मुचुकुन्द
देवताओं के रक्षक राजा, जिन्होंने युगों की नींद के बाद भगवान से केवल उनकी सेवा माँगी
संक्षेप में
मुचुकुन्द इक्ष्वाकु वंश के राजा, मान्धाता के पुत्र थे, जिन्होंने बहुत समय तक असुरों से देवताओं की रक्षा की और फिर एक गुफा में लंबी नींद सो गए। कृष्ण का पीछा करता कालयवन उन्हें जगाकर उनकी दृष्टि से भस्म हुआ, और कृष्ण के वर देने पर मुचुकुन्द ने केवल उनके चरणों की सेवा माँगी।
श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.51.14; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10 उत्तरार्ध, पृ. 13 (scan leaf n210) |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.51–10.52.4; विष्णु पुराण, अंश 5 (Wilson अनु., vol. 5), Book V, ch. XXIII, p. 57 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण
मुचुकुन्द की कथा श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध के इक्यावनवें अध्याय में है; राजा परीक्षित पूछते हैं कि कालयवन को भस्म करने वाला वह पुरुष कौन था, और शुकदेव बताते हैं। विष्णु पुराण (अंश 5, अध्याय 23) में भी यही प्रसंग संक्षेप में है।
पृष्ठभूमि
कौन थे
मुचुकुन्द इक्ष्वाकु कुल में जन्मे, मान्धाता के पुत्र, ब्राह्मणों का आदर करने वाले और वचन के पक्के राजा थे। असुरों से डरे इन्द्र आदि देवताओं ने उनसे अपनी रक्षा माँगी, और उन्होंने बहुत समय तक स्वर्ग की रक्षा की।
जब देवताओं को सेनापति के रूप में गुह (कार्तिकेय) मिल गए, तो उन्होंने मुचुकुन्द से कहा: अब आप विश्राम करें। हमारी रक्षा में आपने मनुष्य-लोक और अपना निष्कंटक राज्य छोड़ दिया; आपके पुत्र, रानियाँ, बंधु, मंत्री और उस समय की प्रजा, अब कोई नहीं रहा, सबको काल ले गया। मोक्ष के सिवा कोई वर माँग लीजिए, क्योंकि मोक्ष केवल भगवान विष्णु दे सकते हैं।
मुचुकुन्द ने देवताओं को प्रणाम किया, और गुफा में जाकर देवताओं की दी हुई नींद में सो गए।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
मुचुकुन्द की भक्ति वैराग्य से जन्मी। युगों बाद आँख खुली, तो सब कुछ जा चुका था; और भगवान को सामने पाकर उन्हें अपना बीता राज-जीवन व्यर्थ लगा। उन्होंने कहा कि राज्य का बंधन अपने-आप छूट जाना ही आपकी कृपा है, जिसे साधु वन जाने के लिए माँगते हैं।
प्रमुख कथाएँ
गुफा में कालयवन
मूल ग्रंथ मेंकालयवन ने बिना शस्त्र पैदल चलते कृष्ण को पहचाना, नारद के बताए लक्षणों से, और सोचा कि मैं भी बिना शस्त्र इनसे लड़ूँगा। कृष्ण आगे-आगे भागे, हर कदम पर ऐसे कि लगे बस हाथ आ गए; पीछे दौड़ता कालयवन ताने देता रहा कि यदुकुल में जन्मे को भागना शोभा नहीं देता। कृष्ण एक पहाड़ की गुफा में घुस गए।
गुफा में कालयवन ने एक आदमी को सोते देखा और सोचा: मुझे इतनी दूर लाकर यह साधु बनकर सो रहा है! और उसने उसे लात मारी। बहुत समय से सोया वह पुरुष धीरे से आँखें खोलकर उठा, चारों ओर देखा, और पास खड़े कालयवन पर उसकी क्रोध भरी दृष्टि पड़ते ही कालयवन शरीर से उठी आग में जलकर क्षण भर में राख हो गया।
ग्रंथों में अंतर
मुचुकुन्द की दृष्टि से जलने का कारण: विष्णु पुराण (5.23.22–23) साफ़ कहता है कि मुचुकुन्द ने देवताओं से नींद का वर माँगा था, और देवताओं ने कहा था कि जो तुम्हें जगाएगा, वह तुम्हारे शरीर की आग से तुरंत भस्म हो जाएगा। श्रीमद्भागवत के GRETIL पाठ में यह वर नहीं, केवल "देवताओं की दी नींद" है; पर कृष्णाचार्य संस्करण (1916) के पाठ में यहीं एक अतिरिक्त श्लोक में यह वर है, और संस्करण की टिप्पणी कहती है कि विजयध्वज की टीका वाले पाठ में यह श्लोक नहीं है। यानी भागवत की प्रतियों में यह श्लोक कहीं है, कहीं नहीं।
युगों बाद भगवान का दर्शन
मूल ग्रंथ मेंतब भगवान ने मुचुकुन्द को दर्शन दिए: बादल जैसे श्याम, पीताम्बर पहने, वक्ष पर श्रीवत्स और कौस्तुभ, चार भुजाएँ, वैजयंती माला, और प्रेम भरी मुस्कान। उनके तेज से चकित मुचुकुन्द ने धीरे से पूछा: आप कौन हैं, जो काँटों भरे वन में कमल जैसे कोमल पैरों से चल रहे हैं? आप अग्नि हैं, सूर्य, चंद्रमा या इन्द्र? मुझे लगता है आप तीनों देवों में श्रेष्ठ हैं, क्योंकि आपकी प्रभा से इस गुफा का अँधेरा मिट गया है।
कृष्ण हँसकर बोले: मेरे जन्म, कर्म और नाम हज़ारों हैं, उन्हें मैं भी नहीं गिन सकता। इस बार ब्रह्मा की प्रार्थना पर धर्म की रक्षा के लिए यदुकुल में वसुदेव के घर जन्मा हूँ, इसलिए लोग मुझे वासुदेव कहते हैं। तुमने पहले मुझसे बहुत प्रार्थना की थी, इसलिए तुम पर कृपा करने इस गुफा में आया हूँ। जो वर चाहो माँगो; मेरी शरण आया कोई फिर शोक नहीं करता।
मुचुकुन्द को गर्ग ऋषि की बात याद आई, और वे जान गए कि ये भगवान नारायण हैं। उन्होंने प्रणाम करके कहा: आपकी माया से मोहित मनुष्य दुख देने वाले घर-गृहस्थी में सुख खोजता है। मेरा सारा समय राज्य के मद में, शरीर को ही "मैं" मानकर, व्यर्थ गया। संसार में भटकते जीव का भटकना जब मिटने को होता है, तब उसे सत्संग मिलता है, और सत्संग से ही आप में मन लगता है।
फिर बोले: हे विभु, मैं आपकी चरण-सेवा के सिवा कोई वर नहीं चाहता; कौन समझदार मोक्ष देने वाले आपकी आराधना करके अपने ही बंधन का वर माँगेगा? इसलिए सब कामनाएँ छोड़कर मैं आपकी शरण आया हूँ; मुझ शरणागत की रक्षा कीजिए।
भगवान ने कहा: वरों का लालच देकर मैंने तुम्हें परखा था; तुम्हारी बुद्धि कामनाओं से नहीं डिगी। एकनिष्ठ भक्तों की बुद्धि वरों से नहीं बदलती। मुझमें मन लगाकर जहाँ चाहो विचरो; तुम्हारी भक्ति मुझमें सदा अटल रहे। क्षत्रिय-धर्म में शिकार आदि में तुमने जो जीव मारे, उस पाप को तप से धो लो; अगले जन्म में तुम सब प्राणियों के परम हितैषी श्रेष्ठ ब्राह्मण बनकर मुझे पाओगे।
मुचुकुन्द ने भगवान की परिक्रमा और प्रणाम किया और गुफा से बाहर आए। मनुष्य, पशु, पेड़-पौधे सब छोटे देखकर वे समझ गए कि कलियुग आ गया है, और उत्तर दिशा में चल पड़े। मन कृष्ण में लगाकर वे गंधमादन पर्वत होते हुए नर-नारायण के बदरिकाश्रम पहुँचे, और सब सुख-दुख सहते हुए शांत भाव से तप करके हरि की आराधना करने लगे।
भक्ति और शरणागति की सीख
वर नहीं, सेवा
मुचुकुन्द ने देवताओं से भी वर पाया और भगवान से भी वर का प्रस्ताव पाया; पर भगवान के सामने उन्होंने केवल उनकी चरण-सेवा माँगी। भगवान ने ख़ुद कहा कि वर का लालच उन्हें परखने के लिए था, और सच्चे भक्त की बुद्धि वरों से नहीं डिगती।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
सत्संग कब मिलता है
भवापवर्गो भ्रमतो यदा भवे-
ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः।
सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ
परावरेशे त्वयि जायते मतिः॥हे अच्युत, संसार में भटकते जीव के भटकने का अंत जब आने वाला होता है, तब उसे संतों का संग मिलता है; और जब सत्संग मिलता है, तभी सबके स्वामी और संतों के आश्रय, आप में उसकी बुद्धि लगती है।
चरण-सेवा के सिवा कुछ नहीं
न कामयेऽन्यं तव पादसेवना-
दकिञ्चनप्रार्थ्यतमाद्वरं विभो।
आराध्य कस्त्वां ह्यपवर्गदं हरे
वृणीत आर्यो वरमात्मबन्धनम्॥हे विभु, अकिंचन भक्त जिसे सबसे अधिक चाहते हैं, आपकी उस चरण-सेवा के सिवा मैं कोई और वर नहीं चाहता। हे हरि, मोक्ष देने वाले आपकी आराधना करके कौन समझदार अपने ही बंधन का वर माँगेगा?
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देवता
- श्री कृष्ण — श्रीकृष्ण के पाठ और तीर्थ
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 10.51–10.52.4
- श्रीमद्भागवतम्, भाग 2 (स्कंध 8–12) — टी. आर. कृष्णाचार्य, निर्णयसागर प्रेस — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक) (1916) · स्कंध 10 उत्तरार्ध, पृ. 13–14 (scan leaf n210–n211)
- The Vishnu Purana, vol. 5, part 1 (Book V, ch. XVII – Book VI) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1870) · Book V, ch. XXIII, p. 57 (scan leaf n61) — विष्णु पुराण 5.23.14–26
