माधवदेव

शंकरदेव के सबसे प्रिय शिष्य और उत्तराधिकारी, नाम-घोषा और बरगीतों के रचयिता

संक्षेप में

एक युवा शाक्त विद्वान माँ के ठीक होने पर बकरे की बलि देने निकला था, और शंकरदेव से घंटों शास्त्रार्थ करके उन्हीं के चरणों में गिर पड़ा। उसने विवाह छोड़ा, गुरु-सेवा को जीवन बनाया और नाम-घोषा रचा। यही माधवदेव थे, असम के एकशरण धर्म में शंकरदेव के उत्तराधिकारी।

संत-कविएकशरण धर्म (असम)

एक नज़र में

माधवदेव — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कविNeog, Sankaradeva (NBT, 1967), pp. 47–49
परंपराएकशरण धर्म (असम)Gait, A History of Assam (1906), pp. 57–58
कालसोलहवीं सदी; Das के अनुसार जन्म 1489 ई., और Neog के अनुसार देह-त्याग 1596 ई., कूच बिहार में (आधुनिक विद्वानों का मत)H. M. Das, Sankaradeva — A Study (1945), p. 27; Neog, Sankaradeva (NBT, 1967), p. 30
गुरु (ऐतिहासिक प्रमाण)श्रीमंत शंकरदेवGait, A History of Assam (1906), p. 57

जीवन

शाक्त विद्वान

आधुनिक विद्वानों का मत

Das के अनुसार माधव का जन्म 1489 ई. में आज के नौगाँव ज़िले के बांदुका गाँव में हुआ। वे कायस्थ थे, नामी विद्वान थे और शक्ति के उपासक थे। Neog लिखते हैं कि शंकरदेव से भेंट के समय वे बत्तीस बरस के थे, और अपनी विद्या पर उन्हें गर्व था।

गृहस्थी छोड़ी, गुरु को चुना

परंपरागत कथा

Neog के अनुसार शिष्य बनने से कुछ ही पहले उनकी सगाई नेघेरी के एक कायस्थ की बेटी से हुई थी। संघ की सेवा में बाधा न आए, इसलिए उन्होंने एक छोटी-सी युक्ति से वह संबंध तोड़ दिया, घर छोड़ा और गुरु के पास संन्यासी की तरह रहने लगे।

वे हर रोज़ के काम में गुरु के इतने निकट और सच्चे साथी बने कि शंकरदेव उन्हें "प्राण-बांधव", यानी प्राणों का मित्र, कहते थे। Neog के अनुसार माधवदेव का स्वर मधुर था, और उनके आने से नाम-कीर्तन और भी मीठा और भरा-पूरा हो गया।

शंकरदेव गृहस्थ थे और माधवदेव जीवन-भर ब्रह्मचारी रहे। Neog के अनुसार दोनों का उपदेश था कि भगवान को पाने के लिए संसार छोड़ना ज़रूरी नहीं; फिर भी शायद माधवदेव के अपने आदर्श से ही सत्रों के भीतर "केवलिया" कहलाने वाले संन्यासी भक्तों का एक वर्ग बना।

उत्तराधिकार, और बरपेटा

ऐतिहासिक प्रमाण

शंकरदेव अपनी अंतिम यात्रा पर पाटबाउसी से कूच बिहार जाते हुए एक रात माधवदेव के गणककुची सत्र में रुके। Neog लिखते हैं कि वहीं उन्होंने अपने प्रिय शिष्य से मन की आख़िरी बात की और उन्हें यह मशाल थामे रहने को कहा, इस भरोसे के साथ कि वे अपनी रचनाओं में सदा उनके साथ रहेंगे।

Gait के अनुसार शंकरदेव ने माधवदेव को उत्तराधिकारी चुना, पर यह सबको स्वीकार नहीं हुआ और कुछ ब्राह्मण शिष्यों ने अलग शाखाएँ बनाईं। Das बताते हैं कि शंकरदेव ने धर्म का अधिकार माधवदेव को दिया और संपत्ति बड़े बेटे को, यह दिखाने के लिए कि आध्यात्मिक अधिकार में वंश या जाति नहीं देखी जाती।

Neog के अनुसार माधवदेव ने सुंदरीदिया (बरपेटा) में अपना सत्र बनाया और वहीं नाम-घोषा रचा। नाटकों के लिए बनाया गया उनका मंदिर आगे चलकर बरपेटा सत्र बन गया। विरोधियों की शिकायत पर राजा रघुदेव नारायण के सिपाही उन्हें पकड़कर ले गए, पर मुक़दमे से पहले ही आरोप वापस हो गए और वे सम्मान से छूटे।

फिर राजा ने उन्हें हाजो जाकर बसने का आदेश दिया। वहाँ हयग्रीव-माधव मंदिर के देवता से ज़्यादा लोग संत माधव को देखने आने लगे, तो नई मुसीबत से बचने के लिए वे कूच बिहार चले गए। Neog के अनुसार वहाँ राजा लक्ष्मीनारायण के दरबार में शास्त्रार्थ हुआ, और अंत में 1596 ई. में कूच बिहार में ही उनका देह-त्याग हुआ।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

बलि का संकल्प, और साढ़े चार घंटे का शास्त्रार्थ

परंपरागत कथा

Das कथा सुनाते हैं कि एक बार माधव की माँ बहुत बीमार पड़ीं, तो उन्होंने मन्नत मानी कि माँ ठीक हो गईं तो कामाख्या देवी को बकरे की बलि देंगे। माँ ठीक हो गईं। उन्होंने अपने बहनोई से बलि के लायक बकरा लाने को कहा, पर बहनोई शंकरदेव के शिष्य थे और टालते रहे। कारण जानकर माधव उन्हीं के साथ शंकरदेव से बहस करने चल पड़े।

माधव ने पुराने शास्त्रों से शक्ति-पूजा और बलि का पक्ष रखा, और शंकरदेव ने अनन्य भक्ति का। Neog के अनुसार यह शास्त्रार्थ साढ़े चार घंटे चला। अंत में शंकरदेव ने भागवत का वह श्लोक सुनाया जिसका भाव है: जैसे पेड़ की जड़ में पानी देने से ही डालियाँ और पत्ते सींचे जाते हैं, और पेट में भोजन देने से ही सारे अंग पलते हैं, वैसे ही अकेले अच्युत की पूजा से सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं।

माधव का सारा तर्क ढह गया। वे शंकरदेव के चरणों में गिर पड़े और उन्हें गुरु मान लिया। Das के अनुसार इसके बाद उन्होंने माधवदेव नाम लिया, और गुरु की सेवा में ऐसे रमे कि शंकरदेव के मत में "गुरु-सेवा" एक नया अंग बनकर जुड़ गई।

स्रोतों में अंतर

बहनोई के नाम पर स्रोत अलग हैं: Das उन्हें गयापाणि कहते हैं, और Neog रामदास।

हाथियों का खेदा, और हरि की अंतिम घड़ी

परंपरागत कथा

अहोम राजा के आदेश पर शंकरदेव के लोगों को जंगली हाथी पकड़ने के खेदे में लगाया गया, पर हाथी उन्हीं की ओर से बाड़ा तोड़कर भाग निकले। Neog और Das दोनों के अनुसार शंकरदेव के दामाद हरि और माधवदेव पकड़े गए, और हरि को मृत्युदंड मिला।

Das कथा सुनाते हैं कि उस घड़ी माधवदेव ने हरि को भगवान का नाम सुनाकर ढाढ़स दिया और एक पद गाया, जिसका भाव है: भाई, अंतिम साँस तक सावधान रहो, गोविंद की कृपा जल्द मिलेगी; जीवन और यौवन क्षणिक हैं, मोह और शोक छोड़कर मन हरि के चरणों में लगाओ। इस तरह भगवान के नाम सुनते-सुनते हरि ने प्राण छोड़े।

स्रोतों में अंतर

माधवदेव की रिहाई पर स्रोत अलग हैं: Das के अनुसार उन्हें निर्दोष ब्रह्मचारी भक्त जानकर छोड़ दिया गया। Neog के अनुसार उन्हें बंदी रखा गया; वे आसपास के गाँवों में भिक्षा माँगकर जीते और कभी राज-अधिकारियों को रामायण सुनाते, और लगभग छह महीने बाद छूटकर पैदल धुवाहाट लौटे।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

नाम ही साधन

Das के अनुसार नाम-घोषा का मूल स्वर यह है कि भगवान की भक्ति और उनके नाम-कीर्तन के बिना मुक्ति नहीं। उसके एक पद का भाव है: सच्चा शास्त्र वही जो देवकी-पुत्र ने कहा, देवता एक ही, देवकी-पुत्र; कर्म एक ही, उनके चरणों की सेवा; और मंत्र एक ही, उनका नाम।

Neog बताते हैं कि शंकरदेव के भक्ति-रत्नाकर की तरह माधवदेव भी नाम-घोषा में भागवत के उस वचन का सहारा लेते हैं कि यह पुराण सारे वेदांत का सार है। इसीलिए इस परंपरा ने ब्रह्मसूत्र पर अलग भाष्य लिखना ज़रूरी नहीं समझा।

Gait के अनुसार माधवदेव की शाखा जाति-भेद कम मानती थी, और बलि तथा मूर्ति-पूजा के विरोध में ब्राह्मण गोसाइयों की शाखाओं से कहीं ज़्यादा दृढ़ थी। वे ख़ुद संस्थापक से भी अधिक तपस्वी थे, पर अनुयायियों पर कम कड़ाई रखते थे।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

मुक्तितो निस्पृह यिटो (नाम-घोषा का पहला घोषा)

মুক্তিতো নিস্পৃহ যিটো সেহি ভকতক নমো ৰসময় মাগোহো ভকতি। সমস্ত মস্তক মণি নিজ ভকতৰ বশ্য ভজো হেন দেৱ যদুপতি।।১।। (देवनागरी में: मुक्तितो निस्पृह यिटो सेहि भकतक नमो / रसमय मागोहो भकति। / समस्त मस्तक मणि निज भकतर वश्य / भजो हेन देव यदुपति॥१॥)

जो मुक्ति की भी चाह नहीं रखता, उस भक्त को मैं नमन करता हूँ, और रस से भरी भक्ति माँगता हूँ। जो सबके सिर के मणि होकर भी अपने भक्त के वश में रहते हैं, ऐसे देव यदुपति को मैं भजता हूँ। नाम-घोषा इसी वंदना से खुलता है: मुक्ति से ऊपर भक्ति, और भगवान से पहले भक्त को प्रणाम।

प्रामाणिक संग्रह मेंनाम-घोषा, घोषा 1 (श्रीमंत शंकरदेव संघ का समीक्षित संस्करण, p. 595). संपादकों के अनुसार यह विष्णुपुरी की भक्ति-रत्नावली के मंगलाचरण पर आधारित है. देवनागरी पंक्तियाँ हमारा लिप्यंतरण हैं.

বৈকুণ্ঠক পৰিহৰি (जहाँ भक्त गाते हैं, वहीं हरि)

একান্ত ভকতসৱে নিৰ্গুণ কৃষ্ণৰ গুণ গাৱে সদা বসিয়া যথাত। বৈকুণ্ঠক পৰিহৰি যোগীৰো হৃদয় এৰি থাকা হৰি সাক্ষাতে তথাত।।৪।। (देवनागरी में: एकान्त भकतसवे निर्गुण कृष्णर गुण / गावे सदा बसिया यथात। / वैकुण्ठक परिहरि योगीरो हृदय एरि / थाका हरि साक्षाते तथात॥४॥)

जहाँ एकनिष्ठ भक्त बैठकर गुणातीत कृष्ण के गुण सदा गाते हैं, वहाँ हरि वैकुंठ को छोड़कर, और योगियों का हृदय भी छोड़कर, साक्षात रहते हैं। भाव यह कि भगवान को ढूँढने कहीं दूर नहीं जाना; जहाँ मिलकर नाम गाया जाए, वहीं वे हैं। Neog के अनुसार असम के गाँव-गाँव में बने नामघर, गाँव के सभा-भवन, इसी मिलकर नाम गाने की परंपरा के केंद्र रहे।

प्रामाणिक संग्रह मेंनाम-घोषा, घोषा 4 (वही संस्करण, pp. 596–597). संपादकों के अनुसार यह "नाहं तिष्ठामि वैकुण्ठे" (बृहन्नारदीय पुराण) का भाव है. देवनागरी पंक्तियाँ हमारा लिप्यंतरण हैं.

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंनाम-घोषा (हज़ारी घोषा) — Das के अनुसार इसमें लगभग एक हज़ार पद हैं, इसलिए इसे "हज़ारी घोषा" भी कहते हैं; यह शंकरदेव के मत की व्याख्या है और अलग-अलग छंदों में बँधा है। Neog के अनुसार माधवदेव ने इसे बरपेटा के सुंदरीदिया सत्र में रचा।

प्रामाणिक संग्रह मेंबरगीत — शंकरदेव के बरगीतों के साथ माधवदेव के बरगीत भी गाए जाते हैं। Neog के अनुसार माधवदेव के गीतों में खुली हवा का भाव है, और वे बाल-कृष्ण की लीलाओं और यशोदा के मातृ-भाव के वर्णन में सबसे सुंदर हैं। उन्होंने अपने गुरु की स्तुति में एक "भटिमा" भी रची।

प्रामाणिक संग्रह मेंअंकिया नाट और झुमुरा — Das के अनुसार माधवदेव के आठ छोटे नाटक मिलते हैं, लगभग सभी बाल-कृष्ण की लीलाओं पर: पिंपरा-गुचुआ (मक्खन से चींटियाँ हटाने का बहाना), चोर-धरा, रास-झुमुरा, कोटरा-खेला, भूषण-हरोआ, भोजन-व्यवहार, भूमि-लेटोआ और अर्जुन-भंजन।

प्रामाणिक संग्रह मेंभक्ति-रत्नावली, आदिकांड रामायण और अन्य — Das के अनुसार माधवदेव ने पाटबाउसी में गुरु के पास रहते हुए विष्णुपुरी की संस्कृत भक्ति-रत्नावली का असमिया रूप बनाया, और नाम-मालिका, राजसूय, आदिकांड रामायण भी रचे। Neog के अनुसार माधव कंदली के रामायण में बालकांड माधवदेव ने और उत्तरकांड शंकरदेव ने जोड़ा, और शंकरदेव के कहने पर उन्होंने जन्म-पुराण का भी असमिया पद्य-रूप बनाया।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

ऐतिहासिक प्रमाणGait के अनुसार अपने अनुयायियों में माधवदेव का यश संस्थापक शंकरदेव से भी बढ़ गया। उनके अनुयायी "महापुरुषिया" कहलाते हैं और आज भी बरपेटा को अपना मुख्य केंद्र मानते हैं।

आधुनिक विद्वानों का मतNeog के अनुसार माधवदेव ने भक्ति के प्रचार के लिए संत भेजे, जिनमें प्रमुख थे भवानीपुर के गोपालदेव, पद्म आता और वंशीगोपाल। इन्होंने ज़्यादातर अहोम राज्य में सत्र बनाए, जिनमें से कई आज भी बड़े और समृद्ध हैं। सुंदरीदिया और बरपेटा के मंदिर उन्होंने अपने भांजे रामचरण और मथुरादास को सौंपे।

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स्रोत

माधवदेव — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न