FAQ
नित्यानंद प्रभु — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नित्यानंद प्रभु चैतन्य महाप्रभु के सबसे निकट साथी थे, जो नवद्वीप में उनसे मिले और उनके साथ नाम-कीर्तन की अगुवाई की। बंगाल में गौड़ीय वैष्णव मत को घर-घर पहुँचाने का श्रेय उन्हें जाता है।
Sen के अनुसार नित्यानंद भारत के सारे तीर्थ घूमकर भी कृष्ण को न पा सके, और एक संत ने कहा कि नदिया जाओ। वे नवद्वीप आए और निमाई से मिले, जो उनसे आठ बरस छोटे थे।
Sarkar के अनुसार नवद्वीप में बहुत-से लोग चैतन्य को कृष्ण का अवतार मानने लगे, और उनके बड़े भाई-समान साथी नित्यानंद को बलराम।
माधाई ने नित्यानंद के माथे पर टूटी बोतल मारी, फिर भी उन्होंने क्रोध नहीं किया और उसे आशीर्वाद दिया। इसी क्षमा से दोनों भाइयों का हृदय बदल गया।
Sen के अनुसार खड़दह नित्यानंद का निवास था और वैष्णवों का मुख्य केंद्र बना। वहाँ के गोस्वामियों ने हर जाति के लोगों को वैष्णव भाईचारे में अपनाया।
