भक्ति आंदोलन: दक्षिण के आलवारों से सौराष्ट्र की गंगासती तक

भक्ति आंदोलन क्या था और कैसे फैला: तमिल नायनार-आलवार, आचार्य, रामानंद और उनके शिष्य, महाराष्ट्र के वारकरी, बंगाल-असम, कश्मीर, गुजरात, और संतों की समय-रेखा।

संक्षेप में

सातवीं सदी में तमिल देश के मंदिरों में गाए गए पदों से जो धारा निकली, वह सदियों तक बहती हुई काशी के करघों, पंढरपुर की यात्राओं और असम के नामघरों तक पहुँची। भक्ति आंदोलन यही है: भगवान तक पहुँचने का सबसे सीधा रास्ता प्रेम है, और वह हर किसी के लिए खुला है।

शुरुआत दक्षिण में: नायनार और आलवार

जो पद आज भी गाए जाते हैं, उनमें सबसे पुराने तमिल के हैं। Kingsbury के अनुसार शिव-भक्त कवि संबंदर सातवीं सदी के पहले आधे में हुए, और अप्पर उनके समकालीन थे, उम्र में बड़े। दोनों ने मंदिर-मंदिर घूमकर शिव के गीत गाए।

विष्णु-भक्त आलवारों के पद "नालायिर प्रबंधम्", यानी चार हज़ार पदों के संग्रह में हैं। Hooper के अनुसार इन्हें नाथमुनि (मृत्यु लगभग 920 ई.) ने इकट्ठा करके मंदिर-पूजा में गाने का प्रबंध किया। आलवारों में नम्मालवार को Hooper नौवीं सदी के पहले आधे में रखते हैं।

आचार्यों ने भक्ति को दर्शन दिया

आलवारों की भक्ति को रामानुज ने विशिष्टाद्वैत का दार्शनिक आधार दिया; Bhandarkar उनका जन्म 1016–1017 ई. में रखते हैं। तेरहवीं सदी में मध्व ने द्वैत का मार्ग चलाया।

यही धारा उत्तर पहुँची। भक्तमाल रामानंद को उसी श्री-संप्रदाय में रखती है जो रामानुज से चला, और Macauliffe के अनुसार नाभादास उन्हें रामानुज से चौथी पीढ़ी में गिनते हैं।

उत्तर में रामानंद और उनके शिष्य

Macauliffe के अनुसार रामानंद ने लक्ष्मी-नारायण की जगह सीता-राम की उपासना चलाई और हर जाति के शिष्य स्वीकार किए। कबीर, रविदास, सेन, धन्ना और पीपा उनसे जुड़े, और कबीर, रविदास और धन्ना के अपने पद गुरु ग्रंथ साहिब में मिलते हैं।

इन संतों की याद को नाभादास ने भक्तमाल में छप्पयों में पिरोया; Macauliffe इस ग्रंथ को लगभग 1578 ई. का मानते हैं।

महाराष्ट्र: पंढरपुर की राह

मराठी में इस धारा की नींव ज्ञानेश्वरी है, जिसके अंत में ज्ञानदेव ख़ुद लिखते हैं कि ग्रंथ शके 1212 (1290 ई.) में पूरा हुआ। Ranade गिनते हैं कि इसके बाद लगभग पाँच सौ बरसों में महाराष्ट्र में कोई पचास संत हुए, जिनमें स्त्रियाँ भी थीं और हर जाति के लोग भी।

बहिणाबाई ने इस पूरी परंपरा को एक मंदिर की तरह देखा: ज्ञानदेव ने नींव रखी, नामदेव ने चारदीवारी बनाई, एकनाथ ने खंभा लगाया, और तुकाराम उसका कलश बने।

पूर्व: बंगाल और असम

बंगाल में चैतन्य (1485–1533) के नाम-कीर्तन ने लोगों को गलियों में नाचते-गाते भक्तों में बदल दिया। Sen के अनुसार उन्होंने समाज-सुधार का काम नित्यानंद को सौंपा, जिनके वंशजों ने भाईचारे के दरवाज़े हर जाति के लिए खोले।

असम में शंकरदेव ने बलि की जगह विश्वास और प्रार्थना का मार्ग सिखाया, और उनके उत्तराधिकारी माधवदेव ने नाम-घोषा रचा। Neog के अनुसार इस धर्म में जाति के कारण कोई दीक्षा के अयोग्य नहीं था, और सत्रों के साथ गाँव-गाँव में नामघर बने: गाँव का सभा-भवन, जहाँ नाम-कीर्तन होता और जो गाँव के पूरे जीवन का केंद्र था।

कश्मीर, गुजरात और ब्रज

कश्मीर में चौदहवीं सदी की योगिनी लल देद ने अपने वाखों में भीतर के शिव की बात कही; Grierson के अनुसार हिंदू और मुसलमान, दोनों उन्हें आदर से याद करते हैं। गुजरात में Jhaveri नरसिंह मेहता (1415–1481) से ही गुजराती कविता का पक्का इतिहास शुरू मानते हैं।

ब्रज में वल्लभाचार्य (1479–1531) ने बाल-कृष्ण की सेवा का पुष्टिमार्ग चलाया। और यह धारा उन्नीसवीं सदी तक बहती रही: सौराष्ट्र की गंगासती ने 1894 में समाधि से पहले पानबाई के लिए बावन भजन रचे।

संतों की समय-रेखा (संत-पृष्ठों के स्रोतों से)
संतक्षेत्रसमयस्रोत
दक्षिण भारतसातवीं सदी ई. का पहला आधा; पल्लव-चालुक्य युद्ध (642 ई.) के एक सेनापति के समकालीनHymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 10–11
दक्षिण भारतसातवीं सदी ई.; संबंदर के समकालीन और उनसे उम्र में बड़ेHymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 36
दक्षिण भारतनिश्चित नहीं; परंपरा पाँचवीं सदी कहती है, जबकि विद्वान सातवीं से दसवीं सदी के बीच अलग-अलग तिथियाँ देते हैंHymns of the Tamil Saivite Saints, pp. 2, 86–87; Pope, The Tiruvacagam (1900), pp. xix, lxxvi
दक्षिण भारतनिश्चित नहीं; Aiyar कामचलाऊ रूप से 788 ई. में जन्म और 828 ई. में देह-त्याग मानते हैं, जबकि एक दूसरा मत उन्हें बहुत पहले रखता हैKrishnasami Aiyar, Sri Sankaracharya: His Life and Times, pp. 16–18, 71
दक्षिण भारतपरंपरा के अनुसार कलि संवत् 97; आधुनिक विद्वान (Hooper) उन्हें नौवीं सदी के आसपास, अपने पिता पेरियालवार के समय में रखते हैंGovindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 45; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 10–11, 14
दक्षिण भारतपरंपरा उन्हें कलियुग के आरंभ में रखती है; आधुनिक विद्वानों के अनुसार नौवीं सदी का पहला आधाGovindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 192; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 13
दक्षिण भारतजन्म शके 938–939 (1016–1017 ई.); परंपरा के अनुसार देह-त्याग 1137 ई.Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §46, p. 51; Govindacharya, Life of Ramanujacharya (1906), अंत की तिथि-सूची
बंगाल, ओडिशा और असमBriggs के अनुसार 1200 ई. से पहले, शायद ग्यारहवीं सदी के आरंभ में; परंपराएँ उन्हें कहीं-कहीं युगों पुराना बताती हैंBriggs, Gorakhnath and the Kanphata Yogis (1938), p. 250
दक्षिण भारतबारहवीं सदी; कलचुरि राजा बिज्जल (शासन 1156–1167) के मंत्रीRice, A History of Kanarese Literature (1921), p. 52; Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §100, p. 132
दक्षिण भारतबारहवीं सदी; बसव के समकालीन, जिनके साथियों में वे कल्याण में जा मिलींRice, A History of Kanarese Literature (1921), p. 57
दक्षिण भारततेरहवीं सदी; Bhandarkar के अनुसार लगभग शके 1119–1198 (लगभग 1197–1276 ई.), जबकि मठों की परंपरागत सूची शके 1040–1119 देती हैBhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §50, pp. 58–59
महाराष्ट्रतेरहवीं सदी; ज्ञानेश्वरी शके 1212 (1290 ई.) में पूरी हुई, यह स्वयं ग्रंथ में लिखा हैज्ञानेश्वरी (साखरे सं., 1915), अध्याय 18, ओवी 1810, पृ. 864
महाराष्ट्रतेरहवीं-चौदहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म शके 1192 (1270 ई.) और देह-त्याग 1350 ई.Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 18, 34
महाराष्ट्रनामदेव और ज्ञानदेव का समय (तेरहवीं-चौदहवीं सदी); महीपति उन्हें उसी संत-मंडली में गिनते हैंमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 195–198; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 34
महाराष्ट्रनामदेव का समय (तेरहवीं-चौदहवीं सदी); वे नामदेव के घर में पलींमहीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 21, ओवी 14–21; अध्याय 4, ओवी 234
कश्मीरचौदहवीं सदी; परंपरा उन्हें सैयद अली हमदानी का समकालीन मानती है, जो 1380 ई. में कश्मीर आएGrierson & Barnett, Lalla-Vakyani (1920), भूमिका, pp. 1, 3; Lawrence, The Valley of Kashmir (1895), p. 292
उत्तर भारतचौदहवीं सदी के अंत से पंद्रहवीं सदी के बीच माने जाते हैं; पक्की तिथि ज्ञात नहींMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 100–101; Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 3, टिप्पणी 6
उत्तर भारतपंद्रहवीं सदी से सोलहवीं सदी की शुरुआत तक; पक्की तिथियाँ विवादितWestcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 3, टिप्पणी 6; कबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), प्रस्तावना, पृ. 19–23; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 122; pp. 139–140
उत्तर भारतकबीर के समकालीन माने जाते हैं; जन्म-तिथि, जन्म-स्थान और माता-पिता के बारे में कुछ पक्का ज्ञात नहींMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 316
उत्तर भारतरामानंद के शिष्य माने जाते हैं, इसलिए चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी में रखे जाते हैं; पक्की तिथि ज्ञात नहींMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 120; भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39
उत्तर भारतपंद्रहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म 1415 ई. बताया जाता हैMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 106
उत्तर भारतपंद्रहवीं सदी; Macauliffe के अनुसार जन्म 1425 ई.Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 111
गुजरात और राजस्थानपंद्रहवीं सदी; Jhaveri के अनुसार 1415–1481 ई.Jhaveri, Milestones in Gujarati Literature (1914), p. 35
बंगाल, ओडिशा और असमसोलहवीं सदी; परंपरा जन्म 1449 और देह-त्याग 1569 बताती है, पर Gait के अनुसार जन्म-तिथि शायद तीस-चालीस बरस पहले की हैGait, A History of Assam (1906), p. 57
बंगाल, ओडिशा और असमजन्म फ़रवरी-मार्च 1485 ई. (पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण की रात); देह-त्याग जून-जुलाई 1533 ई., पुरी मेंSarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, pp. ix–xiii
बंगाल, ओडिशा और असमपंद्रहवीं-सोलहवीं सदी; Sen के अनुसार चैतन्य (जन्म 1485) से आठ बरस बड़ेD. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), p. 141; Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, p. ix
उत्तर भारतजन्म वैशाख कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत् 1535 (1479 ई.); देह-त्याग 1531 ई., काशीBhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §62, p. 77; Growse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 283–284
बंगाल, ओडिशा और असमसोलहवीं सदी; Das के अनुसार जन्म 1489 ई., और Neog के अनुसार देह-त्याग 1596 ई., कूच बिहार मेंH. M. Das, Sankaradeva — A Study (1945), p. 27; Neog, Sankaradeva (NBT, 1967), p. 30
उत्तर भारतसोलहवीं सदी; जन्म संवत् 1555–1560 के बीच (लगभग 1500 ई.), देह-त्याग की तिथि पर मत अलगमीराबाई की शब्दावली (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 342
उत्तर भारतसोलहवीं सदी; वार्ता उन्हें वल्लभाचार्य का शिष्य बताती है; जन्म और देह-त्याग की तिथियाँ हमारे पढ़े स्रोतों में नहींचौरासी वैष्णवन की वार्ता, सूरदासजी की वार्ता, पृ. 272–275
उत्तर भारतसोलहवीं सदी; Growse के अनुसार जन्म विक्रम संवत् 1559 (लगभग 1502 ई.)Growse, Mathura: A District Memoir (1883), p. 199
उत्तर भारतसोलहवीं-सत्रहवीं सदी; मानस का आरंभ संवत् 1631 (स्वयं तुलसी के शब्दों में), देह-त्याग संवत् 1680 (Growse के अनुसार); जन्म-तिथि ज्ञात नहींरामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), बालकाण्ड, पृ. 17; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. xii
महाराष्ट्रसोलहवीं सदी; आम तौर पर जन्म 1548 ई. और देह-त्याग 1609 ई. माना जाता है, पर कुछ विद्वान 1528–1599 ई. मानते हैंमहीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), परिशिष्ट, p. 265
उत्तर भारतजन्म संवत् 1601 (1544 ई.), देह-त्याग संवत् 1660, बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसारदादू दयाल की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1, 4; Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 1
उत्तर भारतसोलहवीं-सत्रहवीं सदी; Macauliffe भक्तमाल को लगभग 1578 ई. का मानते हैंMacauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 2; तुलसी रामायण (Growse अनु.), भूमिका, p. iv
उत्तर भारतGrowse के अनुसार सोलहवीं सदी का अंत और सत्रहवीं का आरंभ (अकबर और जहाँगीर का समय); परंपरागत "भक्त-सिंधु" की तिथियाँ संवत् 1441–1537 असंभव हैंGrowse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 219–221
उत्तर भारतजन्म संवत् 1631, देह-त्याग संवत् 1739 (108 वर्ष की आयु में), बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसारमलूकदासजी की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1, 4
महाराष्ट्रसत्रहवीं सदी; आम तौर पर माना जाता है कि जन्म 1608 ई. में और देह-त्याग 1649 ई. में हुआमहीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), भूमिका, p. iii
महाराष्ट्रजन्म चैत्र शुक्ल नवमी, शके 1530 (1608 ई.); देह-त्याग माघ कृष्ण नवमी, शके 1603 (1681 ई.)Deming, Ramdas and the Ramdasis (1928), pp. 21, 27
महाराष्ट्रसत्रहवीं सदी; मराठी विद्वानों के अनुसार जन्म 1628 ई. में और देह-त्याग 1700 ई. में, 72 बरस की उम्र मेंबहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), भूमिका, p. iii
गुजरात और राजस्थानउन्नीसवीं सदी; विवाह 1864 में, और देह-त्याग 15 मार्च 1894 को, समढियाळा (भावनगर) मेंGujarati Vishwakosh, khand 14 (2001), "Bhagat, Kahalsang", ऑनलाइन लेख

इस लेख के संत

स्रोत

भक्ति आंदोलन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न