मलूकदास

कड़ा के संत, जिन्होंने कहा: पीर वही, जो दूसरे की पीर जाने

संक्षेप में

बालक मलूक गली में खेलते हुए काँटे और कंकड़ उठाकर कोने में डाल देता था, ताकि किसी राहगीर के पाँव में न चुभें। आगे चलकर यही मलूकदास बने, जिनकी एक साखी आज भी याद की जाती है: पीर वही है, जो दूसरे की पीड़ा जाने; जो पराई पीड़ा न जाने, वह फ़कीर बेपीर है।

निर्गुण भक्ति संत

एक नज़र में

मलूकदास — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीनिर्गुण भक्ति संतबीजक (Ahmad Shah अनु.), pp. 32–33; मलूकदासजी की बानी (बेलवेडियर), साखी, पृ. 29–30
कालजन्म संवत् 1631, देह-त्याग संवत् 1739 (108 वर्ष की आयु में), बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसार (परंपरागत कथा)मलूकदासजी की बानी (बेलवेडियर), जीवन-चरित्र, पृ. 1, 4

जीवन

कड़ा के खत्री परिवार में

परंपरागत कथा

बेलवेडियर के जीवन-चरित्र के अनुसार मलूकदास इलाहाबाद ज़िले के कड़ा गाँव में, वैसाख बदी पंचमी, संवत् 1631 को, लाला सुंदरदास खत्री कक्कड़ के घर जन्मे। Westcott बताते हैं कि कड़ा-मानिकपुर "मलूकदासी" संप्रदाय का मुख्य केंद्र है।

पाँच बरस की उम्र में वे गली में खेलते हुए काँटे और कूड़ा उठाकर कोने में डाल देते, ताकि किसी के पाँव में न लगे। बचपन से ही साधुओं की सेवा में उनका मन लगता था। एक बार उन्होंने घर के भंडार का सारा अन्न भूखे साधुओं को खिला दिया, और माँ रो पड़ी कि अब घर के लिए क्या बनेगा।

दस-ग्यारह बरस के हुए, तो पिता ने उन्हें कंबल बेचने के काम में लगाया। रास्ते में कोई साधु या ग़रीब माँगता, तो वे कंबल योंही दे देते।

गुरु और अंतिम दिन

परंपरागत कथा

जीवन-चरित्र के अनुसार मलूकदास के गुरु विट्ठलदास थे, जो द्रविड़ देश के एक महात्मा थे। मलूकदास गृहस्थ थे; उनकी एक बेटी हुई, पर थोड़े ही समय में पत्नी और बेटी दोनों चल बसीं।

संवत् 1739 में, 108 बरस की आयु में, उन्होंने चोला छोड़ा। जाने से छह महीने पहले उन्होंने अपने भतीजे रामस्नेही को गद्दी पर बैठाया। उन्होंने कहा था कि मेरा शरीर जलाना मत, गंगा में प्रवाहित कर देना, और ऐसा ही किया गया। कड़ा में उनकी समाधि बनी।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

कंबल की गठरी और मज़दूर

परंपरागत कथा

एक दिन मलूक दूर के गाँव कंबल बेचने गए, पर न कोई कंबल बिका, न कोई माँगने वाला मिला। भारी गठरी सिर पर लादकर लौटते हुए वे थककर एक नीम के नीचे बैठ गए। एक मज़दूर आया और बोला, एक टका दो तो गठरी तुम्हारे घर पहुँचा दूँ। मज़दूर तेज़ चाल से आगे निकल गया, और मलूक भजन करते हुए पीछे-पीछे घर लौटे।

माँ को शक हुआ कि मज़दूर ने कहीं कंबल न निकाल लिए हों, इसलिए उसे खाना देकर कोठरी में बंद कर दिया। मलूक पहुँचे और कोठरी खोली, तो मज़दूर ग़ायब था, बस रोटी का एक टुकड़ा पड़ा था। मलूक ने उसे प्रसाद मानकर खा लिया, माँ के पाँव पड़े, और कहा कि तू बड़भागी है, भगवान ने तुझे मज़दूर के रूप में दर्शन दिए।

उसी दिन से वे उसी कोठरी में ध्यान में बैठ गए, और जीवन-चरित्र कहता है कि दो-तीन दिन बाद भगवान के साक्षात् दर्शन पाकर बाहर निकले।

स्रोतों में अंतर

बेलवेडियर के प्रकाशक मलूकदास के और भी चमत्कार छापते हैं, जो कड़ा के उनके एक भक्त ने लिखकर भेजे थे, पर साथ में साफ़ कहते हैं: "पाठक जन जैसा जिसका निश्चय हो मानें।"

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

पराई पीर

मलूकदास की सबसे प्रसिद्ध सीख एक साखी में है: पीर (संत, गुरु) वही है, जो दूसरे की पीर (पीड़ा) जाने। जो पराई पीड़ा नहीं जानता, वह फ़कीर बेपीर है। वे "पीर" शब्द के दोनों अर्थों से खेलते हैं, और कहते हैं कि सच्चा संत वही है, जिसके मन में दूसरों का दर्द हो।

एक और साखी में वे भेष और मन का अंतर बताते हैं: फ़कीरी का भेष धर लेने से मन हाथ नहीं आता; जो दिल से फ़कीर हो जाए, साहब उसी के साथ रहते हैं।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

मलूका सोई पीर है

मलूका सोई पीर है, जो जानै पर पीर। जो पर पीर न जानही, सो फकीर बेपीर॥

मलूक कहते हैं, सच्चा पीर (संत) वही है, जो दूसरे की पीर (पीड़ा) जानता है। जो पराई पीड़ा नहीं जानता, वह फ़कीर बेपीर है, यानी उसका न कोई पीर है, न उसके मन में दया।

प्रामाणिक संग्रह मेंमलूकदासजी की बानी (बेलवेडियर), साखी, गुरुदेव 5 (पृ. 29)

जहाँ जहाँ बच्छा फिरै

जहाँ जहाँ बच्छा फिरै, तहाँ तहाँ फिरै गाय। कहैं मलूक जहाँ संत जन, तहाँ रमैया जाय॥

जहाँ-जहाँ बछड़ा जाता है, वहाँ-वहाँ गाय उसके पीछे जाती है। मलूक कहते हैं, ऐसे ही जहाँ संत जन होते हैं, वहाँ राम अपने-आप पहुँच जाते हैं।

प्रामाणिक संग्रह मेंमलूकदासजी की बानी (बेलवेडियर), साखी, साध जन 8 (पृ. 29)

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंमलूकदासजी की बानी: शब्द, कवित्त और साखी — बेलवेडियर ने मलूकदास के चुने हुए शब्द, कवित्त और साखियाँ, कठिन शब्दों के अर्थ के साथ, जीवन-चरित्र सहित छापीं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतAhmad Shah कड़ा-मानिकपुर के मलूकदासियों को उन पंथों में गिनते हैं, जो कबीर की परंपरा से निकले और कबीर के पद गाते हैं। Westcott बताते हैं कि मलूकदासी जब जगन्नाथ की यात्रा पर जाते हैं, तो वहाँ कबीर-पंथियों के मठ में भी जाते हैं।

स्रोत

मलूकदास — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न