राजा परीक्षित
गर्भ में भगवान को देखने वाला राजा, जिसने मृत्यु से सात दिन पहले पूरा श्रीमद्भागवत सुना
संक्षेप में
राजा परीक्षित अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र, अर्जुन के पौत्र थे, जिनकी गर्भ में ही भगवान कृष्ण ने अश्वत्थामा के अस्त्र से रक्षा की। एक ऋषि-पुत्र के शाप से जब सात दिन में मृत्यु तय हो गई, तो वे सब छोड़कर गंगा के तट पर बैठ गए, और शुकदेव से पूरा श्रीमद्भागवत सुना।
श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 1.4.9; 1.16.1 |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत, महाभारत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 1.8, 1.12, 1.16–1.19; 12.6; महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.36–1.38 |
| पितामह | अर्जुन | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 9.22.32–33 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत: कथा का आधार
परीक्षित की कथा श्रीमद्भागवत का ढाँचा है। पहले स्कंध में उनका जन्म, राज और शाप है; फिर पूरा भागवत वही है जो शुकदेव गंगा के तट पर उन्हें सुनाते हैं; और बारहवें स्कंध में उनका देह-त्याग। ऋषि शौनक भी सूत जी से पूछते हैं कि अभिमन्यु के जिस पुत्र को भगवान के भक्तों में श्रेष्ठ कहा जाता है, उसका जन्म और कर्म सुनाइए।
महाभारत में शाप की कथा
शाप की कथा महाभारत के आदि पर्व में भी है, और मुनि और उनके पुत्र के नाम वहीं मिलते हैं: मुनि शमीक, और उनका क्रोधी पुत्र शृंगी।
पृष्ठभूमि
वंश
शुकदेव परीक्षित से कहते हैं कि तुम्हारे पिता अभिमन्यु सुभद्रा से जन्मे थे, और अभिमन्यु से उत्तरा के गर्भ में तुम। अभिमन्यु अर्जुन के पुत्र थे। परीक्षित ने उत्तर की बेटी इरावती से विवाह किया, और उनके जनमेजय सहित चार पुत्र हुए।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
भागवत परीक्षित की भक्ति की जड़ गर्भ में बताता है। वहाँ उन्होंने एक अँगूठे भर के, गदा लिए पुरुष को देखा जो अस्त्र की आग को बुझा रहा था; जन्म के बाद वे हर मनुष्य को परखते रहे कि क्या यह वही है, और इसी से उनका नाम परीक्षित पड़ा।
मृत्यु तय हो जाने पर उन्होंने न राज बचाने का उपाय किया, न शाप हटवाने का। उन्होंने इसे वैराग्य का कारण माना, सब छोड़कर गंगा के तट पर अनशन पर बैठ गए, और मन को श्रीकृष्ण के चरणों में लगा दिया।
प्रमुख कथाएँ
गर्भ में रक्षा
मूल ग्रंथ मेंमहाभारत युद्ध के बाद, जब श्रीकृष्ण द्वारका लौटने को रथ पर बैठे, उत्तरा डरी हुई दौड़ती आई: हे देवों के देव, मेरी रक्षा कीजिए; जलते लोहे जैसा एक बाण मेरी ओर आ रहा है; मुझे भले जला दे, पर मेरा गर्भ न गिरे। भगवान समझ गए कि यह पांडवों के वंश को मिटाने के लिए अश्वत्थामा का छोड़ा अस्त्र है।
सबके भीतर बसे योगेश्वर हरि ने कुरुवंश को बचाने के लिए अपनी माया से उत्तरा के गर्भ को ढक लिया। गर्भ में बालक ने एक अँगूठे भर का, साँवला, पीताम्बरधारी, चार भुजाओं वाला पुरुष देखा, जो अपनी गदा घुमाकर अस्त्र की आग को ऐसे मिटा रहा था जैसे सूरज कोहरे को; और फिर वहीं अंतर्धान हो गया।
कलियुग का दमन
मूल ग्रंथ मेंदिग्विजय के समय परीक्षित ने राजा का वेश धरे एक शूद्र को गाय और बैल के जोड़े को पैर से मारते देखा। भागवत में यह पुरुष कलि है, और बैल धर्म, गाय पृथ्वी। परीक्षित ने धर्म और पृथ्वी को ढाढ़स बँधाया, और कलि को मारने के लिए तलवार उठाई।
डरकर कलि ने राजा का वेश छोड़ दिया और उनके पैरों में गिर पड़ा। शरणागत को उन्होंने नहीं मारा, पर कहा कि मेरे राज में तेरा कोई स्थान नहीं। कलि ने रहने की जगह माँगी, तो उन्होंने उसे चार जगहें दीं: जुआ, मदिरा, पराई स्त्री का संग और हिंसा; और माँगने पर पाँचवीं, सोना। भागवत कहता है कि कल्याण चाहने वाला, ख़ासकर राजा, इन जगहों से दूर रहे।
मरे साँप और ऋषि-पुत्र का शाप
मूल ग्रंथ मेंएक दिन शिकार में थके, भूखे-प्यासे परीक्षित एक आश्रम में पहुँचे। वहाँ एक मुनि आँखें मूँदे समाधि में बैठे थे; न आसन मिला, न पानी, न मीठा बोल। जीवन में पहली बार राजा को एक ब्राह्मण पर क्रोध आया, और लौटते समय उन्होंने धनुष की नोक से एक मरा हुआ साँप उठाकर मुनि के कंधे पर डाल दिया।
मुनि का बालक पुत्र साथियों के साथ खेल रहा था। पिता के अपमान की बात सुनकर उसने क्रोध में कौशिकी नदी का जल छूकर शाप दिया: मर्यादा तोड़ने वाले इस राजा को सातवें दिन तक्षक नाग डसेगा। समाधि से जागकर मुनि ने बेटे की निंदा की: छोटे से अपराध पर तूने इतना बड़ा दंड दे दिया; यह राजा धर्म का रक्षक और भगवान का महान भक्त है, भूखा-थका था, शाप के योग्य नहीं।
ग्रंथों में अंतर
भागवत में मुनि और उनके पुत्र का नाम नहीं है। महाभारत के आदि पर्व में यही कथा है, और वहाँ मुनि का नाम शमीक और पुत्र का नाम शृंगी है; वहाँ शृंगी का एक साथी उसे ताना देता है कि तेरे पिता के कंधे पर मरा साँप पड़ा है।
गंगा तट पर: "मरते मनुष्य को क्या करना चाहिए?"
मूल ग्रंथ मेंमहल लौटकर परीक्षित को अपने किए पर गहरा पछतावा हुआ: मैंने एक निर्दोष, तेजस्वी ब्राह्मण के साथ नीच काम किया। जब शाप की ख़बर मिली, तो उन्होंने उसे अच्छा माना, कि यही मुझे संसार से वैराग्य देगा। वे इस लोक और परलोक दोनों को छोड़कर गंगा के तट पर अनशन पर बैठ गए।
वहाँ दूर-दूर से बड़े ऋषि अपने शिष्यों के साथ आए। तभी व्यास-पुत्र शुकदेव संयोग से वहाँ पहुँचे: सोलह बरस के, दिगंबर, अवधूत वेश में, पीछे बच्चे और स्त्रियाँ लगी हुईं। उन्हें देखकर सारे ऋषि अपने आसनों से उठ खड़े हुए।
परीक्षित ने सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर पूछा: जो मनुष्य मरने वाला है, उसे क्या करना चाहिए? क्या सुनना, क्या जपना, क्या करना, क्या याद करना और किसका भजन करना चाहिए, और किससे बचना चाहिए? इसी प्रश्न के उत्तर में शुकदेव ने उन्हें पूरा भागवत सुनाया।
देह-त्याग
मूल ग्रंथ मेंकथा के अंत में शुकदेव ने कहा: राजन्, "मैं मरूँगा", इस पशु-बुद्धि को छोड़ दो; तुम देह की तरह न पहले कभी जन्मे थे, न अब मरोगे। परीक्षित बोले: मैं धन्य हुआ; आपने मुझे अनादि-अनंत हरि की कथा सुनाई। अब मुझे तक्षक या किसी भी मृत्यु का डर नहीं।
शुकदेव के जाने के बाद परीक्षित गंगा के तट पर, कुशों पर, उत्तर की ओर मुँह करके बैठे और मन को परमात्मा में लगा दिया, पेड़ की तरह अचल। ब्राह्मण का वेश धरकर तक्षक आया और उसने राजा को डस लिया; उसके विष की आग से उनकी देह सबके देखते भस्म हो गई।
भक्ति और शरणागति की सीख
संकट को वैराग्य बनाना
परीक्षित ने शाप को सज़ा नहीं, अवसर माना। सात दिन बचे थे, और उन्होंने उन्हें वह सुनने में लगाया जिसे भागवत मरने वाले मनुष्य का सबसे बड़ा काम कहता है: भगवान की कथा।
शरणागत को अभय
कलि को मारने के लिए तलवार उठा चुके परीक्षित ने, उसके पैरों में गिरते ही उसे नहीं मारा। भागवत इसे उनकी शरणागत-वत्सलता कहता है; दंड उन्होंने दिया, पर शरण में आए को प्राणदान भी।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
परीक्षित का प्रश्न
अतः पृच्छामि संसिद्धिं योगिनां परमं गुरुम्।
पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा॥
यच्छ्रोतव्यमथो जाप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो।
स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम्॥इसलिए मैं योगियों के परम गुरु, आपसे पूछता हूँ: जो मनुष्य मरने वाला है, उसे क्या करना चाहिए? हे प्रभु, मनुष्य को क्या सुनना, क्या जपना, क्या करना, क्या याद करना और किसका भजन करना चाहिए; और किससे बचना चाहिए, वह भी बताइए।
शुकदेव का अंतिम उपदेश
त्वं तु राजन्मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि।
न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नङ्क्ष्यसि॥राजन्, "मैं मरूँगा", इस पशु-बुद्धि को छोड़ दो। तुम देह की तरह न कभी पहले न होकर अब जन्मे हो, न नष्ट होगे।
परंपरा में स्थान
परीक्षित के कारण ही भागवत कहा गया: शुकदेव ने उन्हें सुनाया, और बाद में वही कथा सूत जी ने नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों को सुनाई। भागवत के अंत में परीक्षित ख़ुद कहते हैं कि अज्ञान और दुख से तपे जीवों पर ऐसी कृपा करना भगवान में लीन संतों के लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं।
संबंधित भक्त
- अर्जुन — पितामह
VedikMARG पर आगे पढ़ें
देवता
- श्री कृष्ण — जिन्होंने गर्भ में परीक्षित की रक्षा की (भागवत 1.8)
ऋषि
- महर्षि शुकदेव — जिन्होंने गंगा तट पर परीक्षित को श्रीमद्भागवत सुनाया
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 1.4, 1.8, 1.12, 1.16–1.19; 9.22; 12.5–12.6
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · स्कंध 1, पृ. 39 (scan leaf n70)
- श्रीमद्भागवतम्, भाग 2 (स्कंध 8–12) — टी. आर. कृष्णाचार्य, निर्णयसागर प्रेस — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक) (1916) · स्कंध 12, पृ. 8 (scan leaf n383)
- महाभारत — समीक्षित पाठ (Critical Edition, BORI, Poona, 1933–66), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), BORI (सं.) (1999) · 1.36–1.38
