स्वामी हरिदास

वृंदावन के निधिवन के रसिक संत, जिनके द्वार पर राजा भी दर्शन की आस में खड़े रहते

संक्षेप में

किसी ने संत को पारस पत्थर भेंट किया, और संत ने उसे यमुना में फेंक दिया। भेंट करने वाला दुखी हुआ, तो संत ने कहा: नदी की रेत मुट्ठी में उठाओ। उठाई, तो हर कण पारस निकला। यही वृंदावन के स्वामी हरिदास थे, जिनके द्वार पर भक्तमाल के अनुसार राजा भी दर्शन की आस में खड़े रहते थे।

सगुण भक्त-कविकृष्ण-भक्ति

एक नज़र में

स्वामी हरिदास — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीसगुण भक्त-कविभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 91, p. 96; Growse, Mathura: A District Memoir (1883), p. 221
परंपराकृष्ण-भक्तिभक्तमाल (नाभादास), छप्पय 91, p. 96; Growse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 197, 219
कालGrowse के अनुसार सोलहवीं सदी का अंत और सत्रहवीं का आरंभ (अकबर और जहाँगीर का समय); परंपरागत "भक्त-सिंधु" की तिथियाँ संवत् 1441–1537 असंभव हैं (मत अलग-अलग)Growse, Mathura: A District Memoir (1883), pp. 219–221

जीवन

निधिवन के संत

परंपरागत कथा

Growse "भक्त-सिंधु" की कथा देते हैं: हरिदास बचपन से ही खेलों की जगह प्रार्थना और ध्यान में लगे रहते। माता-पिता के कहने पर भी उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया, और पच्चीस बरस की उम्र में वृंदावन के सामने यमुना के बाएँ किनारे मानसरोवर के एकांत में जा बैठे। बाद में वे वृंदावन के निधिवन में आ गए, जहाँ उनके पहले शिष्य उनके मामा बिठल-बिपुल बने।

Growse बताते हैं कि जन्म-स्थान और जाति पर दो मत हैं: भक्त-सिंधु उन्हें कोल के पास के सनाढ्य ब्राह्मण परिवार का बताता है, जबकि हरिदास के वंशज कहते हैं कि वे सारस्वत ब्राह्मण थे और उनका परिवार मुल्तान के पास उच्च से आया था।

तिथि का सच

मत अलग-अलग

भक्त-सिंधु हरिदास का जन्म संवत् 1441 और देह-त्याग संवत् 1537 बताता है। Growse लिखते हैं कि यह साफ़ ग़लत है, क्योंकि जो बादशाह उनसे मिलने वृंदावन आया, वह निश्चित ही अकबर था, और अकबर संवत् 1612 में गद्दी पर बैठा।

Growse के पास संवत् 1825 की एक हस्तलिखित पोथी थी, जिसमें हरिदास से आगे के सारे महंतों की सूची है। हर महंत को बीस बरस देने पर भी हरिदास का देह-त्याग संवत् 1665 के आसपास आता है; और उनकी भाषा तुलसीदास (मृत्यु संवत् 1680) से पुरानी नहीं लगती। Growse का निष्कर्ष है कि हरिदास अकबर और जहाँगीर के समय में थे। Growse यह भी कहते हैं कि हरिदास चैतन्य से प्रभावित तो थे, पर दोनों के आमने-सामने मिलने का कोई प्रमाण नहीं।

जीवन की प्रमुख कथाएँ

पारस पत्थर और इत्र की शीशी

परंपरागत कथा

Growse के अनुसार दिल्ली का एक खत्री दयालदास पारस पत्थर लेकर आया, जो हर चीज़ को सोना बना देता था, और स्वामी को भेंट किया। स्वामी ने उसे यमुना में फेंक दिया। दयालदास दुखी हुआ, तो स्वामी उसे किनारे ले गए और कहा, पानी में से एक मुट्ठी रेत उठाओ। उठाई, तो हर कण उसी पत्थर जैसा निकला। दयालदास समझ गया कि संतों को धन की ज़रूरत नहीं, और वह उनका शिष्य बन गया।

एक कायस्थ ने हज़ार रुपये की इत्र की शीशी भेंट की, और स्वामी ने उसे लापरवाही से ज़मीन पर गिरा दिया। भेंट करने वाला आहत हुआ, पर मंदिर में ले जाया गया, तो देखा कि पूरा मंदिर उसी इत्र से महक रहा था: भगवान ने भेंट स्वीकार कर ली थी।

प्रियादास की टीका इन्हीं दो कथाओं की ओर इशारा करती है: "ल्यायो कोऊ चोवा वाकौ अति मन भोवा वामें, डार्‌यौ लै पुलिन… नैसुकु उघारे पट सुगंध बुड़ाइयै। पारस पाषान करि जल डरवाय दियौ, कियौ तब शिष्य।"

तानसेन और अकबर

परंपरागत कथा

Growse के अनुसार भक्त-सिंधु कहता है कि दिल्ली दरबार के एक गायक का बेटा इतना मंदबुद्धि था कि घर से निकाल दिया गया। वृंदावन में सड़क पर सोते हुए उससे स्वामी की ठोकर लगी। उसकी कहानी सुनकर स्वामी ने उसका नाम "तानसेन" रखा और अपनी इच्छा-शक्ति से उसे निपुण गायक बना दिया।

तानसेन का गायन सुनकर बादशाह उनके गुरु से मिलने वृंदावन आया और भाटरोंड से पैदल निधिवन पहुँचा। स्वामी ने बादशाह पर ध्यान ही नहीं दिया। जब बादशाह ने कोई सेवा माँगी, तो स्वामी उसे बिहारी घाट ले गए, जिसकी हर सीढ़ी रत्न-जड़ी दिखी, और कहा कि इस टूटी सीढ़ी की जगह नई लगा दो। यह बादशाह के बस का न था; उसने बंदरों और मोरों के भोजन के लिए थोड़ा दान दिया और चला गया।

शिक्षाएँ और भक्ति का स्वरूप

रसिक छाप

नाभादास का छप्पय: "(श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की। जुगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजविहारी। अवलोकत रहें केलि, सखी सुख के अधिकारी।" यानी आसुधीर के कुल को उजाला देने वाले हरिदास पर रसिकता की छाप है; युगल के नाम का नियम, नित कुंजविहारी का जप, और सखी-भाव से युगल की लीला का दर्शन।

छप्पय आगे कहता है: "गान कला गन्धर्व, स्याम-स्यामा कौं तोषैं। उत्तम भोग लगाय, मोर मरकट तिमि पोषैं। नृपति द्वार ठाढ़े रहें, दरसन आसा जास की।" वे गंधर्व जैसी गान-कला से श्याम-श्यामा को प्रसन्न करते, उत्तम भोग लगाकर मोरों और बंदरों को भी खिलाते, और राजा भी उनके द्वार पर दर्शन की आस में खड़े रहते।

रचनाएँ और ग्रंथ

प्रामाणिक संग्रह मेंहरिदास और उनकी शिष्य-परंपरा की वाणी — Growse के अनुसार हरिदास की परंपरा के हर महंत ने साखी, चौबोले या पद जैसी भक्ति-रचनाएँ कीं। हरिदास की अपनी रचनाओं की भाषा को Growse तुलसीदास से पुरानी नहीं मानते, और इसी को उनकी तिथि का एक प्रमाण बनाते हैं।

भक्ति, साहित्य और समाज में योगदान

ऐतिहासिक प्रमाणGrowse के अनुसार वृंदावन में पुराने चार संप्रदायों के अलावा तीन नए संप्रदाय बने: गौड़ीय वैष्णव, राधावल्लभी, और स्वामी हरिदास के शिष्य। हरिदास के बाद उनके मामा बिठल-बिपुल महंत बने, और फिर बिहारिनीदास।

ऐतिहासिक प्रमाणGrowse के समय (1883) स्वामी हरिदास के वंशज गोसाइयों का मुख्य केंद्र वृंदावन का बिहारीजी, यानी बाँके बिहारी, मंदिर था। Growse लिखते हैं कि पूरे भारत में यही एक मंदिर है जिस पर केवल इसी संप्रदाय का अधिकार है, और भक्तों के चंदे से यह उन्हीं दिनों नए सिरे से बना था।

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तीर्थ

स्रोत

स्वामी हरिदास — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न