भक्ति का खुला द्वार
उत्तर भारत में यह द्वार रामानंद की परंपरा से खुला। भक्तमाल कहती है कि उनके गुरु राघवानंद ने काशी में रहकर चारों वर्णों और आश्रमों में भक्ति दृढ़ की। Macauliffe के अनुसार रामानंद हर जाति के व्यक्ति को शिष्य बनाते थे, और मानते थे कि जो एक ही भगवान की सेवा करते हैं, वे आपस में भाई हैं और साथ बैठकर खा सकते हैं।
उनसे जुड़े नाम ही इसकी गवाही हैं: कबीर जुलाहे थे, रविदास चमार, सेन नाई, धन्ना जाट किसान, और पीपा राजा। एक ही गुरु के आँगन में करघा, चमड़े का काम, उस्तरा, हल और राजमुकुट, सब साथ आ बैठे।
महाराष्ट्र में भी यही धारा बही। Ranade गिनते हैं कि लगभग पाँच सौ बरसों में वहाँ के संतों में करीब आधे ब्राह्मण नहीं थे, कुछ तो उन जातियों से थे जिन्हें सबसे नीचा माना जाता था, महार तक। उनके अनुसार यह आंदोलन ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष और पढ़े-अनपढ़, सब तक पहुँचा।
संतों ने अपनी जाति ख़ुद गाई
इन संतों ने अपनी जाति कभी छिपाई नहीं, उसे अपनी वाणी में गाया। कबीर का पद कहता है: "जाति जुलाहा मति का धीरु", यानी जात से जुलाहा, पर मन से धीर। रविदास अपने पद में साफ़ कहते हैं कि वे चमार हैं और बनारस के आसपास मरे पशु उठाते हैं, फिर भी राम-नाम की शरण के कारण बड़े-बड़े ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करते हैं।
धन्ना गुरु ग्रंथ साहिब के अपने पद में नामदेव, कबीर, रविदास और सेन का नाम लेकर कहते हैं कि यह सब सुनकर मैं, एक जाट, भगवान की सेवा में लग गया। उसी पद में वे सेन को गाँव-गाँव जाने-माने नाई के रूप में याद करते हैं, जो अपनी भक्ति से संतों में गिना गया।
नामदेव गुरु ग्रंथ साहिब के दो पदों में गाते हैं कि पंडितों ने उन्हें शूद्र कहकर मारा और मंदिर से निकाल दिया, पर भगवान ने मंदिर का मुख ही नामा की ओर फेर दिया। तुकाराम भी जाति से शूद्र गिने जाते थे, और Abbott के अनुसार कभी पाठशाला नहीं गए।
मंदिर के द्वार पर
महीपति के अनुसार चोखामेला महार थे, और पंढरपुर में रहकर भी मंदिर के भीतर नहीं जा सकते थे; वे महाद्वार पर साष्टांग करके मन में ही विट्ठल को पूजते। एक बार भगवान उनके साथ भोजन करने बैठे, तो पास खड़े एक पुजारी ने उन्हें थप्पड़ मार दिया कि महार के साथ भगवान कैसे खा सकते हैं।
चोखा का उत्तर आज भी इस बहस का सबसे सीधा उत्तर है: गंगा में ब्राह्मण भी नहाता है और अछूत भी, धरती पर सब जातियाँ चलती हैं, तो क्या गंगा और धरती अपवित्र हो गईं? Ranade उनके उपदेश का सार देते हैं: जिसके मन में भगवान पर श्रद्धा और मनुष्यों से प्रेम है, उसकी जाति कभी मत पूछो।
दक्षिण में भी ऐसी ही कथा है। Hooper के अनुसार तिरुप्पाण आलवार अपने को अछूत मानते थे, इसलिए श्रीरंगम के द्वीप पर पैर न रखकर कावेरी के दूसरे किनारे से ही गाते। परंपरा कहती है कि भगवान ने अपने भक्त का अपमान करने वाले पुजारी को आदेश दिया कि वह तिरुप्पाण को अपने कंधों पर बिठाकर मंदिर में लाए।
जिन्होंने अपनी ही बिरादरी से टक्कर ली
दीवार केवल नीचे से नहीं तोड़ी गई। पैठण के ब्राह्मण संत एकनाथ ने भागवत का वह वचन सुनाया कि भगवान को सब कुछ अर्पित करने वाला चांडाल भी भगवान से विमुख ब्राह्मण से श्रेष्ठ है, और राण्या महार का भोजन का न्योता स्वीकार किया। ब्राह्मणों ने उनसे प्रायश्चित करवाया, फिर भी वे अपनी बात से नहीं हटे।
जूनागढ़ के नागर ब्राह्मण नरसिंह मेहता को ढेढ़ों ने अपने मोहल्ले में भजन के लिए बुलाया, और वे पूरी रात वहीं गाते रहे। Jhaveri के अनुसार इसकी सज़ा मिली: बिरादरी ने उन्हें अपने भोजों से बाहर कर दिया।
रामानुज ने गुरु से गुप्त रखने की शर्त पर मिला मंत्र मंदिर के ऊँचे मंडप से सबको सुना दिया, यह कहकर कि उनके अकेले के नरक जाने से इतने लोग तर जाएँ तो सौदा सस्ता है। बहिणाबाई ने ब्राह्मण घर की बेटी होकर पूछा कि ब्राह्मण किसे कहें, जब जीवन पशु, पक्षी और अछूत सबमें एक है।
बंगाल में Sen के अनुसार चैतन्य चांडालों को आँसू भरी आँखों से गले लगाते थे, और समाज-सुधार का काम उन्होंने नित्यानंद को सौंपा, जो ब्राह्मण होकर भी "अशुद्ध" मानी जाने वाली जातियों के घर खाते और रहते थे।
बसव से शंकरदेव और गंगासती तक
कर्नाटक में बसव पुराण की कथा है कि आठ बरस के बसव ने जनेऊ पहनने से मना कर दिया और कहा कि वे जाति के पेड़ की जड़ पर रखी कुल्हाड़ी हैं। Bhandarkar के अनुसार बसव ने वीरशैव संप्रदाय को कड़ा, जाति-विरोधी रूप दिया।
असम में Neog के अनुसार शंकरदेव के धर्म में कोई भी व्यक्ति जाति के कारण दीक्षा के अयोग्य नहीं था। शंकरदेव और माधवदेव के शिष्यों में दो मुसलमान, एक गारो, एक भूटिया, एक कुम्हार और एक बनिया तक के नाम मिलते हैं, और ब्राह्मण शूद्र गुरुओं के शिष्य बने।
और उन्नीसवीं सदी के सौराष्ट्र में गुजराती विश्वकोश कहळसंग, गंगासती और पानबाई की संत-त्रिपुटी को ऐसे ही याद करता है: जिन्होंने जाति या वर्ण का भेद किए बिना जीवन जिया।
एक सच, जो भूलना नहीं चाहिए
इन कथाओं को पढ़कर यह मान लेना ग़लत होगा कि भक्ति ने जाति मिटा दी। स्रोत ख़ुद बताते हैं कि संतों को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ी: एकनाथ को प्रायश्चित, नरसिंह को बिरादरी से बाहर होना, और तुकाराम को रामेश्वर भट्ट के कहने पर अपनी पोथियाँ इंद्रायणी में डुबोनी पड़ीं।
संप्रदायों के भीतर भी यह प्रश्न बना रहा। Gait के अनुसार शंकरदेव के बाद असम में ब्राह्मण गोसाइयों की शाखाएँ जाति-भेद पर ज़्यादा ध्यान देती रहीं, जबकि माधवदेव की शाखा कम। भक्ति ने भगवान के आगे बराबरी का सपना दिया; समाज उसे पूरा अपनाने में सदियाँ लेता रहा।
| संत | समाज (जैसा स्रोत कहते हैं) | क्या हुआ | स्रोत |
|---|---|---|---|
| कबीर | जुलाहा | अपने पद में: "जाति जुलाहा मति का धीरु" | कबीर-ग्रंथावली (श्यामसुंदरदास सं.), परिशिष्ट, पद 97, पृ. 293 |
| रविदास | चमार | चित्तौड़ की रानी झाली शिष्या बनीं; साथ के ब्राह्मण नाराज़ हुए | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 318, 320; भक्तमाल (नाभादास), प्रियादास की टीका, कवित्त 266, पृ. 70 |
| सेन | नाई | भक्तमाल: भगवान ने सेन का रूप धरकर राजा की सेवा की | भक्तमाल (नाभादास), छप्पय 63, पृ. 77 |
| धन्ना | जाट किसान | अपने पद में: "मैं, एक जाट, भगवान की सेवा में लग गया" | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, p. 109 |
| नामदेव | पंडितों ने शूद्र कहा | मंदिर से निकाले गए; कथा: मंदिर का मुख उनकी ओर घूमा | Macauliffe, The Sikh Religion vol. VI, pp. 31–32 |
| चोखामेला | महार | मंदिर के महाद्वार से पूजा; पुजारी ने थप्पड़ मारा | महीपति, भक्तविजय (Abbott–Godbole अनु.), अध्याय 23, ओवी 7–10, 64–72 |
| तुकाराम | शूद्र गिने गए | अभंगों की पोथियाँ नदी में डुबोने को कहा गया | महीपति, भक्तलीलामृत: Tukaram (Abbott अनु., 1930), भूमिका, p. x; अध्याय 35, pp. 202–205 |
| नम्मालवार | शूद्र परिवार | कुरुकूर में जन्म; बारह आलवारों में गिने गए | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 12–13 |
| तिरुप्पाण आलवार | अपने को अछूत मानते थे | कथा: पुजारी उन्हें कंधे पर मंदिर ले गया | Hooper, Hymns of the Alvars (1929), pp. 15–16 |
| एकनाथ | ब्राह्मण | राण्या महार के घर भोजन; प्रायश्चित करवाया गया | महीपति, भक्तलीलामृत: Eknath (Abbott अनु., 1927), अध्याय 19, pp. 139–148 |
| नरसिंह मेहता | नागर ब्राह्मण | ढेढ़ों के मोहल्ले में भजन; बिरादरी से बाहर | Jhaveri, Milestones in Gujarati Literature (1914), pp. 35, 38 |
| बसव | आराध्य ब्राह्मण | जनेऊ से इनकार; वीरशैव धर्म को जाति-विरोधी रूप | Rice, A History of Kanarese Literature (1921), p. 52; Würth, Basava Purana (JBBRAS vol. VIII, 1865), p. 67 |
