संत धन्ना

राजस्थान के जाट किसान, जिनकी भोली भक्ति की कथा भक्तमाल में है

संक्षेप में

एक भोला जाट बालक पत्थर को ठाकुर मानकर रोटी खिलाने बैठा, और जब तक ठाकुर न खाएँ, तब तक ख़ुद भी भूखा रहा। यही संत धन्ना हैं। नाभादास कहते हैं: धन्य है धना का भजन, जिसके खेत में बिना बीज के अंकुर फूटे। उनके पद गुरु ग्रंथ साहिब में हैं।

भक्त संतगुरु ग्रंथ साहिब में वाणी

एक नज़र में

संत धन्ना — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीभक्त संतभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 62 ("धन्य धना के भजन को…"), पृ. 76
परंपरागुरु ग्रंथ साहिब में वाणीMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 1; pp. 108–111
कालपंद्रहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म 1415 ई. बताया जाता है (परंपरागत कथा)Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 106
गुरु (परंपरागत कथा)स्वामी रामानंदभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39; प्रियादास की टीका, कवित्त 308, पृ. 77; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 107–108
समकालीन / प्रसंग में साथ (संत की अपनी वाणी में)संत सेनाMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 109
प्रेरणा-स्रोत (संत की अपनी वाणी में)संत नामदेवMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 109

जीवन

टोंक का जाट किसान

परंपरागत कथा

Macauliffe के अनुसार धन्ना, जिन्हें धन्ना जाट कहा जाता है, राजपूताना के टोंक इलाक़े में धुआँ गाँव में रहते थे, जो देवली छावनी से लगभग बीस मील दूर है। उनका जन्म 1415 ई. में बताया जाता है।

धन्ना किसान थे, और यह बात उनकी अपनी वाणी में भी है। गुरु ग्रंथ साहिब के एक पद में वे नामदेव, कबीर, रैदास और सेन का नाम लेकर कहते हैं कि यह सब सुनकर मैं, एक जाट, भगवान की सेवा में लग गया।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

पत्थर के ठाकुर और भोली रोटी

परंपरागत कथा

धन्ना बालक थे, जब एक ब्राह्मण उनके घर ठाकुर की पूजा करने आया। धन्ना ने कहा, मुझे भी ठाकुर दो, मैं भी पूजा करूँगा। ब्राह्मण ने टालना चाहा, पर बालक नहीं माना। तब उसने एक साधारण पत्थर उठाकर दे दिया।

धन्ना ने बड़े प्रेम से उसे छाती से लगाया और पूजने लगे। रोटी आई, तो ठाकुर के आगे रखी, आँखें मूँदकर परदा कर दिया। आँख खोली तो रोटी जस की तस थी। धन्ना डर गए, बार-बार पाँव पड़े, और भूख-प्यास छोड़ दी कि जब तक ठाकुर नहीं खाएँगे, मैं भी नहीं खाऊँगा।

प्रियादास कहते हैं कि उस सच्चे भाव से भगवान प्रसन्न हुए, रोज़ भोग पाने लगे, और धन्ना की गायें भी चराने लगे। बाद में वह ब्राह्मण लौटकर आया, तो धन्ना ने प्रेम से उसे सारी बात सुनाई।

फिर भगवान ने धन्ना से कहा कि जाओ, रामानंद को गुरु बनाओ। धन्ना ने रामानंद से दीक्षा ली, और घर लौटकर गृहस्थी के काम करते हुए भक्ति करते रहे।

स्रोतों में अंतर

Macauliffe की कथा कुछ अलग है: धन्ना भूख से मरने लगे, तो वही ब्राह्मण आया और उन्हें भोजन करने को मनाया। Macauliffe लिखते हैं कि भले धन्ना ने बचपन में मूर्ति-पूजा से शुरुआत की, पर बड़े होकर उनके पद एक ही भगवान की भक्ति दिखाते हैं।

बिना बीज का खेत

परंपरागत कथा

एक दिन धन्ना बोने के लिए गेहूँ लेकर खेत जा रहे थे। रास्ते में कुछ संत मिले, जो भूखे थे। धन्ना ने बीज का सारा गेहूँ उन्हें खिला दिया। माता-पिता के डर से वे ख़ाली खेत में यों ही हल चलाते रहे।

नाभादास कहते हैं कि उस खेत में बिना बीज के अंकुर फूटे। आस-पास के किसान उनके खेत की बड़ाई करने लगे। दुनिया अचरज में थी कि बोया कहीं और गया, उगा कहीं और। Macauliffe बताते हैं कि उनके समय तक वह खेत "धन्ने भगत का खेत" कहलाता था।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

भोला भरोसा

धन्ना की कथा भक्ति का सबसे सीधा रूप दिखाती है: न शास्त्र, न विधि, बस भरोसा। नाभादास उनकी प्रशंसा इसी बात से शुरू करते हैं, "धन्य धना के भजन को"।

गुरु ग्रंथ साहिब के एक पद में धन्ना मन को समझाते हैं: जिसने माँ के गर्भ में शरीर बनाया और पाला, वही अब भी पालता है। कछुई पानी में रहती है और उसके बच्चे किनारे पर, फिर भी भगवान उन्हें पालते हैं। पत्थर में दबे कीड़े को भी वही भोजन देता है, इसलिए मन, डर मत।

एक और पद में धन्ना भगवान से सीधे घर की चीज़ें माँगते हैं: दाल, आटा, घी, जूते, अच्छे कपड़े, दूध देने वाली गाय-भैंस, और एक अच्छी पत्नी। Macauliffe कहते हैं कि टीकाकार इन शब्दों के गहरे अर्थ निकालते हैं, पर याद रखना चाहिए कि धन्ना किसान थे और उन्हें सचमुच इन चीज़ों की ज़रूरत थी।

रचनाएँ और ग्रंथ

गुरु ग्रंथ साहिब मेंगुरु ग्रंथ साहिब में धन्ना के पद — धन्ना के पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं (राग आसा और धनासरी में)। Macauliffe ने उनका अंग्रेज़ी अनुवाद दिया है, और बताया है कि एक पद "महला 5" के शीर्षक में छपा है, पर वह धन्ना का ही है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

संत की अपनी वाणी मेंधन्ना के एक पद में नामदेव, कबीर, रैदास और सेन, चारों का नाम आता है, और धन्ना कहते हैं कि इनकी कथा सुनकर ही वे भगवान की सेवा में लगे। यानी धन्ना इन भक्तों को जानते थे और उनसे प्रेरणा लेते थे।

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स्रोत

संत धन्ना — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न