गजेन्द्र
ग्राह की पकड़ में फँसा हाथियों का सरदार, जिसने सूँड़ में कमल उठाकर "नारायण" पुकारा
संक्षेप में
गजेन्द्र त्रिकूट पर्वत के वन में हाथियों का सरदार था। सरोवर में जल पीते समय एक बलवान ग्राह ने उसका पैर पकड़ लिया। हज़ार बरस की खींचतान के बाद जब बल टूट गया, तो उसने भगवान की शरण ली। उसकी पुकार सुनकर भगवान गरुड़ पर आए, और चक्र से ग्राह का मुँह चीरकर उसे छुड़ा लिया।
भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 8.2.20–33 |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 8.2–8.4 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, आठवाँ स्कंध
गजेन्द्र की कथा श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध के दूसरे से चौथे अध्याय तक है, जिसे शुकदेव राजा परीक्षित को सुनाते हैं। दूसरे अध्याय में त्रिकूट पर्वत, सरोवर और ग्राह की पकड़ है; तीसरे में गजेन्द्र की स्तुति और भगवान का आना; और चौथे में ग्राह और गजेन्द्र के पिछले जन्म की कथा।
पृष्ठभूमि
त्रिकूट पर्वत और वरुण का उद्यान
क्षीरसागर से घिरा त्रिकूट नाम का एक ऊँचा पर्वत था, जिसके तीन शिखर चाँदी, लोहे और सोने के थे। उसकी घाटी में वरुण देव का ऋतुमत नाम का उद्यान था, फलों-फूलों के पेड़ों से भरा, और उसमें सुनहरे कमलों वाला एक बड़ा सरोवर।
उसी वन में हाथियों का एक सरदार अपनी हथिनियों के साथ घूमता था। उसकी गंध भर से सिंह, हाथी, बाघ और बड़े साँप डरकर भाग जाते, और उसकी कृपा से छोटे जीव निर्भय होकर चरते।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
गजेन्द्र की भक्ति संकट में जागी, पर वह नई नहीं थी। भागवत कहता है कि उसने वह परम जप किया जो पिछले जन्म में सीखा था; पिछले जन्म में वह भगवान विष्णु का व्रती राजा था, और उसी आराधना के प्रभाव से हाथी की देह में भी उसकी स्मृति बनी रही।
उसकी स्तुति में कोई माँग नहीं है, न जीवन की, न छुटकारे की। वह कहता है: मैं इस हाथी की देह में जीना नहीं चाहता; मुझे तो उस अज्ञान के आवरण से मुक्ति चाहिए, जो समय से भी नहीं मिटता।
प्रमुख कथाएँ
ग्राह की पकड़
मूल ग्रंथ मेंधूप से तपा, मद में डूबा गजेन्द्र अपने झुंड के साथ प्यासा सरोवर पर पहुँचा। उसने जी भरकर अमृत जैसा पानी पिया, नहाया, और किसी गृहस्थ की तरह सूँड़ में पानी भर-भरकर हथिनियों और बच्चों को पिलाता-नहलाता रहा। मोह में डूबे उसे आने वाले संकट का पता ही न था।
तभी एक बलवान ग्राह ने क्रोध में उसका पैर पकड़ लिया। गजेन्द्र ने पूरा ज़ोर लगाया; हथिनियाँ चिंघाड़ती रहीं, दूसरे हाथी पीछे से सहारा देकर भी उसे छुड़ा न सके। भीतर और बाहर की यह खींचतान हज़ार बरस चली, और देवता भी देखकर चकित रहे।
शरण का निश्चय
मूल ग्रंथ मेंधीरे-धीरे गजेन्द्र का मन, बल और तेज घटता गया, जबकि पानी में ग्राह का बल बढ़ता गया। जब वह अपने को छुड़ा न सका, तो उसके मन में यह बात आई: मुझे मेरे साथी हाथी नहीं छुड़ा सकते, फिर हथिनियाँ क्या करेंगी? मैं उस परम शरण में जाता हूँ, जिसके डर से मृत्यु भी भागती है, और जो डरे हुए शरणागत की रक्षा करता है।
ऐसा निश्चय करके उसने मन को हृदय में स्थिर किया, और वह परम जप करने लगा जो पिछले जन्म में सीखा था: "ॐ नमो भगवते तस्मै…"। यही स्तुति आज गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र के नाम से पढ़ी जाती है।
"नारायण, अखिल गुरु, भगवन्, नमस्ते"
मूल ग्रंथ मेंगजेन्द्र की स्तुति किसी एक देवता के नाम-रूप की नहीं, निराकार परमेश्वर की थी, इसलिए ब्रह्मा जैसे अलग-अलग रूपों के अभिमानी देवता नहीं आए। तब सर्वात्मा हरि स्वयं प्रकट हुए; पीड़ित गजेन्द्र की पुकार सुनकर वे वेदमय गरुड़ पर, हाथ में चक्र लिए, तेज़ी से आए।
सरोवर के भीतर ग्राह की पकड़ में तड़पते गजेन्द्र ने आकाश में गरुड़ पर चक्रधारी हरि को देखा। उसने सूँड़ में एक कमल उठाया, और बड़ी कठिनाई से बोला: नारायण, अखिल जगत के गुरु, भगवन्, आपको नमस्कार!
उसे पीड़ा में देखकर भगवान गरुड़ से उतर पड़े, और करुणा से ग्राह सहित गजेन्द्र को सरोवर से बाहर खींच लिया। फिर देवताओं के देखते-देखते चक्र से ग्राह का मुँह चीरकर गजेन्द्र को छुड़ा दिया। देवताओं ने फूल बरसाए और गंधर्व गाने लगे।
ग्राह और गजेन्द्र का पिछला जन्म
मूल ग्रंथ मेंजो ग्राह था, वह देवल ऋषि के शाप से ग्राह बना हूहू नाम का श्रेष्ठ गंधर्व था। मुक्त होकर उसने भगवान को प्रणाम किया, उनका यश गाया, और अपने लोक चला गया।
गजेन्द्र पिछले जन्म में द्रविड़ देश का पाण्ड्य राजा इन्द्रद्युम्न था, जो भगवान विष्णु के व्रतों में लगा रहता था। एक दिन वह एक बड़े पर्वत पर बने आश्रम में मौन व्रत लेकर, जटा धारण किए भगवान की पूजा कर रहा था, तभी अगस्त्य ऋषि शिष्यों सहित आ गए। राजा ने न उठकर स्वागत किया, न कुछ कहा। अगस्त्य ने क्रोधित होकर शाप दिया: ब्राह्मण का अपमान करने वाला यह जड़-बुद्धि हाथी की योनि में जाए।
हाथी बनकर भी भगवान की आराधना के प्रभाव से उसकी स्मृति बनी रही। भगवान के स्पर्श से वह अज्ञान के बंधन से छूटा, पीताम्बरधारी चतुर्भुज रूप पाया, और भगवान ने उसे अपना पार्षद बना लिया।
भक्ति और शरणागति की सीख
अपनों की सीमा
गजेन्द्र की पहली समझ यही थी: जिन साथियों के बीच वह सरदार था, वे भी उसे नहीं छुड़ा सके। भागवत उसे गृहस्थ की तरह परिवार में मगन दिखाता है, और संकट में उसी के मुँह से कहलवाता है कि अंत में शरण केवल वह परमेश्वर है जिससे मृत्यु भी डरती है।
भगवान के बताए स्मरण
गजेन्द्र को छुड़ाकर भगवान ने सबके सामने कहा: जो रात के अंत में उठकर मुझे, तुम्हें, इस सरोवर और पर्वत को, मेरे अवतारों को, और प्रह्लाद, ध्रुव, नारद जैसे भक्तों को याद करते हैं, वे सब पापों से छूट जाते हैं; और जो भोर में इस स्तुति से मेरी स्तुति करते हैं, उन्हें प्राण छूटने पर मैं उत्तम गति देता हूँ।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
स्तुति से: जीना नहीं, मुक्ति
जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम्॥मैं इस हाथी की देह में जीना नहीं चाहता, जो भीतर-बाहर अज्ञान से ढकी है; इसमें जीकर क्या करूँगा? मुझे तो आत्मा के प्रकाश को ढकने वाले उस आवरण से मुक्ति चाहिए, जो समय से भी नहीं मिटता।
कमल उठाकर पुकार
सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा-
न्नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते॥सरोवर के भीतर बलवान ग्राह की पकड़ में पीड़ित गजेन्द्र ने आकाश में गरुड़ पर चक्र लिए हरि को देखा, और कमल वाली सूँड़ ऊपर उठाकर बड़ी कठिनाई से बोला: हे नारायण, हे अखिल जगत के गुरु, भगवन्, आपको नमस्कार!
परंपरा में स्थान
शुकदेव कथा के अंत में कहते हैं कि गजराज के छूटने की यह कथा स्वर्ग और यश देने वाली, कलियुग के दोष और बुरे सपनों को मिटाने वाली है; इसीलिए कल्याण चाहने वाले लोग भोर में उठकर इसका पाठ करते हैं।
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देवता
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
भक्ति-पाठ
- गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र — गजेन्द्र की पूरी स्तुति, मूल पाठ और अर्थ सहित (भागवत 8.3)
ऋषि
- महर्षि अगस्त्य — जिनके शाप से राजा इन्द्रद्युम्न हाथी बने (भागवत 8.4.7–11)
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 8.2–8.4
- श्रीमद्भागवतम्, भाग 2 (स्कंध 8–12) — टी. आर. कृष्णाचार्य, निर्णयसागर प्रेस — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक) (1916) · स्कंध 8, पृ. 5–6 (scan leaf n8–n9)
