अंगद

बाली के पुत्र, जो राम के दूत बनकर रावण की सभा में गए, और लौटकर राम के चरण पकड़ लिए

संक्षेप में

अंगद वानर-राज बाली और तारा के पुत्र थे, जिन्हें राम ने युद्ध से पहले अपना दूत बनाकर रावण के पास भेजा। उन्होंने रावण की सभा में राम का संदेश बिना घटाए-बढ़ाए सुनाया। रामचरितमानस में वे सभा में पैर जमा देते हैं, कोई उसे हिला नहीं पाता, और वे रावण से कहते हैं: मेरे नहीं, राम के चरण पकड़।

श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त

एक नज़र में

अंगद — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण-महाभारत के भक्तवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 6.31.49, 66; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 2 (कृष्णाचार्य सं.), युद्धकाण्ड, सर्ग 41, पृ. 157 (scan leaf n172)
कथा किस ग्रंथ मेंवाल्मीकि रामायण, रामचरितमानसवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 6.31.48–80; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), लंकाकाण्ड, दोहा 34–35, पृ. 337 (scan leaf n347)

कथा किन ग्रंथों में है

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस

अंगद का दूत-कर्म वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में है, जब राम की सेना लंका को घेर लेती है। रामचरितमानस के लंकाकाण्ड में तुलसीदास इसी प्रसंग को लंबे संवाद और पैर जमाने की कथा के साथ कहते हैं।

पृष्ठभूमि

राम का दूत

विभीषण की सलाह से और राजधर्म याद करके, राम ने बाली के पुत्र अंगद को बुलाकर कहा: सौम्य, लंका जाकर निडर होकर रावण से मेरी ओर से कहो: यदि सीता को लौटाकर मेरी शरण नहीं आओगे, तो यह लोक राक्षसों से ख़ाली कर दूँगा; और धर्मात्मा विभीषण लंका का राजा होगा।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

अंगद की भक्ति दूत की निष्ठा में है: वाल्मीकि कहते हैं कि उन्होंने राम का पूरा संदेश बिना एक शब्द घटाए-बढ़ाए रावण और उसके मंत्रियों को सुनाया, और अपना परिचय ऐसे दिया: मैं अक्लिष्ट-कर्मा कोसलेन्द्र राम का दूत, बाली का पुत्र अंगद हूँ।

रामचरितमानस में रावण के बल को हराकर लौटे अंगद का शरीर पुलकित था, आँखों में आँसू, और उन्होंने राम के चरण-कमल पकड़ लिए।

प्रमुख कथाएँ

रावण की सभा में

मूल ग्रंथ में

अंगद आकाश से उड़कर रावण के महल पहुँचे और राम का संदेश सुनाया: निकलकर युद्ध करो; मैं तुम्हें मंत्रियों, पुत्रों और बंधुओं सहित मारूँगा, और विभीषण राजा होंगे; यदि आदर से सीता को प्रणाम करके लौटा न दो।

क्रुद्ध रावण ने कहा: इसे पकड़ो, मार डालो। चार राक्षसों ने अंगद को पकड़ा; अपना बल दिखाने के लिए अंगद ने ख़ुद पकड़े जाने दिया, फिर उन्हें भुजाओं में दबाए महल के ऊपर उछले, और वे राक्षस धरती पर गिर पड़े। फिर अंगद के पैर रखते ही रावण के देखते-देखते उसके महल का पर्वत जैसा शिखर टूट गया; अपना नाम सुनाकर, गरजते हुए अंगद राम के पास लौट आए।

मानस में पैर जमाना

बाद के ग्रंथ में

रामचरितमानस में अंगद सभा में पैर जमा देते हैं, और करोड़ों मेघनाद जैसे योद्धा उठकर भी उसे हिला नहीं पाते; तुलसीदास कहते हैं: जैसे करोड़ों विघ्नों से भी संत का मन नीति नहीं छोड़ता। तब रावण ख़ुद उठा, और पैर पकड़ने लगा; अंगद बोले: मेरे पैर पकड़ने से तेरा उद्धार नहीं होगा, मूर्ख, जाकर राम के चरण क्यों नहीं पकड़ता?

भक्ति और शरणागति की सीख

दूत की मर्यादा

अंगद ने शत्रु की सभा में भी राम का संदेश ज्यों का त्यों पहुँचाया, और अपना बल केवल तब दिखाया, जब उन्हें पकड़ने की कोशिश हुई। मानस में उनका उत्तर भक्ति का सार है: बचना है तो राम के चरण पकड़ो।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

मैं राम का दूत हूँ

दूतोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः। वालिपुत्रोऽङ्गदो नाम यदि ते श्रोत्रमागतः॥

मैं अनथक कर्म करने वाले कोसलराज राम का दूत, बाली का पुत्र अंगद हूँ, यदि मेरा नाम तुम्हारे कानों तक पहुँचा हो।

वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड, समीक्षित पाठ 6.31.66

मानस: राम के चरण पकड़

गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहे न तोर उबारा॥ गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥

रावण पैर पकड़ने लगा, तो बाली के पुत्र अंगद बोले: मेरे पैर पकड़ने से तेरा उद्धार नहीं होगा; मूर्ख, जाकर राम के चरण क्यों नहीं पकड़ता? यह सुनकर रावण मन में बहुत लज्जित होकर लौट गया।

रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, दोहा 34 के बाद की चौपाई

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देवता

स्रोत

अंगद — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न