गोस्वामी तुलसीदास
रामचरितमानस के रचयिता, जिन्होंने राम-कथा को लोकभाषा में गाया
संक्षेप में
प्रियादास कथा कहते हैं कि पत्नी की एक फटकार ने तुलसीदास का जीवन बदल दिया: इस हाड़-माँस के शरीर से जितना प्रेम है, उतना राम से होता तो? वही तुलसीदास आगे चलकर रामचरितमानस के रचयिता बने, और राम की कथा को लोगों की अपनी बोली में घर-घर पहुँचाया।
सगुण भक्त-कविराम-भक्ति
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | सगुण भक्त-कवि | कबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), प्रस्तावना, पृ. 12–13; भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 129, पृ. 131 |
| परंपरा | राम-भक्ति | भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 129 ("…रामचरन रसमत्त…"), पृ. 131; भक्तमाल (नाभादास), प्रियादास की टीका, कवित्त 518, पृ. 133 |
| काल | सोलहवीं-सत्रहवीं सदी; मानस का आरंभ संवत् 1631 (स्वयं तुलसी के शब्दों में), देह-त्याग संवत् 1680 (Growse के अनुसार); जन्म-तिथि ज्ञात नहीं (आधुनिक विद्वानों का मत) | रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), बालकाण्ड, पृ. 17; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. xii |
| समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा) | नाभादास | भक्तमाल (नाभादास), प्रियादास की टीका, कवित्त 517, पृ. 133; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. x |
जीवन
कुल और जन्म-स्थान
मत अलग-अलगGrowse के अनुसार तुलसीदास कान्यकुब्ज ब्राह्मण कुल के थे। जन्म-स्थान पर मत अलग हैं। "भक्त-सिंधु" नाम की एक बाद की पोथी उनके पिता का नाम आत्माराम और जन्म-स्थान हस्तिनापुर बताती है, पर Growse उसे "बहुत प्रामाणिक नहीं" मानते हैं। कुछ लोग चित्रकूट के पास हाजीपुर को जन्म-स्थान कहते हैं।
Growse यह भी बताते हैं कि राजापुर के मंदिर में मानस की एक प्रति रखी थी, जिसे तुलसी के अपने हाथ की लिखी कहा जाता था। लगभग 1800 ई. में वह चोरी हुई, नदी में फेंकी गई, और जाल से निकाली गई। तब तक केवल अयोध्या काण्ड पढ़ने लायक बचा था।
पत्नी की फटकार
परंपरागत कथाप्रियादास कहते हैं कि तुलसीदास को अपनी पत्नी से बहुत प्रेम था। एक दिन वह उनसे पूछे बिना अपने पिता के घर चली गई। तुलसी अपनी सुध भूलकर उसके पीछे-पीछे वहीं पहुँच गए।
पत्नी को बहुत लाज आई। वह रोष से बोली: इस हाड़-चाम के शरीर से इतना प्रेम है, राम से होता तो? यह बात तुलसी के मन में ऐसे लगी, मानो सवेरा हो गया हो। वे पछताए, सब छोड़कर काशी चले गए, और वहीं राम की सेवा में रम गए।
Growse प्रियादास की बाक़ी कथाओं को इतिहास नहीं मानते, पर इस एक बात को सच मानने को तैयार हैं कि पत्नी ने ही उन्हें सांसारिक प्रेम से राम-प्रेम की ओर मोड़ा। प्रियादास पत्नी का नाम नहीं लेते; "रत्नावली" नाम बाद की परंपरा का है।
काशी, अयोध्या, चित्रकूट
आधुनिक विद्वानों का मतGrowse के अनुसार तुलसीदास के जीवन का बड़ा हिस्सा काशी में बीता। बीच-बीच में वे सोरों, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग और वृंदावन भी रहे। सोरों में उन्होंने कुछ समय पढ़ाई की थी। काशी में उन्होंने सीताराम का एक मंदिर भी स्थापित किया था।
मानस का आरंभ
संत की अपनी वाणी मेंरामचरितमानस कब शुरू हुई, यह तुलसी ने ख़ुद लिखा है: "सम्बत सोरह सै इकतीसा। करउँ कथा हरि-पद धरि सीसा॥ नौमी भौमबार मधुमासा। अवधपुरी यह चरित प्रकासा॥" यानी संवत् 1631 में, चैत्र मास की नवमी, मंगलवार को, अयोध्या में उन्होंने भगवान के चरणों में सिर रखकर यह कथा कहनी शुरू की। उसी दिन रामनवमी होती है।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
प्रेत, हनुमान और राम के दर्शन
परंपरागत कथाकाशी में तुलसी के शौच का बचा हुआ पानी रोज़ एक प्रेत को मिल जाता था, और वह इससे तृप्त होता था। प्रसन्न होकर उसने हनुमान का पता बताया: जहाँ रामायण की कथा होती है, वहाँ हनुमान मैले कपड़ों में सबसे पहले आते और सबसे आख़िर में जाते हैं।
तुलसी ने उन्हें पहचान लिया, पीछे-पीछे जंगल तक गए, और दौड़कर उनके पाँव पकड़ लिए: "अब आप बचकर नहीं जा सकते।" हनुमान ने वरदान माँगने को कहा। तुलसी बोले, "मैं राम के रूप को अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ।"
तय दिन राम और लक्ष्मण घोड़ों पर, हरे वस्त्रों में, सामने से निकल गए, पर तुलसी ने उन्हें पहचाना ही नहीं। बाद में हनुमान ने पूछा, "अपने प्यारे को देखा?" तुलसी बोले, "मैंने तो नज़र भरकर देखा ही नहीं। एक बार फिर दिखाइए।"
स्रोतों में अंतर
Wilson ने भक्तमाल की किसी गद्य-कथा के आधार पर लिखा कि यह हनुमान-दर्शन चित्रकूट में हुआ। Growse बताते हैं कि Wilson का वृत्तांत मूल भक्तमाल से मेल नहीं खाता; कई बातें छोड़ता है और कई जोड़ता है।
हत्यारा ब्राह्मण और शिव का नंदी
परंपरागत कथाएक ब्राह्मण, जिससे हत्या हो गई थी, तीर्थों में भटकता हुआ आया और "राम" का नाम लेकर भिक्षा माँगने लगा। राम का नाम सुनकर तुलसी ने उसे घर बुलाया, प्रसाद दिया, और उसे शुद्ध मानकर साथ बैठाकर खिलाया।
काशी के ब्राह्मणों की सभा ने तुलसी को बुलाकर पूछा कि उसका पाप कैसे मिट गया। तुलसी बोले, "आप पोथियाँ तो बाँचते हैं, पर उनका भाव हृदय तक नहीं पहुँचा।" ब्राह्मणों ने शर्त रखी: अगर शिव का नंदी इसके हाथ से खा ले, तो हम मानेंगे। थाल में प्रसाद रखा गया, और नंदी ने उसे खा लिया। सभा "जय-जय" से गूँज उठी।
चोर और साँवला पहरेदार
परंपरागत कथाएक रात चोर तुलसी के घर चोरी करने आए। उन्होंने देखा कि एक साँवला किशोर धनुष-बाण लिए पहरा दे रहा है। जितनी बार वे आगे बढ़ते, वह बाण साधकर खड़ा मिलता। सुबह उन्होंने तुलसी से पूछा, "वह साँवला लड़का कौन है?" तुलसी कुछ न बोले, बस उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने घर का सब कुछ लुटा दिया, यह जानकर कि राम स्वयं पहरा दे रहे थे। चोरों ने दीक्षा ली और साधु बन गए।
बादशाह की क़ैद और बंदरों की सेना
परंपरागत कथातुलसी की ख्याति दिल्ली तक पहुँची। बादशाह ने उन्हें आदर से बुलाया, ऊँचे आसन पर बैठाया, और कहा: "कोई करामात दिखाइए।" तुलसी बोले, "करामात की बात झूठी है, मैं तो बस एक राम को जानता हूँ।" बादशाह ने कहा, "देखें तुम्हारा राम कैसा है," और उन्हें क़ैद कर दिया।
तुलसी ने मन में हनुमान को पुकारा। उसी घड़ी करोड़ों बंदर किले पर टूट पड़े, कपड़े फाड़ने लगे, लोगों को नोचने लगे। बादशाह को लगा प्रलय आ गया। वह तुलसी के पाँव पड़ा। तुलसी ने कहा, "यह स्थान अब राम का घर हो गया, इसे जल्दी छोड़ दो।" बादशाह ने वह जगह छोड़कर नया किला बनवाया।
स्रोतों में अंतर
प्रियादास बादशाह का नाम नहीं लेते, बस "दिल्लीपति पातसाह" कहते हैं। Wilson ने उसे शाहजहाँ बताया, और कहा कि उसी ने पुरानी दिल्ली छोड़कर शाहजहाँनाबाद बसाया। Growse इस पूरी कथा को उन किंवदंतियों में गिनते हैं, जो इतिहास नहीं, पर कवि के नाम से लोगों में सच मानी जाती हैं।
वृंदावन में: "मेरे इष्ट तो राम हैं"
परंपरागत कथाकाशी से तुलसी वृंदावन गए, नाभादास से मिले, और उनके कवित्त सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। मदनगोपाल के दर्शन करते हुए उन्होंने कहा, "मेरे इष्ट तो राम हैं।" कथा है कि मूर्ति ने उसी समय राम का रूप दिखा दिया।
किसी ने कहा कि कृष्ण तो पूर्ण अवतार हैं, राम अंश-अवतार। तुलसी का उत्तर बड़ा मीठा है: जब मैं राम को केवल दशरथ का सुंदर बेटा जानता था, तब भी उनसे प्रेम था; अब आपने उनकी ईश्वरता बताई, तो प्रेम करोड़ गुना जाग उठा।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
अपने मन के सुख के लिए, लोगों की भाषा में
मानस के आरंभ में तुलसी कहते हैं कि यह कथा पुराणों, वेदों और शास्त्रों से सम्मत है, और वे इसे "स्वान्तःसुखाय", यानी अपने अंतर्मन के सुख के लिए, लोकभाषा में रच रहे हैं। संस्कृत के बड़े ग्रंथ के बजाय उन्होंने अवधी चुनी, ताकि राम-कथा आम लोग भी गा सकें।
राम: दशरथ के पुत्र भी, परब्रह्म भी
तुलसी के राम एक साथ दशरथ के प्यारे बेटे भी हैं और परमेश्वर भी। मदनगोपाल वाली कथा में यही भाव है: ईश्वरता जानकर प्रेम घटता नहीं, बढ़ता है। Growse के अनुसार तुलसी के दार्शनिक विचार बाद के वेदांत पर आधारित हैं।
प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ
स्वान्तःसुखाय
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथाभाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥जो कथा अनेक पुराणों, वेदों और शास्त्रों से सम्मत है, जो रामायण में कही गई है और कहीं-कहीं दूसरे ग्रंथों से भी ली गई है, उसी रघुनाथ की गाथा को तुलसी अपने अंतर्मन के सुख के लिए अत्यंत सुंदर लोकभाषा में रच रहा है।
मानस का आरंभ
सम्बत सोरह सै इकतीसा। करउँ कथा हरि-पद धरि सीसा॥
नौमी भौमबार मधुमासा। अवधपुरी यह चरित प्रकासा॥संवत् 1631 में, भगवान के चरणों में सिर रखकर, मैं यह कथा कहता हूँ। चैत्र (मधुमास) की नवमी, मंगलवार के दिन, अयोध्यापुरी में यह चरित प्रकट हुआ।
शंभु की कृपा से
सम्भु प्रसाद सुमति हिय हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥शिवजी की कृपा से हृदय में सुंदर बुद्धि उमगी, और तुलसी रामचरितमानस का कवि बना। तुलसी अपनी इस बड़ी रचना का श्रेय अपने को नहीं, शिव की कृपा को देते हैं।
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंरामचरितमानस — अवधी में राम की कथा, संवत् 1631 में अयोध्या में आरंभ। Growse के अनुसार तुलसी ने वाल्मीकि की कथा की कई बातें छोड़ीं, और उनकी जगह काकभुशुंडि की कथा और भक्ति पर लंबी चर्चाएँ रखीं।
प्रामाणिक संग्रह मेंगीतावली, दोहावली, कवित्त (कवितावली), विनयपत्रिका, सतसई, रामाज्ञा — Growse इन छह को मानस के अलावा तुलसी की पक्की रचनाएँ गिनते हैं।
रचयिता संदिग्धहनुमान बाहुक, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, रामशलाका और कुछ छंद — Growse के समय ये भी तुलसी के नाम से छपते थे, पर वे इनकी प्रामाणिकता पर "काफ़ी संदेह" बताते हैं।
परंपरा से इनके नाम परहनुमान चालीसा — परंपरा से तुलसीदास की मानी जाती है, और इसकी अंतिम चौपाई में "तुलसीदास" की छाप है। पर Growse (1914) की दोनों सूचियों में, न पक्की रचनाओं में, न संदिग्ध में, इसका नाम नहीं है।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
आधुनिक विद्वानों का मतWestcott लिखते हैं कि उत्तर और मध्य भारत के साधारण लोगों पर भले के लिए जिन दो सुधारकों का सबसे गहरा प्रभाव पड़ा, वे कबीर और तुलसीदास हैं।
परंपरागत कथानाभादास ने भक्तमाल में तुलसीदास को इन्हीं शब्दों में याद किया: कलियुग के कुटिल जीवों के उद्धार के लिए वाल्मीकि ही तुलसी बनकर आए, और उन्होंने संसार-सागर पार करने के लिए एक सुगम नाव बना दी। यह भक्ति का वचन है, इतिहास का दावा नहीं।
आधुनिक विद्वानों का मतश्यामसुंदरदास के अनुसार कबीर के निर्गुण मार्ग ने तुलसी और सूर के सगुण मार्ग के लिए रास्ता साफ़ किया।
संबंधित संत
- नाभादास — समकालीन / प्रसंग में साथ
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भक्ति-पाठ
- श्री हनुमान चालीसा — परंपरा से तुलसीदास की मानी जाती है; Growse की रचना-सूची में नहीं
- श्री बजरंग बाण — परंपरा से तुलसीदास के नाम से
- श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक — परंपरा से तुलसीदास के नाम से
तीर्थ
ऋषि
- महर्षि वाल्मीकि — भक्तमाल तुलसीदास को वाल्मीकि का अवतार कहती है
स्रोत
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · बालकाण्ड, पृ. 1, 17
- श्रीभक्तमाल — नाभादास के मूल छप्पय, प्रियादास की भक्तिरसबोधिनी टीका सहित — नाभादास (मूल), प्रियादास (टीका, 1713 ई.) (1600) · छप्पय 129; प्रियादास की टीका, कवित्त 508–518, पृ. 131–133
- The Rámáyana of Tulsi Dás — F. S. Growse (अनु.) (1914) · भूमिका, pp. iii–xiv
- Kabir and the Kabir Panth — G. H. Westcott (1907) · p. 1
- कबीर-ग्रंथावली (नागरीप्रचारिणी ग्रंथमाला 33) — श्यामसुंदरदास (सं.) (1928) · प्रस्तावना, पृ. 12–13
