संत बहिणाबाई

तुकाराम की शिष्या, जिन्होंने अपनी आत्मकथा अभंगों में लिखी

संक्षेप में

ग्यारह बरस की एक लड़की को उसके पति ने चोटी पकड़कर पीटा, क्योंकि वह कीर्तन सुनने गई थी। उसी लड़की ने आगे चलकर अपनी पूरी कहानी अभंगों में लिखी। ये हैं संत बहिणाबाई, तुकाराम की शिष्या, जिनकी आत्मकथा मराठी साहित्य में अनोखी मानी जाती है।

संत-कविमहिला संत / संत-कवयित्रीवारकरी परंपरा

एक नज़र में

संत बहिणाबाई — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कवि, महिला संत / संत-कवयित्रीबहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), अभंग 78, p. 44; बहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), भूमिका, pp. iii–iv
परंपरावारकरी परंपराबहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), अभंग 1, p. 1; अभंग 42, p. 29
कालसत्रहवीं सदी; मराठी विद्वानों के अनुसार जन्म 1628 ई. में और देह-त्याग 1700 ई. में, 72 बरस की उम्र में (आधुनिक विद्वानों का मत)बहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), भूमिका, p. iii
गुरु (संत की अपनी वाणी में)संत तुकारामबहिणाबाई की गाथा (Abbott अनु., 1929), अभंग 1, 21–27, pp. 1, 17–21; महीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), अध्याय 40, ओवी 238, p. 322

जीवन

देवगाँव की बेटी

संत की अपनी वाणी में

बहिणाबाई अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि उनका मायका देवगाँव था, जिसके पूर्व में वेरूळ (एलोरा) नगर है। पिता आऊजी गाँव के कुलकर्णी थे और माँ का नाम जानकी था। बहुत छोटी उम्र में उनका विवाह शिऊर के एक रिश्तेदार से हुआ, जो तीस बरस के थे और जिनका यह दूसरा विवाह था।

विवाह के चार साल बाद पिता के दफ़्तर को लेकर रिश्तेदारों से झगड़ा हुआ, और परिवार रातों-रात गाँव छोड़कर निकल पड़ा। कई तीर्थों से होते हुए वे कोल्हापुर पहुँचे और वहाँ एक ब्राह्मण हिरंभट के घर ठहरे।

Abbott बताते हैं कि बहिणाबाई के जीवन के बारे में जो कुछ ज्ञात है, वह उनकी अपनी आत्मकथा से ही है, जो मराठी साहित्य में अनोखी है। उसका पहला छपा संस्करण 1914 में आया।

कीर्तन, और पति का क्रोध

संत की अपनी वाणी में

कोल्हापुर में जयराम स्वामी के कीर्तन होते थे, और बहिणाबाई वहाँ जातीं। एक दिन किसी स्त्री ने उनके पति को बताया कि जयराम स्वामी ने कीर्तन में उनके सिर पर हाथ रखा। बहिणाबाई लिखती हैं कि पति ने घर आकर उन्हें चोटी पकड़कर मनभर पीटा, और फिर हाथ-पाँव बाँधकर एक ओर डाल दिया। "यह सब मेरे साथ ग्यारहवें बरस में हुआ। पत्नी के किस धर्म में मुझसे चूक हुई थी?"

पति कहते: हम ब्राह्मण हैं, हमें वेद पढ़ने चाहिए; यह शूद्र तुका, उसे सपने में देखना! मेरी पत्नी बिगड़ गई है। वे उन्हें छोड़कर तीर्थ जाने वाले थे कि अचानक बीमार पड़ गए। एक महीने से ज़्यादा कष्ट के बाद उन्होंने पछताकर माना कि पांडुरंग और तुकाराम का अपमान करने से यह हुआ। ठीक होकर उन्होंने ख़ुद कहा: चलो, तुकोबा के गाँव चलकर रहते हैं।

देहू में

संत की अपनी वाणी में

माता-पिता, भाई और पति के साथ बहिणाबाई देहू पहुँचीं। इंद्रायणी में नहाकर उन्होंने पांडुरंग के दर्शन किए, और वहाँ तुकोबा कीर्तन कर रहे थे। "जो रूप मैंने कोल्हापुर में सपने में देखा था, वही अब खुली आँखों से देखा।"

देहू में मंबाजी गोसावी ने उन्हें घर से धक्के देकर निकाला, और वे मंदिर की धर्मशाला में ठहरे। बहिणाबाई लिखती हैं कि एक दिन इंद्रायणी पर पांडुरंग की मूर्ति देखते हुए उन्हें अचानक कविता करने की प्रेरणा हुई, जो सागर के ज्वार की तरह आई।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

बहिणाबाई का बछड़ा

संत की अपनी वाणी में

कोल्हापुर में हिरंभट ने परिवार को एक काली गाय और बछड़ा दिया। बहिणाबाई लिखती हैं कि बछड़ा जहाँ वे जातीं, पीछे-पीछे जाता; कीर्तन में भी आकर उनके पास खड़ा हो जाता, और जब सब प्रणाम करते, तो वह भी सिर झुका देता। लोग हँसते: देखो, बछड़ा भी पूजा करता है!

जब बछड़े को कीर्तन से बाहर निकाला गया, तो जयराम स्वामी ने कहा: क्या हरि बछड़े की आत्मा में नहीं हैं? उसे भीतर बुलवाया, और लड़की और बछड़े, दोनों को प्यार से सहलाया। बाद में बछड़ा मर गया, और बहिणाबाई लिखती हैं कि दुख से वे कई दिन बेहोश रहीं। संत-साधुओं ने गाते-बजाते उस बछड़े को समाधि दी।

सपने में तुकाराम

संत की अपनी वाणी में

बछड़े के मरने के सातवें दिन बहिणाबाई ने सपने में तुकाराम को देखा। उन्होंने कहा: घबराओ मत, मैं तुम्हारे पास हूँ; यह अमृत पियो। फिर उनके सिर पर हाथ रखकर कान में "राम कृष्ण हरि" मंत्र दिया। बहिणाबाई लिखती हैं कि यह कार्तिक कृष्ण पंचमी, रविवार का दिन था। उसी दिन से उन्होंने तुकाराम को अपना सद्गुरु माना।

स्रोतों में अंतर

महीपति की कथा अलग है। उनके भक्तलीलामृत में यह सपना तुकाराम के वैकुंठ जाने के बाद का है: "निलोबा गोसावी और गंगाधर की पत्नी बहिणाबाई को सपने में दर्शन देकर मंत्र दिया।" बहिणाबाई की अपनी आत्मकथा के अनुसार वे बाद में देहू जाकर तुकाराम से जीते-जी मिलीं।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

ब्राह्मण कौन है?

एक ब्राह्मण परिवार की बेटी होकर भी बहिणाबाई पूछती हैं: सच में ब्राह्मण किसे कहें? उनका उत्तर है कि जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता, क्योंकि जीवन तो पशु, पक्षी और अछूत, सबमें एक ही है। शरीर से भी नहीं, क्योंकि सबके शरीर उन्हीं पाँच तत्वों से बने हैं।

बहिणाबाई के अनुसार ब्राह्मण वह है, जो सब जीवों में एक ही आत्मा देखे, जो शांति की मूर्ति हो, और जिसके मन से काम और क्रोध चले गए हों: "जो बचा, वही उसका ब्राह्मणत्व है।"

स्त्री होने का दुख

बहिणाबाई अपने अभंगों में खुलकर लिखती हैं कि स्त्री होने के कारण उन्हें वेद सुनने, "ॐ" बोलने और दर्शन की बातें करने से रोका गया। "स्त्री का शरीर पाकर, और दूसरों के अधीन होकर, मैं वैराग्य की अपनी इच्छा पूरी न कर सकी।" एक समय वे इतनी निराश हुईं कि आत्महत्या तक सोचने लगीं, पर अंत में भगवान को ही अपनी शरण माना।

संतों का मंदिर

बहिणाबाई का एक प्रसिद्ध अभंग संतों की परंपरा को एक मंदिर की तरह देखता है: संतों की कृपा से इमारत पूरी हुई। ज्ञानदेव ने नींव रखी और मंदिर खड़ा किया, उनके सेवक नामदेव ने चारदीवारी बनाई, जनार्दन के शिष्य एकनाथ ने भागवत का खंभा लगाया, और तुकाराम उसका कलश बने। अब इस मंदिर में आराम से भजन करो।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंबहिणाबाई की गाथा (आत्मकथा और अभंग) — उनकी गाथा में आत्मकथा के अभंग, मृत्यु के निकट आने पर लिखे अभंग, और भक्ति, सद्गुरु, संतों और ब्राह्मण-धर्म पर अभंग हैं। Abbott के अनुसार इसका पहला छपा संस्करण 1914 में आया और दूसरा, अलग हस्तलिखित प्रति से, 1926 में; दोनों पाठों में अंतर हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतAbbott के अनुसार बहिणाबाई की आत्मकथा मराठी साहित्य में अनोखी है: किसी संत-कवयित्री ने अपने जीवन, पति के विरोध, स्त्री होने की बाधाओं और मन के संघर्षों को इतनी खुलकर अपने ही शब्दों में लिखा।

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परंपरा

लेख

स्रोत

संत बहिणाबाई — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न