नम्मालवार

इमली के पेड़ के नीचे मौन बैठा बालक, जिसके पदों को "तमिल वेद" कहा गया

संक्षेप में

एक बालक जन्म से न रोया, न माँ का दूध पिया। सोलह बरस वह इमली के एक पेड़ के नीचे आँखें मूँदे, मौन बैठा रहा। फिर एक यात्री ने उससे एक पहेली पूछी, और पहली बार उसके होंठ खुले। यही नम्मालवार थे, आलवारों में सबसे महान, जिनके पद तमिल वेद कहलाते हैं।

आलवारआलवार (तमिल वैष्णव)

एक नज़र में

नम्मालवार — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीआलवारHooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 12; Govindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 192
परंपराआलवार (तमिल वैष्णव)Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 10, 12–13; Govindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 192
कालपरंपरा उन्हें कलियुग के आरंभ में रखती है; आधुनिक विद्वानों के अनुसार नौवीं सदी का पहला आधा (मत अलग-अलग)Govindacharya, Holy Lives of the Azhvars (1902), p. 192; Hooper, Hymns of the Alvars (1929), p. 13
इनसे प्रेरित (परंपरागत कथा)रामानुजाचार्यGovindacharya, Life of Ramanujacharya (1906), अध्याय IX, p. 56; Bhandarkar, Vaisnavism, Saivism (1913), §46, p. 51

जीवन

कुरुकूर का मारन

परंपरागत कथा

Hooper के अनुसार नम्मालवार का जन्म कुरुकूर में, जो आज तिन्नेवेली ज़िले का आऴ्वार्तिरुनगरी है, एक शूद्र परिवार में हुआ। उन्हें शठकोप और परांकुश नामों से भी जाना जाता है; बचपन का नाम मारन था।

Govindacharya के अनुसार परंपरा कहती है कि बच्चा जन्म के बाद न रोया, न माँ का दूध पिया; बस मुस्कुराता रहा, बिल्कुल शांत और मौन। माता-पिता ने उसे अपना नहीं, एक दिव्य बालक माना।

Hooper लिखते हैं कि जीवन के पहले सोलह बरस मारन एक इमली के पेड़ के नीचे रहा, न मुँह खोला, न आँखें। Govindacharya इसे "पवित्र इमली" कहते हैं, जिसके नीचे माता-पिता ने ग्यारहवें दिन बच्चे का पालना रखा था।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

मधुरकवि की पहेली

परंपरागत कथा

मधुरकवि नाम के एक ब्राह्मण उत्तर भारत की तीर्थ-यात्रा पर थे, जब उन्हें दक्षिण की ओर एक तेज़ प्रकाश दिखा। Hooper के अनुसार उसी के सहारे चलते-चलते वे कुरुकूर के इमली के पेड़ तक पहुँचे।

Govindacharya के अनुसार मधुरकवि को शक हुआ कि मूर्ति-सी बैठी इस आकृति में जान है भी या नहीं। उन्होंने एक बड़ा पत्थर ज़मीन पर गिराया; आवाज़ सुनकर आकृति ने आँखें खोलीं, पर मुँह बंद ही रहा। तब उन्होंने तमिल में पहेली पूछी: "सेत्तत्तिन् वयिट्रिल् सिरियदु पिरन्दाल्, एत्तैत् तिन्ऱु एंगे किडक्कुम्?" यानी अगर जो मरा हुआ है, उसके गर्भ में कोई सूक्ष्म चीज़ जन्म ले, तो वह क्या खाती है और कहाँ रहती है?

बालक ने तुरंत मुँह खोला और उत्तर दिया: "अत्तैत् तिन्ऱु अंगे किडक्कुम्", यानी "उसी को खाती है, और वहीं रहती है।" Govindacharya के अनुसार "मरा हुआ" जड़ शरीर है और "सूक्ष्म चीज़" निराकार आत्मा: शरीर में जन्मी आत्मा उसी के अनुभव भोगती है, और उसी में रहती है। मधुरकवि भक्ति से भर उठे और उसी क्षण उनके शिष्य बन गए।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

जीवन भर का ध्यान

Hooper लिखते हैं कि कुछ दूसरे आलवारों के विपरीत नम्मालवार का पूरा जीवन दिव्य सत्य के ध्यान में बीता। उसी समय उन्हें विष्णु का साक्षात्कार हुआ, और उसी से वह काव्य निकला, जो नालायिर प्रबंधम् में सुरक्षित है।

उनके शिष्य मधुरकवि ने केवल दस पद रचे, सब अपने गुरु की स्तुति में। Hooper के अनुसार मधुरकवि गुरु-भक्ति के सबसे बड़े उदाहरण हैं, जो अपने आचार्य को ही भगवान मानते थे।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंतिरुवाय्मोऴि और अन्य पद — Hooper के अनुसार नम्मालवार की रचनाएँ हैं: तिरुविरुत्तम् (100 पद), तिरुवासिरियम् (7), पेरिय तिरुवंतादि (87), और तिरुवाय्मोऴि (1102 पद)। तिरुवाय्मोऴि नालायिर प्रबंधम् का पूरा चौथा भाग है, दस "दशकों" में बँटा, और प्रबंधम् का सबसे प्रसिद्ध अंश। परंपरा मानती है कि उनकी रचनाओं में चारों वेदों का सार है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतHooper के अनुसार नम्मालवार आलवारों में "सबसे महान, सबसे प्रसिद्ध और सबसे ज़्यादा लिखने वाले" हैं। आलवारों के ये पद नाथमुनि (मृत्यु लगभग 920 ई.) ने इकट्ठा किए और मंदिर-पूजा में गाने की व्यवस्था की।

आधुनिक विद्वानों का मतHooper बताते हैं कि आलवारों की परंपरागत तिथियाँ ईसा से हज़ारों बरस पहले की हैं, जबकि शुरुआती पश्चिमी विद्वानों ने उन्हें रामानुज (मृत्यु 1137 ई.) के बाद रखा था। अब यह सहमति है कि आलवार रामानुज से पहले हुए।

संबंधित संत

VedikMARG पर आगे पढ़ें

परंपरा

लेख

तीर्थ

स्रोत

नम्मालवार — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न