विभीषण
रावण का धर्मात्मा भाई, जो सब छोड़कर राम की शरण आया, और राम ने कहा: शरण आए को अभय देना मेरा व्रत है
संक्षेप में
विभीषण रावण के छोटे भाई थे, जिन्होंने बार-बार रावण को सीता लौटाने की सलाह दी। अपमानित होकर वे लंका, मित्र और धन छोड़कर राम की शरण आए। सुग्रीव को शक था, पर राम ने कहा: जो एक बार भी शरण आकर कहे "मैं तुम्हारा हूँ", उसे सब प्राणियों से अभय देना मेरा व्रत है।
श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 6.11.10; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 2 (कृष्णाचार्य सं.), युद्धकाण्ड, सर्ग 18–19, पृ. 126 (scan leaf n141) |
| कथा किस ग्रंथ में | वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 6.10–6.13; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), सुन्दरकाण्ड, दोहा 45–47, पृ. 316 (scan leaf n326) |
कथा किन ग्रंथों में है
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस
विभीषण की शरणागति वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के आरंभिक सर्गों में है, और रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड के अंत में।
पृष्ठभूमि
रावण को सलाह
विभीषण ने रावण को समझाया कि सीता राम को लौटा दो। रावण ने उन्हें कुल-कलंक कहकर धिक्कारा: कोई और ऐसा कहता तो इसी घड़ी मर जाता। तब विभीषण गदा लेकर चार साथियों के साथ आकाश में उठे और बोले: राजन, तुम मेरे भाई हो, जो चाहो कहो; पर हित की बात कोई नहीं सुनता। मीठा बोलने वाले बहुत मिलते हैं, अप्रिय पर हितकारी बात कहने और सुनने वाले दुर्लभ हैं। तुम्हारा कल्याण हो, मैं जाता हूँ।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
राम के पैरों में गिरकर विभीषण ने कहा: मैं रावण का छोटा भाई हूँ, उसने मेरा अपमान किया है; आप सब प्राणियों के शरणदाता हैं, मैं आपकी शरण आया हूँ। लंका, मित्र, धन, सब छोड़ आया हूँ; मेरा राज्य, जीवन और सुख, अब सब आपके हाथ है।
रामचरितमानस में विभीषण दूर से ही दोनों भाइयों को देखकर ठिठक जाते हैं, आँखों में आँसू और रोम-रोम पुलकित; और कहते हैं: नाथ, मैं दशानन का भाई हूँ, राक्षस वंश में जन्मा; आपका यश सुनकर आया हूँ, हे भव-भय मिटाने वाले, मेरी रक्षा कीजिए। राम उठकर उन्हें हृदय से लगा लेते हैं।
प्रमुख कथाएँ
राम की शरण
मूल ग्रंथ मेंसमुद्र के उत्तरी तट पर आकाश में खड़े विभीषण ने कहा: मैं दुष्ट राक्षस-राज रावण का छोटा भाई विभीषण हूँ; उसने जटायु को मारकर सीता को हरा है, और मैंने उसे बार-बार समझाया कि सीता राम को लौटा दो। सुग्रीव ने शंका की कि यह हमें मारने आया है, और वानर पेड़-चट्टानें उठाकर तैयार हो गए।
राम ने कहा: जो मित्र-भाव से आया है, उसे मैं कभी नहीं छोड़ूँगा, चाहे उसमें दोष हो। वह दुष्ट हो या न हो, मेरा ज़रा भी अहित नहीं कर सकता। कबूतर ने भी अपनी पत्नी को हरने वाले शरणागत शत्रु का सत्कार किया था, तो मुझ जैसे का क्या कहना? ऋषि कण्डु कहते हैं कि हाथ जोड़कर शरण माँगने वाले शत्रु को भी नहीं मारना चाहिए; शरणागत की रक्षा न करना बड़ा पाप है।
और फिर राम का व्रत: जो एक बार भी शरण आकर "मैं तुम्हारा हूँ" कहकर माँगे, उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ। हे हरिश्रेष्ठ, उसे ले आओ; मैंने उसे अभय दे दिया है, वह विभीषण हो या स्वयं रावण।
अभय पाकर विभीषण अपने साथियों सहित धरती पर उतरे और राम के चरणों में गिर पड़े। राम ने उन्हें गले लगाया, लक्ष्मण से समुद्र का जल मँगवाया, और वानरों के बीच विभीषण का राक्षसों के राजा के रूप में अभिषेक करवाया; सब वानर "साधु, साधु" कह उठे।
ग्रंथों में अंतर
दक्षिण भारत की प्रतियों (कृष्णाचार्य संस्करण, 1905) में शरण के तुरंत बाद राम विभीषण से रावण की सेना का बल पूछते हैं, और रावण को मारकर उन्हें राजा बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं; समीक्षित पाठ में राम उसी समय उनका अभिषेक करवाते हैं।
भक्ति और शरणागति की सीख
शरणागति
विभीषण की कथा भक्ति में शरणागति का सबसे बड़ा उदाहरण है: शरण लेने वाले के पास न सेना थी, न राज्य; केवल "मैं आपका हूँ" का भाव था। और राम ने उसकी जाति, कुल या शत्रु का भाई होने पर विचार नहीं किया; कहा कि शरण आए की रक्षा उनका व्रत है।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
राम का शरणागति-व्रत
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम॥जो एक बार भी मेरी शरण आकर कहे "मैं तुम्हारा हूँ", उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ; यह मेरा व्रत है।
मानस: यश सुनकर आया हूँ
श्रवन सुजस सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥हे प्रभु, आपका सुंदर यश कानों से सुनकर आया हूँ, कि आप संसार का भय मिटाने वाले हैं। हे दुख हरने वाले, शरण आए को सुख देने वाले रघुवीर, मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।
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देवता
- श्री राम — भगवान राम के पाठ और आरती
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · 6.10–6.13
- Srimad Valmiki Ramayana, According to the Southern Readings, with footnotes, vol. II (सुन्दर, युद्ध काण्ड) — T. R. Krishnacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1905) · युद्धकाण्ड, सर्ग 18–19, पृ. 126 (scan leaf n141)
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · सुन्दरकाण्ड, दोहा 45–47, पृ. 316 (scan leaf n326)
