लक्ष्मण

राम के छाया-से भाई, जिन्होंने कहा: मेरे गुरु, पिता, माता, सब कुछ आप ही हैं

संक्षेप में

लक्ष्मण राजा दशरथ और सुमित्रा के पुत्र, राम के छोटे भाई थे, जो उनके साथ चौदह बरस वन में रहे। उन्होंने राम से कहा कि धनुष लेकर आगे-आगे रास्ता दिखाऊँगा, फल-मूल लाऊँगा, और आप सोएँ या जागें, सब काम मैं करूँगा। माँ सुमित्रा ने उन्हें विदा करते हुए कहा: राम को दशरथ और सीता को मुझे जानना।

श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त

एक नज़र में

लक्ष्मण — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण-महाभारत के भक्तवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.28.1; 2.35.3–4
कथा किस ग्रंथ मेंवाल्मीकि रामायण, रामचरितमानसवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.28; 2.35; 2.44–2.45; 4.6; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), अयोध्याकाण्ड, दोहा 70–72, पृ. 167 (scan leaf n179)
भाईभरतवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.28.6

कथा किन ग्रंथों में है

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस

लक्ष्मण रामायण में शुरू से अंत तक राम के साथ हैं। उनकी भक्ति सबसे साफ़ अयोध्याकाण्ड में दिखती है, जब वे राम के साथ वन जाने की प्रार्थना करते हैं, और माँ सुमित्रा उन्हें विदा करती हैं। रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास यही प्रसंग अपने शब्दों में कहते हैं।

पृष्ठभूमि

वन जाने की प्रार्थना

राम ने पहले लक्ष्मण को रोकना चाहा: तुम मेरे साथ चले गए, तो माँ कौसल्या और सुमित्रा का भरण कौन करेगा? लक्ष्मण बोले: आपके तेज से भरत उनकी पूजा करेंगे; और माता कौसल्या तो मुझ जैसे हज़ारों का भरण कर सकती हैं। मैं धनुष-बाण, कुदाल और टोकरी लेकर आपके आगे-आगे रास्ता दिखाता चलूँगा, रोज़ फल-मूल लाऊँगा; आप सीता के साथ पर्वतों पर विहार करें, और आप जागें या सोएँ, सब काम मैं करूँगा।

यह सुनकर राम बहुत प्रसन्न हुए और कहा: सबसे विदा लेकर आओ, और गुरु के घर रखे वरुण के दिए दिव्य धनुष, कवच, तरकश और तलवारें ले आओ।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

रामचरितमानस में राम लक्ष्मण को अयोध्या में रहकर माता-पिता की सेवा करने को कहते हैं, तो लक्ष्मण व्याकुल होकर चरण पकड़ लेते हैं: नाथ, मैं दास हूँ, आप स्वामी; आप छोड़ दें तो मेरा क्या बस? मैं गुरु, पिता, माता किसी को नहीं जानता; जगत में जहाँ तक स्नेह, प्रीति, भरोसा और ज्ञान है, मेरे लिए सब एक आप ही हैं।

प्रमुख कथाएँ

माँ सुमित्रा का उपदेश

मूल ग्रंथ में

वन जाते समय लक्ष्मण ने माँ सुमित्रा के चरण छुए। रोती हुई माँ ने उनका सिर सूँघकर कहा: तुम्हें वन में रहने के लिए ही रचा गया है; बड़े भाई राम के साथ जाते हुए उनकी रक्षा में कभी चूक मत करना। संकट हो या समृद्धि, यही तुम्हारी गति हैं; बड़े भाई के कहे में रहना ही सज्जनों का धर्म है।

और फिर वह प्रसिद्ध वचन: राम को दशरथ जानो, सीता को मुझे जानो, और वन को अयोध्या जानो; बेटा, सुख से जाओ।

जागता सेवक

मूल ग्रंथ में

वनवास की पहली रात शृंगवेरपुर में लक्ष्मण ने राम के लिए जल लाया, धरती पर सोए राम और सीता के पैर धोए, और पेड़ के सहारे खड़े होकर रात भर जागते रहे। गुह ने कहा कि तुम सो जाओ, हम रक्षा करेंगे; पर लक्ष्मण बोले: जब राम सीता के साथ धरती पर सो रहे हों, तो मुझे नींद, जीवन या कोई सुख कैसे मिल सकता है?

सीता के आभूषण

मूल ग्रंथ में

किष्किन्धा में सुग्रीव ने सीता के गिराए वस्त्र और आभूषण दिखाए, तो राम आँसुओं में डूबकर धरती पर गिर पड़े और लक्ष्मण से बोले: देखो लक्ष्मण, हरी जाती वैदेही ने ये उत्तरीय और आभूषण गिराए हैं।

ग्रंथों में अंतर

लक्ष्मण रेखा: सीता की रक्षा के लिए खींची गई रेखा की कथा लोक में बहुत प्रसिद्ध है। वाल्मीकि रामायण में यह नहीं है; रामचरितमानस में भी इसका केवल एक उल्लेख है, लंकाकाण्ड में मंदोदरी रावण से कहती है: "रामानुज लघु रेख खँचाई। सोउ नहिं नाँघेहु असि मनुसाई॥", राम के छोटे भाई की खींची छोटी-सी रेखा भी तुम नहीं लाँघ सके, ऐसी है तुम्हारी वीरता।

लक्ष्मण का प्रसिद्ध उत्तर, "मैं केयूर नहीं पहचानता, कुंडल नहीं पहचानता; नूपुर पहचानता हूँ, क्योंकि रोज़ उनके चरणों में प्रणाम करता था", समीक्षित पाठ में नहीं है। यह दक्षिण भारत की प्रतियों में है; कृष्णाचार्य संस्करण (1905) में किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 6, श्लोक 21।

भक्ति और शरणागति की सीख

सेवा ही भक्ति

लक्ष्मण ने राज-महल छोड़कर चौदह बरस भाई की सेवा चुनी, और वाल्मीकि उनके हर वचन में यही भाव दिखाते हैं: आगे चलकर रास्ता दिखाना, फल लाना, रात भर जागना। सुमित्रा का वचन इसकी जड़ है: राम में पिता, सीता में माँ, और वन में अयोध्या देखना।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

सुमित्रा: राम को दशरथ जानो

रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम्। अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम्॥

राम को दशरथ जानो, जनक की बेटी सीता को मुझे जानो, और वन को अयोध्या जानो; बेटा, सुख से जाओ।

वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड, समीक्षित पाठ 2.35.8

मानस: मेरे सब कुछ आप

गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥ जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निपुनाई॥ मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥

हे नाथ, मैं सच कहता हूँ, विश्वास कीजिए: मैं गुरु, पिता, माता, किसी को नहीं जानता। संसार में जहाँ तक स्नेह, नाते, प्रीति, भरोसा और वेदों की निपुणता है, हे दीनबंधु, हृदय की जानने वाले स्वामी, मेरे लिए वह सब एक आप ही हैं।

रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 71 के बाद की चौपाई

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देवता

स्रोत

लक्ष्मण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न