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सभी संत और भक्त-कवि (43)
43 नाम
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महिला संत और संत-कवयित्रियाँ
भक्ति की परंपरा में स्त्रियों की वाणी भी उतनी ही ऊँची रही है। इस कोश की सूची में 7 महिला संत हैं: मीराबाई, संत जनाबाई, संत बहिणाबाई, अक्का महादेवी, अंडाल, गंगासती, लल्लेश्वरी (लाल देद)।
भक्तमाल: संतों की पुरानी माला
उत्तर भारत के भक्तों को याद रखने वाली माला है नाभादास की "भक्तमाल"। बाद में अलग-अलग भाषाओं में लिखे ज़्यादातर भक्त-चरित इसी पर आधारित हैं। इसमें हर भक्त पर एक छोटा-सा छप्पय है, जो उनके सबसे बड़े गुण की प्रशंसा करता है। तुलसीदास जैसे सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के वैष्णव कवियों का सबसे पुराना उल्लेख भी इसी में मिलता है।
बाद में प्रियादास ने संवत् 1769 (1713 ई.) में इस पर "भक्तिरसबोधिनी" टीका लिखी। भक्तों के जीवन की ज़्यादातर कथाएँ इसी टीका में हैं, मूल छप्पयों में नहीं।
भक्तमाल कब लिखी गई, इस पर पुराने विद्वान भी एकमत नहीं। Macauliffe इसे लगभग 1578 ई. का मानते हैं। Growse लिखते हैं कि आज जो पाठ हमारे पास है, उसे नाभादास के शिष्य नारायणदास ने शाहजहाँ के समय में संपादित किया था, या शायद पूरा उन्होंने ही लिखा।
Macauliffe यह भी कहते हैं कि भक्तमाल तिथियों पर लगभग चुप है। इसलिए इस ज्ञानकोश में भक्तमाल को भक्तों की परंपरा का सबसे पुराना साक्षी माना गया है, इतिहास की तिथियों का नहीं। नीचे इसके पाँच छप्पय हैं: पहले मूल पाठ, फिर उसका सरल अर्थ।
कबीर पर
कबीर कानि राखी नहीं, वर्णाश्रम षट्दरसनी॥
भक्ति विमुख जो धर्म, सो अधरम करि गायो।
जोग जग्य व्रत दान, भजन बिनु तुच्छ दिखायो॥
हिन्दू तुरक प्रमान, रमैनी शबदी साखी।
पक्षपात नहिं वचन, सबही के हित की भाखी॥
आरूढ़ दसा ह्वै जगत् पर, मुखदेखी नाहिन भनी।
कबीर कानि राखी नहीं, वर्णाश्रम षट्दरसनी॥कबीर ने वर्ण-आश्रम और छह दर्शनों की मर्यादा का बोझ नहीं ढोया। भक्ति से मुँह मोड़ने वाले धर्म को उन्होंने अधर्म कहा, और भजन के बिना योग, यज्ञ, व्रत और दान को तुच्छ बताया। उनकी रमैनी, सबद और साखी हिंदू और तुर्क, दोनों के लिए प्रमाण हैं। उन्होंने पक्षपात के बिना सबके हित की बात कही। ऊँची अवस्था में पहुँचकर भी उन्होंने दुनिया को देखकर मुँहदेखी बात नहीं कही।
रैदास पर
सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की॥
सदाचार श्रुति शास्त्र, वचन अविरुद्ध उचार्यो।
नीर खीर विवरन, परम हंसनि उर धार्यो॥
भगवत् कृपा प्रसाद, परमगति इहि तन पाई।
…
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज वन्दहिं जासु की।रैदास की निर्मल वाणी संदेह की गाँठें खोलने में निपुण है। उन्होंने सदाचार, श्रुति और शास्त्र के अनुकूल वचन कहे। दूध और पानी को अलग करने वाले हंस जैसा उनका विवेक परमहंसों ने भी हृदय में रखा। भगवान की कृपा से उन्होंने इसी शरीर में परम गति पाई। लोग वर्ण-आश्रम का अभिमान छोड़कर उनके चरणों की धूल को प्रणाम करते हैं।
सूरदास पर
सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै॥
उक्ति चोज अनुप्रास, वरन अस्थिति अति भारी।
वचन प्रीति निर्वाह, अर्थ अद्भुत तुक धारी॥
प्रतिबिम्बित दिवि दृष्टि, हृदय हरि लीला भासी।
जनम करम गुन रूप, बसै रसना परकासी॥
विमल बुद्धि गुन और की, जो यह गुन श्रवननि धरै।
सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै॥सूर की कविता सुनकर ऐसा कौन कवि है, जो सराहना में सिर न हिलाए? उनकी उक्तियों में चमत्कार है, अनुप्रास है, और शब्दों का सधा हुआ विन्यास है। वचनों में प्रेम का निर्वाह है, अर्थ अद्भुत है और तुक सधी हुई है। उनकी दिव्य दृष्टि में, उनके हृदय में हरि की लीला झलकती थी। भगवान के जन्म, कर्म, गुण और रूप उनकी जीभ पर बसकर प्रकट होते थे। जो इन गुणों को कानों से सुनता है, उसकी बुद्धि भी निर्मल हो जाती है।
मीरा पर
लोकलाज कुल शृंखला, तजि मीरा गिरिधर भजी॥
सदृश गोपिका प्रेम, प्रगट कलिजुगहिं दिखायौ।
निरअंकुश, अति निडर, रसिक जस रसना गायौ॥
दुष्टनि दोष विचारि, मृत्यु को उद्यम कीयौ।
बार न बाँकौ भयौ, गरल अमृत ज्यौं पीयौ॥
भक्ति निसान बजायकै, काहू ते नाहिन लजी।
लोकलाज कुल शृंखला, तजि मीरा गिरिधर भजी॥लोक-लाज और कुल की ज़ंजीरें छोड़कर मीरा ने गिरिधर का भजन किया। गोपियों जैसा प्रेम उन्होंने कलियुग में सबके सामने दिखाया। बिना किसी अंकुश के, बिल्कुल निडर होकर, उन्होंने रसिक कृष्ण का यश गाया। दुष्टों ने उनमें दोष देखा और उन्हें मारने का उपाय किया, पर उनका बाल भी बाँका न हुआ: विष को उन्होंने अमृत की तरह पी लिया। भक्ति का डंका बजाकर भी वे किसी से नहीं लजाईं।
तुलसीदास पर
कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ॥
त्रेता काव्य निबन्ध, करी सतकोटि रमायन।
इक अक्षर उद्धरैं, ब्रह्म हत्यादि परायन॥
अब भक्तनि सुखदैन, बहुरि लीला विस्तारी।
रामचरन रसमत्त, रहत अहनिसि व्रतधारी॥
संसार अपार के पार को, सुगम रूप नवका लयौ।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ॥कलियुग के कुटिल जीवों के उद्धार के लिए वाल्मीकि ही तुलसी बनकर आए। त्रेता में उन्होंने सौ करोड़ श्लोकों की रामायण रची थी, जिसका एक अक्षर भी ब्रह्महत्या जैसे पाप में डूबे व्यक्ति को तार देता है। अब भक्तों को सुख देने के लिए उन्होंने वही लीला फिर से विस्तार से कही। वे राम के चरणों के रस में मग्न रहते, और दिन-रात अपने व्रत पर टिके रहते। संसार के अपार सागर को पार करने के लिए उन्होंने एक सुगम नाव बना दी।
रामानंद और उनके शिष्य — भक्तमाल के अनुसार
कबीर, रैदास, पीपा, धना और सेन को अक्सर एक ही गुरु के शिष्य कहा जाता है: स्वामी रामानंद। इसका सबसे पुराना आधार भक्तमाल का छप्पय 36 है। नाभादास लिखते हैं कि रामानंद ने रघुनाथ की तरह संसार को पार कराने वाला "दूसरा सेतु" बनाया।
छप्पय में उनके शिष्यों के नाम इस क्रम से हैं: अनंतानंद, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावती, नरहरि, पीपा, भावानंद, रैदास, धना, सेन, और सुरसुरा की पत्नी। साथ में लिखा है कि और भी शिष्य-प्रशिष्य थे, "एक ते एक उजागर"।
Macauliffe भी रैदास को "निश्चय ही" रामानंद का शिष्य और कबीर का समकालीन मानते हैं, पर साथ में यह भी कहते हैं कि रैदास की तिथि, माता-पिता और जन्मस्थान के बारे में कुछ भी पक्का पता नहीं।
यह गुरु-शिष्य संबंध परंपरा में बहुत पुराना है, पर इतिहास में इस पर प्रश्न भी उठे हैं। Westcott का मत है कि कबीर पंथ में कबीर का जन्म 1398 ई. शायद इसीलिए माना गया, ताकि वे चौदहवीं सदी के रामानंद के समकालीन ठहरें। इस कोश में यह संबंध "परंपरा" के label के साथ लिखा जाएगा।
गुरु ग्रंथ साहिब में भगतों की वाणी
गुरु अर्जन देव ने जब गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया, तो सिख गुरुओं की वाणी के साथ उन भक्तों की वाणी भी रखी, जिन्हें "भगत" कहा जाता है। Macauliffe के अनुसार इनमें जयदेव, नामदेव, त्रिलोचन, परमानंद, सधना, बेणी, रामानंद, धन्ना, पीपा, सैण (सेन), कबीर, रविदास और सूरदास हैं, और दो मुस्लिम संत भी: फ़रीद और भीखन।
मीराबाई का एक पद आम गुरु ग्रंथ साहिब में नहीं है। वह केवल "भाई बन्नो वाली बीड़" नाम की एक पुरानी प्रति में मिलता है।
एक बात पर ख़ास ध्यान रखना है। Macauliffe के अनुसार गुरु ग्रंथ साहिब में जिन सूरदास का पद है, वे सूरसागर के प्रसिद्ध सूरदास नहीं, बल्कि सूरदास "मदनमोहन" हैं, जिनका जन्म 1528 ई. में बताया गया है। भक्तमाल में भी दोनों के छप्पय अलग-अलग हैं। इसलिए इस कोश में गुरु ग्रंथ साहिब का वह पद सूरसागर वाले सूरदास के नाम से नहीं दिया जाएगा।
एक संत, कई तिथियाँ: कबीर का उदाहरण
संतों की तिथियाँ अक्सर पक्की नहीं होतीं। Westcott कबीर के बारे में लिखते हैं कि ऐतिहासिक महत्व वाली परंपराओं तक सीमित रहें, तो उनका जन्मस्थान, जन्म-तिथि, जन्म का धर्म, और वे विवाहित थे या नहीं, ये सब अनिश्चित रह जाते हैं। कथाएँ बहुत हैं, पर वे सटीक जानकारी की ज़रूरत पूरी नहीं करतीं।
नीचे की तालिका दिखाती है कि एक ही संत के लिए अलग-अलग स्रोत क्या कहते हैं। इसीलिए हर संत-पृष्ठ पर तिथि के साथ उसका आधार लिखा जाएगा: इतिहास, परंपरा, या "मत अलग-अलग"।
| मत | तिथि | स्रोत |
|---|---|---|
| कबीर पंथ की मान्यता | जन्म संवत् 1455 (1398 ई.), ज्येष्ठ पूर्णिमा; देह-त्याग संवत् 1575 (1518 ई.), मगहर | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 122; p. 139; Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 3, टिप्पणी 6 |
| Westcott (1907) | 1440–1518 ई.; उनके अनुसार 1518 "संभवतः ठीक" | Westcott, Kabir and the Kabir Panth, कालक्रम-तालिका (अध्याय I से पहले); p. 3, टिप्पणी 6 |
| भारत खंड चा अर्वाचीन कोश (मराठी), Macauliffe के हवाले से | देह-त्याग शक 1370 (1448 ई.) | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 140, टिप्पणी 1 |
इस कोश को कैसे पढ़ें
हर कथा, तिथि और योगदान के साथ एक छोटा label लगा होता है, जो बताता है कि बात कहाँ से आई है:
- संत की अपनी वाणी मेंबात संत की अपनी रचना में कही गई है।
- ऐतिहासिक प्रमाणउस समय के अभिलेख या स्वतंत्र प्रमाण से पक्की है।
- परंपरागत कथाभक्तों की परंपरा, टीका या चरित-ग्रंथ से आई कथा है। श्रद्धा की बात है, इतिहास का प्रमाण नहीं।
- क्षेत्रीय परंपराकिसी एक क्षेत्र या संप्रदाय की मान्यता है।
- आधुनिक विद्वानों का मतआधुनिक विद्वानों का विश्लेषण है।
- मत अलग-अलगस्रोत अलग-अलग बातें कहते हैं; सब रूप दिए गए हैं।
और हर पद या दोहे के साथ यह label, कि वह सचमुच उसी संत का है या नहीं:
- गुरु ग्रंथ साहिब मेंपद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है।
- प्रामाणिक संग्रह मेंपद संत की वाणी के किसी प्रामाणिक पुराने संग्रह में है।
- परंपरा से इनके नाम परपद गाया तो इनके नाम से जाता है, पर पुराने संग्रहों में नहीं मिला।
- रचयिता संदिग्धरचयिता पर ही संदेह है।
सनातन धर्म के और खंड
स्रोत
- The Sikh Religion: Its Gurus, Sacred Writings and Authors, vol. VI (Bhagats of the Granth Sahib) — Max Arthur Macauliffe (1909)
- The Rámáyana of Tulsi Dás — F. S. Growse (अनु.) (1914)
- श्रीभक्तमाल — नाभादास के मूल छप्पय, प्रियादास की भक्तिरसबोधिनी टीका सहित — नाभादास (मूल), प्रियादास (टीका, 1713 ई.) (1600)
- Kabir and the Kabir Panth — G. H. Westcott (1907)
