संत कबीरदास
काशी के जुलाहे संत, जिन्होंने राम को हर घट के भीतर बताया
संक्षेप में
काशी में एक जुलाहा करघे पर ताना-बाना बुनता था, और मन में राम का नाम। यही संत कबीर थे। उन्होंने कहा कि राम मंदिर या मस्जिद में नहीं, हर घट के भीतर है, जैसे कस्तूरी हिरन की अपनी नाभि में होती है। उनकी साखियाँ और पद पाँच सौ साल से लोगों की ज़ुबान पर हैं।
निर्गुण भक्ति संतकबीर पंथगुरु ग्रंथ साहिब में वाणी
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | निर्गुण भक्ति संत | कबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), पद 49, पृ. 104; कबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), प्रस्तावना, पृ. 13 |
| परंपरा | कबीर पंथ, गुरु ग्रंथ साहिब में वाणी | Westcott, Kabir and the Kabir Panth, pp. 1–3; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 1; pp. 142–315 |
| काल | पंद्रहवीं सदी से सोलहवीं सदी की शुरुआत तक; पक्की तिथियाँ विवादित (मत अलग-अलग) | Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 3, टिप्पणी 6; कबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), प्रस्तावना, पृ. 19–23; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 122; pp. 139–140 |
| गुरु (परंपरागत कथा) | स्वामी रामानंद | भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39; प्रियादास की टीका, कवित्त 268–269, पृ. 70 |
| समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा) | संत रविदास | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 316; p. 141 |
| इनसे प्रेरित (आधुनिक विद्वानों का मत) | दादू दयाल | Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 1; दादू दयाल की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 3 |
जीवन
करघा और राम-नाम
संत की अपनी वाणी मेंकबीर ने अपने माता-पिता का नाम कहीं नहीं लिया। अपने बारे में उन्होंने जो कहा, उसमें बस इतना है कि वे जात के जुलाहे हैं और काशी में रहते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब के एक पद में वे कहते हैं: "जाति जुलाहा मति का धीरु। सहजि सहजि गुन रमै कबीरु", यानी जात से जुलाहा, पर मन से धीर, और कबीर धीरे-धीरे, सहज भाव से हरि के गुणों में रमता है।
भक्तमाल की टीका में प्रियादास कबीर के काम का सुंदर चित्र देते हैं: वे ताना-बाना बुनते, और हृदय में राम मँडराते रहते। उतना ही काम करते, जितने में शरीर का निर्वाह हो जाए। बाक़ी समय भक्ति में जाता।
जन्म की कथा
परंपरागत कथाकबीर के जन्म की जो कथा सबसे ज़्यादा सुनाई जाती है, वह परंपरा की है। काशी में एक ब्राह्मण स्वामी रामानंद के बड़े भक्त थे। वे अपनी विधवा बेटी को लेकर स्वामीजी के दर्शन करने गए। बेटी ने प्रणाम किया, तो स्वामीजी ने अनजाने में उसे "पुत्रवती हो" का आशीर्वाद दे दिया।
जब पिता ने बताया कि बेटी विधवा है, तो स्वामीजी ने कहा कि वचन अब लौट नहीं सकता, पर इससे जो पुत्र होगा वह बड़ा प्रतापी होगा। बालक हुआ तो लोक-लाज के डर से माँ ने उसे लहर तालाब के किनारे छोड़ दिया। वहीं से नीरू नाम का एक जुलाहा अपनी पत्नी नीमा के साथ गुज़र रहा था। उनके कोई संतान न थी। उन्होंने बालक को उठाया, और उसे अपने बेटे की तरह पाला।
कबीर पंथ में एक दूसरी कथा भी चलती है: बालक लहर तालाब में कमल के फूल पर प्रकट हुआ, और वहीं नीमा ने उसे देखा। Westcott बताते हैं कि ये कथाएँ उन्होंने ज़्यादातर "कबीर कसौटी" नाम की एक पुस्तिका से लीं, जो 1885 में बंबई में छपी थी और कबीर पंथ के पाँच लोगों ने ग्रंथों और मौखिक परंपरा से तैयार की थी।
श्यामसुंदरदास का मत है कि कबीर का किसी विधवा ब्राह्मणी का पुत्र होना असंभव नहीं, पर रामानंद के आशीर्वाद वाली बात शायद बाद में जोड़ी गई, ताकि उस कन्या का कलंक मिट सके। Westcott भी लिखते हैं कि कबीर की किसी भी रचना में, जो सीधे उनकी मानी जा सके, जन्म की यह कथा नहीं है।
कब जन्मे, कब गए: तिथियों पर मतभेद
मत अलग-अलगकबीर पंथ में एक पद्य चलता है, जिसे कबीर के शिष्य धर्मदास का कहा जाता है: "चौदह सौ पचपन साल गए, चंद्रवार एक ठाठ ठए। जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥" इसी से कबीर का जन्म संवत् 1455 (1398 ई.) की ज्येष्ठ पूर्णिमा माना जाता है। श्यामसुंदरदास गणना करके कहते हैं कि उस साल ज्येष्ठ पूर्णिमा सोमवार को नहीं पड़ती, संवत् 1456 में पड़ती है।
देह-त्याग की भी दो तिथियाँ प्रसिद्ध हैं: संवत् 1505 और संवत् 1575 (1518 ई.)। दोनों में सत्तर साल का अंतर है। श्यामसुंदरदास ने मगहर के रौज़े पर किसी शिलालेख का पता किया, जिससे तिथि पक्की हो सके, पर वहाँ ऐसा कोई शिलालेख नहीं मिला। अंत में वे जन्म 1456 और देह-त्याग 1575 को ठीक मानते हैं, यानी 119 साल की आयु। वे ख़ुद मानते हैं कि इस पर बहुत लोगों को विश्वास नहीं होगा।
Westcott 1518 को संभवतः ठीक, पर 1398 को संदिग्ध मानते हैं। उनके अनुसार 1398 शायद इसलिए चुना गया, ताकि कबीर रामानंद के समकालीन ठहरें। वे अपनी ओर से 1440–1518 ई. देते हैं। इसलिए इस पृष्ठ पर कोई एक तिथि पक्की बताकर नहीं लिखी गई।
काशी छोड़कर मगहर
संत की अपनी वाणी मेंउन दिनों माना जाता था कि काशी में मरने वाले को मुक्ति मिलती है, और मगहर में मरने वाला नरक जाता है। कबीर ने इस मान्यता को कई जगह काटा। जीवन के अंत में वे सचमुच काशी छोड़कर मगहर चले गए। गुरु ग्रंथ साहिब के एक पद में वे ख़ुद कहते हैं: "बहुत बरष तप कीया कासी। मरनु भया मगहर की बासी॥"
मगहर, गोरखपुर से पश्चिम में है। Macauliffe के अनुसार कबीर वहाँ आमी नदी के किनारे एक संत की कुटिया में रहे। उनका एक और वचन है, जो इस पूरे प्रसंग का सार है: "जस कासी तस मगहर ऊसर, हृदय रामसति होई", यानी जिसके हृदय में राम सच्चे हैं, उसके लिए काशी और मगहर की बंजर धरती एक बराबर है।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
घाट की सीढ़ी पर राम-नाम
परंपरागत कथाकबीर चाहते थे कि स्वामी रामानंद उन्हें शिष्य बनाएँ। पर उन्हें डर था कि स्वामीजी उन्हें म्लेच्छ मानकर उनका मुँह भी न देखेंगे। रामानंद रोज़ रात के आख़िरी पहर गंगा-स्नान को जाते थे। कबीर उसी रास्ते में घाट की सीढ़ियों पर लेट गए।
अँधेरे में स्वामीजी का पैर कबीर पर पड़ा, और उनके मुँह से निकला: "राम!" कबीर ने उसी को गुरु का दिया मंत्र मान लिया। उन्होंने माथे पर तिलक लगाया और गले में माला पहन ली।
यह देखकर उनकी माँ ने बहुत शोर मचाया, और बात रामानंद तक पहुँची। स्वामीजी ने कहा, "उसे पकड़कर लाओ, मैंने कब उसे शिष्य बनाया?" कबीर लाए गए। परदे के पीछे से पूछने पर उन्होंने कहा कि राम-नाम ही वह मंत्र है जो सारे शास्त्रों में लिखा है। तब स्वामीजी ने परदा हटाया और उन्हें अपना लिया।
स्रोतों में अंतर
प्रियादास (1713 ई.) और कबीर कसौटी (1885), दोनों यह कथा लगभग एक-सी कहते हैं। Macauliffe दूसरी बात कहते हैं: पंडितों ने कबीर को "निगुरा", यानी बिना गुरु का, कहकर नीचा दिखाना चाहा, इसलिए कबीर ने रामानंद को खोजकर उनसे दीक्षा ली। भक्तमाल वाली कथा को उन्होंने छोड़ दिया है।
इतिहास की दृष्टि से यह संबंध पक्का नहीं है। Westcott के अनुसार कबीर की जन्म-तिथि 1398 शायद इसलिए मानी गई, ताकि वे रामानंद के समकालीन ठहरें।
बाज़ार में बिका नहीं, बँट गया कपड़ा
परंपरागत कथाएक दिन कबीर बाज़ार में कपड़ा बेचने बैठे थे। एक आदमी आया और बोला, "मेरा शरीर उघड़ा है, कुछ ढकने को दे दो।" कबीर कपड़ा फाड़कर आधा देने लगे। उसने कहा, आधे से काम नहीं चलेगा। कबीर ने पूरा कपड़ा दे दिया।
अब घर कैसे जाएँ? पत्नी, बेटा और माँ भूखे राह देख रहे होंगे। कबीर लज्जा से बाज़ार की दुकानों में छिपे रहे। प्रियादास कहते हैं कि तब भगवान को चिंता हुई, और वे ख़ुद बैलों पर अनाज लादकर तीन दिन बाद कबीर के घर डाल गए। माँ ने शोर मचाया कि मेरा बेटा किसी से दान नहीं लेता।
लोग कबीर को ढूँढकर घर लाए। जब उन्होंने सारी बात सुनी, तो समझ गए कि यह प्रभु की कृपा है, और सारा अनाज उसी घड़ी संतों में बाँट दिया।
स्रोतों में अंतर
Macauliffe में यही कथा कबीर कसौटी से है। वहाँ भगवान स्वयं नहीं आते, बल्कि एक अनाज के व्यापारी के मन में प्रेरणा डालते हैं कि वह कबीर के घर अनाज पहुँचा दे। प्रियादास में भगवान "बालद" यानी बैल लेकर स्वयं आते हैं।
बादशाह के दरबार में: "जानै न सलाम, जानै राम"
परंपरागत कथाप्रियादास के अनुसार कुछ ब्राह्मणों को कबीर का बढ़ता प्रभाव अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कबीर की माँ को भी साथ मिलाया, और बादशाह सिकंदर से शिकायत की कि इस आदमी ने सारे गाँव को परेशान कर रखा है।
कबीर दरबार में लाए गए। क़ाज़ी ने कहा, "सलाम करो।" प्रियादास लिखते हैं कि कबीर सलाम जानते ही न थे, वे तो बस राम को जानते थे, और राम में उनके पाँव गहरे गड़े थे।
फिर उन्हें ज़ंजीरों में बाँधकर गंगा में डुबोया गया, पर वे किनारे पर जीवित खड़े दिखे। लकड़ियों में आग लगाई गई, तो उनकी देह सोने-सी दमक उठी। अंत में एक मतवाला हाथी उन पर छोड़ा गया, पर वह पास नहीं आया और चिंघाड़कर भाग गया।
यह देखकर बादशाह उनके पैरों पर गिर पड़ा, और गाँव, देश, जो चाहें, देने की बात कही। कबीर ने कहा कि मुझे तो बस एक राम चाहिए, जिसे आठों पहर जपता हूँ; धन से मेरा कोई काम नहीं।
स्रोतों में अंतर
Macauliffe की कथा में शिकायत करने वाले शेख़ तक़ी और कुछ ब्राह्मण हैं। Westcott कहते हैं कि काल-क्रम देखते हुए शेख़ तक़ी का इस कथा में होना बहुत असंभव लगता है।
हाथी वाला प्रसंग गुरु ग्रंथ साहिब के एक पद में आता है, और गंगा में ज़ंजीर टूटने वाला प्रसंग भी एक दूसरे पद में: "गंग गुसाइन गहिर गँभीर। जंजीर बाँधि करि खरे कबीर॥" श्यामसुंदरदास बताते हैं कि हाथी वाला एक दूसरा पद, जिसे इस कथा का आधार कहा जाता है, उनकी पुरानी हस्तलिखित प्रतियों में नहीं मिलता।
मगहर में फूल
परंपरागत कथाप्रियादास कबीर की कथा इस तरह पूरी करते हैं: कबीर मगहर गए, वहाँ बहुत भक्ति-भाव दिखाया, फूल मँगवाए, उन पर लेट गए, और हरि में मिल गए।
स्रोतों में अंतर
Macauliffe एक लंबी कथा देते हैं। कबीर के देह-त्याग के बाद काशी के राजा बीरसिंह बघेला उनका दाह करना चाहते थे, और गोरखपुर के नवाब बिजली ख़ाँ उन्हें दफ़नाना चाहते थे। दोनों में झगड़ा हुआ। झगड़ा थमा, तो देखा गया कि देह की जगह सुगंधित फूल पड़े हैं। तब मुसलमानों ने वहाँ क़ब्र बनाई और हिंदुओं ने पास ही समाधि। प्रियादास में यह झगड़ा नहीं है।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
राम बाहर नहीं, भीतर है
कबीर बार-बार कहते हैं कि जिसे हम मंदिर, मस्जिद, तीर्थ और जंगल में ढूँढते हैं, वह हमारे भीतर ही है। कस्तूरी हिरन की नाभि में होती है, पर हिरन उसकी गंध के पीछे सारे जंगल में भटकता है। "ऐसैं घटि घटि रांम है, दुनियां देखै नांहिं।"
एक पद में वे कहते हैं: "खालिक खलक खलक मैं खालिक, सब घट रह्यौ समाई", यानी बनाने वाला अपनी बनाई दुनिया में है, और दुनिया उसमें। वही सब घटों में समाया है, तो कौन भला और कौन बुरा?
निर्गुण राम
कबीर के राम दशरथ के पुत्र वाले रूप तक सीमित नहीं हैं। वे कहते हैं, "निरगुण रांम निरगुण रांम जपहु रे भाई", उस राम को जपो जिसकी गति कोई नहीं जान सकता। श्यामसुंदरदास के अनुसार कबीर के राम से अर्थ निर्गुण ब्रह्म है।
कथनी नहीं, करनी
कबीर दिखावे की भक्ति से चिढ़ते हैं। वे पूछते हैं: अगर करनी ही न हो, तो कथनी से क्या हुआ? "कथणीं कथी तौ क्या भया, जे करणीं नां ठहराइ।" ऐसी बात कच्चे साँचे के किले जैसी है, जो देखते-देखते ढह जाता है।
माला पर भी उनकी साखियाँ यही कहती हैं: हाथ से माला फेरते रहो और मन चारों ओर दौड़ता रहे, तो माला काठ ही रह जाती है। पढ़ाई के बारे में भी वे यही कहते हैं: पोथियाँ पढ़-पढ़कर दुनिया मर गई, पर पंडित कोई न बना।
न हिंदू, न तुरक
कबीर दोनों धर्मों के बाहरी झगड़ों को टोकते हैं। एक ही बूँद से सब बने, एक ही चमड़ा, एक ही ज्योति, तो कौन ब्राह्मण और कौन शूद्र? उनका निष्कर्ष है: "कहै कबीर एक रांम जपहु रे, हिंदू तुरक न कोई।" एक दूसरे पद में वे कहते हैं, "हिंदू तुरक का करता एकै", दोनों का बनाने वाला एक है।
नाभादास ने भक्तमाल में कबीर का यही रूप याद किया है: कबीर ने वर्ण-आश्रम और छह दर्शनों की मर्यादा का बोझ नहीं ढोया, उनकी रमैनी, सबद और साखी हिंदू और तुर्क दोनों के लिए प्रमाण हैं, और उन्होंने पक्षपात के बिना सबके हित की बात कही।
प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ
निरगुण रांम जपहु रे भाई
निरगुण रांम निरगुण रांम जपहु रे भाई,
अबिगति की गति लखी न जाई॥ टेक॥
चारि बेद जाकै सुमृत पुरांनां, नौ व्याकरनां मरम न जांनां॥
सेस नाग जाकै गरड़ समांनां, चरन कंवल कंवला नहीं जांनां॥
कहै कबीर जाकै भेदै नांहीं, निज जन बैठे हरि की छाँहीं॥भाई, निर्गुण राम का जप करो; उस अविगत की गति कोई नहीं जान सकता। चारों वेद, स्मृतियाँ, पुराण और नौ व्याकरण भी उसका मर्म नहीं जान पाए। शेषनाग, गरुड़ और लक्ष्मी भी उसके चरण-कमलों का भेद नहीं जान पाए। कबीर कहते हैं कि जिसका कोई भेद ही नहीं, उसकी छाँव में उसके अपने जन चैन से बैठे हैं।
ऐसा भेद बिगूचन भारी
ऐसा भेद बिगूचन भारी॥
बेद कतेब दीन अरु दुनियां, कौंन पुरिष कौंन नारी॥ टेक॥
एक बूंद एकै मल मूतर, एक चाम एक गूदा।
एक जोति थैं सब उतपनां, कौंन बांम्हन कौंन सूदा॥
माटी का प्यंड सहजि उतपनां, नाद रु ब्यंद समांनां।
बिनसि गयां थैं का नांव धरिहौ, पढ़ि गुनि भ्रंम जांनां॥
रज गुन ब्रह्मा तम गुन संकर, सत गुन हरि है सोई।
कहै कबीर एक रांम जपहु रे, हिंदू तुरक न कोई॥यह भेद-भाव बड़ा भारी उलझाव है: वेद और कतेब, दीन और दुनिया, कौन पुरुष, कौन स्त्री। सब एक ही बूँद से बने, सबमें वही मल-मूत्र, वही चमड़ा, वही मांस। एक ही ज्योति से सब पैदा हुए, तो कौन ब्राह्मण और कौन शूद्र? मिट्टी का यह पिंड सहज बना और फिर मिट जाता है; मिट जाने पर इसका क्या नाम रखोगे? पढ़-लिखकर भी भ्रम ही हाथ आया। रजोगुण में वही ब्रह्मा है, तमोगुण में शंकर और सतोगुण में हरि। कबीर कहते हैं, एक राम को जपो; उसके आगे न कोई हिंदू है, न तुर्क।
कस्तूरी कुंडलि बसै
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूंढै बन मांहि।
ऐसैं घटि घटि रांम है, दुनियां देखै नांहिं॥कस्तूरी हिरन की अपनी नाभि में बसती है, पर वह उसकी गंध के पीछे सारे जंगल में ढूँढता फिरता है। ठीक ऐसे ही राम हर घट में, हर शरीर के भीतर है, पर दुनिया उसे देख नहीं पाती।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सुपंडित होइ॥पोथियाँ पढ़-पढ़कर सारी दुनिया मर गई, पर सच्चा पंडित कोई न बना। जो प्रियतम (परमात्मा) का एक अक्षर भी पढ़ ले, वही सच्चा पंडित है। आज यह दोहा अक्सर "ढाई आखर प्रेम का" के रूप में सुनाया जाता है; श्यामसुंदरदास की पुरानी प्रति में पाठ "ऐकै अषिर पीव का" है।
कबीर माला काठ की
कबीर माला काठ की, कहि समझावै तोहि।
मन न फिरावै आपणां, कहा फिरावै मोहि॥काठ की माला ख़ुद तुम्हें समझा रही है: "अपने मन को तो तुम फेरते नहीं, मुझे क्या फेरते हो?" बहुत प्रसिद्ध दोहा "माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर" इसी भाव का है, पर श्यामसुंदरदास की पुरानी (संवत् 1561 वाली) प्रति में वह नहीं है; वह केवल बाद की प्रति में मिलता है, जिसे उन्होंने टिप्पणी में दिया है।
जाति जुलाहा मति का धीरु
जो जन लेहि खसम का नाउ। तिनकै सद बलिहारै जाउ॥
सो निर्मल निर्मल हरि गुन गावै। सो भाई मेरै मन भावै॥
जिहि घर राम रह्या भरपूरि। तिनकी पग पंकज हम धूरि॥
जाति जुलाहा मति का धीरु। सहजि सहजि गुन रमै कबीरु॥जो लोग स्वामी (परमात्मा) का नाम लेते हैं, मैं उन पर सदा बलिहारी जाता हूँ। जो निर्मल मन से हरि के गुण गाता है, वही भाई मेरे मन को भाता है। जिस घर में राम भरपूर बसा है, मैं उनके चरण-कमलों की धूल हूँ। मैं जात से जुलाहा हूँ, पर मन से धीर; कबीर सहज भाव से हरि के गुणों में रमता है।
काशी और मगहर
ज्यों जल छाड़ि बाहर भयो मीना। पूरब जनम हौं तप का हीना॥
अब कहु राम कवन गति मोरी। तजिले बनारस मति भइ थोरी॥
बहुत बरष तप कीया कासी। मरनु भया मगहर की बासी॥
कासी मगहर सम बीचारी। ओछी भगति कैसे उतरसि पारी॥
…मैं ऐसा हो गया हूँ, जैसे पानी से बाहर निकली मछली; शायद पिछले जन्म में मेरा तप कम रहा। राम, अब बताओ मेरी क्या गति होगी? लोग कहते हैं, बनारस छोड़ा तो मेरी बुद्धि थोड़ी हो गई। बहुत बरस काशी में तप किया, और मरने की घड़ी आई तो मगहर का वासी बना। मैंने काशी और मगहर को एक बराबर समझा, पर ओछी भक्ति से कोई कैसे पार उतरेगा? (पद की आख़िरी पंक्ति यहाँ छोड़ी गई है, क्योंकि उसका अर्थ अनुवादक अलग-अलग करते हैं।)
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंबीजक — कबीर की वाणी का एक बड़ा संग्रह। Ahmad Shah इसे कबीर की शिक्षा का सबसे प्रामाणिक लेखा मानते हैं। "बीजक" का एक अर्थ है वह नक़्शा, जिससे गड़ा हुआ ख़ज़ाना खोजा जाता है। इसकी भाषा बनारस, मिर्ज़ापुर और गोरखपुर के आसपास की बोली है, और उनके अनुसार इसका सबसे पुराना छपा संस्करण 1868 का है।
गुरु ग्रंथ साहिब मेंगुरु ग्रंथ साहिब में कबीर की वाणी — गुरु अर्जन देव ने कबीर के बहुत-से पद और श्लोक गुरु ग्रंथ साहिब में रखे। Macauliffe के अंग्रेज़ी अनुवाद में ये लगभग पौने दो सौ पृष्ठों में आते हैं।
प्रामाणिक संग्रह मेंकबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास, 1928) — काशी नागरीप्रचारिणी सभा का संस्करण। इसका मूल आधार संवत् 1561 की एक हस्तलिखित प्रति है, जो श्यामसुंदरदास के अनुसार काशी में मलूकदास ने खेमचंद के पढ़ने के लिए लिखी थी। संवत् 1881 की दूसरी प्रति में 131 दोहे और 5 पद अधिक हैं। गुरु ग्रंथ साहिब के जो पद इन प्रतियों में नहीं मिले, वे परिशिष्ट में दिए गए हैं।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
ऐतिहासिक प्रमाणकबीर की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। इससे उनके पद और श्लोक एक बहुत पुरानी और सुरक्षित परंपरा में बचे रहे।
आधुनिक विद्वानों का मतWestcott के अनुसार कई बाद के संत कबीर के ऋणी रहे: पंजाब में गुरु नानक, अहमदाबाद के दादू (1544), और अवध में सतनामी संप्रदाय के जगजीवनदास (1760)। गुरु नानक कई जगह कबीर के वचनों का समर्थन के साथ उल्लेख करते हैं।
आधुनिक विद्वानों का मतश्यामसुंदरदास कबीर को उस निर्गुण भक्ति-मार्ग का प्रमुख प्रवर्तक मानते हैं, जिसमें परमात्मा की एकता के आधार पर मनुष्यों की एकता की बात हुई, और जिसमें सेना, धना, पीपा और रैदास जैसे संत भी थे।
विरासत और प्रभाव
कबीर के नाम से कबीर पंथ चला। 1901 की जनगणना में 8,43,171 लोगों ने अपने को कबीरपंथी लिखवाया था, और Westcott के अनुसार असली संख्या इससे ज़्यादा रही होगी, क्योंकि कई कबीरपंथी रामानंदी लिखे गए।
कबीर पंथ की परंपरा में धर्मदास कबीर के प्रधान शिष्य और उत्तराधिकारी माने जाते हैं, और कहा जाता है कि उन्होंने संवत् 1521 में अपने गुरु के वचनों का संग्रह किया।
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भक्ति-पाठ
- श्री संत कबीर आरती — कबीर पंथ की आरती; छठे पद में धरमदास की छाप, कबीर की अपनी रचना नहीं
तीर्थ
- काशी — कबीर की नगरी
स्रोत
- कबीर-ग्रंथावली (नागरीप्रचारिणी ग्रंथमाला 33) — श्यामसुंदरदास (सं.) (1928) · भूमिका; प्रस्तावना पृ. 13–36; साखी और पद; परिशिष्ट
- श्रीभक्तमाल — नाभादास के मूल छप्पय, प्रियादास की भक्तिरसबोधिनी टीका सहित — नाभादास (मूल), प्रियादास (टीका, 1713 ई.) (1600) · छप्पय 36, 60; प्रियादास की टीका, कवित्त 268–281, पृ. 39, 70–72
- The Sikh Religion: Its Gurus, Sacred Writings and Authors, vol. VI (Bhagats of the Granth Sahib) — Max Arthur Macauliffe (1909) · pp. 1, 122–141, 316
- Kabir and the Kabir Panth — G. H. Westcott (1907) · अध्याय I, pp. 1–20
- The Bijak of Kabir — Ahmad Shah (अनु.) (1917) · Preface; pp. 29–30
