नंदनार
जो रोज़ कहते रहे "कल चिदंबरम् जाऊँगा", और जिनके लिए शिव ने नंदी को हटा दिया
संक्षेप में
वे शिव-मंदिरों के द्वार के बाहर खड़े होकर नाचते-गाते थे। चिदंबरम् जाने की तड़प थी, पर हर दिन कहते: कल जाऊँगा। पेरिय पुराणम् उन्हें इसी नाम से पुकारता है: तिरुनाळैप्पोवार्, यानी "कल जाने वाले"। यही नंदनार थे, जिनके लिए शिव ने तिरुप्पुन्कूर में नंदी को हटा दिया था।
भगवान शिव के भक्तभक्त-चरित ग्रंथों के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | भक्त-चरित ग्रंथों के भक्त | पेरिय पुराणम्, मूल तमिल (Project Madurai), सर्ग 4.4, पद 1046–1082; पेरिय पुराणम्, भाग 1 (Nallaswami Pillai अनु.), Divisions of the Book, p. 5 |
| कथा किस ग्रंथ में | पेरिय पुराणम् | पेरिय पुराणम्, मूल तमिल (Project Madurai), सर्ग 4.4, पद 1046–1082 |
कथा किन ग्रंथों में है
पेरिय पुराणम्, मूल तमिल
नंदनार की कथा सेक्किऴार के पेरिय पुराणम् में "तिरुनाळैप्पोवार् नायनार पुराणम्" नाम से 37 पदों में है। उनसे पहले सुंदरर ने अपने पद में "नाळैप्पोवान्" का नाम शिव के प्रिय भक्तों में लिया है; Kingsbury लिखते हैं कि यही नंदन हैं। नल्लस्वामी पिल्लै के अनुसार पेरिय पुराणम् की कथाओं में नंदनार और कन्नप्प की कथाएँ सबसे लोकप्रिय कथाओं में हैं।
पृष्ठभूमि
आदनूर के नंदनार
कोल्लिडम् नदी के उपजाऊ किनारे पर मेर्का नाडु में आदनूर गाँव था, और उसके बाहर, खेतों के पास, खेत-मज़दूरों की बस्ती: छोटी फूस की झोंपड़ियाँ, जिनकी छतों पर लौकी की बेलें चढ़ी थीं। उसी बस्ती में नंदनार रहते थे, गाँव की सेवा का पुश्तैनी काम करने वाले कुल में जन्मे।
होश सँभालते ही उनका मन चंद्रमा धारण करने वाले शिव में लग गया, और कोई दूसरा विचार नहीं आया। गाँव से नगाड़े बजाने की सेवा के बदले मिली ज़मीन से गुज़ारा करते, और अपना काम ही भगवान की सेवा बना लिया: हर शिव-मंदिर को नगाड़ों और दूसरे बाजों के लिए चमड़ा और तस्मे, वीणा और याऴ के लिए तार, और पूजा के लिए गोरोचन देते।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
नंदनार मंदिरों के भीतर नहीं जाते थे। वे द्वार के बाहर खड़े होकर, उमड़ते प्रेम में नाचते और गाते थे। उनकी झिझक उनकी अपनी थी: अपने जन्म को वे भगवान तक पहुँचने में रुकावट मानते थे। पर पेरिय पुराणम् उन्हें "तिरुत्तोण्डर्", यानी पवित्र सेवक, कहकर ही पुकारता है।
प्रमुख कथाएँ
तिरुप्पुन्कूर के नंदी
मूल ग्रंथ मेंतिरुप्पुन्कूर के शिव, शिवलोकनाथ, के चरणों की याद में वे आदनूर से वहाँ अपनी सेवा देने पहुँचे। उनकी इच्छा थी कि द्वार से ही सीधे भगवान के दर्शन करें और गाएँ। पर बीच में नंदी (बैल) बैठे थे। तब भगवान ने कृपा करके उस बैल को हटने का आदेश दिया, ताकि उनका भक्त सीधे उन्हें देख सके।
दर्शन करके लौटते हुए उन्होंने पास में एक गड्ढा देखा, और प्रेम से वहाँ तालाब खोदने लगे। भगवान की कृपा से तालाब पूरा हुआ; फिर मंदिर की परिक्रमा करके, नाचते हुए वे अपने गाँव लौट गए।
"कल जाऊँगा"
मूल ग्रंथ मेंकई तीर्थों की सेवा के बाद उनके मन में चिदंबरम् (तिल्लै) के नटराज के दर्शन की तड़प उठी। रात भर नींद न आई। सुबह सोचते: मेरे कुल का वहाँ पहुँचना ठीक नहीं; शायद यही भगवान की इच्छा है; और रुक जाते। पर प्रेम बढ़ता जाता, और वे कहते: नाळैप् पोवेन्, कल जाऊँगा।
"कल जाऊँगा" कहते-कहते दिन बीतते रहे, फिर सहा न गया। जन्म के बंधन से छूटने के लिए वे सचमुच चल पड़े, और खेतों से घिरे तिल्लै के पास पहुँचे। नगर की सीमा पर प्रणाम किया; पर वहाँ यज्ञों की आग, उठता धुआँ, वेद-पाठ के मठ देखकर, अपने कुल को याद करके डर गए और भीतर नहीं गए।
नगर की दीवार के बाहर ही, हाथ जोड़े, पिघलते मन से वे उस पवित्र सीमा की परिक्रमा करने लगे, दिन और रात। थककर सोचते कि सभा में नाचते भगवान के दर्शन कैसे होंगे, और यही दुख लिए सो जाते कि यह जन्म ही रुकावट है।
अग्नि से मुनि-रूप में
मूल ग्रंथ मेंसभा में नाचने वाले भगवान ने उनका दुख जाना, और सपने में मुस्कुराते हुए प्रकट होकर कहा: यह जन्म छूट जाए, इसके लिए अग्नि में डुबकी लगाओ, और यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मणों के साथ मेरे सामने आओ। उसी तरह उन्होंने तिल्लै के ब्राह्मणों को भी अग्नि तैयार करने की आज्ञा दी।
ब्राह्मण भगवान की आज्ञा मानकर नंदनार के पास आए और बोले: स्वामी, नटराज की कृपा से हम आपके लिए अग्नि तैयार करने आए हैं। नंदनार ने हाथ जोड़कर कहा: मेरा उद्धार हो गया। दक्षिणी दीवार के बाहर, द्वार के सामने बने अग्नि-कुंड की उन्होंने भगवान के चरणों का ध्यान करते हुए परिक्रमा की।
हाथ जोड़कर, नाचते चरणों का स्मरण करते हुए वे अग्नि में प्रवेश कर गए। उसी क्षण उनकी यह देह छूट गई, और वे एक पुण्य मुनि के रूप में, चमकते यज्ञोपवीत और जटा के साथ, उठ खड़े हुए। आकाश में दुंदुभि बजी, देवताओं ने फूल बरसाए, और तिल्लै के ब्राह्मणों ने हाथ जोड़े।
फिर ब्राह्मणों के साथ वे गोपुर को प्रणाम करके भीतर गए, नटराज के नृत्य-स्थान तक पहुँचे, और उसके बाद किसी को दिखाई नहीं दिए। ब्राह्मण अचरज में पड़ गए, और भगवान ने उन्हें सदा अपने चरणों में रहने का वर दिया।
ग्रंथों में अंतर
पेरिय पुराणम् में किसी ज़मींदार या मालिक का प्रसंग नहीं है, जो नंदनार को चिदंबरम् जाने से रोकता हो। मूल कथा में रुकावट केवल नंदनार की अपनी झिझक है, और अंत में भगवान स्वयं राह बनाते हैं।
भक्ति और शरणागति की सीख
भगवान ख़ुद राह बनाते हैं
दो बार कथा एक ही बात कहती है: नंदनार दूरी पर खड़े रहे, और भगवान ने दूरी हटाई। तिरुप्पुन्कूर में भक्त भीतर नहीं गया, तो नंदी हट गए; चिदंबरम् में वह नगर की दीवार के बाहर रुका, तो भगवान ने सपने में आकर राह बताई और ब्राह्मणों को स्वयं उसकी सेवा में भेजा।
"कल जाऊँगा" टालने की आदत नहीं, एक प्रेम की बेचैनी थी: रोज़ का "कल" उनकी चाह को बढ़ाता गया, जब तक वे सचमुच चल नहीं पड़े।
परंपरा में स्थान
Krishna Sastri (1916) लिखते हैं कि तीर्थ के रूप में चिदंबरम् माणिक्कवाचकर और नंदनार दोनों से गहरा जुड़ा है, जिन्हें वहीं मुक्ति मिली। Francis के South Arcot Gazetteer (1906) के अनुसार चिदंबरम् का होमकुलम् तालाब वह स्थान माना जाता है जहाँ नंदनार ने अग्नि-प्रवेश से पहले स्नान किया था।
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देवता
- श्री शिव — भगवान शिव के पाठ और आरती
संत
- सुंदरर (सुंदरमूर्ति) — जिनके पद में "नाळैप्पोवान्" का नाम आता है
स्रोत
- Periya Puranam (Tiruttondar Puranam) of Sekkizhar, Kandam 1, Sarukkam 4–5 — Tamil text — सेक्किऴार; e-text: Project Madurai · सर्ग 4.4, पद 1046–1082
- Hymns of the Tamil Saivite Saints — F. Kingsbury, G. E. Phillips (अनु.) (1921) · p. 73 (सुंदरर का पद)
- South-Indian Images of Gods and Goddesses — H. Krishna Sastri, Government Press, Madras (1916) · p. 89
- Madras District Gazetteers: South Arcot — W. Francis, Government Press, Madras (1906) · Chidambaram, p. 274
- Periyapuranam (The Lives of Saiva Saints) of St. Sekkilar, Part I — J. M. Nallaswami Pillai (अनु.), Tamil University Publishing House, Madras (1924) · pp. 5, 140
