शुरुआत दक्षिण में: नायनार और आलवार
जो पद आज भी गाए जाते हैं, उनमें सबसे पुराने तमिल के हैं। Kingsbury के अनुसार शिव-भक्त कवि संबंदर सातवीं सदी के पहले आधे में हुए, और अप्पर उनके समकालीन थे, उम्र में बड़े। दोनों ने मंदिर-मंदिर घूमकर शिव के गीत गाए।
विष्णु-भक्त आलवारों के पद "नालायिर प्रबंधम्", यानी चार हज़ार पदों के संग्रह में हैं। Hooper के अनुसार इन्हें नाथमुनि (मृत्यु लगभग 920 ई.) ने इकट्ठा करके मंदिर-पूजा में गाने का प्रबंध किया। आलवारों में नम्मालवार को Hooper नौवीं सदी के पहले आधे में रखते हैं।
आचार्यों ने भक्ति को दर्शन दिया
आलवारों की भक्ति को रामानुज ने विशिष्टाद्वैत का दार्शनिक आधार दिया; Bhandarkar उनका जन्म 1016–1017 ई. में रखते हैं। तेरहवीं सदी में मध्व ने द्वैत का मार्ग चलाया।
यही धारा उत्तर पहुँची। भक्तमाल रामानंद को उसी श्री-संप्रदाय में रखती है जो रामानुज से चला, और Macauliffe के अनुसार नाभादास उन्हें रामानुज से चौथी पीढ़ी में गिनते हैं।
उत्तर में रामानंद और उनके शिष्य
Macauliffe के अनुसार रामानंद ने लक्ष्मी-नारायण की जगह सीता-राम की उपासना चलाई और हर जाति के शिष्य स्वीकार किए। कबीर, रविदास, सेन, धन्ना और पीपा उनसे जुड़े, और कबीर, रविदास और धन्ना के अपने पद गुरु ग्रंथ साहिब में मिलते हैं।
इन संतों की याद को नाभादास ने भक्तमाल में छप्पयों में पिरोया; Macauliffe इस ग्रंथ को लगभग 1578 ई. का मानते हैं।
महाराष्ट्र: पंढरपुर की राह
मराठी में इस धारा की नींव ज्ञानेश्वरी है, जिसके अंत में ज्ञानदेव ख़ुद लिखते हैं कि ग्रंथ शके 1212 (1290 ई.) में पूरा हुआ। Ranade गिनते हैं कि इसके बाद लगभग पाँच सौ बरसों में महाराष्ट्र में कोई पचास संत हुए, जिनमें स्त्रियाँ भी थीं और हर जाति के लोग भी।
बहिणाबाई ने इस पूरी परंपरा को एक मंदिर की तरह देखा: ज्ञानदेव ने नींव रखी, नामदेव ने चारदीवारी बनाई, एकनाथ ने खंभा लगाया, और तुकाराम उसका कलश बने।
पूर्व: बंगाल और असम
बंगाल में चैतन्य (1485–1533) के नाम-कीर्तन ने लोगों को गलियों में नाचते-गाते भक्तों में बदल दिया। Sen के अनुसार उन्होंने समाज-सुधार का काम नित्यानंद को सौंपा, जिनके वंशजों ने भाईचारे के दरवाज़े हर जाति के लिए खोले।
असम में शंकरदेव ने बलि की जगह विश्वास और प्रार्थना का मार्ग सिखाया, और उनके उत्तराधिकारी माधवदेव ने नाम-घोषा रचा। Neog के अनुसार इस धर्म में जाति के कारण कोई दीक्षा के अयोग्य नहीं था, और सत्रों के साथ गाँव-गाँव में नामघर बने: गाँव का सभा-भवन, जहाँ नाम-कीर्तन होता और जो गाँव के पूरे जीवन का केंद्र था।
कश्मीर, गुजरात और ब्रज
कश्मीर में चौदहवीं सदी की योगिनी लल देद ने अपने वाखों में भीतर के शिव की बात कही; Grierson के अनुसार हिंदू और मुसलमान, दोनों उन्हें आदर से याद करते हैं। गुजरात में Jhaveri नरसिंह मेहता (1415–1481) से ही गुजराती कविता का पक्का इतिहास शुरू मानते हैं।
ब्रज में वल्लभाचार्य (1479–1531) ने बाल-कृष्ण की सेवा का पुष्टिमार्ग चलाया। और यह धारा उन्नीसवीं सदी तक बहती रही: सौराष्ट्र की गंगासती ने 1894 में समाधि से पहले पानबाई के लिए बावन भजन रचे।
| संत | क्षेत्र | समय | स्रोत |
|---|---|---|---|
| दक्षिण भारत | सातवीं सदी ई. का पहला आधा; पल्लव-चालुक्य युद्ध (642 ई.) के एक सेनापति के समकालीन | Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 10–11 | |
| दक्षिण भारत | सातवीं सदी ई.; संबंदर के समकालीन और उनसे उम्र में बड़े | Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 36 | |
| दक्षिण भारत | निश्चित नहीं; परंपरा पाँचवीं सदी कहती है, जबकि विद्वान सातवीं से दसवीं सदी के बीच अलग-अलग तिथियाँ देते हैं | Hymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 86–87; Pope, The Tiruvacagam (1900), pp. xix, lxxvi | |
| दक्षिण भारत | निश्चित नहीं; Aiyar कामचलाऊ रूप से 788 ई. में जन्म और 828 ई. में देह-त्याग मानते हैं, जबकि एक दूसरा मत उन्हें बहुत पहले रखता है | Krishnasami Aiyar, Sri Sankaracharya: His Life and Times, pp. 16–18, 71 | |
| दक्षिण भारत | परंपरा के अनुसार कलि संवत् 97; आधुनिक विद्वान (Hooper) उन्हें नौवीं सदी के आसपास, अपने पिता पेरियालवार के समय में रखते हैं | Govindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 45; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 10–11, 14 | |
| दक्षिण भारत | परंपरा उन्हें कलियुग के आरंभ में रखती है; आधुनिक विद्वानों के अनुसार नौवीं सदी का पहला आधा | Govindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 192; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 13 | |
| दक्षिण भारत | जन्म शके 938–939 (1016–1017 ई.); परंपरा के अनुसार देह-त्याग 1137 ई. | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §46, p. 51; Govindacharya, Life of Ramanujacharya (1906), अंत की तिथि-सूची | |
| बंगाल, ओडिशा और असम | Briggs के अनुसार 1200 ई. से पहले, शायद ग्यारहवीं सदी के आरंभ में; परंपराएँ उन्हें कहीं-कहीं युगों पुराना बताती हैं | Briggs, Gorakhnath and the Kanphata Yogis (1938), p. 250 | |
| दक्षिण भारत | बारहवीं सदी; कलचुरि राजा बिज्जल (शासन 1156–1167) के मंत्री | Rice, A History of Kanarese Literature (1921), p. 52; Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §100, p. 132 | |
| दक्षिण भारत | बारहवीं सदी; बसव के समकालीन, जिनके साथियों में वे कल्याण में जा मिलीं | Rice, A History of Kanarese Literature (1921), p. 57 | |
| दक्षिण भारत | तेरहवीं सदी; Bhandarkar के अनुसार लगभग शके 1119–1198 (लगभग 1197–1276 ई.), जबकि मठों की परंपरागत सूची शके 1040–1119 देती है | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §50, pp. 58–59 | |
| महाराष्ट्र | तेरहवीं सदी; ज्ञानेश्वरी शके 1212 (1290 ई.) में पूरी हुई, यह स्वयं ग्रंथ में लिखा है | ज्ञानेश्वरी (साखरे सं., 1915), अध्याय 18, ओवी 1810, पृ. 864 | |
| महाराष्ट्र | तेरहवीं-चौदहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म शके 1192 (1270 ई.) और देह-त्याग 1350 ई. | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 18, 34 | |
| महाराष्ट्र | नामदेव और ज्ञानदेव का समय (तेरहवीं-चौदहवीं सदी); महीपति उन्हें उसी संत-मंडली में गिनते हैं | महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 195–198; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 34 | |
| महाराष्ट्र | नामदेव का समय (तेरहवीं-चौदहवीं सदी); वे नामदेव के घर में पलीं | महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 14–21; अध्याय 4, ओवी 234 | |
| कश्मीर | चौदहवीं सदी; परंपरा उन्हें सैयद अली हमदानी का समकालीन मानती है, जो 1380 ई. में कश्मीर आए | Grierson & Barnett, Lalla-Vakyani (1920), भूमिका, pp. 1, 3; Lawrence, The Valley of Kashmir (1895), p. 292 | |
| उत्तर भारत | चौदहवीं सदी के अंत से पंद्रहवीं सदी के बीच माने जाते हैं; पक्की तिथि ज्ञात नहीं | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 100–101; Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 3, टिप्पणी 6 | |
| उत्तर भारत | पंद्रहवीं सदी से सोलहवीं सदी की शुरुआत तक; पक्की तिथियाँ विवादित | Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 3, टिप्पणी 6; कबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), प्रस्तावना, पृ. 19–23; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 122; pp. 139–140 | |
| उत्तर भारत | कबीर के समकालीन माने जाते हैं; जन्म-तिथि, जन्म-स्थान और माता-पिता के बारे में कुछ पक्का ज्ञात नहीं | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 316 | |
| उत्तर भारत | रामानंद के शिष्य माने जाते हैं, इसलिए चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी में रखे जाते हैं; पक्की तिथि ज्ञात नहीं | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 120; भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39 | |
| उत्तर भारत | पंद्रहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म 1415 ई. बताया जाता है | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 106 | |
| उत्तर भारत | पंद्रहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म 1425 ई. | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 111 | |
| गुजरात और राजस्थान | पंद्रहवीं सदी; Jhaveri के अनुसार 1415–1481 ई. | Jhaveri, Milestones in Gujarati Literature (1914), p. 35 | |
| बंगाल, ओडिशा और असम | सोलहवीं सदी; परंपरा जन्म 1449 और देह-त्याग 1569 बताती है, पर Gait के अनुसार जन्म-तिथि शायद तीस-चालीस बरस पहले की है | Gait, A History of Assam (1906), p. 57 | |
| बंगाल, ओडिशा और असम | जन्म फ़रवरी-मार्च 1485 ई. (पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण की रात); देह-त्याग जून-जुलाई 1533 ई., पुरी में | Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, pp. ix–xiii | |
| बंगाल, ओडिशा और असम | पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी; Sen के अनुसार चैतन्य (जन्म 1485) से आठ बरस बड़े | D. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), p. 141; Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, p. ix | |
| उत्तर भारत | जन्म वैशाख कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत् 1535 (1479 ई.); देह-त्याग 1531 ई., काशी | Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §62, p. 77; Growse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 283–284 | |
| बंगाल, ओडिशा और असम | सोलहवीं सदी; Das के अनुसार जन्म 1489 ई., और Neog के अनुसार देह-त्याग 1596 ई., कूच बिहार में | H. M. Das, Sankaradeva — A Study (1945), p. 27; Neog, Sankaradeva (NBT, 1967), p. 30 | |
| उत्तर भारत | सोलहवीं सदी; जन्म संवत् 1555–1560 के बीच (लगभग 1500 ई.), देह-त्याग की तिथि पर मत अलग | मीराबाई की शब्दावली (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 342 | |
| उत्तर भारत | सोलहवीं सदी; वार्ता उन्हें वल्लभाचार्य का शिष्य बताती है; जन्म और देह-त्याग की तिथियाँ हमारे पढ़े स्रोतों में नहीं | चौरासी वैष्णवन की वार्ता, सूरदासजी की वार्ता, पृ. 272–275 | |
| उत्तर भारत | सोलहवीं सदी; Growse के अनुसार जन्म विक्रम संवत् 1559 (लगभग 1502 ई.) | Growse, Mathura: A District Memoir (1883), p. 199 | |
| उत्तर भारत | सोलहवीं-सत्रहवीं सदी; मानस का आरंभ संवत् 1631 (स्वयं तुलसी के शब्दों में), देह-त्याग संवत् 1680 (Growse के अनुसार); जन्म-तिथि ज्ञात नहीं | रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), बालकाण्ड, पृ. 17; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. xii | |
| महाराष्ट्र | सोलहवीं सदी; आम तौर पर जन्म 1548 ई. और देह-त्याग 1609 ई. माना जाता है, पर कुछ विद्वान 1528–1599 ई. मानते हैं | महीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), परिशिष्ट, p. 265 | |
| उत्तर भारत | जन्म संवत् 1601 (1544 ई.), देह-त्याग संवत् 1660, बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसार | दादू दयाल की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1, 4; Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 1 | |
| उत्तर भारत | सोलहवीं-सत्रहवीं सदी; Macauliffe भक्तमाल को लगभग 1578 ई. का मानते हैं | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 2; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. iv | |
| उत्तर भारत | Growse के अनुसार सोलहवीं सदी का अंत और सत्रहवीं का आरंभ (अकबर और जहाँगीर का समय); परंपरागत "भक्त-सिंधु" की तिथियाँ संवत् 1441–1537 असंभव हैं | Growse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 219–221 | |
| उत्तर भारत | जन्म संवत् 1631, देह-त्याग संवत् 1739 (108 वर्ष की आयु में), बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसार | मलूकदासजी की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1, 4 | |
| महाराष्ट्र | सत्रहवीं सदी; आम तौर पर माना जाता है कि जन्म 1608 ई. में और देह-त्याग 1649 ई. में हुआ | महीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), भूमिका, p. iii | |
| महाराष्ट्र | जन्म चैत्र शुक्ल नवमी, शके 1530 (1608 ई.); देह-त्याग माघ कृष्ण नवमी, शके 1603 (1681 ई.) | Deming, Ramdas and the Ramdasis (1928), pp. 21, 27 | |
| महाराष्ट्र | सत्रहवीं सदी; मराठी विद्वानों के अनुसार जन्म 1628 ई. में और देह-त्याग 1700 ई. में, 72 बरस की उम्र में | बहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), भूमिका, p. iii | |
| गुजरात और राजस्थान | उन्नीसवीं सदी; विवाह 1864 में, और देह-त्याग 15 मार्च 1894 को, समढियाळा (भावनगर) में | Gujarati Vishwakosh, khand 14 (2001), "Bhagat, Kahalsang", ऑनलाइन लेख |
