बसवन्ना
कल्याण के मंत्री, जिन्होंने कहा: मेरा शरीर ही मंदिर है
संक्षेप में
जिनके पास धन है, वे भगवान का मंदिर नहीं बनवाते; तो मैं, ग़रीब, क्या करूँ? मेरे पैर खंभे होंगे, शरीर मंदिर, और सिर सोने का कलश। पत्थर का मंदिर ढह जाएगा, चलता-फिरता यह मंदिर कभी नहीं। यह बसवन्ना का वचन है, कल्याण के उस मंत्री का, जिसे लिंगायत अपना सबसे बड़ा संत मानते हैं।
वीरशैव वचनकारवीरशैव
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | वीरशैव वचनकार | Rice, A History of Kanarese Literature (1921), pp. 53, 56–57 |
| परंपरा | वीरशैव | Rice, A History of Kanarese Literature (1921), pp. 52–54; Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §100, pp. 131–132; Würth, Basava Purana (JBBRAS vol. VIII, 1865), pp. 66–68 |
| काल | बारहवीं सदी; कलचुरि राजा बिज्जल (शासन 1156–1167) के मंत्री (ऐतिहासिक प्रमाण) | Rice, A History of Kanarese Literature (1921), p. 52; Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §100, p. 132 |
| समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा) | अक्का महादेवी | Rice, A History of Kanarese Literature (1921), p. 57; Würth, Basava Purana (JBBRAS vol. VIII, 1865), p. 118 |
जीवन
बागेवाडी का बालक
परंपरागत कथालिंगायत परंपरा के बसव पुराण के अनुसार शिव ने देखा कि धरती पर शिव-धर्म कमज़ोर पड़ गया है, और अपने वाहन नंदी को सुधार के लिए धरती पर भेजा। बागेवाडी में शिव-भक्त ब्राह्मण मादिराज और मादलांबिका निःसंतान थे; नंदीश्वर से प्रार्थना के बाद उनके यहाँ बसव का जन्म हुआ।
Rice के अनुसार बसव आराध्य ब्राह्मण थे, जन्म बागेवाडी (कलादगी ज़िला) में हुआ, और वे मलप्रभा और कृष्णा के संगम पर कप्पडि ले जाए गए, जहाँ "संगमेश्वर" नाम से शिव का मंदिर है। कहा जाता है कि वहीं उन्हें वीरशैव धर्म को फिर जगाने की पुकार सुनाई दी।
कल्याण के मंत्री
ऐतिहासिक प्रमाणRice के अनुसार बसव की पहली पत्नी उनके मामा की बेटी थीं, जो कल्याण के कलचुरि राजा बिज्जल (1156–1167) के प्रधानमंत्री थे। ससुर के देहांत के बाद बसव प्रधानमंत्री बने। राजकोष उनके हाथ में था, और उन्होंने जंगम नाम के पुरोहित नियुक्त कर उन पर बड़ा धन ख़र्च किया।
बसव पुराण कहता है कि बसव पहले कोई सांसारिक पद नहीं लेना चाहते थे, पर इस आशा में मान गए कि इससे नए धर्म के प्रचार में मदद मिलेगी। Würth, जिन्होंने 1865 में यह पुराण अनुवाद किया, लिखते हैं कि बसव के जीवन की मुख्य बातें, जैसे ब्राह्मण कुल, मंत्री बलदेव की बेटी से विवाह, बिज्जल का प्रधानमंत्री होना और लिंगायत मत का प्रचार, निस्संदेह ऐतिहासिक हैं।
Rice एक शिलालेख का उल्लेख करते हैं: बागेवाडी से ग्यारह मील दूर मनरगोलि का 1161 का लेख, जिसमें एक बसव के बनाए मंदिर को दान दर्ज है। उसमें बसव को "शिव-भक्ति में अद्वितीय" और "जगत का पुण्यवान पिता" कहा गया है। Rice के अनुसार यह लिंगायत मत के प्रवर्तक की ओर ही इशारा लगता है, हालाँकि उसमें प्रधानमंत्री होने का उल्लेख नहीं।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
जनेऊ से इनकार
परंपरागत कथाबसव पुराण के अनुसार आठ बरस की उम्र में पिता ने बसव का यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहा, पर बसव ने मना कर दिया: "मैं शिव का उपासक हूँ, ब्रह्मा की संतान नहीं। मैं जाति के पेड़ की जड़ पर रखी कुल्हाड़ी हूँ।"
कथा कहती है कि संस्कार में आए मामा बलदेव, जो कल्याण में बिज्जल के प्रधानमंत्री थे, इस बालक की बुद्धि और भक्ति से इतने प्रभावित हुए कि अपनी बेटी का विवाह उससे कर दिया। ब्राह्मणों के विरोध के कारण बसव गाँव छोड़कर कप्पडि चले गए।
कल्याण का अंत: अलग-अलग कथाएँ
मत अलग-अलगRice लिखते हैं कि बसव और राजा बिज्जल के संबंधों के अंत की अलग-अलग कथाएँ हैं। लिंगायत बसव पुराण के अनुसार राजा ने दो लिंगायत भक्तों, हल्लेयग और मधुवय्य, की आँखें निकलवा दीं। तब बसव ने कल्याण को श्राप दिया, अपने अनुयायी जगदेव को राजा को मारने का आदेश दिया, और कूडलसंगम चले गए, जहाँ संगमेश्वर की मूर्ति ने उन्हें अपने में लीन कर लिया।
Rice के अनुसार बाद का लिंगायत ग्रंथ "चन्नबसव पुराण" (1584) बसव को राजा की मृत्यु से पूरी तरह बरी करता है, हालाँकि Rice इसे बाद में जोड़ी गई सफ़ाई जैसा मानते हैं। Rice यह भी लिखते हैं कि घटनाओं के सबसे निकट का स्रोत पाल्कुरिकि सोमनाथ का तेलुगु बसव पुराण (लगभग 1195) होना चाहिए था, अगर वह उपलब्ध होता।
स्रोतों में अंतर
लिंगायतों के विरोधी जैनों की कथा, "बिज्जलराय-चरित", अलग है: उसके अनुसार बसव की प्रभावशाली स्थिति उनकी बहन के कारण थी, जिससे राजा ने विवाह किया था; बसव ने राजा को ज़हर का फल भेजा, और भागकर उलवि में घिर जाने पर कुएँ में कूद गए। Würth और Bhandarkar, दोनों ने इस जैन कथा को दर्ज किया है; Würth इसे "शत्रुओं" का वृत्तांत कहते हैं।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
शरीर ही मंदिर
Rice के अनुवाद में बसव का एक वचन: जिनके पास धन है, वे शिव का मंदिर नहीं बनवाते; तो मैं, ग़रीब, तुम्हारे लिए एक मंदिर बनाऊँगा: मेरे पैर खंभे होंगे, मेरा शरीर देवालय, और सिर सोने का कलश। हे कूडलसंगमदेव, सुनो: पत्थर का स्थिर मंदिर एक दिन मिट जाएगा, पर आत्मा का यह चलता-फिरता मंदिर कभी नष्ट नहीं होगा।
एक और वचन का भाव: गाल पीले पड़ें, गर्दन पर झुर्रियाँ आएँ, दाँत गिरें, कमर झुके, लाठी का सहारा लेना पड़े, और सुंदरता बुढ़ापे में खो जाए, उससे पहले, अभी, कूडलसंगमदेव की पूजा करो।
बसव पुराण के अनुसार संगमेश्वर ने बसव को जो उपदेश दिया, उसमें था: शिव का चिह्न धारण करने वाले जंगमों को मेरा ही रूप मानो; वे गाली दें या मारें, तब भी उन्हें प्रणाम करो; कुछ भी भगवान को अर्पित किए बिना मत खाओ; पराई स्त्री और पराए धन की इच्छा मत करो; इंद्रियों को मन की वासना के पीछे मत जाने दो; और सदा सच बोलो।
रचनाएँ और ग्रंथ
परंपरा से इनके नाम परवचन — Rice के अनुसार वचन-साहित्य बसव के समय में शुरू हुआ। ये छोटे, सरल गद्य-अनुच्छेद हैं, जो धन के मोह, केवल कर्मकांड या किताबी ज्ञान की व्यर्थता और जीवन की अनिश्चितता पर बात करते हैं, और मनुष्य को शिव की शरण लेने को कहते हैं। बसव के नाम से छह ऐसे ग्रंथ जुड़े हैं, जैसे षट्स्थल-वचन और कालज्ञान-वचन; हर वचन के अंत में उनकी छाप "कूडलसंगमदेव" आती है।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
आधुनिक विद्वानों का मतRice और Bhandarkar, दोनों के अनुसार लिंगायत या वीरशैव धर्म बसव से शुरू नहीं हुआ; बसव उसके संस्थापक से ज़्यादा उसके पुनर्जीवक और प्रचारक थे। Bhandarkar के अनुसार बसव पुराण ख़ुद उनसे पहले के आचार्यों के नाम लेता है, और बसव ने अपने राजनीतिक प्रभाव से इस संप्रदाय को आगे बढ़ाया और उसे कड़ा, जाति-विरोधी रूप दिया।
आधुनिक विद्वानों का मतRice के अनुसार लिंगायत आंदोलन की लोकप्रियता का बड़ा कारण यह था कि वचन ऐसे सरल गद्य में थे, जिसे समझने के लिए किसी विद्या की ज़रूरत नहीं। Rice इसकी तुलना चौदहवीं सदी के इंग्लैंड में विक्लिफ़ और उनके प्रचारकों के असर से करते हैं, और लिखते हैं कि वचन आज भी लिंगायत आचार्य अपने अनुयायियों को सुनाते हैं।
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स्रोत
- A History of Kanarese Literature (2nd ed.) — E. P. Rice (1921) · pp. 52–57
- Basava Purana and Channabasava Purana of the Lingaits (JBBRAS vol. VIII) — Rev. G. Würth (अनु.) (1865) · pp. 65–71, 96–97
- Vaisnavism, Saivism and Minor Religious Systems — R. G. Bhandarkar (1913) · §§100–102, pp. 131–134
