माणिक्कवाचकर
पांड्य राजा के मंत्री, जिन्होंने घोड़ों का धन गुरु के चरणों में रख दिया
संक्षेप में
राजा ने अपने मंत्री को घोड़े ख़रीदने भेजा, पर रास्ते में एक पेड़ के नीचे बैठे गुरु को देखकर मंत्री ने सारा धन उनके चरणों में रख दिया। यही माणिक्कवाचकर थे, जिनके तिरुवाचकम् के बारे में तमिल कहावत है: जिसका मन इसे सुनकर न पिघले, उसका हृदय पत्थर का है।
संत-कवि
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | संत-कवि | Pope, The Tiruvacagam (1900), pp. xxix, xxxii–xxxiii; Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 86–87 |
| काल | निश्चित नहीं; परंपरा पाँचवीं सदी कहती है, जबकि विद्वान सातवीं से दसवीं सदी के बीच अलग-अलग तिथियाँ देते हैं (मत अलग-अलग) | Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 86–87; Pope, The Tiruvacagam (1900), pp. xix, lxxvi |
जीवन
पांड्य राजा का मंत्री
परंपरागत कथापरंपरा के अनुसार माणिक्कवाचकर मदुरै के पांड्य राजा के युवा प्रधानमंत्री थे, जिनका मन जल्दी ही संसार की नश्वरता पर टिक गया। Pope लिखते हैं कि वे शैव मतों के विद्वानों से मिलते और मन में पूछते: वह निर्मल गुरु कहाँ मिलेगा, जो आगमों का रहस्य समझाए?
Pope साफ़ कहते हैं कि इस संत का इतिहास धुँधला है। उनके दो ही स्रोत हैं: उनकी अपनी रचनाएँ, जिनमें आत्मकथा कम है, और बहुत बाद का "तिरुवातवूरर पुराणम्", जिसे Pope "पूरी तरह अनैतिहासिक" कहते हैं। फिर भी उनके अनुसार यह व्यक्ति सचमुच था, और कथाओं के पीछे कुछ सच्चाई है।
तिरुप्पेरुंतुरै में गुरु
परंपरागत कथाराजा ने उन्हें बहुत-सा धन देकर तिरुप्पेरुंतुरै (आज का आवुडैयार कोयिल) भेजा, जहाँ विदेशी घोड़ों के जहाज़ आए थे। Pope के अनुसार कथा कहती है कि वहाँ एक कुरुंदम् के पेड़ के नीचे शिव ख़ुद गुरु के रूप में अपने गणों के साथ बैठे थे। मंत्री ने गुरु को देखा, तो उसी क्षण संसार की सारी इच्छा छोड़कर उनके चरणों में गिर पड़े।
दीक्षा के बाद उन्होंने अपने वस्त्र, गहने, और राजा का घोड़ों वाला पूरा धन गुरु और भक्तों को सौंप दिया। Pope ख़ुद लिखते हैं कि सांसारिक दृष्टि से इस काम को उचित ठहराना कठिन है, पर भक्त की दृष्टि में दीक्षा के बाद उसका सब कुछ गुरु का था।
चिदंबरम्, और अंतिम लीला
परंपरागत कथामदुरै की घटनाओं के बाद माणिक्कवाचकर कभी पांड्य राज्य नहीं लौटे। वे मंदिर-मंदिर गाते हुए चिदंबरम् पहुँचे, जहाँ नटराज के नृत्य के आँगन में पूजा का आनंद उनके पदों में बिना उदासी के छलकता है।
Pope के अनुसार कथा कहती है कि अंत में एक अजनबी भक्त ने उनके मुँह से सारे पद सुनकर लिख लिए और ग़ायब हो गया; अगली सुबह चिदंबरम् की मूर्ति के आसन पर वह पोथी मिली, जिस पर शिव के हस्ताक्षर थे। भक्तों ने अर्थ पूछा, तो माणिक्कवाचकर ने नटराज की ओर इशारा करके कहा: इनका अर्थ ये ही हैं, और उसी मूर्ति में लीन हो गए।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
घोड़े, जो सियार निकले
परंपरागत कथाराजा ने धन का हिसाब माँगा और मंत्री को जेल में डाल दिया। Pope के अनुसार कथा कहती है कि शिव ने जंगल के सियारों को सुंदर घोड़े बना दिया, देवताओं को साईस बनाया, और ख़ुद व्यापारी बनकर घोड़े मदुरै ले आए। राजा प्रसन्न हुआ और मंत्री को छोड़ दिया।
पर उसी रात घोड़े फिर सियार बन गए, अस्तबल के असली घोड़ों को खाकर जंगल भाग गए। क्रोधित राजा ने माणिक्कवाचकर को वैगै नदी की तपती रेत पर, पीठ पर भारी पत्थर रखकर, दोपहर की धूप में डलवा दिया।
बुढ़िया के लिए शिव की मज़दूरी
परंपरागत कथातब शिव की आज्ञा से वैगै में बाढ़ आई और मदुरै डूबने लगा। हर नागरिक को बाँध का एक हिस्सा बनाने का आदेश मिला। Pope के अनुसार एक ग़रीब विधवा, जो चावल के पिट्ठे बेचकर गुज़ारा करती थी, न ख़ुद मिट्टी ढो सकती थी, न मज़दूर रख सकती थी। उसने मंदिर में रोकर प्रार्थना की।
मंदिर के बाहर फटे कपड़ों में एक युवा मज़दूर मिला: "मुझे काम पर रख लो, भूखा हूँ, खाना दे दो।" वह शिव थे। पिट्ठे खाकर वे कभी इधर मिट्टी डालते, कभी उधर, नाचते-गाते, फिर टोकरी को तकिया बनाकर सो गए। राजा ने इस आलसी मज़दूर को कोड़े लगवाए, पर पहली चोट पर पूरा ब्रह्मांड काँप उठा: हर देवता और हर जीव ने वह चोट अपने ऊपर महसूस की, और मज़दूर ग़ायब हो गया।
अपनी भूल समझकर राजा ने माणिक्कवाचकर से क्षमा माँगी और उन्हें राज्य तक देना चाहा, पर उन्होंने केवल गुरु के चरणों में तिरुप्पेरुंतुरै लौटने की अनुमति माँगी।
स्रोतों में अंतर
Pope बताते हैं कि मदुरै में आज भी आवणि मास की उन्नीसवीं तिथि (लगभग 4 सितंबर) को इस कथा की स्मृति में बड़ा वार्षिक उत्सव होता है।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
कृपा, और पिघलता हृदय
Kingsbury लिखते हैं कि माणिक्कवाचकर अपने पदों में भाव को सबसे ऊपर रखते हैं: उनकी सबसे बड़ी आत्म-ग्लानि यह है कि उनमें भगवान के लिए पागलपन जैसा प्रेम क्यों नहीं उमड़ता। उनके लगभग हर पद में "कृपा" शब्द लौट-लौटकर आता है। "शतक" के पहले पद का भाव है: शरीर काँपता है, हाथ ऊपर उठते हैं, तुम्हारे सुगंधित चरणों में सिसकता हूँ।
Pope के अनुसार उनका संदेश था कि एक ही सर्वोच्च, सगुण भगवान हैं, जो कृपा करके गुरु रूप में धरती पर आते हैं और सच्चे खोजी को शिष्य बनाते हैं; और मुक्ति का यह मार्ग समाज के हर वर्ग के लिए खुला है।
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंतिरुवाचकम् ("पवित्र वाणी") — इक्यावन गीतों का संग्रह, जिसके बारे में Pope लिखते हैं कि तमिल देश में यह रोज़ आँसुओं के साथ गाया जाता है, और भक्तों के लिए इसका वही स्थान है, जो ईसाइयों के लिए भजन-संहिता का। Kingsbury के अनुसार तमिल लोगों के मन में इसका आदर देवारम् से भी ऊँचा है। Pope यह भी मानते हैं कि इन गीतों का कुछ हिस्सा शायद बाद का हो।
प्रामाणिक संग्रह मेंतिरुक्कोवैयार — चार सौ पदों की प्रेम-काव्य शैली की रचना, जो Kingsbury के अनुसार माणिक्कवाचकर की दूसरी प्रमुख कृति है।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
आधुनिक विद्वानों का मतPope के अनुसार दक्षिण भारत को बौद्ध और जैन मतों से फिर शैव धर्म की ओर लाने वाले भक्तों की लंबी परंपरा में माणिक्कवाचकर पहले थे। Pope ज़ोर देकर कहते हैं कि उनकी सफलता का कारण उत्पीड़न नहीं, उनकी अपनी उत्कट भक्ति थी; उत्पीड़न की कथाएँ, उनके विचार में, बाद के समय की हैं।
स्रोत
- The Tiruvaçagam or Sacred Utterances of Mânikka-Vâçagar — G. U. Pope (सं. एवं अनु.) (1900) · Legendary History, pp. xix–xxxiv; Note XII, p. lxxvi
- Hymns of the Tamil Saivite Saints — F. Kingsbury, G. E. Phillips (अनु.) (1921) · pp. 2, 86–89
