भीष्म पितामह
शर-शय्या पर लेटे पितामह, जिन्होंने प्राण छोड़ते समय सामने खड़े कृष्ण पर आँखें टिकाए रखीं
संक्षेप में
भीष्म कौरवों और पांडवों के पितामह थे, जो युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े। जब कृष्ण चक्र लेकर उनकी ओर दौड़े, तो भीष्म ने कहा: आइए देवेश, आपके हाथों मरना मेरा कल्याण है। शर-शय्या से उन्होंने युधिष्ठिर को विष्णु सहस्रनाम दिया, और सामने खड़े कृष्ण की स्तुति करते हुए प्राण छोड़े।
श्रीकृष्ण के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | महाभारत (समीक्षित पाठ), 6.55.93; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 1.9.29–31 |
| कथा किस ग्रंथ में | महाभारत, श्रीमद्भागवत | महाभारत (समीक्षित पाठ), 6.55.70–100; 13.135; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 1.9.29–44 |
कथा किन ग्रंथों में है
महाभारत और श्रीमद्भागवत
भीष्म की कथा महाभारत के भीष्मपर्व, शांतिपर्व और अनुशासनपर्व में फैली है; विष्णु सहस्रनाम अनुशासनपर्व में है। श्रीमद्भागवत के पहले स्कंध के नौवें अध्याय में शर-शय्या पर उनकी अंतिम स्तुति है।
पृष्ठभूमि
सहस्रनाम का उपदेश
शर-शय्या पर धर्म के सारे उपदेश सुनने के बाद युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा: संसार में एक देवता कौन है, सबसे बड़ा आश्रय कौन, किसकी स्तुति और पूजा से मनुष्य कल्याण पाता है, और किसका जप करके जीव जन्म-मृत्यु के बंधन से छूटता है? भीष्म ने उत्तर दिया: जगत के स्वामी, देवों के देव, अनंत पुरुषोत्तम विष्णु की हज़ार नामों से स्तुति, पूजा और ध्यान करने वाला सब दुखों के पार हो जाता है; और फिर उन्होंने वे हज़ार नाम सुनाए।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
भीष्म शत्रु-पक्ष में थे, पर उनकी भक्ति कृष्ण के प्रति खुली थी। भागवत में अंतिम समय उन्होंने अपनी वाणी समेटी, मन को सब आसक्तियों से मुक्त करके सामने खड़े पीताम्बरधारी चतुर्भुज कृष्ण में लगाया, और बिना पलक झपकाए उन्हें देखते रहे; कृष्ण के देखने भर से उनकी बाणों की पीड़ा मिट गई।
प्रमुख कथाएँ
चक्रधारी कृष्ण का स्वागत
मूल ग्रंथ मेंयुद्ध में भीष्म के बाणों से पांडव-सेना को भागते, और अर्जुन को भीष्म के प्रति आदर के कारण नरमी से लड़ते देख, कृष्ण ने सात्यकि से कहा कि मैं आज ख़ुद चक्र लेकर भीष्म और द्रोण को मारूँगा और युधिष्ठिर को राज्य दूँगा। फिर घोड़े छोड़कर, सूर्य जैसा चमकता सुदर्शन चक्र हाथ में लिए वे रथ से कूदकर भीष्म की ओर दौड़े; सब प्राणी भय से चिल्ला उठे कि कौरवों का अंत आ गया।
पर भीष्म घबराए नहीं; धनुष-बाण लिए रथ पर खड़े रहकर बोले: आइए, आइए देवेश, जगन्निवास, आपको नमस्कार है; हे लोकनाथ, सबके शरणदाता, मुझे युद्ध में इस रथ से गिरा दीजिए। हे कृष्ण, आपके हाथों मारे जाने से मेरा इस लोक और परलोक, दोनों में कल्याण होगा; आपके मेरी ओर दौड़ने से तीनों लोकों में मेरा सम्मान बढ़ गया।
तब अर्जुन ने रथ से कूदकर कृष्ण की भुजाएँ पकड़ीं; कृष्ण उन्हें भी घसीटते हुए बढ़ते रहे, और दसवें कदम पर अर्जुन किसी तरह उन्हें रोक पाए। अर्जुन ने प्रणाम करके कहा: केशव, क्रोध शांत कीजिए, आप ही पांडवों की गति हैं; मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार कौरवों का अंत करूँगा।
ग्रंथों में अंतर
श्रीमद्भागवत (1.9.37) में भीष्म इसी घटना को अपनी स्तुति में याद करते हैं, पर दो अंतर हैं: वहाँ कृष्ण "रथ का पहिया" (रथचरण) लेकर दौड़ते हैं, सुदर्शन नहीं; और भागवत कहता है कि कृष्ण ने अपना वचन (शस्त्र न उठाने का) छोड़कर भीष्म की प्रतिज्ञा सच करने के लिए ऐसा किया। महाभारत के इस अध्याय में भीष्म की ऐसी प्रतिज्ञा नहीं पढ़ी गई। दक्षिण भारत की प्रतियों में यहाँ कुछ श्लोक अधिक हैं, जिनमें कृष्ण के सोचते ही सुदर्शन उनके हाथ में आ जाता है।
शर-शय्या की अंतिम स्तुति
मूल ग्रंथ मेंउत्तरायण आया, जिसकी इच्छा-मृत्यु वाले भीष्म प्रतीक्षा कर रहे थे। तब उन्होंने कृष्ण की स्तुति की: तीनों लोकों को मोहने वाले, तमाल जैसे श्याम, सूर्य की किरणों जैसा पीताम्बर पहने, अर्जुन के सखा में मेरा निर्दोष प्रेम हो। युद्ध में घोड़ों की धूल से मटमैले बाल, पसीने से सजा मुख, और मेरे तीखे बाणों से छिदी त्वचा वाले कृष्ण में मेरा मन लगे।
उन्होंने याद किया कि कैसे कृष्ण ने सखा अर्जुन के कहने पर रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा किया, अपनों को मारने से हिचकते अर्जुन का मोह आत्म-ज्ञान से दूर किया, और युद्ध में घायल होकर भी भीष्म की ओर दौड़े। और कहा: मरते समय मेरी प्रीति उन्हीं भगवान में हो, अर्जुन के रथ पर चाबुक और लगाम थामे जिनकी शोभा देखकर युद्ध में मरे लोगों ने उनका स्वरूप पाया।
इस तरह मन, वाणी और दृष्टि को कृष्ण में लगाकर भीष्म ने अपने भीतर ही श्वास रोक ली और शांत हो गए; उन्हें ब्रह्म में लीन होते जानकर सब ऐसे चुप हो गए, जैसे साँझ को पक्षी।
भक्ति और शरणागति की सीख
शत्रु-पक्ष में भी भक्त
भीष्म कर्तव्य से कौरवों की ओर लड़े, पर उनका मन कृष्ण में था: अपनी ओर चक्र लेकर आते भगवान में उन्हें शत्रु नहीं, शरणदाता दिखा। और जीवन के अंत में उन्होंने संसार को वह स्तोत्र दिया, जिसे आज भी करोड़ों लोग पढ़ते हैं, विष्णु सहस्रनाम।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
आइए देवेश
एह्येहि देवेश जगन्निवास
नमोऽस्तु ते माधव चक्रपाणे।
प्रसह्य मां पातय लोकनाथ
रथोत्तमात्सर्वशरण्य सङ्ख्ये॥आइए, आइए देवेश, जगत के निवास, हे चक्रधारी माधव, आपको नमस्कार है। हे लोकनाथ, सबके शरणदाता, युद्ध में मुझे बलपूर्वक इस उत्तम रथ से गिरा दीजिए।
भागवत: मेरी प्रतिज्ञा सच करने को
स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा-
मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः।
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गु-
र्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः॥अपना वचन छोड़कर, मेरी प्रतिज्ञा सच करने के लिए जो रथ से कूद पड़े और रथ का पहिया उठाकर मेरी ओर ऐसे दौड़े, जैसे हाथी को मारने सिंह; उस समय धरती काँप रही थी और उनका दुपट्टा गिर गया था।
VedikMARG पर आगे पढ़ें
देवता
- श्री कृष्ण — श्रीकृष्ण के पाठ और तीर्थ
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
भक्ति-पाठ
- विष्णु सहस्रनाम — भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को दिया गया स्तोत्र (महाभारत, अनुशासनपर्व)
स्रोत
- महाभारत — समीक्षित पाठ (Critical Edition, BORI, Poona, 1933–66), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), BORI (सं.) (1999) · 6.55.70–100; 13.135.1–6
- Sriman Mahabharatam, mainly based on the South Indian texts — Bhishmaparva (6) — T. R. Krishnacharya, T. R. Vyasacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1908) · भीष्मपर्व, अध्याय 59, पृ. 99 (scan leaf n107)
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 1.9.29–44
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · स्कंध 1, पृ. 17–18 (scan leaf n48–n49)
