लल्लेश्वरी (लाल देद)

कश्मीर की शैव योगिनी, जिनके वाख हिंदू और मुसलमान, दोनों की ज़ुबान पर हैं

संक्षेप में

सास उसकी थाली में पत्थर रखकर ऊपर से थोड़ा भात ढक देती, ताकि सबको लगे बहू ख़ूब खा रही है; बहू चुपचाप सह लेती। वही आगे चलकर लल देद बनी, कश्मीर की योगिनी, जिनके वाख आज भी हर कश्मीरी, हिंदू हो या मुसलमान, की ज़ुबान पर हैं।

कश्मीर शैव योगिनीमहिला संत / संत-कवयित्रीकश्मीर शैव परंपरा

एक नज़र में

लल्लेश्वरी (लाल देद) — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीकश्मीर शैव योगिनी, महिला संत / संत-कवयित्रीGrierson & Barnett, Lalla-Vakyani (1920), भूमिका, p. 1; Grierson & Barnett, Lalla-Vakyani (1920), भूमिका, pp. 1–2; Lawrence, The Valley of Kashmir (1895), p. 292
परंपराकश्मीर शैव परंपराGrierson & Barnett, Lalla-Vakyani (1920), भूमिका, p. 1
कालचौदहवीं सदी; परंपरा उन्हें सैयद अली हमदानी का समकालीन मानती है, जो 1380 ई. में कश्मीर आए (आधुनिक विद्वानों का मत)Grierson & Barnett, Lalla-Vakyani (1920), भूमिका, pp. 1, 3; Lawrence, The Valley of Kashmir (1895), p. 292

जीवन

"ग्रैनी लल"

आधुनिक विद्वानों का मत

Grierson और Barnett लिखते हैं कि कश्मीर में कहावतें और सूक्तियाँ बहुत हैं, पर किसी का यश लल देद ("दादी लल") की वाणी जितना नहीं। ऐसा कोई कश्मीरी नहीं, हिंदू हो या मुसलमान, जिसकी ज़ुबान पर उनके कुछ वाख न हों और जो उनकी स्मृति का आदर न करता हो। संस्कृत में उनका नाम लल्ला योगीश्वरी है।

उनके बारे में बहुत कम जाना जाता है। Grierson के अनुसार इतना ही कुछ भरोसे से कहा जा सकता है कि वे सचमुच थीं, शायद चौदहवीं सदी में, और अपने ही वाखों के अनुसार वे परमानंद में अर्धनग्न होकर गातीं और नाचती घूमती थीं।

ससुराल से निकलकर योगिनी

परंपरागत कथा

कश्मीर की कथाओं के अनुसार लल एक प्रतिष्ठित परिवार की विवाहिता थीं, और सास उन्हें लगभग भूखा रखती थी। एक कश्मीरी कहावत है: "बड़ी भेड़ कटे या छोटी, लल की थाली में तो पत्थर ही रहा।" सास थाली में बड़ा-सा पत्थर रखकर उसे पतले भात से ढक देती, ताकि दूसरों को लगे कि ढेर भरा है; फिर भी लल ने कभी शिकायत नहीं की।

सास ने पति के मन में शक भी डाला, पर पति पीछा करके पहुँचा तो लल प्रार्थना में बैठी मिलीं। अंत में सास उन्हें घर से निकलवाने में सफल हुई। फटे कपड़ों में घूमती लल ने कश्मीर के एक प्रसिद्ध शैव संत, सेद बोयु, को गुरु बनाया, और उनकी शिक्षा से वे घूमती योगिनी बन गईं।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

सैयद अली हमदानी और नानबाई का तंदूर

परंपरागत कथा

कथा कहती है कि जब सैयद अली हमदानी कश्मीर आए, तो लल ने उन्हें दूर से देखा और चिल्लाईं: "मैंने एक मर्द देखा है!" और भागकर एक नानबाई के जलते तंदूर में कूद गईं। सैयद अली ने पीछा करके पूछा, तो नानबाई की पत्नी ने डर के मारे इनकार कर दिया। तभी लल तंदूर से स्वर्ग के हरे वस्त्र पहने बाहर निकलीं।

जब लोगों ने उनके नग्न घूमने पर आपत्ति की, तो कथा के अनुसार उन्होंने कहा: मर्द तो वे ही हैं, जो भगवान से डरते हैं, और ऐसे बहुत कम हैं।

स्रोतों में अंतर

Lawrence लिखते हैं कि हिंदू मानते हैं कि सैयद अली ने अपनी प्रेरणा "लालिश्री" नाम की एक हिंदू स्त्री से पाई, जो एक देवी का अवतार थीं। मुसलमान इसे नहीं मानते, पर उनका नाम बड़े आदर से लेते हैं और उन्हें "लल देदी" कहते हैं। Grierson के अनुसार दोनों का समकालीन होना असंभव नहीं, पर प्रेरणा वाली बात हिंदू श्रद्धा की अतिशयोक्ति है।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

भीतर का शिव

Grierson के अनुसार लल कश्मीर शैव परंपरा की योगिनी थीं, पर कट्टर नहीं; उनके लिए सब धर्म अपने मूल तत्व में एक थे। उनके एक वाख का भाव है कि जब परम चेतना का सूरज चमकता है, तो जड़-चेतन, पूरा जगत, केवल शिव दिखता है, जैसे सूरज बर्फ़ को पानी में मिला देता है।

वाख 94 में वे बताती हैं कि गुरु ने उन्हें एक ही वचन दिया: "बाहर से भीतर के अंतरतम में प्रवेश करो।" यही उनका नियम बन गया, "और इसीलिए मैं नग्न होकर नाचने लगी।" Grierson समझाते हैं कि बाहरी जगत को माया जानकर और अपने भीतर के आत्मा को परमात्मा से एक पहचानकर, उन्होंने बाहर की हर चीज़, वस्त्र तक, छोड़ दी।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

देव वटा, दिवोरु वटा

देव वटा, दिवोरु वटा, प्येठ ब्वन छुय येक वाठ। पूज़ कस करख, होटा बटा! कर मनस त पवनस संगाठ॥ (Grierson का रोमन पाठ: dēv waṭā, diworu waṭā / pĕṭha bŏna chuy yēka wāṭh / pūz kas karakh, hōṭā baṭā! / kar manas ta pawanas sangāṭh)

मूर्ति भी पत्थर है, मंदिर भी पत्थर; ऊपर से नीचे तक दोनों एक ही चीज़ के बने हैं। अरे पंडित, तू किसकी पूजा करता है? अपने मन और प्राण-वायु को एक कर। Grierson समझाते हैं कि लल पत्थर-पूजा की जगह योग का "प्राणाग्निहोत्र", यानी प्राणों को वश में करने की साधना, बताती हैं।

परंपरा से इनके नाम परLallā-Vākyāni (1920), वाख 17, p. 39. देवनागरी पंक्तियाँ Grierson के रोमन पाठ का हमारा लिप्यंतरण हैं.

रचनाएँ और ग्रंथ

परंपरा से इनके नाम परलल्ला-वाक्यानि (लल के वाख) — Grierson के अनुसार लल की रचनाओं की कोई प्रामाणिक हस्तलिपि नहीं बची; निजी संग्रहों में से कोई भी पूरा नहीं, और कोई दो आपस में मेल नहीं खाते। 1914 में गुश गाँव के एक बूढ़े ब्राह्मण धर्मदास दरवेश ने ये वाख वैसे ही सुनाए, जैसे उन्हें कुल-परंपरा से मिले थे; उन्होंने वे शब्द भी नहीं बदले, जिनका अर्थ उन्हें ख़ुद नहीं पता था। Grierson और Barnett का संस्करण इसी पाठ पर टिका है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतGrierson के अनुसार लल देद की वाणी कश्मीर की साझी विरासत है: हिंदू उन्हें अपनी योगिनी मानते हैं, और घाटी के मुसलमान भी, जो सैयद अली को अपने धर्म का बड़ा प्रचारक मानते हैं, लल का अत्यंत आदर करते हैं।

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स्रोत

लल्लेश्वरी (लाल देद) — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न