उद्धव

कृष्ण के ज्ञानी सखा, जो गोपियों को समझाने गए और उनकी चरण-धूल माँगकर लौटे

संक्षेप में

उद्धव वृष्णि वंश के श्रेष्ठ मंत्री, बृहस्पति के शिष्य और श्रीकृष्ण के प्रिय सखा थे। कृष्ण ने उन्हें व्रज भेजा कि गोपियों को समझाएँ, पर गोपियों का प्रेम देखकर उद्धव ख़ुद कह उठे: काश, मैं वृंदावन की कोई झाड़ी या लता होता, जिस पर इनके चरणों की धूल पड़े।

श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

उद्धव — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.46.1–2; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10, पृ. 94 (scan leaf n191)
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवतश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 3.2; 10.46–10.47; 11.6–11.29

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत

उद्धव भागवत में तीन जगह मुख्य रूप से आते हैं: तीसरे स्कंध में, जहाँ वे विदुर को कृष्ण की बातें सुनाते हैं; दसवें स्कंध के छियालीसवें-सैंतालीसवें अध्याय में, जहाँ वे व्रज जाते हैं; और ग्यारहवें स्कंध में, जहाँ कृष्ण उन्हें अपना अंतिम उपदेश देते हैं, जिसे "उद्धव गीता" भी कहा जाता है।

पृष्ठभूमि

कौन थे

भागवत उन्हें वृष्णियों का श्रेष्ठ मंत्री, कृष्ण का प्रिय सखा, बृहस्पति का सीधा शिष्य और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ कहता है। कृष्ण उन्हें अपना एकनिष्ठ, सबसे प्रिय भक्त मानते थे।

उनकी भक्ति बचपन से थी। भागवत कहता है कि पाँच बरस की उम्र में भी वे खेल-खेल में कृष्ण की पूजा रचाते, और माँ सुबह नाश्ते के लिए बुलातीं तो नहीं जाते थे।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

उद्धव ज्ञानी थे, और व्रज भी ज्ञान का संदेश लेकर गए थे। पर वहाँ उन्होंने देखा कि जिस भगवान को मुनि और वे ख़ुद खोजते हैं, उसमें गोपियों का मन पूरी तरह लगा है; और उनका ज्ञान गोपियों के प्रेम के आगे झुक गया।

बरसों बाद, जब विदुर ने उनसे कृष्ण का समाचार पूछा, तो कृष्ण के चरणों की याद में वे कुछ देर बोल ही न सके, भक्ति के अमृत में डूबे चुप बैठे रहे।

प्रमुख कथाएँ

व्रज का संदेश

मूल ग्रंथ में

मथुरा में एक दिन कृष्ण ने उद्धव का हाथ पकड़कर कहा: सौम्य, व्रज जाओ; मेरे माता-पिता को प्रसन्न करो, और मेरे संदेश से गोपियों का विरह-दुख दूर करो। उनका मन मुझमें लगा है, प्राण मुझमें हैं, मेरे लिए उन्होंने सब छोड़ दिया; मेरी याद में वे बेसुध हो जाती हैं, और मेरे लौटने के संदेश के सहारे ही किसी तरह प्राण रखे हुए हैं।

उद्धव व्रज पहुँचे। लंबी बाँहों, कमल जैसी आँखों और पीताम्बर वाले, कृष्ण जैसे वेश वाले उस पुरुष को देखकर गोपियाँ चकित होकर उसे घेरकर खड़ी हो गईं: यह कौन है, कहाँ से आया है?

ज्ञानी का झुकना

मूल ग्रंथ में

उद्धव ने गोपियों से कहा: अहो, तुम धन्य हो, सारा संसार तुम्हें पूजे, क्योंकि तुम्हारा मन इस तरह भगवान वासुदेव को अर्पित है। दान, व्रत, तप, होम, जप, स्वाध्याय और संयम से लोग जो भक्ति पाना चाहते हैं, जो मुनियों को भी दुर्लभ है, वह तुम्हें मिली है। विरह में भी तुम्हारा सारा भाव उन्हीं में लगा है; यह दिखाकर तुमने मुझ पर बड़ी कृपा की है।

फिर उन्होंने कृष्ण का संदेश सुनाया: मुझसे तुम्हारा वियोग कभी नहीं, क्योंकि मैं सबका आत्मा हूँ, जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी सब प्राणियों में हैं। प्रिय पास हो तो मन उतना नहीं लगता, जितना दूर हो तब; इसलिए मैं दूर हूँ, कि तुम्हारा मन मुझमें और गहरा लगे।

कुछ महीने व्रज में रहकर उद्धव ने गोपियों का प्रेम देखा, और उनके मुँह से निकला: कहाँ ये वन में रहने वाली स्त्रियाँ, और कहाँ परमात्मा कृष्ण में इनका ऐसा गहरा भाव! काश, मैं वृंदावन की कोई झाड़ी, लता या जड़ी-बूटी होता, जिस पर इनके चरणों की धूल पड़े, जिन्होंने छोड़ने में कठिन अपने सगे-संबंधी और लोक-मर्यादा छोड़कर उस मुकुंद की राह पकड़ी, जिसे वेद भी खोजते हैं। मैं नंद के व्रज की इन स्त्रियों की चरण-धूल को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

लौटते समय नंद और गोपों ने आँसू भरी आँखों से कहा: हमारे मन की सारी वृत्तियाँ कृष्ण के चरणों में लगी रहें, वाणी उनके नाम लेती रहे, और शरीर उन्हें प्रणाम करता रहे; कर्मों के कारण जहाँ भी जन्म लें, कृष्ण में हमारी प्रीति बनी रहे।

अंतिम उपदेश और बदरिकाश्रम

मूल ग्रंथ में

यदुवंश के अंत से पहले कृष्ण ने उद्धव को लंबा उपदेश दिया, जो भागवत के ग्यारहवें स्कंध के बड़े हिस्से में है। उपदेश के अंत में उद्धव बोले: आपके सान्निध्य से मोह का अंधकार मिट गया; आपने मुझ सेवक को ज्ञान का दीपक दिया है; बस इतना सिखाइए कि आपके चरण-कमलों में मेरा प्रेम कभी न टूटे।

कृष्ण ने कहा: उद्धव, मेरे बदरी नाम के आश्रम जाओ; वहाँ अलकनंदा में स्नान करके, वल्कल पहनकर, वन के फल खाकर, संयम और शांति से, जो मैंने सिखाया उसका मनन करो; इसके बाद तुम मुझे पाओगे।

उद्धव ने परिक्रमा की, कृष्ण के चरणों पर सिर रखकर उन्हें आँसुओं से भिगो दिया। उस प्रेम को छोड़ना इतना कठिन था कि वे जा नहीं पा रहे थे; आख़िर प्रभु की पादुकाएँ सिर पर रखकर, बार-बार प्रणाम करते हुए, वे बदरिकाश्रम चले गए, और वहाँ तप करके भगवान को पाया।

भक्ति और शरणागति की सीख

ज्ञान से बड़ा प्रेम

उद्धव की कथा भागवत की एक बड़ी बात कहती है: बृहस्पति का शिष्य, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, व्रज की ग्वालिनों के प्रेम के आगे झुककर उनकी चरण-धूल माँगता है। उद्धव ख़ुद कहते हैं कि भगवान बिना जाने भजने वाले का भी उसी तरह कल्याण करते हैं, जैसे श्रेष्ठ औषधि बिना जाने खाने वाले का भी रोग हर लेती है।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

गोपियों से उद्धव

अहो यूयं स्म पूर्णार्था भवत्यो लोकपूजिताः। वासुदेवे भगवति यासामित्यर्पितं मनः॥

अहो, तुम्हारा जीवन सफल है, और तुम संसार की पूजा के योग्य हो, क्योंकि तुम्हारा मन इस तरह भगवान वासुदेव को अर्पित है।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 47, श्लोक 23

वृंदावन की लता बनने की चाह

आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥

अहो, मैं वृंदावन की कोई झाड़ी, लता या जड़ी-बूटी बन जाऊँ, जिस पर इन गोपियों के चरणों की धूल पड़ती हो; जिन्होंने छोड़ने में कठिन अपने सगे-संबंधी और लोक-मर्यादा छोड़कर उस मुकुंद की राह पकड़ी, जिसे वेद भी खोजते हैं।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 47, श्लोक 61

चरण-धूल को प्रणाम

वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः। यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम्॥

मैं नंद के व्रज की स्त्रियों की चरण-धूल को बार-बार प्रणाम करता हूँ, जिनका गाया हरि-कथा का गान तीनों लोकों को पवित्र करता है।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 47, श्लोक 63

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देवता

स्रोत

उद्धव — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न