सुग्रीव
अग्नि को साक्षी मानकर राम के सखा बने वानर-राज, जिन्होंने भूल मानकर कहा: सीता को राम अपने तेज से पाएँगे
संक्षेप में
सुग्रीव वानरों के राजा, बाली के छोटे भाई थे, जिन्होंने अग्नि को साक्षी मानकर राम से मित्रता की। राज्य मिलने के बाद वे सुख में राम का काम भूल गए, पर लक्ष्मण के आने पर भूल मानी और कहा: मेरा खोया राज्य राम की कृपा से मिला है; सीता को राम अपने तेज से पाएँगे, मैं तो केवल सहायक हूँ।
श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 4.5.10–16; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 1 (कृष्णाचार्य सं.), किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 5, पृ. 330 (scan leaf n343) |
| कथा किस ग्रंथ में | वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 4.5; 4.29; 4.35; 4.37; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 4–5, पृ. 286 (scan leaf n298); रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 17–21, पृ. 292–293 (scan leaf n300–n301) |
कथा किन ग्रंथों में है
वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड
सुग्रीव की कथा वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड में है: राम से मित्रता, बाली-वध के बाद राज्य, वर्षा ऋतु की देरी, और फिर सीता की खोज के लिए वानरों को भेजना। युद्धकाण्ड में वे पूरी सेना के राजा के रूप में राम के साथ लड़ते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में भी यही कथा है: अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता, और वर्षा के बाद की भूल। पर भूल का प्रसंग मानस में कुछ अलग ढंग से चलता है, जो नीचे "ग्रंथों में अंतर" में है।
पृष्ठभूमि
राम से मित्रता
हनुमान से राम के गुण सुनकर सुग्रीव ने मनुष्य का रूप धरकर राम से कहा: आप धर्म में विनीत, पराक्रमी और सब पर स्नेह करने वाले हैं; आप मुझ वानर से मित्रता चाहते हैं, यह मेरा सम्मान और सबसे बड़ा लाभ है। मित्रता अच्छी लगे, तो यह मेरा हाथ है; हाथ पकड़कर पक्की मर्यादा बाँध लीजिए।
राम ने प्रसन्न होकर उनका हाथ दबाया और गले लगा लिया। हनुमान ने लकड़ियों से आग जलाई, फूलों से पूजकर दोनों के बीच रखी; और सुग्रीव और राम ने उस जलती अग्नि की परिक्रमा करके मित्रता की। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, और तृप्त नहीं हुए।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
सुग्रीव की भक्ति एक साधारण मनुष्य जैसी है: उनसे भूल होती है, और वे उसे मानते हैं। लक्ष्मण के सामने उन्होंने कहा: मेरी खोई लक्ष्मी, कीर्ति और वानरों का राज्य, सब राम की कृपा से मुझे फिर मिला है। अपने काम से प्रसिद्ध उन देव के उपकार का बदला कौन चुका सकता है? मुझ सेवक से विश्वास या प्रेम में कोई चूक हुई हो, तो क्षमा करें; भूल किससे नहीं होती?
मानस में मित्रता होते ही सुग्रीव आँसू भरकर राम से कहते हैं: नाथ, मिथिलेश-कुमारी मिलेंगी। मैंने उन्हें आकाश-मार्ग से जाते, "राम राम हा राम" पुकारते देखा था, और उन्होंने हमें देखकर वस्त्र गिराया था। सोच छोड़कर धीरज रखिए; जिस तरह जानकी मिलें, मैं हर प्रकार से वही सेवा करूँगा।
प्रमुख कथाएँ
भूल और क्षमा
मूल ग्रंथ मेंबाली-वध के बाद सुग्रीव राजा बने, और वर्षा के चार महीने राम ने पर्वत पर बिताए। वर्षा बीतने पर आकाश साफ़ हुआ, शरद की चाँदनी फैली, पर सुग्रीव सुख-भोग में डूबे रहे; यह देखकर, और खोई सीता को याद करके, राम दुख से मूर्छित हो गए।
तब लक्ष्मण क्रोध में किष्किन्धा गए। तारा ने उन्हें धर्म भरी बातों से शांत किया, और सुग्रीव का डर ऐसे उतर गया, जैसे गीला कपड़ा। उन्होंने गले की माला तोड़ दी, मद छोड़ा, और विनम्र होकर कहा: धर्मात्मा राम अपने तेज से सीता को पाएँगे और रावण को मारेंगे, मैं तो केवल सहायक हूँ; जिन्होंने एक बाण से सात बड़े पेड़, पर्वत और धरती को भेद दिया, उन्हें सहायकों की क्या ज़रूरत? फिर भी रावण को मारने जाते राम के पीछे मैं चलूँगा।
यह सुनकर लक्ष्मण प्रसन्न हुए। सुग्रीव ने देश भर से वानरों को बुलवाया, लक्ष्मण से कहा कि अब मुझे आपकी आज्ञा में रहना है, और उन्हीं के साथ पालकी में बैठकर राम के पास गए।
ग्रंथों में अंतर
रामचरितमानस में राम लक्ष्मण से कहते हैं: सुग्रीव भी मेरी सुधि भूल गया, राज्य, कोष, नगर और स्त्री पाकर; और फिर करुणा से समझाते हैं कि सखा सुग्रीव को केवल डर दिखाकर ले आना। लक्ष्मण के पहुँचने से पहले ही हनुमान सुग्रीव के चरणों में सिर नवाकर उन्हें याद दिलाते हैं; सुग्रीव डरकर मानते हैं कि विषयों ने मेरा ज्ञान हर लिया, और तुरंत दूतों को वानर-दल बुलाने भेजते हैं।
मानस में सुग्रीव लक्ष्मण से कहते हैं: नाथ, विषय जैसा कोई मद नहीं, यह क्षण भर में मुनियों के मन में भी मोह जगा देता है। फिर राम के चरणों में सिर रखकर कहते हैं: देव, आपकी माया बड़ी प्रबल है, आप दया करें तभी छूटती है; मैं तो एक पामर, कामी वानर हूँ। जिसके गले में लोभ की फाँस न पड़े, वह आप जैसा है; यह गुण साधन से नहीं आता, आपकी कृपा से कोई-कोई ही पाता है। राम मुस्कुराकर कहते हैं: तुम मुझे भाई भरत जैसे प्रिय हो; अब मन लगाकर सीता की खोज का यत्न करो।
भक्ति और शरणागति की सीख
भूल मानना
वाल्मीकि सुग्रीव को निर्दोष नहीं दिखाते: राज्य पाकर वे राम का काम भूल गए थे। पर उनकी भक्ति इसमें है कि क्रोध देखकर वे अड़े नहीं, अपना सब कुछ राम की कृपा का फल माना, और कहा कि सेवक से भूल हो जाए तो क्षमा कीजिए।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
मित्रता का हाथ
रोचते यदि वा सख्यं बाहुरेष प्रसारितः।
गृह्यतां पाणिना पाणिर्मर्यादा बध्यतां ध्रुवा॥यदि आपको मित्रता अच्छी लगे, तो यह मेरा हाथ फैला है; अपने हाथ से इसे पकड़ लीजिए, और पक्की मर्यादा बाँध लीजिए।
राम की कृपा से
प्रनष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम्।
रामप्रसादात्सौमित्रे पुनः प्राप्तमिदं मया॥हे सौमित्र, मेरी खोई लक्ष्मी, कीर्ति और वानरों का स्थायी राज्य, यह सब मुझे राम की कृपा से फिर मिला है।
सेवा का वचन
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा॥
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहिं जानकी आई॥सुग्रीव ने कहा: हे रघुवीर, सुनिए; सोच छोड़िए, मन में धीरज रखिए। जिस तरह जानकी आकर मिलें, मैं हर प्रकार से वही सेवा करूँगा।
"भरत जैसे प्रिय"
अतिसय प्रबल देव तव माया। छूटइ राम करहु जौं दाया॥
तब रघुपति बोले मुसुकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई॥सुग्रीव: हे देव, आपकी माया अत्यंत प्रबल है; हे राम, वह तभी छूटती है जब आप दया करें। तब रघुनाथ मुस्कुराकर बोले: भाई, तुम मुझे भरत जैसे प्रिय हो।
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देवता
- श्री राम — भगवान राम के पाठ और आरती
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · 4.5; 4.29; 4.35; 4.37
- Srimad Valmiki Ramayana, According to the Southern Readings, with footnotes, vol. I (बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा काण्ड) — T. R. Krishnacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1905) · किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 5, पृ. 330 (scan leaf n343)
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 4–5, पृ. 286 (scan leaf n298)
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 17–21, पृ. 292–293 (scan leaf n300–n301)
