श्रीमद्भागवत क्या है?
एक राजा जानता है कि सात दिन बाद उसकी मृत्यु निश्चित है। एक ब्राह्मण-पुत्र ने शाप दिया है कि सातवें दिन तक्षक नाग उसे डँसेगा। राजा राज्य छोड़कर गंगा के किनारे बैठ जाता है, और बड़े-बड़े ऋषि वहाँ इकट्ठा होते हैं। तभी एक युवा संन्यासी आता है, अवधूत के वेश में, बच्चों से घिरा हुआ, जिसे किसी बात की परवाह नहीं। वह व्यास का पुत्र शुकदेव है। और राजा परीक्षित उससे पूछते हैं: "जो मरने वाला है, उसे क्या करना चाहिए?" श्रीमद्भागवत इसी प्रश्न का उत्तर है।
"भागवत" का अर्थ है भगवान से जुड़ा, या भगवान के भक्तों का। यह पुराण स्वयं को भगवान की कथा का ग्रंथ कहता है, और इसका केंद्र भक्ति है: कर्म और ज्ञान से भी ऊपर, भगवान से प्रेम। विष्णु पुराण और भागवत दोनों की परंपरागत सूची में यह पाँचवाँ महापुराण है; भागवत अपनी सूची (12.7.23) में स्वयं को आठवें स्थान पर रखता है।
मत्स्य पुराण भागवत की पहचान ऐसे देता है: जिसमें गायत्री को आधार बनाकर धर्म का विस्तार हो, जिसमें वृत्रासुर-वध की कथा हो, जो सारस्वत कल्प के वृत्तांत से जुड़ा हो, और जिसके 18,000 श्लोक हों। भागवत स्वयं भी अपनी संख्या 18,000 बताता है। यही पहचान श्रीमद्भागवत और देवी भागवत के बीच के पुराने विवाद का केंद्र है, जिसकी चर्चा नीचे है।
कथा का ढाँचा: व्यास की उदासी से नैमिषारण्य तक
भागवत की कथा कई परतों में चलती है। सबसे बाहरी परत नैमिषारण्य की है, जहाँ शौनक आदि ऋषि हज़ार वर्ष का सत्र (लंबा यज्ञ) कर रहे हैं। वहाँ सूत आते हैं, और ऋषि उनसे भगवान की कथा पूछते हैं। सूत वह कथा सुनाते हैं जो उन्होंने शुकदेव के मुख से परीक्षित को सुनाते हुए सुनी थी।
पर भागवत के जन्म की कथा उससे भी पहले की है। व्यास वेदों का विभाजन कर चुके थे, महाभारत लिख चुके थे, फिर भी उनका मन संतुष्ट नहीं था। वे अपने आश्रम में उदास बैठे थे, तभी नारद आए। नारद ने पूछा कि क्या उनकी आत्मा संतुष्ट है, और फिर कारण बताया: "आपने भगवान के निर्मल यश का प्रायः वर्णन ही नहीं किया; जिस ज्ञान से भगवान प्रसन्न न हों, मैं उसे अधूरा मानता हूँ।" नारद की प्रेरणा से व्यास ने भगवान की लीलाओं की संहिता रची, और उसे अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया, जो संसार से विरक्त थे।
फिर आती है परीक्षित की कथा। परीक्षित अर्जुन के पौत्र थे, अभिमन्यु के पुत्र। एक दिन शिकार से थके, प्यासे परीक्षित ने ध्यान में बैठे शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ साँप डाल दिया। ऋषि के पुत्र शृंगी ने क्रोध में शाप दिया कि सातवें दिन तक्षक इस राजा को डँसेगा। परीक्षित ने शाप को सहज स्वीकार किया, गंगा-तट पर उपवास के लिए बैठ गए, और शुकदेव से सात दिन भगवान की कथा सुनी। अंत में वे कहते हैं: "मैं अब तक्षक जैसी मृत्यु से नहीं डरता; आपने मुझे अभय ब्रह्म दिखा दिया।"
कथा के अंत में तक्षक आता है, रास्ते में विषवैद्य कश्यप को धन देकर लौटा देता है, और परीक्षित को डँस लेता है। उनके पुत्र जनमेजय पिता की मृत्यु से क्रोधित होकर नागों को नष्ट करने के लिए सर्प-सत्र करते हैं। इसी "सात दिन की कथा" की परंपरा से आज की "भागवत सप्ताह" कथा का रूप बना।
संरचना: बारह स्कंध और 335 अध्याय
श्रीमद्भागवत बारह "स्कंधों" में बँटा है। स्कंध का अर्थ है पेड़ का तना, और भागवत की परंपरा इसे कल्पवृक्ष की तरह देखती है, जिसका हर स्कंध एक बड़ी शाखा है। हमने GRETIL पर उपलब्ध भागवत के पाठ में हर स्कंध के अध्याय और श्लोक स्वयं गिने। कुल 335 अध्याय निकले, और यही संख्या परंपरा भी बताती है। सबसे बड़ा दसवाँ स्कंध है, 90 अध्यायों का, जिसमें श्रीकृष्ण का पूरा चरित है।
श्लोकों की संख्या का प्रश्न थोड़ा उलझा है। परंपरा 18,000 कहती है। हमारे गिने हुए e-text में 13,221 श्लोक-संख्याएँ हैं, और कुछ सौ श्लोक ऐसे भी हैं जिन्हें उसमें अलग चिह्न से दिखाया गया है। पाँचवें स्कंध का बड़ा भाग गद्य में है, और गद्य के अनुच्छेदों को श्लोक की तरह कैसे गिना जाए, इस पर भी संख्या बदलती है। ध्यान रहे, यह e-text स्वयं को "संशोधन के अधीन" बताता है; अलग छपे संस्करणों में संख्याएँ थोड़ी अलग मिल सकती हैं।
| स्कंध | अध्याय | श्लोक | मुख्य विषय | स्रोत |
|---|---|---|---|---|
| 1 | 19 | 804 | नैमिषारण्य, व्यास-नारद, अवतारों की सूची, परीक्षित और शाप | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 1 |
| 2 | 10 | 340 | शुकदेव का उपदेश, विराट रूप, भागवत के दस लक्षण | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 2 |
| 3 | 33 | 1,277 | विदुर-उद्धव और विदुर-मैत्रेय संवाद, सृष्टि, वराह, कपिल और देवहूति | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 3 |
| 4 | 31 | 1,397 | दक्ष-यज्ञ, ध्रुव, पृथु, प्रचेता | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 4 |
| 5 | 26 | 639 | प्रियव्रत, ऋषभदेव, भरत, भूगोल और लोक | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 5 |
| 6 | 19 | 837 | अजामिल, दक्ष, चित्रकेतु, वृत्रासुर | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 6 |
| 7 | 15 | 697 | प्रह्लाद और नरसिंह, वर्णाश्रम-धर्म | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 7 |
| 8 | 24 | 905 | मन्वन्तर, गजेंद्र, समुद्र-मंथन, वामन, मत्स्य | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 8 |
| 9 | 24 | 942 | सूर्य और चंद्र वंश, अंबरीष, राम-कथा | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 9 |
| 10 | 90 | 3,560 | श्रीकृष्ण-चरित: जन्म से द्वारका तक | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 10 |
| 11 | 31 | 1,286 | यदु-वंश का अंत, अवधूत के 24 गुरु, उद्धव को उपदेश | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 11 |
| 12 | 13 | 537 | कलियुग, प्रलय, परीक्षित का अंत, पुराणों की संख्या, फलश्रुति | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 12 |
| कुल | 335 | 13,221 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), स्कंध 1–12 |
भागवत के दस लक्षण
पुराण की पुरानी परिभाषा पाँच लक्षणों की है, पर भागवत अपने लिए दस लक्षण बताता है। दूसरे स्कंध में शुकदेव कहते हैं कि इसमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय: ये दस विषय हैं। बारहवें स्कंध में यही बात थोड़े अलग नामों से फिर आती है, और वहाँ भागवत यह भी कहता है कि "कुछ लोग बड़े और छोटे पुराण के भेद से पाँच लक्षण कहते हैं।"
इन दस में सबसे ज़रूरी अंतिम है: "आश्रय", यानी वह परम सत्य जिस पर सब टिका है। भागवत के अनुसार बाकी नौ लक्षण इसी "आश्रय" को समझाने के लिए हैं। "ईशानुकथा" यानी भगवान और उनके भक्तों की कथाएँ, और "ऊति" यानी कर्मों की वासनाएँ: ये दो लक्षण भागवत को बाकी पुराणों से अलग करते हैं, क्योंकि उसका ज़ोर वंशों पर नहीं, भक्ति की कथाओं पर है।
अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः । मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः ॥इसमें सर्ग (सृष्टि), विसर्ग (आगे की सृष्टि), स्थान (मर्यादा), पोषण (भगवान की कृपा), ऊति (कर्म-वासनाएँ), मन्वन्तर, ईशानुकथा (भगवान की कथाएँ), निरोध (प्रलय), मुक्ति और आश्रय: ये दस विषय हैं।
एक सत्य, तीन नाम: ब्रह्म, परमात्मा, भगवान
भागवत का दर्शन एक प्रसिद्ध श्लोक में सिमटा है। तत्त्व को जानने वाले कहते हैं कि सत्य एक ही है, अद्वय ज्ञान, पर उसे तीन नामों से पुकारा जाता है: ब्रह्म, परमात्मा और भगवान। ज्ञानी उसे निराकार ब्रह्म के रूप में जानते हैं, योगी हृदय में स्थित परमात्मा के रूप में, और भक्त भगवान के रूप में, जिसके रूप, गुण और लीलाएँ हैं। भागवत की भक्ति इसी तीसरे रूप की उपासना है।
पहले स्कंध में अवतारों की एक लंबी सूची आती है, और उसके बाद वह वचन जो भागवत का सबसे प्रसिद्ध वाक्य बन गया: "ये सब (अवतार) परम पुरुष के अंश और कलाएँ हैं, पर कृष्ण तो स्वयं भगवान हैं।" वैष्णव परंपराओं, ख़ासकर कृष्ण-भक्ति परंपराओं, ने इसी वाक्य को अपना केंद्र बनाया। बारहवें स्कंध में भागवत अपने को सब वेदांत का सार बताता है, जिसका लक्षण ब्रह्म और आत्मा की एकता है, और जिसका एक ही प्रयोजन है: कैवल्य, यानी मुक्ति।
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् । ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥तत्त्व को जानने वाले उसी एक अद्वय ज्ञान को तत्त्व कहते हैं, जिसे ब्रह्म, परमात्मा और भगवान, इन तीन नामों से पुकारा जाता है।
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् । इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ये सब परम पुरुष के अंश और कलाएँ हैं, पर कृष्ण तो स्वयं भगवान हैं। ये युग-युग में इंद्र के शत्रुओं से त्रस्त संसार को सुख देते हैं।
कपिल और देवहूति: माँ को दिया गया ज्ञान (स्कंध 3)
तीसरे स्कंध के अंतिम भाग में भागवत की सबसे कोमल दार्शनिक कथा है। कर्दम ऋषि और देवहूति के पुत्र के रूप में भगवान कपिल अवतार लेते हैं। पिता संन्यास लेकर चले जाते हैं, और माँ देवहूति अपने ही पुत्र से पूछती हैं कि संसार के बंधन से कैसे छूटें। कपिल उन्हें सांख्य के तत्त्व समझाते हैं, और साथ में भक्ति-योग: कि भगवान में लगी भक्ति ही मन को सबसे जल्दी शुद्ध करती है।
स्कंध के अंतिम अध्याय में देवहूति इसी उपदेश पर साधना करके मुक्ति पाती हैं। यह कथा दिखाती है कि भागवत में सांख्य दर्शन और भक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, साथी हैं। इसी साइट के ऋषि खंड में महर्षि कपिल का पृष्ठ और "सांख्य दर्शन" लेख इस विषय को और विस्तार देते हैं।
ध्रुव और पृथु (स्कंध 4)
चौथे स्कंध में ध्रुव की कथा (अध्याय 8–12) विष्णु पुराण से कहीं अधिक विस्तार में है। सौतेली माँ के अपमान से आहत बालक ध्रुव को रास्ते में नारद मिलते हैं, पहले उसकी परीक्षा लेते हैं, फिर उसे मधुवन में वासुदेव-मंत्र से तप करने का मार्ग बताते हैं। भगवान प्रकट होते हैं, और ध्रुव को वह अटल स्थान देते हैं जिसके चारों ओर सारे ग्रह-नक्षत्र घूमते हैं। भागवत ध्रुव के आगे के जीवन, उनके राज्य और यक्षों से युद्ध की कथा भी देता है।
उसी स्कंध में राजा पृथु की कथा (अध्याय 15–23) है: वेन की भुजा के मंथन से उनका जन्म, धरती का दोहन, और अंत में राज्य छोड़कर पत्नी अर्चि के साथ वन में तप। भागवत पृथु को एक आदर्श राजा के रूप में दिखाता है, जो प्रजा का पेट भरना और धर्म की रक्षा करना अपना सबसे बड़ा कर्तव्य मानता है। ध्रुव की कथा का पूरा विस्तार इस साइट के भक्त ध्रुव पृष्ठ पर है।
ऋषभदेव और जड़ भरत (स्कंध 5)
पाँचवें स्कंध में राजा ऋषभदेव की कथा है (अध्याय 4–6), जो भगवान के अवतार माने गए। उन्होंने अपने सौ पुत्रों में सबसे बड़े, भरत, को राज्य दिया और स्वयं अवधूत बनकर, शरीर की परवाह छोड़कर, विचरण करने लगे। अपने पुत्रों को दिए उनके उपदेश में सबसे प्रसिद्ध बात यह है कि मनुष्य का शरीर केवल विषय-भोग के लिए नहीं, तप के लिए मिला है, जिससे मन शुद्ध हो और अनंत आनंद मिले।
उन्हीं भरत के नाम से इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा, यह भागवत की परंपरा है। भरत ने भी आगे राज्य छोड़कर तप किया, पर एक मृग-शावक के मोह में अटक गए, और अगले जन्म में मृग और फिर "जड़ भरत" बने। यह कथा विष्णु पुराण में भी है; भागवत उसे पाँचवें स्कंध में राजा रहूगण के संवाद (अध्याय 10 से) के साथ कहता है, जहाँ पालकी ढोते जड़ भरत राजा को आत्मा का उपदेश देते हैं। इसके बाद पाँचवाँ स्कंध पृथ्वी के द्वीपों, भारतवर्ष, लोकों और नरकों का भूगोल देता है।
अजामिल और वृत्रासुर: नाम की शक्ति और शत्रु की भक्ति (स्कंध 6)
छठे स्कंध की पहली कथा अजामिल की है। अजामिल एक ब्राह्मण था जो बुरी संगत में पड़कर पतित हो गया था। उसके दस पुत्र थे, और सबसे छोटे, सबसे प्यारे बेटे का नाम नारायण था। मृत्यु के समय, यमदूतों को देखकर डरा हुआ अजामिल अपने बेटे को पुकारता है: "नारायण!" उसी क्षण विष्णु के दूत आकर यमदूतों को रोक देते हैं। उनके बीच जो संवाद होता है, वह नाम की महिमा का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग है: अनजाने में लिया गया भगवान का नाम भी पाप नष्ट करता है।
छठे स्कंध की दूसरी बड़ी कथा वृत्रासुर की है, और यह बहुत अनोखी है। इंद्र से हारने के बाद देवताओं को भगवान ने बताया कि ऋषि दधीचि (दध्यङ्) से उनका शरीर माँगो। दधीचि ने अपना शरीर दे दिया, और उनकी हड्डियों से विश्वकर्मा ने वज्र बनाया। पर कथा का असली नायक वृत्र है: एक असुर, जो युद्ध के बीच भी भगवान का ऐसा भक्त है कि मृत्यु से पहले उसकी प्रार्थनाएँ भागवत की सबसे सुंदर स्तुतियों में गिनी जाती हैं। मत्स्य पुराण भागवत की पहचान इसी "वृत्रासुर-वध" से कराता है।
प्रह्लाद, नरसिंह और नवधा भक्ति (स्कंध 7)
सातवें स्कंध में प्रह्लाद की कथा भागवत की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में है। विष्णु पुराण में नरसिंह-वध एक श्लोक में है; भागवत उसे पूरे विस्तार से कहता है (अध्याय 8)। हिरण्यकशिपु पूछता है: "कहाँ है तेरा विष्णु? क्या इस खंभे में है?" और जब वह खंभे पर प्रहार करता है, तो उसमें से न पूरे मनुष्य, न पूरे सिंह, नरसिंह प्रकट होते हैं, और उसे द्वार पर, अपनी जंघा पर रखकर, नखों से ऐसे चीर देते हैं जैसे गरुड़ किसी विषैले साँप को। हिरण्यकशिपु को मिले वरदान के कारण उसे न किसी अस्त्र से मारा जा सकता था, न घर के भीतर, न बाहर; नरसिंह ने हर शर्त को सच रखते हुए उसका अंत किया।
पर भागवत के लिए इस कथा का केंद्र वध नहीं, प्रह्लाद की भक्ति है। गुरु के घर से लौटे प्रह्लाद से पिता पूछते हैं कि तुमने क्या सीखा, और प्रह्लाद भक्ति के नौ रूप बताते हैं: भगवान की कथा सुनना, उनका कीर्तन, स्मरण, चरणों की सेवा, पूजा, वंदना, दास-भाव, सखा-भाव, और अपने आप को पूरी तरह भगवान को सौंप देना। इसे "नवधा भक्ति" कहते हैं, और यह भारत की भक्ति-परंपरा की सबसे प्रसिद्ध सूची है।
नरसिंह के शांत होने पर प्रह्लाद उनकी स्तुति करते हैं, और वर माँगने को कहा जाता है तो कहते हैं कि मुझे कोई कामना ही न रहे; और पिता के उद्धार की प्रार्थना करते हैं। इस साइट के भक्त प्रह्लाद पृष्ठ पर यह कथा, और नवधा भक्ति की भागवत और मानस वाली दोनों सूचियाँ, विस्तार से हैं।
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥विष्णु की कथा सुनना, कीर्तन, स्मरण, चरणों की सेवा, पूजा, वंदना, दास-भाव, सखा-भाव और आत्म-समर्पण (ये भक्ति के नौ रूप हैं)।
गजेंद्र मोक्ष, समुद्र-मंथन, वामन और मत्स्य (स्कंध 8)
आठवें स्कंध की पहली कथा गजेंद्र की है। क्षीरसागर से घिरे त्रिकूट पर्वत के एक सरोवर में गजराज अपने परिवार के साथ जल-क्रीड़ा कर रहा था, तभी एक बलवान ग्राह ने उसका पैर पकड़ लिया। हाथी और ग्राह हज़ार वर्ष तक लड़ते रहे। जब गजेंद्र की सारी शक्ति चुक गई, तो उसने अपने पिछले जन्म के संस्कार से भगवान की स्तुति की, और हरि गरुड़ पर आकर चक्र से ग्राह का मुँह चीर देते हैं।
कथा के अंत में भागवत दोनों का पिछला जन्म बताता है। ग्राह असल में हूहू नाम का गंधर्व था, जो देवल ऋषि के शाप से ग्राह बना था। और गजेंद्र पिछले जन्म में द्रविड़ देश के पांड्य राजा इंद्रद्युम्न थे, विष्णु-व्रत में लीन, जिन्हें अगस्त्य ने, सम्मान न देने पर, हाथी होने का शाप दिया था। संकट में पूरी शरणागति ही उद्धार का रास्ता है: यही गजेंद्र मोक्ष का सार है, और इसकी स्तुति आज भी संकट में पढ़ी जाती है।
इसी स्कंध में समुद्र-मंथन (अध्याय 5–12) है, जिसमें भगवान कूर्म बनकर मंदराचल को पीठ पर उठाते हैं, फिर मोहिनी बनकर अमृत बाँटते हैं; वामन अवतार (अध्याय 15–23), जिसमें वामन राजा बलि से तीन पग धरती माँगते हैं और दो पग में तीनों लोक नाप लेते हैं, और बलि तीसरे पग के लिए अपना सिर आगे कर देते हैं; और मत्स्य अवतार (अध्याय 24), जिसमें द्रविड़ देश के राजा सत्यव्रत की अंजलि में एक छोटी मछली आती है, जो बढ़ते-बढ़ते विशाल हो जाती है, और प्रलय के जल में उनकी नाव बचाती है।
अंबरीष और राम-कथा (स्कंध 9)
नौवाँ स्कंध सूर्य और चंद्र वंशों का है, और उसमें राजा अंबरीष की कथा (अध्याय 4–5) भक्ति का बड़ा उदाहरण है। अंबरीष ने अपनी रानी के साथ एक वर्ष तक द्वादशी-व्रत किया। व्रत के अंत में पारण के समय दुर्वासा ऋषि अतिथि बनकर आए, स्नान करने गए और देर कर दी। द्वादशी का समय निकलने लगा, तो अंबरीष ने ब्राह्मणों की सलाह से केवल जल पीकर पारण कर लिया। लौटकर क्रोधित दुर्वासा ने उन पर कृत्या छोड़ी।
पर भगवान ने अंबरीष की रक्षा के लिए पहले ही अपना चक्र दे रखा था। सुदर्शन चक्र ने कृत्या को भस्म किया और दुर्वासा का पीछा किया। दुर्वासा ब्रह्मा, शिव और स्वयं विष्णु के पास गए, और विष्णु ने कहा: "मैं भक्तों के अधीन हूँ; अंबरीष के पास ही जाओ।" अंत में अंबरीष ने स्वयं चक्र से प्रार्थना करके दुर्वासा को बचाया। भक्त अपने अपमान करने वाले के लिए भी भगवान से दया माँगता है, यही इस कथा का सार है। इसी स्कंध में राम-कथा (अध्याय 10–11) संक्षेप में है।
दशम स्कंध: श्रीकृष्ण-चरित (90 अध्याय)
दसवाँ स्कंध भागवत का हृदय है: 90 अध्याय और लगभग 3,560 श्लोक, यानी पूरे ग्रंथ का एक-चौथाई से अधिक। परंपरा इसे दो भागों में पढ़ती है, पूर्वार्ध (अध्याय 1–49) और उत्तरार्ध (50–90)। पूर्वार्ध में कंस के कारागार में जन्म, गोकुल और वृंदावन की लीलाएँ, और मथुरा जाकर कंस-वध; उत्तरार्ध में द्वारका, विवाह, युद्ध और कृष्ण का राजा के रूप में जीवन।
बाल-लीलाओं में पूतना-वध (अध्याय 6), शकट-भंजन (अध्याय 7), कालिय-दमन, माखन-चोरी, और इंद्र की पूजा रोककर गोवर्धन उठाना (अध्याय 24–25) आते हैं। अध्याय 21 में "वेणु-गीत" है, जिसमें गोपियाँ कृष्ण की बाँसुरी का वर्णन करती हैं। और अध्याय 29 से 33 तक "रास-पंचाध्यायी" है, यानी शरद की रात का रास, जिसे परंपरा भागवत का सबसे गूढ़ और पवित्र भाग मानती है।
रास-पंचाध्यायी का पहला वाक्य ही उसका अर्थ बता देता है: भगवान ने "योगमाया का आश्रय लेकर" रमण का मन किया। भागवत की परंपरा रास को जीव और भगवान के मिलन का, गोपियों के निष्काम, सर्वस्व-समर्पण वाले प्रेम का प्रतीक मानती है। भागवत स्वयं रास के अंत में कहता है कि भगवान ने भक्तों पर कृपा के लिए मनुष्य-देह धारण की और ऐसी लीलाएँ कीं, जिन्हें सुनकर लोग उनमें लग जाएँ। उद्धव, जो स्वयं ज्ञानी थे, गोपियों के प्रेम को देखकर कहते हैं कि वे वृंदावन की कोई झाड़ी या लता बनना चाहेंगे, ताकि इन गोपियों के चरणों की धूल उन पर पड़े।
मथुरा जाने के बाद कृष्ण उद्धव को अपना संदेश देकर व्रज भेजते हैं (अध्याय 46–47), और उद्धव गोपियों का प्रेम देखकर स्वयं उनके चरणों की धूल पाने की कामना करने लगते हैं। उत्तरार्ध में रुक्मिणी का प्रेम-पत्र और हरण (अध्याय 52–54), और कृष्ण के गरीब ब्राह्मण सखा की कथा (अध्याय 80–81) आती है, जो मुट्ठी भर चिउड़े लेकर द्वारका गए। ध्यान रहे, भागवत में इस सखा का नाम "सुदामा" नहीं आता; उसे केवल ब्राह्मण सखा कहा गया है। भागवत में "सुदामा" नाम मथुरा के एक माली का है। लोक-परंपरा ने उन्हें सुदामा नाम दिया।
एकादश स्कंध: उद्धव को उपदेश और अवधूत के 24 गुरु
ग्यारहवाँ स्कंध भागवत का दार्शनिक शिखर है। यदु-वंश के अंत का समय पास है, और कृष्ण अपने परम भक्त उद्धव को अंतिम उपदेश देते हैं। इस लंबे संवाद को परंपरा "उद्धव गीता" कहती है। इसमें ज्ञान, भक्ति, कर्म, वैराग्य, ध्यान और वर्णाश्रम-धर्म, सब पर भगवान का अंतिम वचन है, और भगवद्गीता के बाद इसे कृष्ण का दूसरा सबसे बड़ा उपदेश माना जाता है।
इसी स्कंध में एक बहुत प्रसिद्ध कथा है: राजा यदु ने एक युवा, निर्भय अवधूत को बच्चे की तरह आनंद से घूमते देखा, और पूछा कि यह बुद्धि आपको कहाँ से मिली। अवधूत ने कहा: "मेरे बहुत-से गुरु हैं", और चौबीस गुरु गिनाए: पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, मधु निकालने वाला, हिरण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनाने वाला, साँप, मकड़ी और भृंगी कीट। हर एक से उसने एक सीख ली: धरती से क्षमा, अजगर से संतोष, पिंगला से आशा छोड़ने की शांति।
इस कथा की सबसे गहरी सीख उससे पहले का एक वाक्य है: "मनुष्य का गुरु, विशेष रूप से, उसकी अपनी आत्मा ही है, क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान से वह स्वयं अपना कल्याण खोज लेता है।" यानी संसार की हर चीज़ गुरु बन सकती है, अगर देखने वाला जागा हुआ हो। ग्यारहवें स्कंध में एक और वचन भी बहुत प्रसिद्ध है: शरीर, वाणी, मन, इंद्रियों, बुद्धि या स्वभाव से जो कुछ भी करो, वह सब परम नारायण को अर्पित कर दो।
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्वभावात् । करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥शरीर से, वाणी से, मन से, इंद्रियों से, बुद्धि से, आत्मा से या अपने स्वभाव के अनुसार मनुष्य जो कुछ भी करे, वह सब "परम नारायण के लिए" कहकर उन्हें अर्पित कर दे।
द्वादश स्कंध: कलियुग, प्रलय और नाम-कीर्तन
बारहवाँ, अंतिम स्कंध कलियुग के राजाओं और कलियुग के स्वभाव का वर्णन करता है, फिर प्रलय के प्रकार, परीक्षित का अंत, वेदों और पुराणों का विभाजन, अठारह पुराणों की सूची और श्लोक-संख्या, और भागवत की अपनी महिमा। कलियुग का वर्णन विष्णु पुराण जैसा ही अंधकार भरा है, पर अंत में आशा भी वैसी ही है।
शुकदेव कहते हैं: "हे राजन्, दोषों के भंडार इस कलियुग में एक बड़ा गुण है: केवल कृष्ण के कीर्तन से मनुष्य आसक्ति से मुक्त होकर परम गति पा लेता है।" और फिर वही बात, जो विष्णु पुराण (6.2.17) में व्यास कहते हैं: सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में पूजा से जो फल मिलता था, वही कलियुग में हरि-कीर्तन से मिलता है। आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु जैसे संतों के कीर्तन-आंदोलन ने इसी विचार को अपना आधार बनाया।
रचना-काल और दो पुराने विवाद
परंपरा के अनुसार भागवत की रचना व्यास ने की, और यह स्वयं अपने बारे में यही कहता है। आधुनिक विद्वानों ने इसकी तिथि पर अलग-अलग मत दिए हैं; ज़्यादातर इसे विष्णु पुराण से बाद का मानते हैं, क्योंकि इसकी भाषा और शैली अधिक विकसित है। कोई एक तिथि सर्वमान्य नहीं है, इसलिए यहाँ कोई तारीख़ "तथ्य" के रूप में नहीं दी जा रही।
पहला पुराना विवाद रचयिता का था। Wilson लिखते हैं कि उनके समय के विद्वान Colebrooke, कुछ विद्वान पंडितों की राय के आधार पर, भागवत को व्याकरणाचार्य बोपदेव की रचना मानते थे, जो देवगिरि के राजा हेमाद्रि के दरबार में थे। Colonel Vans Kennedy ने इसका विरोध किया, क्योंकि लगभग हर पुराण की अठारह वाली सूची में भागवत का नाम है। Wilson स्वयं मानते थे कि बोपदेव वाली बात के पीछे परंपरा के सिवा कोई प्रमाण नहीं। यह 19वीं सदी का विवाद है; बाद के विद्वानों ने इस पर अलग मत रखे हैं।
दूसरा विवाद यह था कि अठारह महापुराणों में गिना जाने वाला "भागवत" कौन-सा है। मत्स्य पुराण भागवत की पहचान "गायत्री से आरंभ और वृत्रासुर-वध" से देता है, और कुछ लोगों का मत था कि यह पहचान देवी भागवत पर बैठती है। Wilson बताते हैं कि इस पर दोनों पक्षों में ग्रंथ लिखे गए। वैष्णव परंपरा श्रीमद्भागवत को महापुराण मानती है, और यही इस ज्ञानकोश की मुख्य सूची में है; देवी भागवत एक अलग ग्रंथ है, और दोनों को मिलाया नहीं जाना चाहिए।
टीकाएँ, संस्करण और अनुवाद
भागवत पर सबसे प्रसिद्ध टीका श्रीधर स्वामी की "भावार्थदीपिका" है, जो इतनी मान्य है कि भागवत के ज़्यादातर पुराने संस्करण इसी के साथ छपे। 1916 के आसपास टी. आर. कृष्णाचार्य ने निर्णयसागर प्रेस से श्रीधरी टीका सहित भागवत छापा, और बंगाल में 1894 में पंचानन तर्करत्न का संस्करण निकला।
यूरोप में भागवत का अनुवाद बहुत पहले शुरू हुआ। फ़्रांसीसी विद्वान Eugène Burnouf ने 1840 से भागवत के पहले स्कंधों का फ़्रेंच अनुवाद छापा, और बाद में Hauvette-Besnault ने दसवें स्कंध के अंश का। भारत में Manmatha Nath Dutt ने 1895 में इसका अंग्रेज़ी गद्य अनुवाद प्रकाशित किया।
भक्ति-परंपरा पर प्रभाव और आज का अर्थ
भारत की भक्ति-परंपरा पर किसी एक ग्रंथ का सबसे बड़ा प्रभाव शायद भागवत का है। वल्लभाचार्य, चैतन्य और उनके अनुयायियों की परंपराओं ने भागवत को अपना मुख्य ग्रंथ माना। सूरदास के पद, मीरा के भजन, रासलीला की परंपरा, और देश भर में होने वाली भागवत-सप्ताह कथाएँ: इन सबकी जड़ें भागवत के दसवें स्कंध में हैं। इस साइट के संत ज्ञानकोश में इनमें से कई संतों के पृष्ठ हैं।
आज के पाठक के लिए भागवत का संदेश उसकी शुरुआत में ही है: मृत्यु निश्चित है, समय कम है, तो उसे किसमें लगाएँ? परीक्षित के सात दिन हर मनुष्य के जीवन का प्रतीक हैं। भागवत का उत्तर है: भगवान की कथा, उनका नाम और उनसे प्रेम। और उसकी भक्ति किसी एक वर्ग की नहीं: उसमें असुर वृत्र भी भक्त है, हाथी गजेंद्र भी, पतित अजामिल भी, और ग्वालिन गोपियाँ भी।
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- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
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- अठारह महापुराणों की सूचियाँ — विष्णु, भागवत, मत्स्य, कूर्म, अग्नि, वराह और गरुड़ पुराण अठारह पुराणों के नाम और श्लोक-संख्या कैसे देते हैं, कहाँ वे मेल खाते हैं और कहाँ नहीं
- पुराण के पंच लक्षण — पुराण की सबसे पुरानी परिभाषा, भागवत के दस लक्षण, और यह सवाल कि आज के पुराण इस परिभाषा पर कितने खरे उतरते हैं
- भक्त प्रह्लाद — नवधा भक्ति और नरसिंह
- भक्त ध्रुव — चौथे स्कंध की कथा
- गजेंद्र — आठवें स्कंध का गजेंद्र मोक्ष
- राजा अंबरीष — द्वादशी-व्रत और सुदर्शन चक्र
- अजामिल — नाम की महिमा
- वृत्रासुर — असुर, जो भक्त था
- उद्धव — एकादश स्कंध के श्रोता
- कृष्ण के ब्राह्मण सखा (सुदामा) — दशम स्कंध 80–81
- राजा परीक्षित — भागवत के श्रोता
- शुकदेव — भागवत के वक्ता
- गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र — पूरा पाठ
स्रोत एवं संदर्भ
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 1.18.37, 1.19.25, 12.7.23, 12.13.4, 12.13.9, 1.1.4, 1.4.32–33, 1.5.2, 1.5.8, 1.7.8, 1.18.37, 1.19.25, 12.6.5, 12.6.11–16, स्कंध 1–12 (स्वयं गिनती), स्वयं गिनती; e-text की टिप्पणी, स्कंध 1, स्कंध 2, स्कंध 3, स्कंध 4, स्कंध 5, स्कंध 6, स्कंध 7, स्कंध 8, स्कंध 9, स्कंध 10, स्कंध 11, स्कंध 12, स्कंध 1–12, 2.10.1, 12.7.9–10, 2.10.1–7, 1.2.11, 1.3.28, 12.13.12, 3.23–3.33, 3.33, 4.8–4.12, 4.15–4.23, 5.4–5.6, 5.4.9, 5.8, 5.10.2–5, 6.1.24–27, 6.1–6.3, 6.9.51, 6.10.13, 6.11–6.12, 7.8.17–29, 7.5.23–24, 7.9–7.10, 8.2.1, 8.2.27–29, 8.3, 8.4.3, 8.4.7, 8.4.11, 8.5–8.12, 8.15–8.23, 8.24, 9.4.29, 9.4.35, 9.4–9.5, 9.4.28, 9.4.63, 9.5, 9.10–9.11, स्कंध 10 (स्वयं गिनती), 10.6, 10.7.8, 10.21, 10.24–10.25, 10.29–10.33, 10.29.1, 10.33, 10.47.61, 10.46–10.47, 10.52–10.54, 10.80–10.81, 10.41, 11.7.24–35, 11.7.20, 11.2.36, 12.1–12.3, 12.6–12.7, 12.13, 12.3.51–52, 1.19, 6.1–6.12, 8.2–8.4, 10.29–10.33, 2.10.1, 1.3.28, 7.5.23, 11.2.36
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.21, 2.13, 6.2.17
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- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, pp. xlvi–l, Preface, pp. xlvi–xlvii
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · भाग 1
- Shrimat Bhagabatam, pt. 1–12 — पञ्चानन तर्करत्न (सं.) (1894) · pt. 1–12
- Le Bhâgavata Purâṇa, ou Histoire poétique de Krichṇa, tomes 1–2 (स्कंध 1–6) — Eugène Burnouf (अनु.) (1840) · tome 1
- Le Bhâgavata Purâṇa, tome 4 (स्कंध 10 का अंश) — M. Hauvette-Besnault (अनु.) (1884) · tome 4
- A Prose English Translation of Srimadbhagabatam, Books VII–XII — Manmatha Nath Dutt (अनु.) (1895) · Books VII–XII
