राजा सुदर्शन

बचपन में राज्य से भागे राजकुमार, जिन्होंने अनजाने में देवी का बीज-मंत्र पाया और जीवन भर जपा

संक्षेप में

राजा सुदर्शन देवी भागवत पुराण के वह राजकुमार हैं, जिन्हें बचपन में माँ के साथ राज्य छोड़कर भागना पड़ा। ऋषि के आश्रम में खेलते हुए उन्होंने अनजाने ही देवी का बीज-मंत्र पकड़ लिया और जीवन भर जपा। स्वयंवर के बाद जब राजाओं ने उन्हें घेरा, तो देवी स्वयं प्रकट होकर उनकी रक्षा को आईं।

देवी के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

राजा सुदर्शन — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तदेवी भागवत पुराण (Vijnanananda अनु.), स्कंध 3, अध्याय 14, श्लोक 8–11, पृ. 175
कथा किस ग्रंथ मेंदेवी भागवत पुराणदेवी भागवत पुराण (Vijnanananda अनु.), स्कंध 3, अध्याय 14–25, श्लोक पूरे, पृ. 175–224; श्रीमद्देवीभागवत सटीक (खेमराज श्रीकृष्णदास, बंबई), स्कंध 3, अध्याय 17, folio 30 (scan leaf n218–n219), श्लोक 34–50

कथा किन ग्रंथों में है

देवी भागवत पुराण, तीसरा स्कंध

सुदर्शन की कथा देवी भागवत पुराण के तीसरे स्कंध में अध्याय 14 से 25 तक है, जिसे व्यास राजा जनमेजय को सुनाते हैं: पिता की मृत्यु, वनवास, बीज-मंत्र, शशिकला से विवाह, युद्ध में देवी का प्रकट होना, और अयोध्या में देवी की स्थापना।

पृष्ठभूमि

राजकुमार का बचपन

अयोध्या के धर्मात्मा राजा ध्रुवसन्धि की दो रानियाँ थीं, मनोरमा और लीलावती। मनोरमा से सुदर्शन जन्मे, और एक महीने बाद लीलावती से शत्रुजित। राजा पहले दोनों से बराबर स्नेह रखते थे, पर मीठा बोलने वाले शत्रुजित प्रजा और मंत्रियों को अधिक प्रिय हुए, और राजा भी सुदर्शन पर उतना स्नेह नहीं दिखा पाते थे।

एक दिन शिकार में सिंह से लड़ते हुए राजा मारे गए। वसिष्ठ और मंत्री बड़े पुत्र सुदर्शन को राजा बनाना चाहते थे, पर लीलावती के पिता, उज्जयिनी के राजा युधाजित, अपने नाती शत्रुजित के लिए अड़ गए। मनोरमा के पिता, कलिंग के राजा वीरसेन, सुदर्शन के पक्ष में आए; युद्ध हुआ और युधाजित ने वीरसेन को मार डाला।

डरी हुई मनोरमा बेटे और मंत्री विदल्ल के साथ नगर से निकल गईं। गंगा के किनारे निषाद लुटेरों ने रथ और धन सब छीन लिया; केवल पहने हुए कपड़े बचे। गंगा पार करके वे चित्रकूट पर्वत पर भरद्वाज ऋषि के आश्रम पहुँचीं। युधाजित वहाँ भी सुदर्शन को मारने आया, पर ऋषि ने उन्हें सौंपने से मना कर दिया, और मंत्री के समझाने पर युधाजित लौट गया।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

सुदर्शन की भक्ति किसी विधि से शुरू नहीं हुई। पाँच वर्ष के बालक ने देवी का एक-अक्षर बीज-मंत्र पाया, बिना ऋषि, छंद, ध्यान या न्यास जाने, और उसे सार मानकर मन-ही-मन सदा जपता रहा, कभी भूला नहीं। व्यास कहते हैं कि वन में रहते हुए भी देवी के ध्यान से उन्हें राज्य पाने से बड़ा सुख मिला।

प्रमुख कथाएँ

"क्ली": अनजाने में मिला मंत्र

मूल ग्रंथ में

आश्रम में सुदर्शन मुनि-बालकों के साथ खेलते-कूदते बड़े हो रहे थे। एक दिन मंत्री विदल्ल वहाँ आए, तो एक मुनि-पुत्र ने हँसी में उन्हें "क्लीब" कहकर पुकारा। बालक सुदर्शन ने उसका पहला अक्षर "क्ली" पकड़ लिया और बार-बार दोहराने लगा। व्यास कहते हैं कि अनुस्वार के बिना यही कामराज नाम का बीज-मंत्र है, और बालक उसे आदर से मन में रखकर जपने लगा।

ग्यारह वर्ष की आयु में मुनि ने उनका यज्ञोपवीत करके वेद पढ़ाए, और उसी मंत्र के बल से वे थोड़े ही समय में धनुर्वेद और नीति-शास्त्र में निपुण हो गए। एक दिन उन्हें लाल वस्त्र और लाल आभूषण पहने, गरुड़ पर बैठी वैष्णवी शक्ति के रूप में देवी के प्रत्यक्ष दर्शन हुए, और वन में देवी ने ही उन्हें धनुष, तीखे बाण, तरकश और कवच दिए।

शशिकला और स्वयंवर

मूल ग्रंथ में

काशी के राजा सुबाहु की बेटी शशिकला ने भाटों से वन में रहने वाले सुंदर राजकुमार सुदर्शन के बारे में सुना और मन में उन्हीं को पति चुन लिया। एक रात सपने में देवी ने उससे कहा: वर माँगो; सुदर्शन मेरा भक्त है, मेरे कहने से वह तुम्हारी सब इच्छा पूरी करेगा।

माता-पिता ने समझाया कि सुदर्शन राज्यहीन, धनहीन और वनवासी है, और युधाजित उसे मारना चाहता है; पर शशिकला ने कहा कि सपने में देवी ने स्वयं उसे मेरा पति ठहराया है, और मैं दूसरे को नहीं चुनूँगी। उसने एक ब्राह्मण से चुपके से सुदर्शन को स्वयंवर में आने का संदेश भेजा।

माँ मनोरमा ने काँपते हुए रोका कि वहाँ सब शत्रु होंगे। सुदर्शन ने कहा: जो होना है वह होगा; मैं जगन्माता की आज्ञा से जा रहा हूँ, और भगवती की कृपा से मुझे किसी का डर नहीं। तब मनोरमा ने देवी के नाम ले-लेकर आशीर्वाद दिया: अम्बिका आगे से रक्षा करें, पार्वती दोनों ओर से, दुर्गा किलों में, कालिका भयंकर युद्ध में, और महामाया भुवनेश्वरी हर जगह, हर समय।

स्वयंवर-सभा में युधाजित ने खुलकर कहा कि वह सुदर्शन को मार डालेगा। राजाओं के बीच सुदर्शन शांत रहे और बोले: मुझे युधाजित से ज़रा भी डर नहीं; मैं रोज़ जगत की माता भगवती का स्मरण करता हूँ, वही मेरा भला देखेंगी। मेरा मन पूरी तरह उन्हीं को अर्पित है, और युधाजित से मेरा कोई वैर नहीं।

युद्ध में देवी का प्रकट होना

मूल ग्रंथ में

शशिकला सभा में नहीं आई; राजा सुबाहु ने रात में चुपचाप विधि से उसका विवाह सुदर्शन से कर दिया। सुबह यह जानकर क्रोधित राजाओं ने सुदर्शन का रास्ता रोक लिया। सुदर्शन ने पूरे मन से देवी की शरण ली और वही एक-अक्षर बीज-मंत्र जपते रहे; उसके प्रभाव से वे और उनकी पत्नी रथ में निडर बैठे रहे।

युद्ध भयंकर हुआ, तब सिंह पर सवार, दिव्य आभूषण और अस्त्र धारण किए भगवती अचानक वहाँ प्रकट हुईं। सुदर्शन ने सुबाहु से कहा: देखिए, दयालु महादेवी हम पर कृपा करने आई हैं, अब मैं पूरी तरह निडर हूँ। युधाजित ने बाण चलाए; चण्डिका ने अनेक रूप धरकर युद्ध किया, और युधाजित और शत्रुजित दोनों मारे गए।

बाद में राजाओं ने पूछा कि बचपन में वन चले गए तुमने इस देवी को कैसे जाना? सुदर्शन ने कहा: बचपन में ही मुझे कामराज बीज-मंत्र मिला, जिसे मैं रोज़ ध्यान से जपता रहा; उसी से मैंने उन सनातन मंगलमयी माता को जाना, और तब से दिन-रात भक्ति से उन्हीं का स्मरण करता हूँ।

अयोध्या में लौटना

मूल ग्रंथ में

अयोध्या पहुँचकर सुदर्शन ने सबसे पहले शत्रुजित की माँ लीलावती को प्रणाम किया और कहा: माँ, आपके बेटे और पिता को मैंने नहीं मारा, देवी दुर्गा ने मारा है। आप मेरे लिए मेरी माँ मनोरमा जैसी हैं, मैं आपका सेवक हूँ। वनवास में मुझे दुख नहीं हुआ, और आज धन आने पर सुख भी नहीं; मेरे मन में किसी के लिए ईर्ष्या नहीं। लीलावती ने आँसू भरकर उन्हें बेटा कहा और धर्म से राज करने का आशीर्वाद दिया।

फिर सुदर्शन ने शुभ मुहूर्त में देवी दुर्गा की मूर्ति स्वर्ण-सिंहासन पर स्थापित की, और कहा कि पहले देवी को सिंहासन पर बिठाऊँगा, फिर राम जैसे राजाओं की तरह राज करूँगा। उनके राज में कोसल के गाँव-गाँव में देवी के मंदिर बने, और उधर काशी में राजा सुबाहु ने भी देवी की स्थापना की।

भक्ति और शरणागति की सीख

भय की जगह भरोसा

सुदर्शन के पास न सेना थी, न धन, न सहायक। स्वयंवर में जाने से पहले, सभा में और युद्ध में, हर बार उनका उत्तर एक था: जो होना है वह होगा, मैं भगवती का स्मरण करता हूँ और वही रक्षा करेंगी। उनका भरोसा डर को दबाना नहीं था, बल्कि शत्रु के प्रति भी वैर न रखना था।

विधि से अधिक श्रद्धा: बालक सुदर्शन ने मंत्र बिना किसी विधि के पाया, फिर भी सदा जपा। व्यास यह भी कहते हैं कि जो पवित्र और शांत होकर सच्चे गुरु से यह मंत्र पाकर निरंतर ध्यान करे, उसकी इच्छाएँ पूरी होती हैं। कथा दोनों बातें कहती है, और पृष्ठ भी दोनों को साथ रखता है।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

एक अक्षर का मंत्र

सुदर्शनस्तु तच्छ्रुत्वा दधारैकाक्षरं स्फुटम्। अनुस्वारायुतं तच्च प्रोवाचातिपुनः पुनः॥ बीजं वै कामराजाख्यं गृहीतं मनसा तदा। जजाप बालकोऽत्यर्थं धृत्वा चेतसि सादरम्॥

यह सुनकर सुदर्शन ने एक अक्षर साफ़-साफ़ पकड़ लिया, और अनुस्वार के बिना ही उसे बार-बार बोलने लगा। इस तरह मन में कामराज नाम का बीज-मंत्र आ गया, और बालक उसे आदर से चित्त में रखकर बहुत जपने लगा।

देवी भागवत पुराण, स्कंध 3, अध्याय 17, श्लोक 35–36

"सुदर्शन मेरा भक्त है"

वरं वरय सुश्रोणि मम भक्तः सुदर्शनः। सर्वकामप्रदस्तेऽस्तु वचनान्मम भामिनि॥

सपने में देवी ने शशिकला से कहा: हे सुंदरी, वर माँगो। सुदर्शन मेरा भक्त है; मेरे वचन से वह तुम्हारी सब इच्छाएँ पूरी करने वाला हो।

देवी भागवत पुराण, स्कंध 3, अध्याय 17, श्लोक 50

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स्रोत

राजा सुदर्शन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न