अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना (रहीम)

अकबर के सेनापति, जिनके नीति के दोहे आज भी कहावत बनकर ज़ुबान पर हैं

संक्षेप में

जिस सेनापति ने गुजरात और सिंध जीते, उसी ने लिखा: रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय। यही अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना हैं, अकबर के दरबार के सबसे बड़े अमीरों में एक, जो कविता "रहीम" नाम से लिखते थे। उनके नीति के दोहे चार सौ बरस बाद भी लोगों की ज़ुबान पर कहावत बनकर ज़िंदा हैं।

नीति-कवि

एक नज़र में

अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना (रहीम) — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीनीति-कविआईन-ए-अकबरी (Blochmann अनु.), अमीर सं. 29, p. 338; रहीम-रत्नावली (याज्ञिक सं.), दोहावली, दोहे 198, 205, पृ. 20
कालजन्म 14 सफ़र 964 हिजरी (लाहौर), देह-त्याग 1036 हिजरी (दिल्ली), 72 वर्ष की आयु में (ऐतिहासिक प्रमाण)आईन-ए-अकबरी (Blochmann अनु.), अमीर सं. 29, pp. 334, 338

जीवन

बैरम ख़ाँ के बेटे

ऐतिहासिक प्रमाण

आईन-ए-अकबरी के अनुसार रहीम अकबर के संरक्षक बैरम ख़ाँ के बेटे थे। उनकी माँ मेवात के जमाल ख़ाँ की बेटी थीं। उनका जन्म लाहौर में 14 सफ़र 964 हिजरी को हुआ।

जब गुजरात के पाटन में बैरम ख़ाँ की हत्या हुई, तो उनके डेरे को अफ़ग़ानों ने लूट लिया। दो वफ़ादार सेवक बालक रहीम और उनकी माँ को बचाकर अहमदाबाद ले गए, और वहाँ से अकबर के पास। दरबारियों के बहकाने के बावजूद अकबर ने बालक को अपनाया और "मिर्ज़ा ख़ाँ" की उपाधि दी।

सेनापति और ख़ानख़ाना

ऐतिहासिक प्रमाण

गुजरात के बाग़ी सुल्तान मुज़फ़्फ़र के पास चालीस हज़ार सवार थे और रहीम के पास बस दस हज़ार। फिर भी उन्होंने अहमदाबाद के पास सरखेज की लड़ाई में उसे हराया। इसी जीत पर अकबर ने उन्हें पाँच हज़ारी मनसब और "ख़ानख़ाना" की उपाधि दी, इसीलिए इतिहासकार उन्हें मिर्ज़ा ख़ानख़ाना कहते हैं।

जीत के बाद उन्होंने अपनी सारी संपत्ति सैनिकों में बाँट दी, यहाँ तक कि अपनी क़लमदान भी, जो उस सैनिक को मिली जो सबसे आख़िर में आया और बोला कि उसे कुछ नहीं मिला।

आईन-ए-अकबरी उनके बड़े कामों में गुजरात और सिंध की विजय, और बीजापुर के सुहैल ख़ाँ की हार गिनाती है। उन्होंने बाबर के तुर्की संस्मरणों का फ़ारसी में अनुवाद करके अकबर को भेंट किया।

जहाँगीर का समय और अंत

ऐतिहासिक प्रमाण

जहाँगीर के समय में उन्हें अकबर जैसा सम्मान नहीं मिला। लगभग तीस बरस वे दक्खिन में रहे। उनके चार बेटे थे और चारों उनसे पहले चल बसे। एक बेटे दाराब ख़ाँ का सिर महाबत ख़ाँ ने काटकर उनके पास "तरबूज़ की भेंट" कहकर भेजा।

जहाँगीर के 21वें वर्ष में वे लाहौर में बीमार पड़े, और दिल्ली पहुँचकर 72 वर्ष की आयु में, 1036 हिजरी में, उनका देहांत हुआ।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

नीति, प्रेम और दान

रहीम के दोहे ज़्यादातर जीवन की सीख हैं: प्रेम के धागे को झटके से न तोड़ो, मान-मर्यादा (पानी) बचाकर रखो, बड़ों के सामने छोटों को मत भूलो, क्योंकि जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार क्या करेगी।

उनके दोहों में भक्ति भी है। एक दोहे में वे कहते हैं: धोखे से भी मुँह से राम निकल जाए, तो उसे पूरी परम गति मिलती है।

आईन-ए-अकबरी कहती है कि रहीम अपनी उदारता और विद्या-प्रेम के लिए प्रसिद्ध थे, और लोग उन्हें अकबर के समय का सबसे बड़ा विद्या-संरक्षक मानते थे।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

रहिमन धागा प्रेम का

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय। टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ पड़ जाय॥

रहीम कहते हैं, प्रेम का धागा झटके से मत तोड़ो। टूटा हुआ धागा फिर नहीं जुड़ता, और जुड़ भी जाए तो बीच में गाँठ पड़ जाती है। रिश्ता एक बार टूटे, तो पहले जैसा नहीं रहता।

प्रामाणिक संग्रह मेंरहीम-रत्नावली (याज्ञिक सं., 1929), दोहावली, दोहा 198 (पृ. 20)

रहिमन पानी राखिए

रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

रहीम कहते हैं, पानी बचाकर रखो, बिना पानी के सब सूना है। "पानी" के यहाँ तीन अर्थ हैं: मोती की चमक, मनुष्य की इज़्ज़त, और आटे (चून) का पानी। चमक गई तो मोती बेकार, इज़्ज़त गई तो मनुष्य, और पानी के बिना आटा गूँधा ही नहीं जा सकता।

प्रामाणिक संग्रह मेंरहीम-रत्नावली (याज्ञिक सं., 1929), दोहावली, दोहा 205 (पृ. 20)

तरुवर फल नहिं खात हैं

तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहि न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

पेड़ अपने फल ख़ुद नहीं खाते, तालाब अपना पानी ख़ुद नहीं पीते। रहीम कहते हैं, सज्जन लोग भी धन दूसरों के काम के लिए ही इकट्ठा करते हैं।

प्रामाणिक संग्रह मेंरहीम-रत्नावली (याज्ञिक सं., 1929), दोहावली, दोहा 88

जो रहीम उत्तम प्रकृति

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥

जिसका स्वभाव उत्तम है, बुरी संगत उसका क्या बिगाड़ेगी? चंदन के पेड़ पर साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन में ज़हर नहीं फैलता।

प्रामाणिक संग्रह मेंरहीम-रत्नावली (याज्ञिक सं., 1929), भूमिका, पृ. 37, जहाँ संपादक इसे "रहीम का एक बहुत प्रसिद्ध दोहा" कहते हैं

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंदोहे (रहीम-रत्नावली में संकलित) — रहीम के नीति के दोहे उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना हैं। मयाशंकर याज्ञिक ने 1929 में "रहीम-रत्नावली" में उनकी उस समय तक मिली कविताओं का सबसे बड़ा संग्रह छापा।

प्रामाणिक संग्रह मेंबाबर के संस्मरणों का फ़ारसी अनुवाद — आईन-ए-अकबरी के अनुसार रहीम ने बाबर के तुर्की संस्मरणों (वाक़िआत-ए-बाबरी) का फ़ारसी अनुवाद किया और अकबर के 34वें वर्ष में उन्हें भेंट किया।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

ऐतिहासिक प्रमाणआईन-ए-अकबरी कहती है कि रहीम फ़ारसी, तुर्की, अरबी और हिंदी, चारों बड़ी कुशलता से लिखते थे, और कविता "रहीम" नाम से करते थे। एक मुग़ल अमीर का हिंदी में ऐसी लोकप्रिय कविता करना उस समय की साझी संस्कृति का एक अनोखा उदाहरण है।

ऐतिहासिक प्रमाणउनके नाम पर "मआसिर-ए-रहीमी" नाम का ग्रंथ लिखा गया, जिसे Blochmann उनकी उदारता का शानदार प्रमाण कहते हैं। लोग उनकी तुलना मीर अली शेर से करते थे।

स्रोत

अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना (रहीम) — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न