मीराबाई

राजमहल छोड़कर गिरधर गोपाल को अपना सब कुछ मानने वाली भक्त-कवयित्री

संक्षेप में

बचपन में ही मीरा का मन गिरधर गोपाल की एक मूर्ति में लग गया, और उन्होंने उसे ही अपना सब कुछ मान लिया। राजघराने में ब्याह हुआ, ससुराल ने रोका, विष तक भेजा, पर मीरा ने लोक-लाज छोड़कर गिरधर का भजन नहीं छोड़ा। नाभादास कहते हैं, उन्होंने कलियुग में गोपियों जैसा प्रेम सबके सामने दिखाया।

सगुण भक्त-कविमहिला संत / संत-कवयित्रीकृष्ण-भक्ति

एक नज़र में

मीराबाई — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसगुण भक्त-कवि, महिला संत / संत-कवयित्रीभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 115, पृ. 120–121; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 343; भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 115, पृ. 120–121
परंपराकृष्ण-भक्तिभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 115 ("…तजि मीरा गिरिधर भजी"), पृ. 120–121; भक्तमाल (नाभादास), प्रियादास की टीका, कवित्त 471, पृ. 121
कालसोलहवीं सदी; जन्म संवत् 1555–1560 के बीच (लगभग 1500 ई.), देह-त्याग की तिथि पर मत अलग (मत अलग-अलग)मीराबाई की शब्दावली (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 342
गुरु (मत अलग-अलग)संत रविदासमीराबाई की शब्दावली (बेलवेडियर), शब्द 57 ("गुरु मिलिया रैदास जी…"), पृ. 21; Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 318

जीवन

मेड़ता की बेटी, गिरधर की दुलहन

परंपरागत कथा

बेलवेडियर प्रेस के जीवन-चरित्र के अनुसार मीरा मेड़ता के राठौड़ रतनसिंह की इकलौती बेटी और राव दूदा की पोती थीं। उनका जन्म कुड़की गाँव में संवत् 1555 और 1560 के बीच हुआ। Macauliffe भी उन्हें मेड़ता के रतनसिंह की बेटी कहते हैं, और जन्म लगभग 1504 ई. बताते हैं। प्रियादास भी मेड़ता को ही उनकी जन्म-भूमि कहते हैं।

बचपन से ही उनका मन गिरधारीलाल की मूर्ति में लगा था। Macauliffe एक कथा कहते हैं: एक बारात निकल रही थी, नन्ही मीरा ने माँ से पूछा, "मेरा दूल्हा कौन है?" माँ ने हँसकर गिरधरलाल की मूर्ति की ओर इशारा कर दिया, और मीरा ने उसी दिन से उन्हें अपना पति मान लिया।

मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के कुँवर भोजराज से हुआ: बेलवेडियर के अनुसार संवत् 1573 में, और Macauliffe के अनुसार 1516 ई. में। प्रियादास कहते हैं कि फेरे लेते समय भी मीरा का मन साँवरे में लगा था, और विदा के समय उन्होंने दहेज में बस एक चीज़ माँगी: गिरधारीलाल की मूर्ति।

ससुराल में विरोध

परंपरागत कथा

ससुराल पहुँचते ही सास ने उन्हें देवी की पूजा करने को कहा। मीरा बोलीं, "मेरा माथा तो गिरधारी के हाथ बिक चुका है, किसी और के आगे नहीं झुकेगा।" सास नाराज़ हुई और राणा से शिकायत की। मीरा को एक अलग महल दे दिया गया, और वे वहाँ अपने गिरधर की सेवा और साधु-संगत में और भी मगन हो गईं।

ननद ने आकर समझाया कि साधुओं की संगत से कुल को कलंक लगता है। मीरा ने कहा कि मेरे तो प्राण ही संतों के साथ हैं। बेलवेडियर के अनुसार विवाह के दस बरस के भीतर ही उनके पति का देहांत हो गया, और इसके बाद वे भजन में और भी लीन हो गईं।

अंतिम दिन: द्वारका

परंपरागत कथा

बहुत सताए जाने पर मीरा मेवाड़ छोड़कर वृंदावन गईं, और फिर द्वारका में बस गईं। उनके जाने के बाद मेवाड़ पर संकट आए, तब राणा को पछतावा हुआ। उसने ब्राह्मणों को मीरा को वापस लाने द्वारका भेजा। ब्राह्मण उनके द्वार पर धरना देकर बैठ गए कि जब तक आप न चलें, हम अन्न-जल न लेंगे।

मीरा रणछोड़जी से विदा लेने मंदिर गईं, और फिर लौटी नहीं। प्रियादास कहते हैं, वे रणछोड़ में लीन हो गईं और फिर कहीं न मिलीं। बेलवेडियर के जीवन-चरित्र में है कि केवल उनके वस्त्र का एक छोर मूर्ति के मुँह से निकला रहा। Macauliffe कहते हैं कि उनकी साड़ी मूर्ति पर लिपटी मिली।

देह-त्याग की तिथि ज्ञात नहीं। बेलवेडियर बताता है कि एक भाट के कहने पर संवत् 1603 लिखा गया, पर वे भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुमान, संवत् 1620 से 1630 के बीच, को ठीक मानते हैं।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

विष का प्याला

परंपरागत कथा

मीरा का साधुओं के साथ बैठना राजघराने को सहन न हुआ। उन्हें मारने का उपाय सोचा गया। चरणामृत कहकर एक कटोरे में विष भेजा गया। मीरा जानती थीं कि यह विष है, फिर भी उन्होंने उसे गिरधर का प्रसाद मानकर पी लिया, और उनका बाल भी बाँका न हुआ।

यह विष वाली बात भक्तमाल के मूल छप्पय में भी है, जो इसे सबसे पुरानी कथाओं में से एक बनाती है: "दुष्टनि दोष विचारि, मृत्यु को उद्यम कीयौ। बार न बाँकौ भयौ, गरल अमृत ज्यौं पीयौ॥"

स्रोतों में अंतर

विष किसने भेजा, इस पर स्रोत अलग हैं। नाभादास और प्रियादास बस "दुष्ट" और "राणा" कहते हैं, नाम नहीं लेते। Macauliffe इसे राणा सांगा, यानी ससुर, का काम बताते हैं। बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसार मीरा के पति भोजराज कभी गद्दी पर नहीं बैठे और सांगा से पहले ही चल बसे; सताने वाले राणा बाद में गद्दी पर बैठे उनके देवर थे, जैसे विक्रमाजीत।

तलवार लेकर आए राणा

परंपरागत कथा

जब विष का असर न हुआ, तो राणा ने पहरेदार लगा दिए कि मीरा किसी से बात करें तो ख़बर दो। एक दिन ख़बर आई कि मीरा भीतर किसी से हँस-हँसकर बातें कर रही हैं। राणा तलवार लेकर पहुँचा और किवाड़ खुलवाए: "कहाँ है वह आदमी?"

मीरा ने शांति से कहा, "वह तो आपके सामने ही विराजे हैं, आँखें खोलकर देखिए।" सामने गिरधर की मूर्ति थी। राणा लज्जित होकर लौट गया। प्रियादास कहते हैं कि प्रभाव देखकर भी उसका मन भाव में न भीगा, क्योंकि हरि-कृपा के बिना भक्ति कैसे मिले।

वृंदावन में जीव गोसाईं

परंपरागत कथा

वृंदावन में मीरा जीव गोसाईं के दर्शन को गईं। गोसाईं ने स्त्रियों का मुँह न देखने का प्रण लिया था, इसलिए मिलने से मना कर दिया। Macauliffe के अनुसार मीरा ने कहला भेजा: मैं तो समझती थी कि वृंदावन में पुरुष बस एक गिरधरलाल हैं, बाक़ी सब उनकी सखियाँ; आज पता चला कि यहाँ और भी पुरुष हैं। यह सुनकर गोसाईं ने अपना प्रण छोड़ दिया और स्वयं मिलने आए।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

मेरे तो गिरधर गोपाल

मीरा की भक्ति का केंद्र एक ही है: गिरधर गोपाल, जिसे वे अपना पति मानती हैं। उनके पदों में बार-बार यही बात आती है कि माता-पिता, भाई-बंधु, कुल की मर्यादा, सब छूट गए, पर गिरधर नहीं छूटे।

नाभादास ने इसी को मीरा की पहचान बताया: लोक-लाज और कुल की ज़ंजीरें तोड़कर, निडर होकर, बिना किसी अंकुश के उन्होंने रसिक कृष्ण का यश गाया।

संतों की संगत

मीरा के लिए भक्ति अकेले की नहीं, संतों के साथ की चीज़ थी। ससुराल की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि वे साधुओं के बीच बैठती हैं, और मीरा का उत्तर था कि मेरे प्राण तो संतों के साथ लगे हैं।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

मेरे गिरधर गुपाल दूसरो न कोई

मेरे गिरधर गुपाल दूसरो न कोई॥ टेक॥ जा के सिर मोर मुकट मेरो पति सोई। तात मात भ्रात बंधु अपना नहिं कोई॥ छाँड़ दई कुल की कान क्या करिहै कोई। संतन ढिंग बैठि बैठि लोक लाज खोई॥ चुनरी के किये टूक टूक ओढ़ लीन्ह लोई। मोती मूँगे उतार बन माला पोई॥ अँसुवन जल सींच सींच प्रेम बेल बोई। अब तो बेल फैल गई आनँद फल होई॥ दूध की मथनिया बड़े प्रेम से बिलोई। माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई॥ आई मैं भक्ति काज जगत देख मोही। दासी मीरा गिरधर प्रभु तारो अब मोही॥

मेरे तो बस गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं। जिसके सिर पर मोर-मुकुट है, वही मेरा पति है। पिता, माता, भाई, बंधु, अब कोई मेरा अपना नहीं। मैंने कुल की मर्यादा छोड़ दी, कोई क्या कर लेगा? संतों के पास बैठ-बैठकर लोक-लाज खो दी। रेशमी चुनरी फाड़कर कंबल ओढ़ लिया, मोती-मूँगे उतारकर जंगली फूलों की माला पिरो ली। आँसुओं के जल से सींच-सींचकर प्रेम की बेल बोई, अब वह फैल गई और उसमें आनंद के फल लगे हैं। मैंने प्रेम से दूध मथा, मक्खन निकाल लिया; अब छाछ कोई और पिए। मैं भक्ति के लिए आई थी, पर दुनिया को देखकर मोह में पड़ गई; प्रभु गिरधर, अब अपनी दासी मीरा को तार दो।

परंपरा से इनके नाम परमीराबाई की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस), शब्द 46 (पृ. 21)

हरि तुम हरो जन की भीर

हरि तुम हरो जन की भीर॥ टेक॥ द्रोपदी की लाज राख्यो तुम बढ़ायो चीर॥ भक्त कारन रूप नरहरि धर्‍यो आप सरीर॥ हिरनकस्यप मारि लीन्हो धर्‍यो नाहिन धीर॥ बूड़ते गजराज राख्यो कियो बाहर नीर॥ दास मीरा लाल गिरधर दुख जहाँ तहँ पीर॥

हरि, तुम अपने जनों का संकट हर लो। तुमने चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज रखी। भक्त के लिए तुमने नरसिंह का शरीर धरा, और हिरण्यकशिपु को मार डाला। डूबते गजराज को बचाकर तुमने पानी से बाहर निकाला। दासी मीरा कहती है, लाल गिरधर, जहाँ दुख है वहीं पीड़ा है, उसे हर लो।

परंपरा से इनके नाम परमीराबाई की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस), जीवन-चरित्र (पृ. 5). बेलवेडियर के अनुसार यह उन दो पदों में से है, जिन्हें गाकर मीरा रणछोड़ में समा गईं। Macauliffe ने इसी भाव के पद का अनुवाद दिया है।

रचनाएँ और ग्रंथ

परंपरा से इनके नाम परपद और भजन — मीरा के नाम से बहुत-से पद गाए जाते हैं। बेलवेडियर के प्रकाशक लिखते हैं कि कबीर को छोड़कर किसी और की वाणी में बाद में इतनी मिलावट नहीं हुई, जितनी मीरा की वाणी में; ख़ासकर वे पद, जिनमें राणा को मीरा का पति कहा गया है, उन्हें गढ़े हुए लगते हैं।

परंपरा से इनके नाम परगुरु ग्रंथ साहिब की एक पुरानी प्रति में एक पद — मीरा का एक पद आम गुरु ग्रंथ साहिब में नहीं, केवल "भाई बन्नो वाली" एक पुरानी प्रति में मिलता है।

रचयिता संदिग्धनरसी जी का मायरा, गीतगोविंद की टीका, रामगोविंद — बेलवेडियर के जीवन-चरित्र में इन ग्रंथों को भी मीरा का बताया गया है, पर इनका कोई प्रमाण नहीं दिया गया।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

परंपरागत कथानाभादास ने भक्तमाल में मीरा को उन भक्तों में रखा, जिन्होंने कलियुग में गोपियों जैसा प्रेम प्रत्यक्ष दिखाया, और भक्ति का डंका बजाकर किसी से न लजाईं।

आधुनिक विद्वानों का मतमीरा की कथा उन गिनी-चुनी कथाओं में है, जो भक्तमाल के मूल छप्पय (लगभग 1600 ई.) में ही दर्ज है, यानी उनके जाने के कुछ ही दशकों बाद उनकी भक्ति और उन्हें दिए गए कष्ट की बात लोगों में फैल चुकी थी।

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स्रोत

मीराबाई — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न