संत रविदास
काशी के संत, जिन्होंने जूते गाँठते हुए राम-नाम गाया
संक्षेप में
काशी का एक संत जूते गाँठता था और राम का नाम गाता था। उसने एक ऐसे नगर का सपना देखा, जहाँ न दुख हो, न चिंता, न कर का डर, और उसका नाम रखा बेगमपुरा। यही संत रविदास हैं, जिन्हें रैदास भी कहते हैं। उनके पद गुरु ग्रंथ साहिब में हैं।
निर्गुण भक्ति संतगुरु ग्रंथ साहिब में वाणी
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | निर्गुण भक्ति संत | कबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), प्रस्तावना, पृ. 13 |
| परंपरा | गुरु ग्रंथ साहिब में वाणी | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 1; pp. 321–341 |
| काल | कबीर के समकालीन माने जाते हैं; जन्म-तिथि, जन्म-स्थान और माता-पिता के बारे में कुछ पक्का ज्ञात नहीं (परंपरागत कथा) | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 316 |
| गुरु (परंपरागत कथा) | स्वामी रामानंद | भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 36, पृ. 39; प्रियादास की टीका, कवित्त 259–260, पृ. 69; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 316 |
| समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा) | संत कबीरदास | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 316; p. 141 |
| शिष्य (मत अलग-अलग) | मीराबाई | मीराबाई की शब्दावली (बेलवेडियर), शब्द 57 ("गुरु मिलिया रैदास जी…"), पृ. 21; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 318 |
जीवन
चमड़े का काम और राम का नाम
संत की अपनी वाणी मेंरविदास ने अपनी जाति कभी नहीं छिपाई। गुरु ग्रंथ साहिब के एक पद में वे कहते हैं कि मैं जात से चमार हूँ, मेरा काम चमड़ा काटना-सुखाना और बनारस के आसपास से मरे हुए पशु उठाना है। फिर भी, क्योंकि मैंने राम-नाम की शरण ली है, बड़े-बड़े ब्राह्मण मुझे प्रणाम करते हैं।
एक और पद में वे कहते हैं: मेरी जाति नीची है, कुल नीचा है, जन्म भी नीचा है, पर मैंने तेरी शरण ली है। उनकी भक्ति का सारा ज़ोर यही है कि भगवान जाति नहीं, प्रेम देखता है।
नाभादास ने भक्तमाल में रविदास को इन्हीं शब्दों में याद किया है: लोग वर्ण-आश्रम का अभिमान छोड़कर उनके चरणों की धूल को प्रणाम करते हैं।
जन्म के बारे में क्या ज्ञात है
परंपरागत कथाMacauliffe साफ़ लिखते हैं कि रविदास कबीर के समकालीन थे, पर उनकी पक्की तिथि, माता-पिता और जन्मस्थान के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं। इसलिए इस पृष्ठ पर कोई जन्म-तिथि नहीं दी गई।
भक्तमाल की टीका में प्रियादास एक कथा सुनाते हैं। पिछले जन्म में रविदास स्वामी रामानंद के एक ब्रह्मचारी शिष्य थे। एक दिन वे भिक्षा का अन्न ऐसे बनिये से ले आए, जिसके बारे में बाद में पता चला कि वह नीचे माने जाने वाले लोगों से लेन-देन करता था। उस दिन भोग लगाते समय रामानंद का ध्यान नहीं लगा। कारण जानकर उन्होंने शिष्य को शाप दिया कि वह नीच कुल में जन्म ले।
प्रियादास आगे कहते हैं कि नए जन्म में बालक माँ का दूध नहीं पीता था, क्योंकि उसे पिछली सब याद थी। आकाशवाणी हुई, रामानंद स्वयं आए, बालक को शिष्य बनाया, और तब उसने दूध पिया। यह कथा परंपरा की है, इतिहास की नहीं।
घर से अलग, साधुओं की सेवा में
परंपरागत कथाबड़े होकर रविदास का मन साधु-संतों में लग गया। जो कुछ हाथ आता, उन्हीं पर ख़र्च कर देते। पिता को यह अच्छा न लगा, और उन्होंने बेटे को घर के पीछे की ज़मीन पर अलग कर दिया, धन में से कुछ भी न दिया। रविदास और उनकी पत्नी वहीं छप्पर डालकर रहने लगे। वे जूते बनाते, और साधुओं को उनके जूते बिना दाम दे देते।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
पारस पत्थर, जिसे छुआ तक नहीं
परंपरागत कथारविदास बहुत तंगी में रहते थे, पर मन में आनंद था। एक दिन एक भक्त उनके घर आया। रविदास ने बड़े आदर से उसे खिलाया-पिलाया। जाते समय उसने एक पारस पत्थर दिया, जो लोहे को छू ले तो सोना बना दे, और कहा, "इसे सँभालकर रखना।"
रविदास ने कहा, "मेरा धन तो राम है, मुझे पत्थर से क्या काम?" बहुत कहने पर उन्होंने बस इतना कहा कि इसे छप्पर में खोंस दो। पत्थर वहीं पड़ा रहा।
तेरह महीने बाद वह भक्त लौटा और पूछा, "पारस का क्या हुआ?" रविदास बोले, "जहाँ तुमने रखा था, वहीं होगा, उठा लो।" उसे पत्थर वहीं मिला। प्रियादास कहते हैं कि वह भक्त कोई और नहीं, स्वयं भगवान थे।
इस प्रसंग पर गुरु ग्रंथ साहिब में रविदास का एक पद भी जोड़ा जाता है: भगवान का नाम संतों का धन है, जो रोज़ बढ़ता है, घटता नहीं, और जिसे कोई चोर नहीं चुरा सकता। जिसके पास यह धन है, उसे पत्थर की क्या ज़रूरत?
स्रोतों में अंतर
प्रियादास और Macauliffe, दोनों आगे बताते हैं कि इसके बाद रविदास को पूजा की टोकरी में रोज़ पाँच सोने की मोहरें मिलने लगीं। वे डर गए कि कहीं भक्ति धन न ले आए, तब सपने में भगवान ने कहा कि हठ छोड़ो, मेरी दी हुई चीज़ रख लो। उसी धन से उन्होंने साधुओं के लिए धर्मशाला और एक मंदिर बनवाया।
राजा के दरबार में
परंपरागत कथाजब रविदास का मंदिर बना और दर्शन को भीड़ आने लगी, तो कुछ ब्राह्मणों को यह सहन न हुआ। उन्होंने भरी सभा में राजा से शिकायत की कि एक चमार भगवान की मूर्ति पूज रहा है, यह शास्त्र के विरुद्ध है।
राजा ने रविदास को बुलाया। उनकी बात सुनकर राजा ने उन्हें निर्दोष माना। प्रियादास लिखते हैं कि रविदास ने विरोधियों के बारे में भी इतना ही कहा: जो मेरे प्रतिकूल हैं, उन्हें मैं अपने अनुकूल मानता हूँ, क्योंकि उन्हीं के कारण संतों का प्रभाव सबके सामने आता है।
चित्तौड़ की रानी झाली
परंपरागत कथाचित्तौड़ की रानी झाली रविदास का नाम सुनकर काशी आईं और उनकी शिष्या बन गईं। उनके साथ के ब्राह्मण बहुत नाराज़ हुए कि रानी ने एक चमार को गुरु बना लिया।
बाद में रानी ने रविदास को चित्तौड़ बुलाया और एक बड़ा भोज रखा। ब्राह्मणों ने उनके साथ भोजन करना उचित नहीं समझा और अपना भोजन अलग बनाया। पर जब वे खाने बैठे, तो हर दो ब्राह्मणों के बीच उन्हें रविदास बैठे दिखे। यह देखकर वे उनके चरणों में गिर पड़े।
स्रोतों में अंतर
प्रियादास इस कथा में एक बात और जोड़ते हैं: रविदास ने अपनी त्वचा के भीतर से सोने का जनेऊ निकालकर दिखाया, और लाखों लोग शिष्य बने। Macauliffe की कथा में यह जनेऊ नहीं है।
कई लोग इस रानी झाली को मीराबाई मान लेते हैं। Macauliffe और प्रियादास, दोनों उन्हें "झाली" ही कहते हैं, मीरा नहीं।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
नाम ही आरती
रविदास की आरती दीपक-थाल की नहीं, नाम की आरती है। गुरु ग्रंथ साहिब के उनके एक पद में भगवान का नाम ही आसन है, नाम ही चंदन, नाम ही दीपक और बाती, नाम ही भोग। "कह रैदास नाम तेरो आरती।"
सच्ची पूजा मन की
एक पद में रविदास माँ से पूछते हैं: भगवान को चढ़ाऊँ क्या? गाय का दूध बछड़े ने जूठा कर दिया, फूल भौंरे ने और पानी मछली ने। चंदन पर साँप लिपटे रहते हैं। फिर वे कहते हैं कि मैं अपना तन और मन ही अर्पण करता हूँ, यही मेरी पूजा है।
भगवान और भक्त का रिश्ता
रविदास भगवान और अपने बीच का रिश्ता बहुत सीधे शब्दों में कहते हैं: तुम पर्वत हो तो मैं मोर, तुम चंद्रमा हो तो मैं चकोर, तुम दीपक हो तो मैं बाती। तुम मुझसे नाता न तोड़ो, तो मैं भी न तोड़ूँ।
प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ
प्रभुजी तुम चंदन हम पानी
अब कैसे छूटै नाम रट लागी॥ टेक॥
प्रभुजी तुम चंदन हम पानी। जाकी अँग अँग बास समानी॥
प्रभुजी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभुजी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभुजी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सुहागा॥
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै रैदासा॥अब यह नाम की रट कैसे छूटे? प्रभु, तुम चंदन हो और मैं पानी, जिसके अंग-अंग में तुम्हारी सुगंध समा गई है। तुम बादल और वन हो, मैं मोर; जैसे चकोर चाँद को निहारता है, वैसे मैं तुम्हें। तुम दीपक हो, मैं बाती, जिसकी जोत दिन-रात जलती है। तुम मोती हो, मैं धागा; हम ऐसे मिले हैं जैसे सोने में सुहागा। तुम स्वामी हो, मैं दास; रैदास ऐसी भक्ति करता है।
बेगमपुरा: बिना दुख का नगर
अब हम खूब वतन घर पाया, ऊँचा खेर सदा मेरे भाया॥ टेक॥
बेगमपूर सहर का नाम। फिकर अँदेस नहीं तेहि ग्राम॥
नहिं जहाँ साँसत लानत मार। हैफ न खता न तरस जवाल॥
आव न जान रहम औजूद। जहाँ गनी आप बसै माबूद॥
जोई सैलि करै सोई भावै। महरम महल में को अटकावै॥
कह रैदास खलास चमारा। जो उस सहर सो मीत हमारा॥अब मैंने एक बढ़िया वतन, एक घर पा लिया है; वह ऊँचा गाँव मुझे सदा भाता है। उस नगर का नाम है बेगमपुर, यानी बिना ग़म का नगर। उस गाँव में न फ़िक्र है, न अंदेशा। वहाँ न सज़ा है, न अपमान, न मार; न पछतावा, न ग़लती, न गिरावट का डर। वहाँ वह बेपरवाह मालिक स्वयं बसता है, जिसकी पूजा होती है। जो जहाँ चाहे घूमे, उस महल के जानकार को कोई नहीं रोकता। मुक्त हुआ चमार रैदास कहता है: जो उस नगर का वासी है, वही मेरा मित्र है। (तीसरे पद की पहली पंक्ति, "आव न जान रहम औजूद", का अर्थ साफ़ न होने से यहाँ छोड़ा गया है।)
रचनाएँ और ग्रंथ
गुरु ग्रंथ साहिब मेंगुरु ग्रंथ साहिब में रविदास के पद — गुरु अर्जन देव ने रविदास के पद गुरु ग्रंथ साहिब में रखे। Macauliffe ने इनका अंग्रेज़ी अनुवाद दिया है, जिसमें बेगमपुरा, नाम की आरती और "तुम पर्वत, मैं मोर" जैसे पद हैं।
प्रामाणिक संग्रह मेंरैदासजी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग) — संतबानी पुस्तक-माला का संग्रह। प्रकाशक के अनुसार इसके पद हस्तलिखित प्रतियों को आपस में मिलाकर छापे गए। इसमें कुछ पद ऐसे रूप में हैं, जो गुरु ग्रंथ साहिब के पाठ से अलग हैं।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
ऐतिहासिक प्रमाणरविदास की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है, इसलिए उनके पद एक पुरानी, सुरक्षित परंपरा में बचे रहे।
परंपरागत कथानाभादास के अनुसार रविदास की निर्मल वाणी संदेह की गाँठें खोलने में निपुण थी, उन्होंने सदाचार, श्रुति और शास्त्र के अनुकूल वचन कहे, और भगवान की कृपा से इसी शरीर में परम गति पाई।
आधुनिक विद्वानों का मतश्यामसुंदरदास रविदास को कबीर के साथ उन संतों में गिनते हैं, जिन्होंने परमात्मा की एकता के आधार पर मनुष्यों की एकता का निर्गुण भक्ति-मार्ग चलाया।
संबंधित संत
- स्वामी रामानंद — गुरु
- संत कबीरदास — समकालीन / प्रसंग में साथ
- मीराबाई — शिष्य
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भक्ति-पाठ
- संत रविदास आरती — रविदास का अपना शबद "नामु तेरो आरती", गुरु ग्रंथ साहिब से
तीर्थ
- काशी — रविदास की नगरी
स्रोत
- श्रीभक्तमाल — नाभादास के मूल छप्पय, प्रियादास की भक्तिरसबोधिनी टीका सहित — नाभादास (मूल), प्रियादास (टीका, 1713 ई.) (1600) · छप्पय 36, 59; प्रियादास की टीका, कवित्त 259–267, पृ. 39, 68–70
- The Sikh Religion: Its Gurus, Sacred Writings and Authors, vol. VI (Bhagats of the Granth Sahib) — Max Arthur Macauliffe (1909) · pp. 1, 316–341
- रैदासजी की बानी, जीवन-चरित्र सहित (संतबानी पुस्तक-माला) — बेलवेडियर छापाखाना, प्रयाग (प्रकाशक-संपादक) (1948) · भूमिका; पद 31, 48, 86
- कबीर-ग्रंथावली (नागरीप्रचारिणी ग्रंथमाला 33) — श्यामसुंदरदास (सं.) (1928) · प्रस्तावना, पृ. 13
