स्वामी रामानंद

वह गुरु, जिनके द्वार हर जाति के लिए खुले थे

संक्षेप में

स्वामी रामानंद वे गुरु माने जाते हैं, जिनके शिष्यों में एक जुलाहा था, एक चमार, एक नाई, एक जाट किसान और एक राजा: कबीर, रैदास, सेन, धन्ना और पीपा। नाभादास कहते हैं कि रघुनाथ की तरह उन्होंने भी संसार को पार कराने का दूसरा सेतु बनाया। उनके जीवन के बारे में बहुत कम पक्का ज्ञात है।

आचार्य एवं दार्शनिकरामानंदी परंपरागुरु ग्रंथ साहिब में वाणी

एक नज़र में

स्वामी रामानंद — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीआचार्य एवं दार्शनिकभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 35 ("श्रीरामानंद पद्धति प्रताप…"), पृ. 39; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 102–103
परंपरारामानंदी परंपरा, गुरु ग्रंथ साहिब में वाणीभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 35–36, पृ. 39; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 103–105; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 1; pp. 105–106
कालचौदहवीं सदी के अंत से पंद्रहवीं सदी के बीच माने जाते हैं; पक्की तिथि ज्ञात नहीं (मत अलग-अलग)Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 100–101; Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 3, टिप्पणी 6
शिष्य (परंपरागत कथा)संत कबीरदासभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39; प्रियादास की टीका, कवित्त 268–269, पृ. 70
शिष्य (परंपरागत कथा)संत रविदासभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39; प्रियादास की टीका, कवित्त 259–260, पृ. 69; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 316
शिष्य (परंपरागत कथा)संत धन्नाभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39; प्रियादास की टीका, कवित्त 308, पृ. 77; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 107–108
शिष्य (परंपरागत कथा)संत पीपाभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, 61; प्रियादास की टीका, कवित्त 283–285, पृ. 39, 72–73; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 112–113
शिष्य (परंपरागत कथा)संत सेनाभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 120

जीवन

गुरु-परंपरा

परंपरागत कथा

भक्तमाल के अनुसार रामानंद श्री-संप्रदाय की परंपरा में आए, जो रामानुजाचार्य से चली थी। नाभादास इस परंपरा में देवाचार्य, फिर हर्यानंद, फिर राघवानंद का नाम लेते हैं, और राघवानंद के बाद रामानंद। वे कहते हैं कि राघवानंद काशी में स्थिर हुए, और चारों वर्ण और आश्रमों में भक्ति दृढ़ की। Macauliffe भी लिखते हैं कि नाभादास रामानंद को रामानुज से चौथी पीढ़ी में रखते हैं।

Macauliffe के अनुसार रामानंद गौड़ ब्राह्मण थे और मैसूर के मेलकोट में जन्मे थे। वे यह भी लिखते हैं कि रामानंद के जीवन के बारे में "बहुत कम ज्ञात है", और भक्तमाल में भी उन पर बस डेढ़ पन्ना है।

Macauliffe एक कथा कहते हैं: रामानंद एक दिन बाग़ में फूल चुन रहे थे, जब राघवानंद ने उन्हें देखकर कहा कि तुम्हारी आयु पूरी होने वाली है। राघवानंद ने योग से उनकी मृत्यु की घड़ी टाल दी, और रामानंद उनकी सेवा में रहने लगे। बाद में वे तीर्थ-यात्रा पर निकले, और काशी के पंचगंगा घाट पर रहे।

अपना मार्ग

परंपरागत कथा

Macauliffe बताते हैं कि रामानुज के संप्रदाय में भोजन और पवित्रता के बड़े कड़े नियम थे: भोजन बनाते या खाते समय किसी की नज़र पड़ जाए, तो वह अशुद्ध माना जाता। लंबी यात्रा से लौटे रामानंद ने इन नियमों को उतनी कड़ाई से नहीं माना, और उनके संप्रदाय ने उन्हें अलग कर दिया।

तब गुरु राघवानंद की अनुमति से रामानंद ने अपना मार्ग चलाया। उसमें लक्ष्मी-नारायण की जगह सीता-राम की उपासना थी। Macauliffe के अनुसार रामानंद ने हर जाति के शिष्य स्वीकार किए, और कहा कि जो भगवान की एक ही तरह सेवा करते हैं, वे सब भाई हैं और साथ खा-पी सकते हैं।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

भगवान हृदय में

गुरु ग्रंथ साहिब में रामानंद का एक पद है। किसी ने उन्हें मंदिर में पूजा के लिए बुलाया, तो उन्होंने कहा: मैं कहाँ जाऊँ, मेरा मन तो घर में ही रम गया है। एक दिन मैं चंदन और सुगंध लेकर पूजा को चला था, पर गुरु ने मेरे हृदय में ही भगवान दिखा दिए। जहाँ जाता हूँ, वहाँ पानी और पत्थर ही मिलते हैं, पर तुम तो सबमें समाए हो।

Macauliffe के अनुसार रामानंद पूजा के बाहरी रूपों को ज़रूरी नहीं मानते थे, और भगवान का नाम निरंतर लेने को सबसे बड़ा साधन बताते थे।

रचनाएँ और ग्रंथ

गुरु ग्रंथ साहिब मेंगुरु ग्रंथ साहिब में एक पद (राग बसंत) — रामानंद का एक पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। Macauliffe ने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद दिया है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

परंपरागत कथानाभादास के अनुसार रामानंद ने रघुनाथ की तरह संसार को पार कराने का "दूसरा सेतु" बनाया। उनके शिष्यों में अनंतानंद, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावती, नरहरि, पीपा, भावानंद, रैदास, धना और सेन थे, और ये सब, नाभादास कहते हैं, "एक ते एक उजागर" थे।

आधुनिक विद्वानों का मतरामानंद से जुड़े शिष्य समाज के हर हिस्से से थे: कबीर जुलाहे, रैदास चमार, सेन नाई, धन्ना जाट किसान और पीपा राजा। Macauliffe इसे उनके खुले द्वार का प्रमाण मानते हैं।

विरासत और प्रभाव

Macauliffe लिखते हैं कि उनके समय तक रामानंद के बहुत-से अनुयायी फिर से जाति के नियम कड़ाई से मानने लगे थे, और रामानुजियों से उनका अंतर बस तिलक और सीता-राम की उपासना में रह गया था।

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तीर्थ

  • काशी — जहाँ पंचगंगा घाट पर रामानंद रहे

स्रोत

स्वामी रामानंद — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न