द्रौपदी
पांडवों की पत्नी, जिनकी लाज सभा में बची; और जिनकी पुकार कई पांडुलिपियों में कृष्ण तक पहुँची
संक्षेप में
द्रौपदी पांडवों की पत्नी थीं, जिन्हें जुए में हारने के बाद दुःशासन सभा में घसीट लाया और उनका वस्त्र खींचने लगा। महाभारत कहता है कि खींचते-खींचते उसी जैसा वस्त्र बार-बार प्रकट होता रहा। कई पांडुलिपियों में इसी समय द्रौपदी "गोविन्द द्वारकावासिन्" कहकर कृष्ण को पुकारती हैं; समीक्षित संस्करण इस पुकार को मूल पाठ से बाहर रखता है।
श्रीकृष्ण के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | महाभारत (समीक्षित पाठ), 2.60.24–25; महाभारत, दाक्षिणात्य पाठ, सभापर्व (कृष्णाचार्य सं.), सभापर्व, अध्याय 90, पृ. 137 (scan leaf n145) |
| कथा किस ग्रंथ में | महाभारत | महाभारत (समीक्षित पाठ), 2.60–2.61; 3.4 |
कथा किन ग्रंथों में है
महाभारत और उसकी पांडुलिपियाँ
द्रौपदी की कथा महाभारत में आदि से अंत तक है। उनकी कृष्ण-भक्ति के दो प्रसिद्ध प्रसंग, सभा में वस्त्र का बढ़ना और दुर्वासा के आने पर कृष्ण का आना, पांडुलिपियों में एक जैसे नहीं मिलते। इसलिए यह पृष्ठ हर बात का स्रोत अलग-अलग बताता है।
पृष्ठभूमि
द्यूत-सभा
जुए में युधिष्ठिर के सब कुछ, अपने भाइयों और फिर द्रौपदी को भी हार जाने पर दुःशासन उन्हें बालों से पकड़कर सभा में घसीट लाया, जबकि वे रजस्वला थीं और एक ही वस्त्र पहने थीं। द्रौपदी ने कहा: यहाँ शास्त्र जानने वाले, मेरे गुरुजन बैठे हैं, उनके सामने मैं इस दशा में खड़ी नहीं रह सकती; मुझे विवस्त्र मत करो।
तब दुःशासन ने ताना दिया: अपनी रक्षा के लिए कृष्ण, जिष्णु (अर्जुन), हरि और नर को पुकार ले, मैं तो तुझे ले ही जाऊँगा।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
दक्षिण भारत की पांडुलिपियों पर आधारित कृष्णाचार्य संस्करण (1906) में, वस्त्र खींचे जाने पर द्रौपदी को महर्षि वसिष्ठ का वचन याद आता है कि बड़ी आपत्ति में भगवान हरि का स्मरण करना चाहिए, और वे शरणागतवत्सल कृष्ण को पुकारती हैं: हे शंख-चक्र-गदाधारी, द्वारका में रहने वाले अच्युत, हे गोविंद, कमल-नयन, मुझ शरणागत की रक्षा करो; कौरवों के समुद्र में डूबती मुझे उबारो।
प्रमुख कथाएँ
वस्त्र का बढ़ना
मूल ग्रंथ मेंविकर्ण के विरोध के बाद भी कर्ण के कहने पर दुःशासन ने सभा के बीच द्रौपदी का वस्त्र बलपूर्वक खींचना शुरू किया। महाभारत कहता है: वस्त्र खींचे जाने पर उसी जैसा दूसरा वस्त्र बार-बार प्रकट होता रहा। सभा में हाहाकार मच गया, सारे राजा उस अद्भुत दृश्य को देखते रहे; और जब सभा के बीच वस्त्रों का ढेर लग गया, तो दुःशासन थककर लज्जित हो बैठ गया।
यह देखकर भीम ने सारे क्षत्रियों के सामने प्रतिज्ञा की: यदि युद्ध में इस पापी भरतकुल-कलंक की छाती चीरकर इसका रक्त न पीऊँ, तो मुझे पुरखों की गति न मिले।
ग्रंथों में अंतर
वस्त्र किसकी कृपा से बढ़ा? समीक्षित पाठ (2.61.41) में किसी का नाम नहीं, केवल इतना कि वस्त्र प्रकट होता रहा। कई पांडुलिपियों में इससे पहले द्रौपदी की "गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय" वाली पुकार है, जिसे समीक्षित संस्करण ने प्रक्षिप्त अंश (*0542–*0548) माना। कृष्णाचार्य संस्करण यह पुकार उद्धरण-चिह्नों में छापता है और कहता है "तस्य प्रसादात्", उनकी कृपा से वस्त्र प्रकट हुआ, फिर "धर्मस्य परिपालनात्", धर्म की रक्षा से सैकड़ों वस्त्र प्रकट हुए। Ganguli के अंग्रेज़ी अनुवाद (प्रचलित पाठ) में भी यही पुकार है, पर वहाँ अदृश्य रहकर धर्म ने वस्त्र ढके।
दुर्वासा और बटलोई का पत्ता
ग्रंथों में अंतरवनवास में सूर्य देव ने युधिष्ठिर को वर दिया था कि बारह बरस तक उनकी रसोई का अन्न अक्षय रहेगा; ब्राह्मणों, भाइयों और युधिष्ठिर के खाने के बाद अंत में द्रौपदी खाती थीं। यह बात समीक्षित पाठ में है।
प्रसिद्ध कथा कहती है कि दुर्योधन के भेजे दुर्वासा दस हज़ार शिष्यों के साथ ठीक तब आए, जब द्रौपदी खा चुकी थीं। चिंतित द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा; कृष्ण आए, बटलोई के गले में चिपका साग का एक कण खाकर बोले "इससे विश्वात्मा तृप्त हों", और नदी में नहाते दुर्वासा और उनके शिष्यों के पेट ऐसे भर गए कि वे पांडवों के डर से भाग गए। यह कथा समीक्षित संस्करण के मूल पाठ में नहीं, उसके परिशिष्ट (Appendix I, सं. 25) में है, यानी कुछ पांडुलिपियों में ही मिलती है।
भक्ति और शरणागति की सीख
पुकार और पाठ
द्रौपदी की कथा में भक्ति की बात ग्रंथ के एक स्तर में साफ़ है और दूसरे में नहीं: मूल पाठ चमत्कार बताता है, पर पुकार नहीं; परंपरा की पांडुलिपियाँ पुकार और कृपा, दोनों बताती हैं। भक्तों ने सदियों से इसी पुकार को याद रखा है, "बड़ी आपत्ति में हरि का स्मरण करना चाहिए"; यह पृष्ठ बस यह बताता है कि वह बात किस पाठ में है।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
उसी जैसा दूसरा वस्त्र
आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्यास्तु विशां पते।
तद्रूपमपरं वस्त्रं प्रादुरासीदनेकशः॥हे राजन, द्रौपदी का वस्त्र खींचे जाने पर उसी जैसा दूसरा वस्त्र बार-बार प्रकट होता रहा।
द्रौपदी की पुकार (कई पांडुलिपियों में)
गोविन्द द्वारकावासिन्कृष्ण गोपीजनप्रिय।
कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव॥हे गोविंद, द्वारका में रहने वाले, गोपियों के प्रिय कृष्ण! हे केशव, कौरवों से अपमानित हो रही मुझे क्या तुम नहीं जानते?
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स्रोत
- महाभारत — समीक्षित पाठ (Critical Edition, BORI, Poona, 1933–66), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), BORI (सं.) (1999) · 2.60–2.61; 3.4; परिशिष्ट I सं. 25
- Sriman Mahabharatam, mainly based on the South Indian texts — Sabhaparva (2) — T. R. Krishnacharya, T. R. Vyasacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1906) · सभापर्व, अध्याय 90, पृ. 137–138 (scan leaf n145–n146)
- The Mahabharata of Krishna-Dwaipayana Vyasa — Kisari Mohan Ganguli (अनु.) (1896) · Sabha Parva, Dyuta Parva
