चैतन्य महाप्रभु
नवद्वीप के पंडित, जिन्होंने नाम-कीर्तन को घर-घर और गली-गली पहुँचाया
संक्षेप में
शराबी माधाई ने कीर्तन करते नित्यानंद के माथे पर टूटी बोतल दे मारी। ख़ून बहता देख निमाई ने बस इतना कहा: माधाई, मारना ही था तो मुझे मारते। न क्रोध, न श्राप। उसी रात माधाई की नींद उड़ गई। यही निमाई आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु कहलाए, नाम-कीर्तन के प्रवर्तक।
भक्त संतगौड़ीय वैष्णवकृष्ण-भक्ति
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | भक्त संत | Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, pp. xi–xii; D. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), pp. 140–141 |
| परंपरा | गौड़ीय वैष्णव, कृष्ण-भक्ति | Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, pp. xiii–xiv; Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, p. xi; D. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), p. 143 |
| काल | जन्म फ़रवरी-मार्च 1485 ई. (पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण की रात); देह-त्याग जून-जुलाई 1533 ई., पुरी में (ऐतिहासिक प्रमाण) | Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, pp. ix–xiii |
| समकालीन / प्रसंग में साथ (परंपरागत कथा) | नित्यानंद प्रभु | D. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), pp. 141–142, 153–154; Sarkar, Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (1913), भूमिका, p. xi |
| इनसे प्रेरित (आधुनिक विद्वानों का मत) | श्रीमंत शंकरदेव | D. C. Sen, Chaitanya and His Age (1922), p. 242 |
जीवन
नवद्वीप का निमाई
परंपरागत कथाSarkar के अनुसार पिता जगन्नाथ मिश्र सिलहट से आकर नवद्वीप में गंगा किनारे बसे थे, और माँ शची नीलांबर चक्रवर्ती की बेटी थीं। फ़रवरी-मार्च 1485 की एक शाम, पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण के समय, उनके दसवें बच्चे का जन्म हुआ। पहली आठ बेटियाँ बचपन में चल बसी थीं, और नौवाँ बेटा विश्वरूप सोलह बरस की उम्र में संन्यासी हो गया था।
बच्चे का नाम विश्वंभर रखा गया। पर इतने बच्चे खो चुकी माँ की ख़ातिर स्त्रियों ने उसे "निमाई" कहा, ताकि बुरी नज़र न लगे; और गोरे रंग के कारण पड़ोसी उसे "गौर" या "गौरांग" कहते। Sarkar बताते हैं कि ग्रहण के कारण उस शाम पूरे नवद्वीप में हरि-नाम गूँज रहा था, जिसे बाद में शुभ संकेत माना गया।
निमाई संस्कृत, ख़ासकर व्याकरण और न्याय में बहुत तेज़ थे। पिता के जाने के बाद उन्होंने लक्ष्मी से विवाह किया और पाठशाला चलाने लगे। Sarkar लिखते हैं कि उस समय विद्या का घमंड उनके सिर चढ़ा था। पूर्व बंगाल की यात्रा से लौटे तो पता चला कि पत्नी साँप के काटने से चल बसी थीं; बाद में उन्होंने विष्णुप्रिया से विवाह किया।
गया में बदलाव
परंपरागत कथागया की तीर्थ-यात्रा में उनकी भेंट ईश्वर पुरी से हुई, जो माधवेंद्र पुरी के शिष्य वैष्णव संन्यासी थे। Sarkar के अनुसार निमाई ने उन्हें गुरु बनाया, और उनका स्वभाव ही बदल गया: विद्या का घमंड चला गया, और अब वे जो भी पढ़ाते, उसका विषय कृष्ण-प्रेम ही होता। वे हँसते, रोते, कृष्ण का नाम पुकारते, जैसे दीवाने हो गए हों।
इसी समय उनकी भेंट बुज़ुर्ग विद्वान अद्वैताचार्य से हुई, और नित्यानंद उनसे आ मिले। Sarkar के अनुसार यहीं से नाम-कीर्तन शुरू हुआ: भक्त टोलियाँ बनाकर गलियों में नाचते-गाते निकलते, या घरों के आँगन में इकट्ठे होते। यही इस मत की सबसे अलग पहचान बनी।
संन्यास, यात्राएँ और पुरी
ऐतिहासिक प्रमाणSarkar के अनुसार पढ़े-लिखे लोग कम ही उनकी बात मानते थे। निमाई ने सोचा कि संन्यासी को देखकर ये घमंडी पंडित भी झुकेंगे, और 1509 में चौबीस बरस की उम्र में केशव भारती से संन्यास लिया। नाम मिला कृष्ण-चैतन्य, जो छोटा होकर "चैतन्य" रह गया। माँ, जो पहले ही एक बेटा खो चुकी थीं, टूट गईं; पर चैतन्य बाद के बरसों में भी कई बातों में उनकी इच्छा मानते रहे।
अगले छह बरस वे ओडिशा, दक्षिण भारत और वृंदावन की यात्राओं में रहे। तीस बरस की उम्र में वे पुरी में बस गए, और बाक़ी जीवन जगन्नाथ की आराधना में बिताया। Sarkar के अनुसार अंतिम दिनों में भाव-दशा में वे कभी समुद्र में कूद पड़ते, कभी मंदिर की दीवार से मुँह रगड़ लेते। जून-जुलाई 1533 में उनका शरीर छूटा, और जीवनीकारों ने उस घड़ी पर रहस्य का परदा डाल दिया है।
देह-त्याग: दो मत
मत अलग-अलगSarkar जून-जुलाई 1533 बताते हैं। Growse (1883) एक अलग तिथि देते हैं: 1527 ई., बयालीस बरस की उम्र में, और लिखते हैं कि ऐसा मानने का कारण है कि भाव-दशा में समुद्र को यमुना समझकर वे उसमें उतर गए, जहाँ उन्हें गोपियों संग कृष्ण की लीला दिख रही थी, और डूब गए। Growse चैतन्य-चरितामृत का समय भी 1590 लिखते हैं, जबकि Sarkar 1582।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
जगाई-माधाई का उद्धार
परंपरागत कथाSen के अनुसार जगाई और माधाई नदिया के एक रईस ब्राह्मण परिवार के थे, पर पक्के शराबी और गुंडे, जिनसे पूरा नगर डरता था। उन्होंने तय किया कि गलियों में कीर्तन करने वालों को सबक़ सिखाएँगे। एक दिन जब नित्यानंद कृष्ण का नाम गा रहे थे, माधाई ने टूटी बोतल फेंककर मारी, और उनके माथे से ख़ून बहने लगा।
नित्यानंद ने बुरा नहीं माना, उल्टे आशीर्वाद दिया। निमाई आए और बस इतना कहा: "माधाई, मारना ही था तो मुझे क्यों नहीं मारा?" और चुपचाप नित्यानंद को साथ ले गए। दोनों भाई हक्के-बक्के रह गए; रात भर सो न सके, और सुबह जाकर पछतावे के साथ क्षमा माँगी।
माधाई को क्षमा मिल गई, फिर भी उनका मन शांत न हुआ। उन्हें सलाह दी गई कि अपने हाथों गंगा किनारे एक घाट बनाओ। Sen के अनुसार वे मज़दूर की तरह कुदाल लेकर घाट बनाते रहे, और नहाने आने वाले हर व्यक्ति से हाथ जोड़कर कहते: अगर मैंने कभी आपको दुख दिया हो, तो क्षमा करें। वह "माधाई का घाट" अब नहीं रहा।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
तिनके से भी नम्र
Sen निमाई के प्रेम-धर्म को तीन बातों में रखते हैं: अपने को तिनके से भी छोटा मानकर भगवान का नाम लो; अपने लिए मान मत माँगो, दूसरों को खुले मन से दो; और पेड़ की तरह सब सहो। पेड़ अपने को काटने वाले से भी अपनी रक्षा नहीं करता, सूखकर भी किसी से पानी नहीं माँगता, और काटने वाले को भी फूल, फल और छाँव देता है।
Sen के अनुसार उस समय के वैष्णव कवि बार-बार गाते हैं कि चैतन्य जाति नहीं देखते थे: वे चांडालों और नीची मानी जाने वाली जातियों को आँसू भरी आँखों से गले लगाते थे, और ऊँच-नीच को एक धरातल पर ले आए।
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंचैतन्य के जीवन के ग्रंथ — चैतन्य की अपनी रचना बहुत कम मानी जाती है; उनका जीवन और उपदेश उनके भक्तों के ग्रंथों से मिलता है। Sarkar के अनुसार सबसे पुराना जीवन-चरित वृंदावन दास का "चैतन्य भागवत" (1535) है, और सबसे विस्तृत व प्रामाणिक कृष्णदास कविराज का "चैतन्य-चरितामृत" (1582), जो उन्होंने वृंदावन में राधाकुंड के किनारे नौ बरस की मेहनत से बुढ़ापे में पूरा किया। Sarkar लोचनदास के "चैतन्य-मंगल" को इतिहास नहीं, कथा-काव्य मानते हैं।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
आधुनिक विद्वानों का मतSarkar के अनुसार आज का वृंदावन, अपने मंदिरों, संस्कृत पाठशालाओं और साधकों के ठिकानों के साथ, बंगाली वैष्णवों की देन है। रूप, सनातन, जीव गोस्वामी, गोपाल भट्ट, रघुनाथ भट्ट और रघुनाथ दास, ये छह गोस्वामी चैतन्य के संप्रदाय के आचार्य माने जाते हैं। उनके ज़्यादातर शिष्यों ने बांग्ला में लिखा, और बांग्ला साहित्य को गीतों, जीवनियों और अनुवादों से भर दिया।
संबंधित संत
- नित्यानंद प्रभु — समकालीन / प्रसंग में साथ
- श्रीमंत शंकरदेव — इनसे प्रेरित
VedikMARG पर आगे पढ़ें
लेख
- भक्ति आंदोलन: दक्षिण के आलवारों से सौराष्ट्र की गंगासती तक — बारह सौ बरसों की एक धारा, क्षेत्र-क्षेत्र और संत-संत, समय-रेखा के साथ
- संत और जाति: भक्ति ने ऊँच-नीच की दीवार कैसे लाँघी — जुलाहे, चमार, नाई, जाट और महार संत, और वे ब्राह्मण संत जिन्होंने दीवार तोड़ी
भक्ति-पाठ
- जगन्नाथाष्टकम् — आदि शंकराचार्य की रचना; परंपरा कहती है कि पुरी में चैतन्य महाप्रभु इसका पाठ करते थे
तीर्थ
- जगन्नाथ पुरी — जहाँ चैतन्य ने अंतिम वर्ष बिताए
स्रोत
- Chaitanya's Pilgrimages and Teachings (Chaitanya-charitamrita, Madhya-lila) — Jadunath Sarkar (अनु.) (1913) · भूमिका, pp. v–xiv
- Chaitanya and His Age — Dinesh Chandra Sen (1922) · pp. 36, 140–143, 153–156, 283–284
- Mathurá: A District Memoir — F. S. Growse (1883) · p. 197
