संत एकनाथ
पैठण के संत, जिन्होंने भागवत को मराठी में कहा और ज्ञानेश्वरी का पाठ शुद्ध किया
संक्षेप में
गंगा से नहाकर लौटते एकनाथ पर किसी ने थूक दिया। वे फिर नहाए, घर जाकर उसी आदमी के लिए थाली भरी, और ले जाकर कहा: कृपा करके यह स्वीकार करो। पैठण के यही संत एकनाथ थे, जिन्होंने भागवत को मराठी में कहा और ज्ञानेश्वरी का पाठ शुद्ध किया।
संत-कविवारकरी परंपरा
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | संत-कवि | महीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), परिशिष्ट, pp. 254–255 |
| परंपरा | वारकरी परंपरा | महीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), अध्याय 13, ओवी 22, p. 3; अध्याय 18, ओवी 39–42, p. 107 |
| काल | सोलहवीं सदी; आम तौर पर जन्म 1548 ई. और देह-त्याग 1609 ई. माना जाता है, पर कुछ विद्वान 1528–1599 ई. मानते हैं (मत अलग-अलग) | महीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), परिशिष्ट, p. 265 |
| प्रेरणा-स्रोत (ऐतिहासिक प्रमाण) | संत ज्ञानेश्वर | महीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), अध्याय 19, ओवी 102–129, pp. 135–138, टिप्पणी |
| इनसे प्रेरित (आधुनिक विद्वानों का मत) | संत तुकाराम | महीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), परिशिष्ट, p. 263 |
जीवन
भानुदास के वंश में
परंपरागत कथामहीपति के अनुसार एकनाथ पैठण (प्रतिष्ठान) में जन्मे। उनके परदादा भानुदास वे भक्त थे, जो पांडुरंग की मूर्ति पंढरपुर वापस लाए। पिता सूर्यनारायण और माँ रुक्मिणी बचपन में ही चल बसे, और दादा चक्रपाणि ने उन्हें पाला।
बालक एकनाथ दूसरे बच्चों जैसे खेल नहीं खेलता था। कंचों को देवता बनाकर उन पर फूल चढ़ाता, कड़छी को कंधे पर वीणा की तरह रखकर भगवान को पुकारता, और लाठी पर पुराने कपड़े का झंडा बाँधकर कहता: मैं पंढरी जा रहा हूँ।
गुरु जनार्दन स्वामी
परंपरागत कथामहीपति लिखते हैं कि एक रात शिव-मंदिर में एकनाथ ने आकाशवाणी सुनी: देवगिरि के क़िले में जनार्दनपंत हैं, जिन पर श्री दत्त की कृपा है; जाकर उनसे मिलो। एकनाथ दादा-दादी से पूछे बिना ही पाँच योजन चलकर देवगिरि पहुँचे, और जनार्दन ने उन्हें गले लगाकर अपना लिया।
एकनाथ भोर से पहले उठकर गुरु का घर बुहारते, पूजा के बर्तन माँजते, और उनके स्नान का पानी तैयार रखते। बाद में जनार्दन ने ही उनसे कहा कि भागवत की टीका प्राकृत यानी मराठी में करो।
काशी में एकनाथी भागवत
ऐतिहासिक प्रमाणAbbott एकनाथी भागवत की अपनी पुष्पिका देते हैं: यह भागवत के ग्यारहवें स्कंध की मराठी टीका वाराणसी में, कार्तिक पूर्णिमा, सोमवार को शालिवाहन शके 1495 (1573 ई.) में जनार्दन की कृपा से पूरी हुई। उनकी "रुक्मिणी-स्वयंवर" की पुष्पिका कहती है कि वह भी काशी में, मणिकर्णिका के तट पर, शके 1493 (1571 ई.) की रामनवमी को पूरी हुई।
गोदावरी में अंतिम कीर्तन
परंपरागत कथामहीपति के अनुसार अंत समय एकनाथ ने स्नान किया, तुलसी की माला पहनी, और वीणा कंधे पर रखकर नाम लेते हुए गोदावरी के लक्ष्मी-तीर्थ तक गए, पीछे लोगों की भीड़ थी। रेत पर बैठे लोगों के आगे उन्होंने अंतिम कीर्तन किया: इस कलियुग में नाम के सिवा मुक्ति का कोई साधन नहीं; हर जीव पर दया करो, यह सच मन में रखो।
फिर उन्होंने लोगों को प्रणाम करके कहा: आप सबकी कृपा-दृष्टि मुझ पर बनी रहे। वे नदी में नाभि तक पानी में जाकर खड़े हो गए, और सबसे हरि का नाम बुलवाते हुए देह छोड़ दी। लोगों ने रीति के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया।
जीवन की प्रमुख कथाएँ
थूकने वाले को भोजन
परंपरागत कथामहीपति के अनुसार एकनाथ गंगा से नहाकर लौट रहे थे। नगर के द्वार पर बैठे एक घमंडी आदमी ने ज़मीन पर थूका, और थूक एकनाथ पर गिरा। एकनाथ को ज़रा भी क्रोध नहीं आया; धरती की तरह, जिस पर कोई फूल चढ़ाए या गंदगी डाले, वे शांत रहे। उन्हें उस आदमी पर दया आई कि इस पाप का फल उसे भुगतना पड़ेगा।
वे फिर नहाए, घर जाकर पूजा की, और दो लोगों जितना भोजन एक पात्र में रखकर उसी आदमी के घर ले गए: कृपा करके यह स्वीकार करो। वह आदमी पछताकर उनके पैरों में गिर पड़ा। एकनाथ ने उसे उठाकर गले लगाया और कहा: अगर मैं सँभलकर चलता, तो तुमसे यह भूल न होती। तुमने पछतावा कर लिया, अब कोई दोष नहीं बचा।
राण्या महार के घर भोजन
परंपरागत कथापैठण में राण्या नाम का एक महार और उसकी पत्नी एकनाथ के कीर्तन में बाहर बैठकर सुनते, और जिस राह से वे गंगा नहाने जाते, उसे बुहार देते। एक दिन राण्या ने डरते-डरते उन्हें घर भोजन पर बुलाया। एकनाथ ने भागवत का श्लोक सुनाया कि भगवान को मन, वचन, कर्म और प्राण अर्पित करने वाला चांडाल भी भगवान से विमुख ब्राह्मण से श्रेष्ठ है।
यह सुनकर ब्राह्मण भड़क उठे और एकनाथ से प्रायश्चित करवाया। एकनाथ ने बिना विरोध किए नदी में खड़े होकर प्रायश्चित किया, फिर भी राण्या का न्योता स्वीकार कर लिया। महीपति की कथा है कि ब्राह्मण पहरा देते रहे, और उन्होंने एकनाथ को एक साथ दो जगह देखा: अपने घर में भी, और महारवाड़े में राण्या के आसन पर भी।
स्रोतों में अंतर
Ranade इसी भाव की एक और कथा देते हैं: एकनाथ ने एक भूखे महार को अपने घर खिलाया, और जाति से बाहर किए जाने पर शुद्धि के लिए नदी पर ले जाए गए। तब एक चमत्कार से साबित हुआ कि एक भूखे महार को खिलाने का पुण्य सैकड़ों ब्राह्मणों को खिलाने से बड़ा है।
श्रीखंड्या: जब भगवान सेवक बने
परंपरागत कथामहीपति के अनुसार एकनाथ की सेवा से प्रसन्न होकर कृष्ण एक ब्राह्मण का रूप लेकर पैठण आए और बोले: मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ, मज़दूरी नहीं चाहिए, बस पेट भर भोजन और आपका साथ। अपना नाम उन्होंने श्रीखंड्या बताया। वे कावड़ में गोदावरी से पानी भरकर लाते और पूजा के लिए चंदन घिसते।
द्वारका का एक ब्राह्मण बरसों से कृष्ण के दर्शन के लिए तप कर रहा था। रुक्मिणी ने उसे सपने में कहा: कृष्ण यहाँ नहीं, पैठण में एकनाथ के घर सेवक बने हैं। वह पैठण आया, तो एकनाथ ने कहा: कृष्ण तो कण-कण में हैं, कौन-सी जगह उनसे ख़ाली है? ब्राह्मण बोला: मुझे यह ब्रह्म-ज्ञान नहीं चाहिए, मुझे श्रीखंड्या दिखाइए।
जब गंगा ने पोथी थाम ली
परंपरागत कथामहीपति के अनुसार पैठण का एक ब्राह्मण एकनाथ के मराठी भागवत के दो अध्याय लेकर काशी गया और मणिकर्णिका घाट पर उन्हें पढ़ने लगा। वहाँ के पंडितों को यह बुरा लगा कि संस्कृत ग्रंथ को प्राकृत भाषा में पढ़ा जा रहा है, और एकनाथ को काशी बुलवाया गया।
पंडितों ने एकनाथ की भागवत छीनकर मणिकर्णिका में फेंक दी। कथा कहती है कि भागीरथी ने रत्न-जड़े कंगनों वाले दोनों हाथ उठाकर पोथी थाम ली। तब मुख्य संन्यासी ने गंगा में कूदकर पोथी सिर पर रख ली, और पंडितों से कहा कि एकनाथ की शरण जाओ। एकनाथ ने उनसे कहा: मुझे नहीं, इस ग्रंथ को पूजो।
शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप
भक्त की कोई जाति नहीं
ब्राह्मणों के आगे एकनाथ ने राण्या महार के बारे में कहा: वह विष्णु का भक्त है, उसने मन के छहों शत्रु जीत लिए हैं, उसे अछूत मत कहो। उसके चरित्र में भागवत धर्म का कोई गुण कम नहीं, और अपनी भक्ति से उसने परब्रह्म को अपने वश में कर लिया है।
महीपति की एक और कथा में एकनाथ ने वैशाख की तपती रेत पर रोते एक बच्चे को उठाकर कमर पर बिठाया और उसके घर पहुँचाया; तब पता चला कि वह महार स्त्री का बच्चा है। उन्होंने उसे बिना झिझक माँ को सौंपा, फिर गंगा में नहाकर घर लौटे।
ज्ञान लोगों की भाषा में
Ranade लिखते हैं कि ज्ञानदेव के बाद एकनाथ, रामदास, नामदेव और तुकाराम ने वह ज्ञान, जो संस्कृत में बंद था, लोगों की अपनी भाषा में खोला; और इसके लिए एकनाथ और तुकाराम को ब्राह्मणों का सबसे कड़ा विरोध झेलना पड़ा।
रचनाएँ और ग्रंथ
प्रामाणिक संग्रह मेंएकनाथी भागवत — भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कंध के 31 अध्यायों की मराठी टीका, जिसे Abbott उनका सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण ग्रंथ कहते हैं। इसकी अपनी पुष्पिका के अनुसार यह काशी में शके 1495 (1573 ई.) की कार्तिक पूर्णिमा को पूरी हुई। परंपरा के अनुसार पाँच अध्याय पैठण में और बाक़ी छब्बीस काशी में लिखे गए।
प्रामाणिक संग्रह मेंरुक्मिणी-स्वयंवर — भागवत के दशम स्कंध की कथा पर आधारित; अंत की पुष्पिका के अनुसार काशी में मणिकर्णिका के तट पर शके 1493 (1571 ई.) की रामनवमी को पूरा हुआ।
प्रामाणिक संग्रह मेंज्ञानेश्वरी का शुद्ध पाठ — नक़ल-दर-नक़ल ज्ञानेश्वरी का पाठ बिगड़ गया था। Abbott के अनुसार यह ऐतिहासिक तथ्य है कि एकनाथ ने उसका पाठ शुद्ध किया: लगभग सभी हस्तलिखित प्रतियों में पुष्पिका है कि एकनाथ ने शके 1506 (1584 ई.) में संशोधन किया, और तंजौर की शके 1515 (1593 ई.) की, यानी एकनाथ के जीवनकाल की, एक प्रति में भी यह पुष्पिका है।
भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान
आधुनिक विद्वानों का मतAbbott अपनी भूमिका में लिखते हैं कि लोकप्रियता में एकनाथ भले तुकाराम से पीछे हों, पर चरित्र, आदर्श, विद्या और जीवन की सच्चाई में वे महाराष्ट्र के संत-कवियों में सबसे महान हैं। उनके अनुसार तुकाराम ने भी अपनी प्रेरणा और विचारों का बड़ा हिस्सा एकनाथ से पाया।
आधुनिक विद्वानों का मतAbbott यह भी साफ़ कहते हैं कि महीपति और दूसरों की ये कथाएँ हूबहू इतिहास नहीं, मुँह-दर-मुँह चली परंपरा हैं; पर वे उस छाप के अनुरूप हैं, जो एकनाथ ने अपनी पीढ़ी पर छोड़ी।
संबंधित संत
- संत ज्ञानेश्वर — प्रेरणा-स्रोत
- संत तुकाराम — इनसे प्रेरित
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परंपरा
- वारकरी परंपरा: पंढरपुर के विट्ठल और महाराष्ट्र के संत — ज्ञानदेव की नींव से तुकाराम के कलश तक, पंढरपुर की राह के संत
लेख
- संत और जाति: भक्ति ने ऊँच-नीच की दीवार कैसे लाँघी — जुलाहे, चमार, नाई, जाट और महार संत, और वे ब्राह्मण संत जिन्होंने दीवार तोड़ी
तीर्थ
- श्रीविट्ठल मंदिर — एकनाथ के कुल से जुड़े पांडुरंग का मंदिर
- काशी — जहाँ एकनाथी भागवत पूरा हुआ
स्रोत
- Eknath: A Translation from the Bhaktalilamrita — Justin E. Abbott (अनु.) (1927) · भूमिका, p. iv; अध्याय 13–22; परिशिष्ट, pp. 254–265
- Rise of the Maratha Power — M. G. Ranade (1900) · pp. 152, 159–160
