नित्यानंद प्रभु

चैतन्य के सबसे निकट साथी, जिन्होंने बंगाल के घर-घर तक कीर्तन और भाईचारा पहुँचाया

संक्षेप में

शराबी माधाई की फेंकी टूटी बोतल से माथा फटा, ख़ून बहने लगा, और नित्यानंद ने बदले में उसे आशीर्वाद दिया। वे भारत के सारे तीर्थ घूमकर भी कहते थे: मंदिरों में सिंहासन ख़ाली मिला। फिर नवद्वीप में उन्हें निमाई मिले, और वे उनके सबसे निकट साथी बन गए।

भक्त संतगौड़ीय वैष्णवकृष्ण-भक्ति

एक नज़र में

नित्यानंद प्रभु — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीभक्त संतD. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), pp. 141–142; Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, p. xi
परंपरागौड़ीय वैष्णव, कृष्ण-भक्तिSarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, p. xiii; D. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), pp. 283–284; D. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), pp. 36, 142
कालपंद्रहवीं-सोलहवीं सदी; Sen के अनुसार चैतन्य (जन्म 1485) से आठ बरस बड़े (आधुनिक विद्वानों का मत)D. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), p. 141; Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, p. ix
समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा)चैतन्य महाप्रभुD. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), pp. 141–142, 153–154; Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, p. xi

जीवन

एकचक्रा का बालक

परंपरागत कथा

Sen बताते हैं कि उस समय बंगाल के बच्चों में भागवत की कृष्ण-लीलाएँ खेलने का बड़ा चाव था। वृंदावन दास के "चैतन्य भागवत" में बालक नित्यानंद एकचक्रा में साथियों के साथ कृष्ण-लीला खेलते दिखते हैं: छकड़ा तोड़ना, कंस-वध, और कभी नकली दाढ़ी-मूँछ लगाकर नारद बनना।

Sen के अनुसार युवा संन्यासी के रूप में नित्यानंद ने पूरे भारत के तीर्थ देखे। वे कहते थे: "मैंने कृष्ण से जुड़े सारे धाम देखे; मंदिर बहुत हैं, पर किसी में कृष्ण नहीं मिले। सिंहासन ख़ाली दिखा। एक संत ने कहा कि बंगाल लौट जाओ, नदिया में वे मिलेंगे, जो पतितों का उद्धार करने आए हैं।"

नवद्वीप में निमाई से भेंट

परंपरागत कथा

Sen के अनुसार निमाई से केवल आठ बरस बड़े नित्यानंद नदिया आए और नंदनाचार्य के घर ठहरे। वे नीली धोती और बड़ी नीली पगड़ी पहनते थे, और उनकी आँखें इतनी सुंदर थीं कि वृंदावन दास पूछते हैं: कमल भी उनकी तुलना में कहाँ? उनका रूप निमाई के संन्यासी हो चुके बड़े भाई विश्वरूप से मिलता था, इसलिए शची देवी उन्हें अपना बेटा कहने लगीं।

Sarkar लिखते हैं कि नित्यानंद चैतन्य के लिए वैसे ही बने, जैसे ईसा के लिए पॉल, बल्कि उससे भी बढ़कर। नवद्वीप में बहुत-से लोग चैतन्य को कृष्ण का अवतार और नित्यानंद को बलराम मानने लगे, और दोनों की अगुवाई में कीर्तन की टोलियाँ गलियों में निकलने लगीं।

बंगाल में प्रचार

ऐतिहासिक प्रमाण

Sarkar के अनुसार चैतन्य के जीवनकाल में ही उनके शिष्यों ने प्रचार का संगठन बना लिया था, और बंगाल में यह मत नित्यानंद ने दूर-दूर तक फैलाया। आगे चलकर नित्यानंद को चैतन्य के बराबर ही आराध्य माना जाने लगा। चैतन्य-चरितामृत के रचयिता कृष्णदास कविराज भी युवावस्था में नित्यानंद के कारण ही वैष्णव बने थे।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

माधाई की चोट, और आशीर्वाद

परंपरागत कथा

Sen के अनुसार नदिया के दो नामी गुंडे, जगाई और माधाई, गलियों में कीर्तन करने वालों को सबक़ सिखाना चाहते थे। एक दिन नित्यानंद कृष्ण का नाम गा रहे थे कि माधाई ने टूटी बोतल फेंककर मारी, और उनका माथा कट गया, ख़ून बहने लगा।

नित्यानंद ने बुरा नहीं माना, बल्कि आशीर्वाद दिया। निमाई आए और बस इतना कहा कि मारना ही था तो मुझे मारते। यह क्षमा देखकर दोनों भाइयों का मन बदल गया, और सुबह वे पछताते हुए क्षमा माँगने आए।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

जाति से ऊपर भाईचारा

Sen के अनुसार चैतन्य ने समाज-सुधार का काम नित्यानंद को सौंपा। ब्राह्मण होकर भी नित्यानंद सुवर्णवणिक जाति के उद्धारण दत्त का पकाया खाना खाते थे, जिस जाति को उस समय "अशुद्ध" माना जाता था, और ज़्यादातर समय नीची मानी जाने वाली जातियों के घरों में बिताते थे।

Sen लिखते हैं कि नित्यानंद का निवास खड़दह वैष्णवों का मुख्य केंद्र बना, जहाँ से समाज के नियम निकलते थे। खड़दह और शांतिपुर के गोस्वामियों, यानी नित्यानंद और अद्वैत के वंशजों, ने भाईचारे के दरवाज़े हर जाति के लिए खोल दिए। जिनके घर कोई ब्राह्मण पूजा-पाठ नहीं करता था, उन्हें उन्होंने शिष्य बनाया, उनके घर खाया और उनके मंदिरों में पुरोहिती की। नित्यानंद और उनके पुत्र वीरभद्र ने इस काम को आगे बढ़ाया।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतSarkar के अनुसार चैतन्य का सबसे पुराना जीवन-चरित, वृंदावन दास का "चैतन्य भागवत" (1535), नित्यानंद के भक्त ने लिखा, जिनके लिए नित्यानंद ईश्वर के अवतार थे और चैतन्य लगभग दूसरे स्थान पर। इससे पता चलता है कि नित्यानंद की अपनी भक्त-परंपरा कितनी बड़ी थी।

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स्रोत

नित्यानंद प्रभु — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न