निषादराज गुह
शृंगवेरपुर के निषाद राजा, जिन्हें राम ने "अपने समान प्रिय सखा" कहा
संक्षेप में
गुह गंगा के तट पर शृंगवेरपुर के निषादों के राजा थे, जिन्हें वाल्मीकि राम का "अपने समान प्रिय सखा" कहते हैं। वनवास की पहली रात उन्होंने धनुष लेकर राम की रखवाली की, और सुबह नाव से उन्हें गंगा पार कराई। लंका से लौटते समय राम ने हनुमान को सबसे पहले गुह के पास कुशल-समाचार देने भेजा।
श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.44.9–10; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 1 (कृष्णाचार्य सं.), अयोध्याकाण्ड, पृ. 151 (scan leaf n164) |
| कथा किस ग्रंथ में | वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.44–2.46; 2.78–2.81; 6.113; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अयोध्याकाण्ड, दोहा 87–89, पृ. 173 (scan leaf n185) |
| कथा में साथ | केवट | रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अयोध्याकाण्ड, दोहा 102–103, पृ. 178 (scan leaf n190) |
कथा किन ग्रंथों में है
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस
गुह वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में दो बार आते हैं: वन जाते राम का स्वागत करते हुए, और राम को लौटाने जाते भरत के मार्गदर्शक बनकर; युद्धकाण्ड में राम लौटते हुए उन्हें याद करते हैं। रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास उन्हें "गुह निषाद" कहते हैं।
पृष्ठभूमि
कौन थे
वाल्मीकि बताते हैं कि गुह निषाद जाति के बलवान राजा और अपने लोगों के प्रसिद्ध स्थपति (मुखिया) थे, और राम के अपने समान प्रिय सखा। राम के अपने राज्य में आने की बात सुनकर वे बूढ़े मंत्रियों और बंधुओं के साथ उनसे मिलने आए।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
गुह की भक्ति सखा की है। उन्होंने लक्ष्मण से शपथ लेकर कहा: इस धरती पर मुझे राम से अधिक प्रिय कोई नहीं, मैं सच कहता हूँ और सत्य की शपथ लेता हूँ; इन्हीं की कृपा से मैं इस लोक में यश, धर्म और अर्थ पाने की आशा रखता हूँ।
मानस में गुह राम के आगे दंडवत करके कहते हैं: आपके चरण-कमल देखकर मैं भाग्यवान हो गया; हे देव, यह धरती, धन, घर सब आपका है, मैं तो परिवार सहित आपका सेवक हूँ। और राम के वनवास का कारण सुनकर दुखी हो जाते हैं कि अब चौदह बरस राम गाँव में नहीं रहेंगे।
प्रमुख कथाएँ
गंगा-तट की रात
मूल ग्रंथ मेंगुह ने राम को गले लगाकर कहा: जैसी अयोध्या, वैसा ही यह राज्य आपका है; बताइए क्या करूँ? और तरह-तरह का भोजन, अर्घ्य और सुंदर बिछौने ले आए: यह सारी धरती आपकी है, हम सेवक हैं, आप स्वामी, राज कीजिए। राम ने उन्हें प्रेम से भुजाओं में भरकर कहा: तुम्हारा यह स्नेह ही मेरा पूरा सत्कार है; पर मैं अब वल्कल पहनने और फल-मूल खाने वाला तपस्वी हूँ, कुछ लेता नहीं; बस मेरे पिता के प्रिय घोड़ों को चारा-पानी दे दो।
उस रात राम ने लक्ष्मण का लाया केवल जल पिया और सीता के साथ धरती पर सो गए। लक्ष्मण उनकी रखवाली में जागते रहे, और धनुष लिए गुह भी लक्ष्मण से बातें करते हुए पूरी रात जागे। गुह ने लक्ष्मण से कहा कि तुम सो जाओ, हम सब अपने बंधुओं के साथ राम की रक्षा करेंगे; पर लक्ष्मण ने कहा कि जब राम सीता के साथ धरती पर सो रहे हों, तो मुझे नींद कैसे आए।
सुबह राम के कहने पर गुह ने नाव मँगवाई और अपने लोगों को उसे खेने का आदेश दिया। विदा लेते हुए राम ने गुह से कहा: अपनी सेना, कोष, किले और प्रजा की सावधानी से रक्षा करना, क्योंकि राज्य को सँभालना सबसे कठिन है। फिर सीता, राम और लक्ष्मण नाव से गंगा पार गए।
भरत से भेंट
मूल ग्रंथ मेंकुछ दिन बाद भरत की विशाल सेना गंगा तट पर आई, तो गुह को शक हुआ कि भरत राम को मारने तो नहीं जा रहे। उन्होंने अपने लोगों से कहा: राम मेरे स्वामी भी हैं और सखा भी; उनकी भलाई के लिए तैयार रहो, सौ-सौ नावों में हथियारबंद युवक तैयार रहें; भरत राम के प्रति शुद्ध मन से हों, तभी यह सेना गंगा पार करेगी।
फिर गुह भेंट लेकर भरत से मिले, और सीधे पूछा: कहीं तुम राम के प्रति बुरे इरादे से तो नहीं जा रहे? तुम्हारी इतनी बड़ी सेना देखकर मन में शंका होती है। भरत ने कहा: राम मेरे बड़े भाई, पिता के समान हैं; मैं उन्हें लौटाने जा रहा हूँ। यह सुनकर गुह प्रसन्न होकर बोले: तुम धन्य हो, बिना प्रयास मिले राज्य को छोड़ना चाहते हो, तुम्हारे जैसा मैं संसार में कोई नहीं देखता।
भरत के पूछने पर गुह ने बताया कि राम ने कहाँ और कैसे रात बिताई: उन्होंने मेरा लाया कोई भोजन नहीं लिया, कहा कि हमें लेना नहीं, सदा देना है; केवल जल पीकर, कुशा के बिछौने पर सीता के साथ सोए, और लक्ष्मण ने उनके पैर धोए। यह सुनकर भरत शोक से गिर पड़े।
लौटते हुए राम की याद
मूल ग्रंथ मेंलंका से अयोध्या लौटते हुए राम ने हनुमान से कहा: शृंगवेरपुर जाकर वन में रहने वाले निषादराज गुह से मेरी कुशल कहना; मुझे सकुशल और निरोग सुनकर मेरा वह अपने समान प्रिय सखा प्रसन्न होगा, और वही तुम्हें अयोध्या का रास्ता और भरत का समाचार बताएगा।
भक्ति और शरणागति की सीख
राम का सखा
गुह की कथा में राम अपना सबसे बड़ा सम्मान एक वनवासी राजा को देते हैं: वाल्मीकि उन्हें बार-बार राम का "आत्मसम सखा", अपने समान प्रिय मित्र कहते हैं, और गुह के लिए राम से प्रिय इस धरती पर कोई नहीं। सच्ची मित्रता ने ही उन्हें भरत पर शक करने और फिर उन्हें गले लगाने, दोनों का साहस दिया।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
राम से प्रिय कोई नहीं
न हि रामात्प्रियतरो ममास्ति भुवि कश्चन।
ब्रवीम्येतदहं सत्यं सत्येनैव च ते शपे॥इस धरती पर मुझे राम से अधिक प्रिय कोई नहीं। मैं तुमसे यह सच कहता हूँ, और सत्य की ही शपथ लेता हूँ।
मानस: सब कुछ आपका
नाथ कुसल पद पंकज देखे। भयउँ भाग भाजन जन लेखे॥
देव धरनि धन धाम तुम्हारा। मैं जन नीच सहित परिवारा॥हे नाथ, आपके चरण-कमलों के दर्शन से ही सब कुशल है; मैं भाग्यशाली लोगों में गिना जाने लगा। हे देव, यह धरती, धन और घर सब आपका है; मैं तो परिवार सहित आपका छोटा-सा सेवक हूँ।
संबंधित भक्त
- केवट — कथा में साथ
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देवता
- श्री राम — भगवान राम के पाठ और आरती
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · 2.44–2.46; 2.78–2.81; 6.113
- Srimad Valmiki Ramayana, According to the Southern Readings, with footnotes, vol. I (बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा काण्ड) — T. R. Krishnacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1905) · अयोध्याकाण्ड, सर्ग 50–52, पृ. 151–152 (scan leaf n164–n165)
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · अयोध्याकाण्ड, दोहा 87–89, 103, पृ. 173, 178 (scan leaf n185, n190)
