FAQ
लल्लेश्वरी (लाल देद) — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लल देद, जिन्हें लल्लेश्वरी या लल्ला योगीश्वरी भी कहते हैं, चौदहवीं सदी की कश्मीर की शैव योगिनी थीं। उनके कश्मीरी "वाख" आज भी हिंदू और मुसलमान, दोनों में प्रचलित हैं।
वाख लल देद के छोटे कश्मीरी पद हैं, जिनमें योग, शिव-भक्ति और भीतर की खोज की बात है। Grierson के अनुसार इनकी कोई प्रामाणिक हस्तलिपि नहीं बची; ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज़ुबानी चलते आए।
कश्मीर की कथाओं के अनुसार प्रसिद्ध शैव संत सेद बोयु, जिन्हें उन्होंने ससुराल छोड़ने के बाद गुरु बनाया। उनके एक वाख में गुरु का "एक वचन" है: बाहर से भीतर के अंतरतम में प्रवेश करो।
सारी परंपराएँ यही कहती हैं, और Grierson इसे असंभव नहीं मानते। सैयद अली 1380 ई. में कश्मीर आए। पर यह बात कि सैयद अली ने लल से प्रेरणा पाई, हिंदू श्रद्धा की है; मुसलमान इसे नहीं मानते।
लल देद के इस वाख का अर्थ है: मूर्ति भी पत्थर है, मंदिर भी पत्थर; अरे पंडित, तू किसकी पूजा करता है? अपने मन और प्राण को एक कर। यानी बाहर की पूजा से बढ़कर भीतर की साधना।
