संत ज्ञानेश्वर
ज्ञानेश्वरी के रचयिता, जिन्होंने गीता को मराठी में घर-घर पहुँचाया
संक्षेप में
जिन बच्चों को ब्राह्मणों ने "संन्यासी की संतान" कहकर ठुकरा दिया, उन्हीं में से एक ने गीता को मराठी में ऐसा उतारा कि वह आज तक घर-घर पढ़ी जाती है। यही संत ज्ञानेश्वर हैं। अपनी ज्ञानेश्वरी के अंत में उन्होंने भगवान से कुछ अपने लिए नहीं, सारे जगत के लिए माँगा: दुष्टों की दुष्टता मिटे, सब जीवों में मैत्री हो।
संत-कविवारकरी परंपरा
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | संत-कवि | ज्ञानेश्वरी (साखरे सं., 1915), अध्याय 18, ओवी 1805, 1810, पृ. 864 |
| परंपरा | वारकरी परंपरा | महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 8, ओवी 58–71; अध्याय 10, ओवी 10–53 |
| काल | तेरहवीं सदी; ज्ञानेश्वरी शके 1212 (1290 ई.) में पूरी हुई, यह स्वयं ग्रंथ में लिखा है (संत की अपनी वाणी में) | ज्ञानेश्वरी (साखरे सं., 1915), अध्याय 18, ओवी 1810, पृ. 864 |
| समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा) | संत नामदेव | महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 10, ओवी 10–53 |
| इनसे प्रेरित (ऐतिहासिक प्रमाण) | संत एकनाथ | महीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), अध्याय 19, ओवी 102–129, pp. 135–138, टिप्पणी |
| प्रेरणा-स्रोत (परंपरागत कथा) | गोरखनाथ | महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 22, ओवी 133–137; बहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), अभंग 1, p. 1 |
जीवन
ग्रंथ में स्वयं ज्ञानेश्वर क्या कहते हैं
संत की अपनी वाणी मेंज्ञानेश्वरी के बिल्कुल अंत में ज्ञानदेव ख़ुद बताते हैं कि यह ग्रंथ कब, कहाँ और कैसे बना। वे कहते हैं: कलियुग में, महाराष्ट्र देश में, श्री गोदावरी के किनारे, अनादि पंचक्रोश क्षेत्र "श्रीमहालया" है। वहाँ यदुवंश के, सब कलाओं के निवास, न्याय से प्रजा को पालने वाले राजा श्रीरामचंद्र राज करते हैं।
वहीं, वे कहते हैं, महेश की परंपरा से आए श्रीनिवृत्तिनाथ के पुत्र (शिष्य) ज्ञानदेव ने गीता को देशी (मराठी) भाषा का गहना पहनाया। अठारहवें अध्याय के अंत में वे अपने को "निवृत्तिदासु ज्ञानदेवो" कहते हैं, यानी निवृत्तिनाथ का दास।
और अंतिम ओवी में तिथि और लेखक: "शके बाराशतें बारोत्तरें। तैं टीका केली ज्ञानेश्वरें। सच्चिदानंदबाबा आदरें। लेखकु जाहला॥" यानी शके 1212 में ज्ञानेश्वर ने यह टीका की, और सच्चिदानंद बाबा ने आदर से इसे लिखा। ग्रंथ का अपना नाम "भावार्थदीपिका" है।
संन्यासी की संतान
परंपरागत कथाज्ञानेश्वर के परिवार की कथा हमें महीपति की "भक्तविजय" (अठारहवीं सदी) से मिलती है। उसके अनुसार गोदावरी के किनारे आपेगाँव के गोविंदपंत के बेटे विठोबा (विट्ठलपंत) तीर्थ-यात्रा पर निकले, और आळंदी में सिधोपंत नाम के ब्राह्मण ने उनसे अपनी बेटी रखुमाबाई का विवाह कर दिया।
बहुत बरस संतान न हुई। तब विठोबा पत्नी से "गंगा-स्नान" की अनुमति लेकर काशी गए, और वहाँ अपने को अकेला बताकर संन्यास ले लिया। बाद में उनके गुरु आळंदी आए, तो रखुमाबाई ने उन्हें प्रणाम किया, और गुरु ने "पुत्रवती हो" का आशीर्वाद दे दिया। सच जानकर गुरु ने विठोबा को गृहस्थ-जीवन में लौटने की आज्ञा दी।
संन्यास छोड़कर लौटने पर ब्राह्मणों ने उन्हें जाति से निकाल दिया। वे जंगल में झोपड़ी बनाकर भिक्षा से गुज़ारा करते रहे। बारह बरस बाद उनके चार संतानें हुईं: निवृत्ति, ज्ञानदेव, सोपान और मुक्ताबाई।
जब बच्चों के जनेऊ का समय आया, तो विठोबा ने ब्राह्मणों से प्रायश्चित्त पूछा। उन्होंने कहा कि आपके लिए मृत्यु के सिवा कोई प्रायश्चित्त नहीं। महीपति कहते हैं कि विठोबा पीछे मुड़कर देखे बिना घर छोड़कर चले गए, और बच्चों से कहा गया कि पैठण जाकर वहाँ के ब्राह्मणों से शुद्धि-पत्र लाओ।
नेवासे में ज्ञानेश्वरी
परंपरागत कथामहीपति के अनुसार पैठण से लौटते हुए चारों भाई-बहन प्रवरा नदी के किनारे महालया (आज का नेवासे) पहुँचे, और वहीं ज्ञानदेव ने गीता पर मराठी टीका लिखी, ताकि भोले और अनपढ़ लोग भी उसे समझ सकें। यही बात ग्रंथ के अंत में ज्ञानदेव ख़ुद भी कहते हैं।
फिर अपने गुरु निवृत्तिनाथ के कहने पर ज्ञानदेव ने अपने अनुभवों से "अमृतानुभव" रचा।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
पैठण में भैंसे के मुँह से वेद
परंपरागत कथापैठण के ब्राह्मणों ने कहा कि संन्यासी की संतान के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं; एक ही उपाय है कि भगवान की शरण जाओ और गधे, कुत्ते, हाथी, सबमें भगवान देखकर सबको प्रणाम करो। महीपति कहते हैं कि यह सुनकर चारों भाई-बहन बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि यही बात तो उनके मन में थी।
फिर ब्राह्मणों ने "ज्ञानदेव" नाम का मज़ाक उड़ाया: उधर पानी की मशक लादे एक भैंसा आ रहा है, उसका नाम भी "ज्ञाना" है। ज्ञानदेव बोले, इस भैंसे में और मुझमें मुझे कोई अंतर नहीं दिखता; एक ही आत्मा सबमें है, जैसे पानी भरे अनगिनत घड़ों में एक ही सूरज दिखता है।
एक ब्राह्मण ने चिढ़कर भैंसे को कोड़ा मारा, और कथा कहती है कि उसका निशान ज्ञानदेव की पीठ पर उभर आया। तब ब्राह्मणों ने कहा, अगर कोई अंतर नहीं, तो इससे वेद बुलवाओ। ज्ञानदेव ने भैंसे के सिर पर हाथ रखा, और भैंसा वेद-पाठ करने लगा।
पीठ पर बनीं रोटियाँ और विसोबा खेचर
परंपरागत कथाआळंदी में विसोबा चाटी नाम का एक ब्राह्मण इन बच्चों से बहुत चिढ़ता था। एक दिन निवृत्ति ने मुक्ताबाई से मांडे (रोटियाँ) बनाने को कहा। मुक्ताबाई तवा लेने कुम्हार के पास गई, तो विसोबा ने उसे मारा और कुम्हार को तवा देने से रोक दिया। मुक्ताबाई रोती हुई घर लौटी।
महीपति कहते हैं कि तब ज्ञानदेव ने योग से अपने भीतर की अग्नि जगाई, उनकी पीठ तपे सोने-सी लाल हो गई, और मुक्ताबाई ने उसी पर मांडे सेंक लिए। विसोबा बाहर से छिपकर यह सब देख रहा था। उसका मन बदल गया, वह भीतर दौड़ा और उनकी थाली से जूठन उठाकर खाने लगा।
ज्ञानदेव ने कहा, "क्यों खेचर (मुर्दाखोर पक्षी) की तरह खाता है?" यह बात विसोबा के मन में उतर गई, उसका अज्ञान मिट गया, और तब से वह "विसोबा खेचर" कहलाया।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
सबमें एक ही आत्मा
ज्ञानेश्वर की शिक्षा का सार भैंसे वाली कथा में ही है: जैसे एक ही धागे से अलग-अलग कपड़े बुने जाते हैं, और सब गहनों में एक ही सोना होता है, वैसे ही भगवान हर जीव में एक-सा है। महीपति कहते हैं कि पैठण के ब्राह्मणों का "सबमें भगवान देखो" वाला निर्णय सुनकर चारों भाई-बहन प्रसन्न हुए, क्योंकि यही उनका धर्म था।
अपने लिए नहीं, जगत के लिए माँगना
ज्ञानेश्वरी पूरी करके ज्ञानदेव विश्वात्मक देव से "पसायदान", यानी प्रसाद का दान, माँगते हैं। उसमें अपने लिए कुछ नहीं है: दुष्टों का टेढ़ापन मिटे, उनकी अच्छे कर्मों में रुचि बढ़े, सब जीवों में आपसी मैत्री हो, पाप का अँधेरा जाए, और जो जो चाहे, उसे वह मिले।
प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ
पसायदान
आतां विश्वात्मकें देवें। येणें वाग्यज्ञें तोषावें।
तोषोनि मज द्यावें। पसायदान हें॥
जें खळांची व्यंकटी सांडो। तयां सत्कर्मीं रती वाढो।
भूतां परस्परें पडो। मैत्र जीवाचें॥
दुरिताचें तिमिर जावो। विश्व स्वधर्मसूर्यें पाहो।
जो जें वांछील तो तें लाहो। प्राणिजात॥अब विश्वात्मा देव मेरे इस वाणी-यज्ञ से प्रसन्न हों, और प्रसन्न होकर मुझे यह प्रसाद दें: दुष्टों का टेढ़ापन छूट जाए, और अच्छे कर्मों में उनकी रुचि बढ़े। सब जीवों में आपस में मैत्री हो। पाप का अँधेरा मिट जाए, सारा जगत अपने-अपने धर्म के सूरज के उजाले में देखे, और हर प्राणी जो चाहे, वह उसे मिले।
ग्रंथ का समय और लेखक
शके बाराशतें बारोत्तरें। तैं टीका केली ज्ञानेश्वरें।
सच्चिदानंदबाबा आदरें। लेखकु जाहला॥शके बारह सौ बारह में ज्ञानेश्वर ने यह टीका की, और सच्चिदानंद बाबा ने बड़े आदर से इसे लिखा। यह पंक्ति ज्ञानेश्वरी का अपना साक्ष्य है कि ग्रंथ कब बना और किसने लिपिबद्ध किया।
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंज्ञानेश्वरी (भावार्थदीपिका) — भगवद्गीता की मराठी ओवी-छंद में टीका, अठारह अध्याय। ग्रंथ स्वयं अपने को "भावार्थदीपिका" कहता है, और बताता है कि यह शके 1212 में नेवासे (महालया) में बनी।
परंपरा से इनके नाम परअमृतानुभव — महीपति के अनुसार गुरु निवृत्तिनाथ के कहने पर ज्ञानदेव ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों से यह ग्रंथ रचा।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
संत की अपनी वाणी मेंज्ञानदेव ग्रंथ के अंत में बताते हैं कि उन्होंने गीता को "देशी", यानी लोगों की अपनी भाषा, का गहना पहनाया। महीपति भी कहते हैं कि यह मराठी टीका इसलिए लिखी गई, ताकि भोले, अनपढ़ और साधारण लोग भी गीता का गहरा अर्थ समझ सकें।
संबंधित संत
- संत नामदेव — समकालीन / प्रसंग में साथ
- संत एकनाथ — इनसे प्रेरित
- गोरखनाथ — प्रेरणा-स्रोत
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परंपरा
- वारकरी परंपरा: पंढरपुर के विट्ठल और महाराष्ट्र के संत — ज्ञानदेव की नींव से तुकाराम के कलश तक, पंढरपुर की राह के संत
लेख
- भक्ति आंदोलन: दक्षिण के आलवारों से सौराष्ट्र की गंगासती तक — बारह सौ बरसों की एक धारा, क्षेत्र-क्षेत्र और संत-संत, समय-रेखा के साथ
तीर्थ
- श्रीविट्ठल मंदिर — वारकरी परंपरा का केंद्र
स्रोत
- ज्ञानेश्वरी — संत ज्ञानेश्वर; सं. नाना महाराज साखरे (1915) · अध्याय 18, ओवी 1793–1810, पृ. 864
- Stories of Indian Saints: Mahipati's Bhaktavijaya — Justin E. Abbott, N. R. Godbole (अनु.) (1933) · अध्याय 8–10
