गंगासती

सौराष्ट्र की संत-कवयित्री, जिनके पानबाई को संबोधित भजन "ग्राम उपनिषद" कहलाते हैं

संक्षेप में

पति के समाधि लेने के अगले दिन से एक स्त्री हर भोर एक भजन रचती, और अपनी शिष्या पानबाई को उसका मर्म समझाती। बावन दिन, बावन भजन, और फिर उसने भी समाधि ले ली। यही गंगासती थीं, सौराष्ट्र की संत-कवयित्री, जिनके भजनों को "ग्राम उपनिषद" कहा गया।

संत-कविमहिला संत / संत-कवयित्री

एक नज़र में

गंगासती — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसंत-कवि, महिला संत / संत-कवयित्रीGujarati Vishwakosh, khand 14 (2001), "Bhagat, Kahalsang", ऑनलाइन लेख; Gujarati Vishwakosh, khand 14 (2001), "Bhagat, Kahalsang", ऑनलाइन लेख
कालउन्नीसवीं सदी; विवाह 1864 में, और देह-त्याग 15 मार्च 1894 को, समढियाळा (भावनगर) में (आधुनिक विद्वानों का मत)Gujarati Vishwakosh, khand 14 (2001), "Bhagat, Kahalsang", ऑनलाइन लेख

जीवन

राजपरा की गंगाबा

आधुनिक विद्वानों का मत

गुजराती विश्वकोश के अनुसार गंगाबा अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं; पिता भाईजीभाई सरवैया और माँ रूपाळीबा। बचपन से ही उनका मन धर्म की ओर था। लोक-परंपरा कहती है कि उनके गाँव राजपरा (पालीताणा) में उनका रोपा हुआ नीम आज भी खड़ा है।

1864 में उनका विवाह कहळसंग गोहिल से हुआ, जो आगे चलकर "भगतबापू" कहलाए। उनके साथ पानबाई भी आईं, जो लगभग उन्हीं की उम्र की थीं। विश्वकोश स्पष्ट करता है कि पानबाई को गंगासती की बहू मानना भ्रम है; गंगाबा की केवल दो बेटियाँ थीं, राजबा (जन्म 1866) और हरिबा (जन्म 1868)।

समढियाळा का सत्संग

आधुनिक विद्वानों का मत

विश्वकोश के अनुसार गंगाबा सादा पहनावा रखतीं, सबके लिए ख़ुद रसोई बनातीं, और उनके घर साधु-संतों का आना-जाना लगा रहता, इसलिए सत्संग का वातावरण हमेशा बना रहता। पानबाई हर रोज़ के हर काम में उनकी सहायक थीं।

आगे चलकर कहळसंग भगत समढियाळा गाँव के बाहर एक वाड़ी में झोंपड़ी बनाकर रहने लगे, और गंगाबा व पानबाई भी साथ रहीं। तीनों ने बाक़ी जीवन वहीं अलख की आराधना में बिताया। उमराळा तालुका के समढियाळा में आज भी तीनों की संयुक्त "जगह" और समाधि-स्थल है।

गंगाबा की मान्यता थी कि साधना की ऊँची अवस्था के साथ जो सिद्धियाँ या शक्तियाँ अपने-आप आती हैं, उन्हें जितना छिपाकर रखा जाए उतना अच्छा; उनका दिखावा लक्ष्य तक पहुँचने में रुकावट बनता है।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

बावन दिन, बावन भजन

परंपरागत कथा

कथा है कि कहळसंग भगत को लगा कि ईश्वर की दी सिद्धि का उपयोग उनके अहंकार के एक अंश को पोस रहा है। प्रायश्चित्त के रूप में उन्होंने समाधि लेने का निश्चय किया, पर गंगासती से वचन लिया कि वे पानबाई को पूर्णता तक पहुँचाने के बाद ही समाधि लेंगी।

भगतबापू ने पद्मासन में बैठकर समाधि ली (विश्वकोश के अनुसार 21 जनवरी 1894)। उसके अगले ही दिन से गंगासती हर भोर एक भजन रचतीं और उसका मर्म पानबाई को पूरा समझातीं। बावन दिन तक यह क्रम चला, और बावन भजन बने।

जब गंगासती को भरोसा हो गया कि पानबाई सबसे ऊँची अवस्था तक पहुँच गई हैं, तो कथा के अनुसार उन्होंने पानबाई को गोद में बिठाकर सिर पर हाथ रखा और त्रिभुवननाथ के दर्शन कराए। फिर उन्होंने सबसे विदा माँगी और पद्मासन में बैठकर समाधि ली। विश्वकोश के अनुसार तीन दिन में तीन भजन रचकर पानबाई ने भी उसी वाड़ी में देह छोड़ी।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

अडिग मन, और समय की चमक

विश्वकोश के अनुसार गंगासती के भजनों में योग, ज्ञान और भक्ति के गहरे रहस्य समझाए गए हैं। वे पानबाई को पुरुषार्थ, संयम, त्याग, वैराग्य, निरभिमान, अभय, गुरु पर भरोसा, जागृति और अभ्यास की बारीकी बताती हैं, और चेताती हैं कि सिद्धियाँ मिलने पर उनमें कभी उलझना नहीं।

"मेरु तो डगे" में वे सच्चे हरि-जन की पहचान बताती हैं: जिसके चित्त की वृत्ति सदा निर्मल रहे, जो किसी से आशा न रखे, दान दे पर ख़ुद कुछ न माँगे, और जिसे हर्ष-शोक की हिचकी न आए। संगत करनी हो तो ऐसे की करो।

"शीलवंत साधुने वारे वारे नमीए" में वे ऐसे साधु को बार-बार नमन करने को कहती हैं, जिसका व्रत कभी न बदले, जो राम का भरोसा हृदय में रखे, जिसे संसार की बातें न भाएँ, और जो ख़ुद पीछे रहकर दूसरों का पोषण करे।

प्रसिद्ध रचनाएँ और उनका अर्थ

મેરુ તો ડગે (मेरु तो डगे)

મેરુ તો ડગે પણ જેના મન નવ ડગે, ભલે ભાંગી પડે ભરમાંડ રે, વિપત પડે પણ વણસે નહીં, સોહી હરિજનનાં પ્રમાણ રે. ...મેરુ. (देवनागरी में: मेरु तो डगे पण जेना मन नव डगे, / भले भांगी पडे भरमांड रे, / विपत पडे पण वणसे नहीं, / सोही हरिजननां प्रमाण रे। …मेरु.)

मेरु पर्वत भले डगमगा जाए, पर जिनका मन नहीं डगता; चाहे पूरा ब्रह्मांड टूट पड़े। विपत्ति आए, फिर भी जो भीतर से बिगड़ते नहीं, यही हरि के जन की पहचान है। आगे के पदों में वे ऐसे जन के लक्षण गिनाती हैं, और अंत में कहती हैं: संगत करनी हो तो ऐसे की करना।

परंपरा से इनके नाम परગંગાસતીના ભજનો, "જેના મન નવ ડગે", पहला पद (पृ. 25). देवनागरी पंक्तियाँ हमारा लिप्यंतरण हैं.

વીજળીને ચમકારે (वीजळीने चमकारे)

વીજળીને ચમકારે મોતીડાં પરોવો રે પાનબાઇ! નહિતર અચાનક અંધારા થાશે જી; જોત રે જોતાંમાં દિવસો વહી જશે પાનબાઇ! એકવીસ હજાર છસોને કાળ ખાશે જી ... વીજળીને ચમકારે (देवनागरी में: वीजळीने चमकारे मोतीडां परोवो रे पानबाई! / नहितर अचानक अंधारा थाशे जी; / जोत रे जोतांमां दिवसो वही जशे पानबाई! / एकवीस हजार छसोने काळ खाशे जी …)

बिजली की चमक में ही मोती पिरो लो, पानबाई, नहीं तो अचानक अँधेरा हो जाएगा। देखते-देखते दिन बीत जाएँगे, और गिनी हुई इक्कीस हज़ार छह सौ (घड़ियों) को काल खा जाएगा। भाव यह कि साधना का अवसर बिजली की कौंध जैसा छोटा है, उसे अभी पकड़ लो।

परंपरा से इनके नाम परગંગાસતીના ભજનો, "વીજળીને ચમકારે મોતીડાં પરોવો", पहला पद (पृ. 60). देवनागरी पंक्तियाँ हमारा लिप्यंतरण हैं.

रचनाएँ और ग्रंथ

परंपरा से इनके नाम परपानबाई को संबोधित भजन — विश्वकोश के अनुसार गंगासती ने बावन भजन रचे, जिन्हें "ग्राम उपनिषद" कहा जाता है। भजनों की छाप "गंगासती एम बोलियां" या "गंगासती कहे सांभळो पानबाई" है। इन्हें बचाने और फैलाने में पीपराळी गाँव के हरिजन साधु भूदरदास और उनके वारिसों का बड़ा योगदान रहा। विश्वकोश यह भी लिखता है कि 1948 की बाढ़ में उनका भजन-संग्रह नष्ट हो गया माना जाता है।

परंपरा से इनके नाम परपानबाई का भजन: "गंगा सती ज्यारे स्वधाम गया" — इसी संग्रह में एक भजन पानबाई के नाम से है, जो गंगासती के स्वधाम जाने पर पानबाई के शोक का, और फिर "वस्तु" का विचार करते ही उस शोक के आनंद में बदल जाने का वर्णन करता है; इसकी छाप "गंगा सती प्रतापे पानबाई बोलिया" है।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

आधुनिक विद्वानों का मतविश्वकोश कहळसंग, गंगासती और पानबाई को सौराष्ट्र की "संत-त्रिपुटी" कहता है, जिन्होंने जाति या वर्ण का भेद किए बिना जीवन जिया और अनन्य भक्ति से परम तत्त्व का अनुभव किया। उनके भजनों में ज्ञान, भक्ति और योग का त्रिवेणी-संगम माना जाता है।

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स्रोत

गंगासती — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न