दादू दयाल

दादू पंथ के प्रवर्तक, जिनकी दया के कारण नाम ही "दयाल" पड़ गया

संक्षेप में

एक क़ाज़ी ने बहस में आपा खोकर दादू के मुँह पर घूँसा मार दिया। दादू ने क्रोध नहीं किया, शांत भाव से मुँह आगे करके बोले: भाई, एक और मार ले। ऐसी क्षमा और दया के कारण लोग उन्हें दादू "दयाल" कहने लगे। राजस्थान के नराना में उनके दादू पंथ की मुख्य गद्दी है।

निर्गुण भक्ति संतदादू पंथ

एक नज़र में

दादू दयाल — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीनिर्गुण भक्ति संतकबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), प्रस्तावना, पृ. 73–74; Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 1
परंपरादादू पंथदादू दयाल की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 4–5
कालजन्म संवत् 1601 (1544 ई.), देह-त्याग संवत् 1660, बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसार (परंपरागत कथा)दादू दयाल की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1, 4; Westcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 1
प्रेरणा-स्रोत (आधुनिक विद्वानों का मत)संत कबीरदासWestcott, Kabir and the Kabir Panth, p. 1; दादू दयाल की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 3

जीवन

जन्म, स्थान और जाति

मत अलग-अलग

बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसार दादू का जन्म फागुन सुदी अष्टमी, बृहस्पतिवार, संवत् 1601 को हुआ, यानी 1544 ई. में, कबीर के जाने के छब्बीस बरस बाद। वह लिखता है कि इस तिथि पर सबकी सहमति है।

जन्म-स्थान पर मत अलग हैं। दादू-पंथी गुजरात के अहमदाबाद को उनका जन्म-स्थान मानते हैं, जबकि पंडित सुधाकर द्विवेदी ने जौनपुर बताया। बेलवेडियर अहमदाबाद के पक्ष में है, क्योंकि दादू की वाणी में गुजराती शब्द और मुहावरे दिखते हैं, जबकि कबीर और रैदास जैसी पूरबी बोली नहीं।

जाति पर तो तीन मत हैं: दादू-पंथी उन्हें गुजराती ब्राह्मण बताते हैं, सुधाकर द्विवेदी मोची, और पादरी जॉन टॉमस धुनिया, जो आम लोगों में भी प्रसिद्ध है। बेलवेडियर इस पर निर्णय नहीं करता, और कहता है कि दादू जैसे महात्मा की महिमा न ऊँची जाति से बढ़ती है, न नीची से घटती है।

गुरु: "वृद्ध बाबा"

मत अलग-अलग

दादू की अपनी वाणी में गुरु का नाम कहीं नहीं आता। सुधाकर द्विवेदी ने कबीर के शिष्य कमाल को उनका गुरु बताया, पर बेलवेडियर के अनुसार इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता।

जनगोपाल लिखते हैं कि ग्यारह बरस के दादू जब बच्चों के साथ खेल रहे थे, तब एक बूढ़े साधु के रूप में परम पुरुष ने उन्हें दर्शन दिए, पान का बीड़ा खिलाया और सिर पर हाथ रखा। सात बरस बाद वही बूढ़े बाबा फिर मिले और उपदेश दिया। इसीलिए जनगोपाल उनके गुरु को "वृद्ध बाबा" कहते हैं, और सुंदरदास "वृद्धानंद"।

साँभर, आमेर, नराना

परंपरागत कथा

दादू के पहले उनतीस बरस का हाल नहीं मिलता। संवत् 1630 में वे साँभर आए और लगभग छह बरस रहे, फिर आमेर में लगभग चौदह बरस। उसके बाद जयपुर, मारवाड़ और बीकानेर में घूमते रहे, और संवत् 1659 में नराना आकर ठहर गए, जो जयपुर से बीस कोस पर है।

नराना के पास भराने की पहाड़ी पर संवत् 1660 में, जेठ बदी अष्टमी, शनिवार को, अट्ठावन बरस की आयु में उन्होंने चोला छोड़ा। वह स्थान बहुत पवित्र माना जाता है, और नराना में आज भी दादू पंथ की मुख्य गद्दी है।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

"भाई, एक और मार ले"

परंपरागत कथा

एक क़ाज़ी दादू से बहस कर रहा था। बहस में वह इतना झुँझलाया कि उसने दादू के मुँह पर घूँसा मार दिया। दादू ने क्रोध करने के बजाय बड़ी शांति से मुँह आगे करके कहा, "भाई, एक और मार ले।" क़ाज़ी बहुत लज्जित हुआ।

एक और बार वे समाधि में बैठे थे, तो उनसे बैर रखने वाले कुछ लोगों ने उन्हें चारों ओर ईंटों से चुनकर बंद कर दिया। कई दिन बाद पड़ोसियों ने ईंटें हटाईं और दोषियों को दंड देना चाहा। दादू ने रोक दिया: जिनकी करतूत से मैं इतने दिन भगवान के चरणों में रहा, वे तो धन्यवाद के पात्र हैं, दंड के नहीं।

बेलवेडियर कहता है कि इसी क्षमा और दया के कारण लोग उन्हें दादू "दयाल" कहने लगे।

फ़तेहपुर सीकरी में अकबर

परंपरागत कथा

बेलवेडियर बताता है कि दादू का पूरा जीवन अकबर के राज्य-काल में बीता: वे अकबर के जन्म के एक बरस बाद जन्मे, और उसकी मृत्यु से दो बरस पहले गए। कहते हैं कि संवत् 1642 में फ़तेहपुर सीकरी में अकबर से उनकी भेंट हुई।

अकबर ने पूछा: ख़ुदा की ज़ात, अंग, वजूद और रंग क्या है? दादू ने एक साखी में उत्तर दिया: "इसक अलह की जात है, इसक अलह का अंग। इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग॥" यानी प्रेम ही अल्लाह की ज़ात है, प्रेम ही उसका अंग, प्रेम ही उसका वजूद और प्रेम ही उसका रंग।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

प्रेम और विरह

दादू की वाणी में "बिरह", यानी भगवान से बिछड़ने की तड़प, बहुत ऊँची जगह रखती है। बिरह अंग की एक साखी कहती है: विरह मेरा मित्र है, बैरी नहीं; जो विरह को बैरी कहे, उसे दादू किसमें गिने? उनके लिए यह तड़प ही वह रास्ता है, जिस पर चलकर जीव प्रियतम तक पहुँचता है।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

इसक अलह की जात है

इसक अलह की जात है, इसक अलह का अंग। इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग॥

प्रेम (इश्क़) ही अल्लाह की ज़ात है, प्रेम ही उसका अंग है। प्रेम ही उसका वजूद (अस्तित्व) है, और प्रेम ही उसका रंग। कहा जाता है कि यह साखी दादू ने अकबर के प्रश्न के उत्तर में कही थी।

प्रामाणिक संग्रह मेंदादू दयाल की बानी, पहिला भाग (बेलवेडियर), बिरह अंग, साखी 152 (पृ. 40)

प्रीतम के पग परसिये

प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव। तहँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव॥

मन में प्रियतम के दर्शन की चाह है, और उनके चरण छूने की। जहाँ उन्होंने पाँव रखे थे, वहीं जाकर सिर झुका दूँ।

प्रामाणिक संग्रह मेंदादू दयाल की बानी, पहिला भाग (बेलवेडियर), बिरह अंग, साखी 153 (पृ. 40)

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंदादू की बानी: साखी और पद — दादू की वाणी "अंगों" में बँटी साखियों और पदों में है। बेलवेडियर ने इसे दो भागों में छापा, और प्रकाशक बताते हैं कि दादू के पदों में कुछ सच्ची या मिली-जुली गुजराती भाषा के पद भी हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतWestcott अहमदाबाद के दादू (1544) को उन संतों में गिनते हैं, जो कबीर को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते थे। बेलवेडियर भी बताता है कि दादू ने जगह-जगह कबीर की महिमा की है।

परंपरागत कथाबेलवेडियर के अनुसार दादू पंथ के बावन प्रसिद्ध अखाड़े हैं, ज़्यादातर जयपुर राज्य में, और कुछ अलवर, मारवाड़, मेवाड़, बीकानेर, पंजाब, गुजरात और काशी में। सब महंतों के मुखिया नराना में रहते हैं।

संबंधित संत

स्रोत

दादू दयाल — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न