभ धारण किए, शंख-चक्र-गदाधारी; दूसरा दूध जैसे गोरे, हल-धारी अनंत (बलराम) का; और तीसरा वासुदेव की बहन, सोने जैसे रंग वाली सुभद्रा का। विश्वकर्मा ने क्षण भर में तीनों प्रतिमाएँ बना दीं: शरद-चंद्र जैसे श्वेत बलराम, नीले बादल जैसे कमल-नयन हरि, और स्वर्ण-वर्णी सुभद्रा।

चकित राजा ने पूछा, "आप दोनों कौन हैं? देवता, यक्ष, या स्वयं ब्रह्मा और हृषीकेश?" तब भगवान बोले: "मैं न देवता हूँ, न यक्ष, न दैत्य, न इंद्र, न ब्रह्मा, न रुद्र; मुझे पुरुषोत्तम जानो। मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही विष्णु, और शिव भी मैं ही हूँ।" राजा ने स्तुति की और वर में वह परम पद माँगा जिसका ज्ञानी ध्यान करते हैं। भगवान ने उन्हें दस हज़ार नौ सौ वर्ष का निर्बाध राज्य, अंत में परम पद, और अटल कीर्ति का वर दिया, और यह भी कि यज्ञ से बना इंद्रद्युम्न सरोवर तीर्थ होगा। फिर राजा तीनों प्रतिमाओं को रथों में मंगल-ध्वनि के साथ ले आए और प्रासाद में स्थापित किया।

नाहं देवो न यक्षो वा न दैत्यो न च देवराट् । न ब्रह्मा न च रुद्रोऽहं विद्धि मां पुरुषोत्तमम् ॥

मैं न देवता हूँ, न यक्ष, न दैत्य, न देवराज इंद्र; न ब्रह्मा हूँ, न रुद्र। मुझे पुरुषोत्तम जानो।

— ब्रह्म पुराण, अध्याय 1–246 — GRETIL e-text, पृष्ठ 51.1

पुरुषोत्तम क्षेत्र: ज्येष्ठ स्नान और गुंडिचा यात्रा

उसी अध्याय में भगवान आगे की परंपराओं का संकेत भी देते हैं। सरोवर के दक्षिण-पश्चिम में एक बरगद है और उसके पास एक मंडप, केतकी, नारियल, चंपा और बकुल से घिरा। "आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पंचमी को, पितृ-देवता वाले नक्षत्र में, लोग हमें वहाँ ले जाएँगे और सात दिन उस मंडप में रखेंगे"; ब्रह्मचारी, यति, गृहस्थ और ब्राह्मण ऋग्, यजुः और साम के स्वरों से बलराम और केशव की स्तुति करेंगे। आगे के अध्यायों में "गुंडिचा मंडप" की ओर रथ पर जाते कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के दर्शन का फल भी बताया गया है।

पुरुषोत्तम क्षेत्र के बाकी अध्यायों में तीर्थ-यात्रा का पूरा क्रम है: पंचतीर्थ की विधि; बलराम, कृष्ण और सुभद्रा को प्रणाम; अनंत-वासुदेव, श्वेतमाधव और मत्स्यमाधव के दर्शन; इंद्रद्युम्न सरोवर; और "महाज्येष्ठी" के योग में कृष्ण का स्नान, जिसे ब्रह्मा से पूछकर किस समय और किस विधि से करना है, यह बताया गया है।

पुराण स्वयं इस क्षेत्र की महिमा में कहता है: "सत्य, सत्य, फिर सत्य: समुद्र के जल से धुला पुरुषोत्तम क्षेत्र एक बार देख लेने से, और ब्रह्मविद्या एक बार जान लेने से, फिर गर्भ में आना नहीं होता।" Wilson ने भी लिखा कि उनकी प्रतियों में पुरुषोत्तम क्षेत्र का वर्णन लगभग चालीस अध्यायों में था, पूरे ग्रंथ का एक-तिहाई, और इससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इस पुराण का मुख्य उद्देश्य जगन्नाथ-रूप कृष्ण की उपासना है।

प्रलय में मार्कण्डेय और वट-वृक्ष का बालक

पुरुषोत्तम क्षेत्र के प्रसंग में ही मार्कण्डेय की प्रलय-कथा आती है। एक कल्प के महाप्रलय में सूर्य-चंद्र और वायु नष्ट हो गए, प्रलय के सूर्य उगे, बिजलियों से पेड़ और पर्वत टूट गए, सब नदियाँ और तालाब सूख गए; फिर संवर्तक अग्नि ने पृथ्वी को भेदकर रसातल तक सब जला दिया। उस भयानक प्रलय में केवल एक ऋषि बचे, मार्कण्डेय, भूख-प्यास से व्याकुल, सूखे होंठों से इधर-उधर भागते हुए, कोई शरण न पाते हुए।

एकाग्र मन से सनातन देव का चिंतन करते हुए वे उस दिव्य स्थान पर पहुँचे जहाँ "पुरुषेश" नाम का सनातन वटराज खड़ा था, और उसकी जड़ में बैठ गए। वहाँ न कालाग्नि का भय था, न अंगारों की वर्षा। फिर सब एक समुद्र हो गया, और उसमें मार्कण्डेय ने एक दिव्य शय्या पर बालक-रूप कृष्ण को देखा: करोड़ों सूर्यों जैसा तेज, चतुर्भुज, कमल-नयन, श्रीवत्स, शंख-चक्र-गदा, वनमाला और कुंडल।

मार्कण्डेय चकित हुए: "इस घोर एकार्णव में यह बालक अकेला निर्भय कैसे है?" माया से मोहित होकर उन्होंने भगवान को नहीं पहचाना और दुख से कहा, "मेरा तप, ज्ञान, कर्म और लंबा जीवन सब व्यर्थ है, जो मैं इस दिव्य बालक को नहीं जानता।" बालक ने हँसकर मेघ जैसे स्वर में कहा, "वत्स, मैं जानता हूँ तुम थके हो और शरण चाहते हो; मेरे शरीर में प्रवेश करो।" मार्कण्डेय उनके खुले मुख में चले गए, और भीतर उन्होंने अनेक जनपदों से भरी पूरी पृथ्वी, सातों समुद्र, जंबू से पुष्कर तक सातों द्वीप, भारत आदि वर्ष, सब पर्वत और रत्नों से भरा सुमेरु देखा। बाहर निकलकर उन्होंने भगवान की स्तुति की, और भगवान प्रसन्न होकर उनसे बोले।

गौतमी-माहात्म्य: गौतम ऋषि और गोदावरी का अवतरण

ब्रह्म पुराण का सबसे बड़ा भाग, लगभग सौ अध्याय (70–175), गोदावरी नदी का है, जिसे यहाँ "गौतमी गंगा" कहा गया है। यह ब्रह्मा और नारद का संवाद है। नारद पूछते हैं कि स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में कितने तीर्थ हैं और सबसे श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्मा बताते हैं कि तीर्थ चार प्रकार के हैं: मानुष, आर्ष (ऋषियों के), आसुर और दैव; और दैव तीर्थ वह है जिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों ने रचा, उससे बढ़कर कुछ नहीं। तीनों देवताओं वाली यह गंगा ही गौतमी है।

ब्रह्मा बताते हैं कि शिव की जटा में स्थित गंगा के दो भाग हुए: एक भाग ब्राह्मण गौतम ने व्रत, दान और समाधि से शिव की पूजा करके उतारा, और दूसरा भाग क्षत्रिय राजा भगीरथ ने तप करके। इस तरह गंगा के दो रूप हुए। दक्षिण की गंगा, गोदावरी, गौतम की लाई हुई है, इसलिए गौतमी कहलाती है।

इस अवतरण के पीछे एक रोचक कथा है। उमा को शिव की जटा में छिपी गंगा सहन नहीं थी, पर शिव उसे छोड़ते नहीं थे। उसी समय पृथ्वी पर अनावृष्टि और अकाल पड़ा, पर ब्रह्मगिरि पर गौतम के आश्रम में कभी अकाल या रोग नहीं होता था; गौतम के तपोबल से औषधियाँ उगती और कटती थीं, और वे सब आने वाले मुनियों का पिता की तरह पालन करते थे। तब विनायक (गणेश) ने माता से कहा कि ऐसे तपस्वी ब्राह्मण ही गंगा को जटा से उतरवा सकते हैं, और भाई और जया के साथ गौतम के आश्रम गए।

विनायक ने ब्राह्मण-रूप में वहाँ रहकर मुनियों को लौटने के लिए उकसाया, और जया को गाय का रूप लेकर गौतम के धान के खेत में भेजा। गौतम ने विकृत-सी गाय को धान खाते देखा और एक तिनके से उसे हटाया; गाय चीख़कर गिर पड़ी। हाहाकार मच गया, और मुनियों ने गौतम को दोषी ठहराया। तब ब्राह्मण-रूप विनायक ने सबकी सहमति से उपाय बताया, जिसका परिणाम यह हुआ कि गौतम ने शिव की आराधना करके उनकी जटा से गंगा को ब्रह्मगिरि पर उतारा। आगे के अध्यायों में शिव "त्र्यंबक" रूप में गौतम के सामने प्रकट होते हैं।

इन तीर्थ-कथाओं में अहल्या-संगम की कथा (अध्याय 87) गौतम के विवाह से शुरू होती है, और यह रूप बहुत कम लोग जानते हैं। ब्रह्मा कहते हैं कि उन्होंने अहल्या को रचकर पालन-पोषण के लिए वेद-वेदांग के ज्ञाता गौतम को सौंपा, और गौतम ने उसे बिना किसी विकार के बड़ा करके लौटा दिया। तब ब्रह्मा ने घोषणा की कि जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, उसे अहल्या मिलेगी, और देवता परिक्रमा के लिए निकल पड़े। उसी समय गौतम ने अधप्रसूता सुरभि गाय को देखा, उसकी और सब देवताओं की एक परिक्रमा की, और ब्रह्मा ने ध्यान से जानकर कहा कि यही पृथ्वी की परिक्रमा है। ब्रह्मा ने गौतम के धैर्य, ज्ञान और तप से प्रसन्न होकर अहल्या उन्हें दी, और साथ में ब्रह्मगिरि भी। आगे यही अध्याय इंद्र के पाप-विचार की कथा कहता है।

फिर गोदावरी के तट के एक-एक तीर्थ का माहात्म्य आता है, और लगभग हर तीर्थ के साथ एक कथा: कुशावर्त, कार्तिकेय तीर्थ, दशाश्वमेधिक, अहल्या-संगम, जनस्थान, अरुणा-वरुणा संगम, गोवर्धन, सीता सहित राम द्वारा पितरों के तर्पण वाला तीर्थ, विश्वामित्र-हरिश्चंद्र-शुनःशेप की कथा वाला तीर्थ, इला तीर्थ, राम तीर्थ, पुत्र तीर्थ, आपस्तंब तीर्थ, लक्ष्मी तीर्थ, किष्किंधा तीर्थ, व्यास तीर्थ, उर्वशी तीर्थ और अंत में समुद्र-संगम।

एकांशो ब्राह्मणेनात्र व्रतदानसमाधिना । गोतमेन शिवं पूज्य आहृतो लोकविश्रुतः ॥ भगीरथेन भूपेन आहृतोऽंशोऽपरस्तथा । एवं द्वैरूप्यमभवद्गङ्गाया मुनिसत्तम ॥

एक भाग ब्राह्मण गौतम ने व्रत, दान और समाधि से शिव की पूजा करके उतारा, जो लोक में प्रसिद्ध है; और दूसरा भाग राजा भगीरथ ने उतारा। हे मुनिश्रेष्ठ, इस तरह गंगा के दो रूप हुए।

— ब्रह्म पुराण, अध्याय 1–246 — GRETIL e-text, पृष्ठ 74.3–74.5

शिव, उमा और दक्ष-यज्ञ

ब्रह्म पुराण केवल वैष्णव नहीं है; इसमें शिव की कथाएँ भी विस्तार से हैं। अध्याय 34 से 38 में त्रिपुरारि, त्रिनेत्र, उमा को प्रिय रुद्र का वर्णन, देवताओं का पार्वती से शिव के लिए प्रार्थना करना, हिमालय पर पार्वती का विवाह, और कामदेव का प्रसंग है। अध्याय 39 से 41 में प्रश्न है कि वैवस्वत मन्वन्तर में प्रचेताओं के पुत्र दक्ष का अश्वमेध कैसे नष्ट हुआ; दक्ष शिव का पराक्रम देखकर हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करते हैं। अध्याय 41 इस पूरी कथा का सार देता है: पार्वती का रोष और शंभु का असह्य क्रोध, वीरभद्र और भद्रकाली की उत्पत्ति, दक्ष-यज्ञ का विनाश, फिर शिव का दक्ष पर प्रसन्न होना और यज्ञ में रुद्र का भाग।

अध्याय 42 में विरजा क्षेत्र का माहात्म्य है, जहाँ ब्रह्माणी (विरजा माता) प्रतिष्ठित हैं और जिनके दर्शन से मनुष्य पवित्र होता है। यही विरजा-मंडल ओड्र देश की उत्तरी सीमा बताया गया था। उत्तर भाग के शिव-पार्वती संवाद (अध्याय 223–226) में पार्वती शिव से पूछती हैं कि मनुष्यों के धर्म और अधर्म क्या हैं, किस आचरण से स्वर्ग मिलता है, और शिव उत्तर देते हैं।

कृष्ण-चरित, यम-मार्ग, श्राद्ध और भक्ति

अध्याय 181 से 212 तक कृष्ण-चरित है। यह गीता के प्रसिद्ध विचार से शुरू होता है: "जब-जब अधर्म बढ़ता है और धर्म घटता है, तब जनार्दन अवतार लेते हैं, सज्जनों की रक्षा, धर्म की स्थापना और दुष्टों के दमन के लिए।" फिर भार से दबी पृथ्वी का मेरु पर देवताओं के पास जाना, कृष्ण-जन्म, गोकुल, वृंदावन, कालिया, धेनुक, इंद्र का कोप और गोवर्धन, अक्रूर, कुब्जा, कंस-वध, मुचुकुंद, रुक्मिणी, प्रद्युम्न, बाण-युद्ध, बलराम के पराक्रम, और अंत में यदुवंश का नाश और अर्जुन द्वारा कृष्ण और बलराम का संस्कार। Wilson के अनुसार यह कृष्ण-चरित शब्दशः विष्णु पुराण जैसा है।

इसके बाद धर्म का भाग: यम-मार्ग और पापियों के दक्षिण-द्वार से यमपुरी में प्रवेश, नरकों की यातनाएँ, धर्मात्माओं की गति, परलोक गए लोगों के लिए श्राद्ध, और श्राद्ध-कल्प का बहुत विस्तार (अकेले अध्याय 220 में 211 श्लोक)। फिर वर्ण और आश्रम के धर्म।

अध्याय 228 और 229 भक्ति पर हैं। एकादशी पर निराहार रहकर, विष्णु की पूजा करके, रात में जागरण करते हुए विष्णु की कथा या गीत गाने वाला विष्णु के परम धाम को जाता है; इसके उदाहरण में अवंती नगरी के एक चांडाल की कथा है, जो जागरण में कृष्ण का गीत गाकर परम गति को पहुँचा। फिर ऋषि पूछते हैं कि विष्णु में भक्ति कैसे हो, और उत्तर में एक सुंदर क्रम दिया गया है: पहले अन्य देवताओं में भक्ति, फिर अग्नि में, अग्नि के प्रसन्न होने पर सूर्य में, सूर्य के प्रसन्न होने पर शंकर में, और त्रिलोचन के प्रसन्न होने पर केशव में।

तुष्टे हुताशने तस्य भक्तिर्भवति भास्करे । प्रसन्ने भास्करे तस्य भक्तिर्भवति शंकरे ॥ तुष्टे त्रिलोचने तस्य भक्तिर्भवति केशवे ।

अग्नि के प्रसन्न होने पर उसकी भक्ति सूर्य में होती है; सूर्य के प्रसन्न होने पर शंकर में; और त्रिलोचन के प्रसन्न होने पर केशव में।

— ब्रह्म पुराण, अध्याय 1–246 — GRETIL e-text, पृष्ठ 229.10–229.12

प्रलय, योग और सांख्य

पुराण के अंतिम भाग में कलियुग के अंत के लक्षण, और तीन प्रकार के प्रलय हैं: नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यंतिक। फिर आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक, इन तीन तापों को जानकर ज्ञान और वैराग्य प्राप्त करने का उपदेश, और "दुख के संयोग की औषधि" योग का वर्णन।

अध्याय 237 से 245 सांख्य और योग का एक पूरा दर्शन हैं: कर्म करने और त्यागने वाले किस गति को पाते हैं, गुण और क्षेत्रज्ञ, सांख्य और योग में भेद, कपिल आदि आचार्यों का सांख्य-मार्ग, और क्षर-अक्षर का विवेक। इसका एक भाग प्राचीन राजा करालजनक और ऋषि वसिष्ठ का संवाद है: राजा पूछते हैं कि वह अक्षर क्या है जहाँ से लौटना नहीं होता, और क्षर क्या है। अंत में वसिष्ठ राजा को आश्वासन देते हैं, "करालजनक, अब तुम्हें कोई भय नहीं; तुमने आज परब्रह्म को सुन लिया।" Wilson ने भी लिखा कि ग्रंथ योग की विस्तृत विधि पर समाप्त होता है, जिसका लक्ष्य विष्णु ही हैं।

अंतिम अध्याय में ऋषि व्यास की स्तुति करते हैं: "आपने चारों वेद, अंग और व्याकरण पढ़कर महाभारत रचा; अज्ञान के अंधकार से अंधे लोगों की आँखें आपने ज्ञान के अंजन की सलाई से खोलीं।" फिर फलश्रुति: इसे सुनने से ब्राह्मण को विद्या, क्षत्रिय को युद्ध में विजय, वैश्य को अक्षय धन और शूद्र को सुख मिलता है; और प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र और अर्बुद में उपवास का जो फल है, वह इसके श्रवण से मिलता है।

विद्वानों के मत: पंचलक्षण, उड़ीसा और काल

मत्स्य पुराण ब्रह्म पुराण को ब्रह्मा द्वारा मरीचि को सुनाया गया पुराण कहता है। Wilson ने ध्यान दिलाया कि आज के पाठ में कथा लोमहर्षण सूत नैमिषारण्य के ऋषियों को सुनाते हैं, और भीतर मूल वक्ता ब्रह्मा हैं जिन्होंने इसे दक्ष को बताया, मरीचि को नहीं। उन्होंने यह भी लिखा कि आरंभ के सृष्टि, मन्वन्तर और वंश वाले अध्याय संक्षिप्त हैं, और उन शब्दों में जो कई पुराणों में समान हैं।

Wilson का मत था कि इस ग्रंथ में पंचलक्षण पुराण की परिभाषा से मेल खाने वाली सामग्री कम है, और उड़ीसा के मंदिरों का वर्णन, जिनके निर्माण की तिथियाँ इतिहास में दर्ज हैं, दिखाता है कि यह तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी से पहले संकलित नहीं हो सकता। उन्होंने "ब्रह्म पुराण के उत्तर खंड" नाम से चलने वाले एक अलग ग्रंथ को भी देखा, जो बालजा (शायद मारवाड़ की बनास) नदी का माहात्म्य है, और उसे स्पष्ट रूप से आधुनिक माना।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि Wilson की प्रतियाँ सात-आठ हज़ार श्लोकों की थीं, जबकि आज के छपे पाठ में तेरह हज़ार से अधिक हैं, जिनमें सौ अध्यायों का गौतमी-माहात्म्य भी है। यानी इस पुराण का आकार और सामग्री समय के साथ बदलते रहे। आधुनिक विद्वान पुराणों में पुरानी और नई परतें अलग-अलग मानते हैं, इसलिए पूरे ग्रंथ की एक तिथि देना कठिन है।

महत्व और आज के लिए अर्थ

आज करोड़ों लोग पुरी की रथ-यात्रा देखते हैं, नासिक-त्र्यंबकेश्वर के पास गोदावरी में स्नान करते हैं, और कोणार्क के सूर्य मंदिर को देखने जाते हैं। इन तीनों की पौराणिक कथाएँ एक ही ग्रंथ में मिलती हैं: ब्रह्म पुराण। इंद्रद्युम्न की लकड़ी की मूर्तियाँ, गौतम की गाय और गंगा, और कोणादित्य, ये कथाएँ आज भी इन तीर्थों की परंपरा में जीवित हैं।

और इस पुराण का सबसे गहरा संदेश शायद भक्ति का वह क्रम है जो यह देता है: किसी भी देवता की सच्ची भक्ति अंततः परमात्मा तक ले जाती है, अग्नि से सूर्य, सूर्य से शिव और शिव से केशव तक। जो पुराण स्वयं को "पहला" और "वैष्णव" कहता है, वही सूर्य और शिव की भी इतनी महिमा गाता है; यही सनातन परंपरा की उदारता है।

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स्रोत एवं संदर्भ

ब्रह्म पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न